





श्री कल्कि अवतारम् साधना
साधना सामग्री- तांत्रोक्त नारियल, मधुरूपेण रूद्राक्ष, वशित्व माला
साधना विधि-
इस साधना को श्रावण शुक्ल षष्ठी तिथि या किसी भी बुधवार को सम्पन्न करना है। यह साधना रात्रि कालीन 09:00 से 12:00 बजे के मध्य सम्पन्न करनी है, यह दो दिन का प्रयोग है। साधक सर्वप्रथम स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध पीले वस्त्र धारण कर पीले आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुंह कर अपने पूजा स्थान पर बैठ जायें, अपने सामने लकड़ी के बाजोट पर पीला वस्त्र बिछा कर, किसी पात्र में कुंकुंम से पांच बिन्दियां बनाकर, उस पर ‘तांत्रोक्त नारियल’ को स्थापित कर दें और कुंकुंम से उस पर चार बिन्दियां लगायें। इसके पश्चात् नारियल के ऊपर चावल की ढेरी बनाकर, उस पर ‘मधुरूपेण रूद्राक्ष’ को स्थापित कर दें।
सर्वप्रथम संक्षिप्त गुरू पूजन सम्पन्न कर गुरू मंत्र की एक माला जप करें। इसके बाद अक्षत, पुष्प, धूप आदि दिखाकर पूजन करें, और पांच मिनट तक किसी भी बिन्दु पर एकाग्रचित्त होकर त्राटक करें, तत्पश्चात् हाथ में जल लेकर अपने नाम व गोत्र का उच्चारण कर, तथा अपनी मनोकामना को पूरी करने का संकल्प करें, और फिर जल को जमीन पर छोड़ दें।
इसके बाद ‘वशित्व माला’ से निम्न मंत्र का आसन पर ही खड़े होकर एक माला जप करें, तथा दस माला की आसन पर बैठकर जप करें, इस प्रकार 11 माला मंत्र जप करें-
मंत्र
।। ऊँ क्रीं कल्कयै क्रीं फट् ।।
दो दिन तक मंत्र जप की समाप्ति के पश्चात् गुरू आरती करें, इसके बाद साधना सामग्री को किसी एकान्त स्थान में घर से दूर ले जाकर जमीन में गाड़ दें, या नदी में इसे विसर्जित करें दें।
भगवान विष्णु ने वराह के रूप में क्रुद्ध अवतार लेकर दुष्ट दानवराज हिरण्याक्ष का संहार कर पृथ्वीवासियों की प्राण रक्षा करके पुनः शांति की स्थापना की और प्रकृति को संतुलित किया था। इस रूप में भगवान विष्णु ने यह उदाहरण प्रस्तुत किया कि जब भी उनके भक्तों को कोई संतप्त करेगा तब वे उनके दुःखों को जिस प्रकार उन्होंने दैत्य हिरण्याक्ष का अपने नुकीले दांतों से उदर चीर कर अंत किया, ठीक उसी प्रकार जो भी उनके भक्तों के जीवन की बाधा, दुःखपूर्ण स्थितियां है, उन्हें भी चीरकर निर्मूल कर देंगे।
वर्तमान में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसके जीवन में कोई कठिनाई, बाधा, विकट परिस्थिति न हो। प्रत्येक मानव के जीवन में कोई-न-कोई स्थिति या शत्रु जो ईर्ष्यावश हानि पहुँचाना चाहता हो, होते ही हैं, जो मुख्यतः सगे-संबंधी, मित्र-बन्धु, सहकर्मचारी के रूप में सदा अपनी बुरी नजर व्यक्ति पर गड़ाये रहते हैं कि कब मौका मिले और सामने वाले को हानि पहुंचाये और बेचारे सामने वाले व्यक्ति को इसका जरा भी भान नहीं होता कि जिसे वह अपना समझ रहा है वही नुकसान पहुंचाने की फिराक में है। ऐसी स्थिति प्रत्येक के जीवन में है कोई-न-कोई गुप्त शत्रु जो निरन्तर नुकसान पहुंचाने में प्रयासरत है या पतन होते हुये देखने में तत्पर है।
ऐसे दुष्ट व्यक्तियों से निजात पाने का एवं अपने परिवार व स्वयं को एक सुरक्षा कवच प्रदान करने का एक मात्र उपाय है वराह शक्ति साधना व वराह शक्ति पूर्ण परिवार सुरक्षा दीक्षा, जिसमें सद्गुरू द्वारा दीक्षित हो आप स्वयं एवं पूरे परिवार के प्रति बुरी नजर, शत्रु बाधा, रोग-कष्ट, गुप्त शत्रु बाधा जैसी दुःख पूर्ण स्थितियों से बचाव कर पूर्णतया निश्चिंत होकर अपने जीवन पथ पर निरन्तर सुरक्षित हो अग्रसर रह सकेंगे।
वराह शक्ति साधना
यह साधना भाद्रपद शुक्ल तृतीया को या किसी भी बुधवार को सम्पन्न किया जा सकता है। साधक प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ पीले वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुंह कर पीला आसन बिछाकर अपने सामने लकड़ी के बाजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर किसी ताम्र पात्र में ‘‘श्री नारायण वराह यंत्र’’ को स्थापित कर पूजा स्थान में बैठ जाएं। सर्वप्रथम संक्षिप्त गणेश/गुरू पूजन संपन्न कर गुरू मंत्र की 04 माला जप करें।
तत्पश्चात् यंत्र का पूजन कुंकुम, पुष्प, अक्षत, दीपक व नैवेद्य आदि से करें। साधना सफलता हेतु संकल्प ग्रहण करें।
विनियोग
अस्य मंत्रस्य भार्गव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, आदि वाराह देवता, सर्वेष्ट सिद्धये जपे विनियोगः।
ध्यान –
आपादं जानुदेशाद्धर कनकनिभं नाभिदेशादधस्तात्।
मुक्ताभं कंठदेशात्तरूण रविनिभं मस्तकान्नीलभासम्।
ईडे हस्तै र्दर्धानं रथचरणदरैः खङ्ग खेटौ गदाख्याम्।
शक्तिं दानाभये च क्षितिधरण लस द्दंष्ट्रमाद्यं वराहम्।।
फिर ‘‘काली हकीक माला’’ से निम्न मंत्र की 3 माला मंत्र जप नित्य 11 दिनों तक संपन्न करें:-
नित्य मंत्र जप पश्चात् गुरू आरती संपन्न करें। साधना समाप्ति उपरांत 12वें दिन यंत्र व माला को किसी पवित्र जलाशय में विसर्जित कर दें। साधना काल में शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण करें व भूमि शयन करें।
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