





धर्मग्रंथों में विश्वकर्मा को सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी का वंशज माना गया है। ब्रह्माजी के पुत्र धर्म तथा धर्म के पुत्र वास्तुदेव थे, जिन्हें शिल्प शास्त्र का आदि पुरुष माना जाता है। इन्हीं वास्तुदेव की अंगिरसी नामक पत्नी से विश्वकर्मा का जन्म हुआ। अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए विश्वकर्मा भी वास्तुकला के महान आचार्य बने। मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और देवज्ञ इनके पुत्र हैं। इन पांचों पुत्रों को वास्तु शिल्प की अलग-अलग विधाओं में विशेषज्ञ माना जाता है।
विश्वकर्मा प्रकाश को वास्तु तंत्र का अपूर्व ग्रंथ माना जाता है। इसमें अनुपम वास्तु विद्या को गणितीय सूत्रों के आधार पर प्रमाणित किया गया है। ऐसा माना जाता है कि सभी पौराणिक संरचनाए भगवान विश्वकर्मा द्वारा निर्मित हैं। भगवान विश्वाकर्मा के जन्म को देवताओं और राक्षसों के बीच हुए समुद्र मंथन से माना जाता है। पौराणिक युग के अस्त्र और शस्त्र भगवान विश्वकर्मा द्वारा ही निर्मित हैं। वज्र का निर्माण भी उन्होने ही किया था।
धर्मशास्त्रों में विश्वकर्मा के पांच स्वरूपों या अवतारों का भी वर्णन मिलता है, जैसे, पहला; विराट विश्वकर्मा, इन्हें सृष्टि को रूप-आकार देने वाला कहा गया है। दूसरा; धर्मवंशी विश्वकर्मा, जो महान शिल्पज्ञ, विज्ञान-विधाता प्रभात के पुत्र हैं। तीसरे; अंगिरावंशी विश्वकर्मा, विज्ञान-व्याख्याता वसु के पुत्र। चौथे, सुधन्वा विश्वकर्मा, महान शिल्पाचार्य ऋषि अथवी के पुत्र और पांचवें भृगुवंशी विश्वकर्मा, उत्कृष्ट शिल्प विज्ञानी शुक्राचार्य के पौत्र के रूप में उल्लिखित हैं।
भगवान विश्वकर्मा को हिंदू पौराणिक कथाओं में दिव्य वास्तुकार कहा जाता है, इसलिए उनका वास्तुकला के प्राचीन विज्ञान, वास्तु शास्त्र से गहरा संबंध है। यह देखते हुए कि उन्होंने ब्रह्मांड जैसे देवताओं के घरों और ब्रह्मांडीय नगरों में संरचनाओं का निर्माण किया था, वास्तु के सिद्धांतों को निर्धारित करने में विश्वकर्मा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिल्पकारों, वास्तुकारों और निर्माणकर्ताओं के देवता माने जाने के कारण, वास्तु शास्त्र पर उनका प्रभाव गहरा है।
विश्वकर्मा के उपदेशों से उत्पन्न वास्तु शास्त्र, निर्देशों का एक समूह है जिसका उद्देश्य मानव निर्मित वातावरण को ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं के साथ सामंजस्य स्थापित करना है। वास्तु यह सुनिश्चित करता है कि सूर्य, वायु और प्राकृतिक तत्वों जैसी प्राकृतिक शक्तियों के संतुलनकारी प्रभावों के माध्यम से संरचनाएँ कल्याण, समृद्धि और शांति को बढ़ावा दें। इस प्रकार, सबसे बुनियादी वास्तु दिशानिर्देश और विश्वकर्मा का स्थान, दिशाओं और ब्रह्मांडीय संरेखण का ज्ञान आधार का काम करते हैं।
