





जीवन की पूर्णता के लिये अष्टांग मार्ग, पातंजलि योग सूत्र के अनुसार दिये अष्टांगीक आठ मार्ग के अंग है, सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्मात, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यासाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि।
ऋषि व्यक्तित्व होने के लिये आत्मज्ञान का, आत्मदृष्टि का पूर्ण विकास होना आवश्यक है। वह हरदम स्वस्थ, निरोग, प्रसन्नचित, पूर्ण सम्मोहन युक्त, व्यक्तित्व अत्यधिक आकर्षण एवं चुम्बकीय होना चाहिये, सम्पूर्ण प्रकार का ज्ञान समाहित हो और वह हर क्षेत्र में प्रवीण हो, भौतिक के साथ-साथ आध्यात्मिक उत्थान भी हो और इसी जीवन में दिव्य अनुभूतियां प्राप्त करें, तो व्यक्ति निश्चित ही पूर्ण मानव कहलाने योग्य है।
इसलिये ऋषियों ने एक ऐसे दिवस का चयन किया, जो अपने आप में तेजस्विता युक्त है। ऋषि पंचमी पर्व पर यह दीक्षा ग्रहण करने से व्यक्ति सहज ही उपरोक्त सुभावों को अपने जीवन में समावेश करता हुआ हर प्रकार से सफलता का अधिकारी होता है। यह दीक्षा पूर्ण ऋषित्व प्राप्ति की साधना है, क्योंकि ऋषि का अर्थ ही उस व्यक्तित्व से है, जिसने समस्त प्रकार के अनुभवों को अपने अंदर पचाया हो, सब प्रकार से रहता हुआ (योगी एवं भोगी) अपने जीवन को गतिशील किया हो।
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