आज मानव जीवन चारों ओर से विभिन्न परेशानियों से जकड़ा हुआ है। व्यक्ति चाह कर भी इच्छित स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाता और उसके द्वारा किये गये सभी प्रयास प्रायः विफल ही होते हैं। आज जब महंगाई आसमान को छु रही है, सामान्य मानव के लिये सुन्दर भवन, वाहन, सुख, समृद्धि, ऐश्वर्य आदि मात्र कल्पना बन कर ही रह गये हैं। इसके अलावा व्यक्ति, चाहे वह किसी भी श्रेणी का हो, उसका जीवन, शोक, मोह, रोग, भय, ऋण, व्याधि आदि से घिरा रहता है, वह एक-एक पग आशंकित सा उठाता हुआ चलता रहता है और खुद हमेशा आनन्द से वंचित रहता है।
संसार में हर व्यक्ति की यह इच्छा रहती है कि उसके जीवन में सभी सुख-सुविधाओं से युक्त स्वयं का भवन या मकान हो और यह श्रेष्ठतम मनोकामना परिपूर्ण हो सके। यह धारणा सामान्य मनुष्य में निश्चित रूप से रहती है। इसके साथ ही स्वयं के व्यवसाय के रूप में कारखाना, फैक्ट्री या दुकान के माध्यम से आर्थिक समृद्धि की प्राप्ति के लिए धन अर्जन कर सके। यह सामान्य इच्छाएं व्यक्ति जीवन में भरसक प्रयास करके उन स्थितियों को प्राप्त कर भी लेता है। परंतु उसके बाद भी परिवार में क्लेश, अशांति, बच्चों का बीमार रहना, व्यापार में घाटा, शत्रुओं का हावी होना, मानसिक परेशानी, व्याधि, जरा, पीड़ा, अकारण तनाव, धनहीनता आदि अनेक विषम स्थितियां प्रमुख रूप से वास्तु दोष के स्वरूप प्राप्त होती हैं।
मकान एक महत्वपूर्ण संपत्ति होती है। नये मकान में सही विधि से वास्तु क्रिया के रूप में बदलाव करना काफी कष्ट दायक होता है जिससे हमें विशेष रूप से व्यर्थ की आर्थिक परेशानियां उठानी पड़ती है और जीवन में सुस्थितियां नहीं आ पाती है। लाखों-लाखों रूपये व्यय करने के बाद भी जीवन में शांति और समृद्धि प्राप्त नहीं हो पाती है। वास्तु दोष युक्त घर होने से पूरे परिवार में प्रतिकूल परिस्थितियों का विस्तार निरन्तर होता रहता है अर्थात् रोग, कलह, तनाव, धनहीनता, शारीरिक कमजोरी, मानसिक चिंताएं, उत्तरोत्तर जीवन अधोगति की ओर अग्रसर होता रहता है।
यह संभव नहीं है कि हम अपने घर, भवन, दुकान, कारखाना, फैक्ट्री और फर्म में तोड़ फोड़ कर वास्तु के अनुरूप निर्माण पुनः कर सकें। इस हेतु शास्त्रोक्त रूप में तथा विश्वकर्मा ब्रह्मा के मंत्रों से चैतन्य वास्तु कृत्या यंत्र की सही तरीके से स्थापना करने से जीवन की अनेक कठिनाईयों का निवारण प्राप्त किया जा सकता है। वास्तु कृत्या यंत्र का मूल उद्देश्य उस व्यक्ति या परिवार से संबंधित सभी दिशाओं में अनुकूल चेतना का संचार करना होता है।
मकान, दुकान,फैक्ट्री या व्यवसाय क्षेत्र में वास्तु दोष के निवारण के लिए वास्तु कृत्या यंत्र स्थापित करने का विधान शास्त्रों में बताया गया है।
वास्तु कृत्या यंत्र में आठ दिशाओं के स्वामीओं का समावेश होता है। जो हमें पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक कठिनाईयों और अनेक कष्टों से मुक्त ही नहीं वरन् जीवन में उत्तरोत्तर सुस्थितियां लाते हैं और व्यक्ति जीवन की सभी इच्छाओं को परिपूर्णता से अपने अनुकूल बना लेता है।
– वास्तु कृत्या यंत्र व्यक्ति को उच्चकोटि का भवन, वाहन आदि का सुख प्राप्त होता है, जो उसके लिये हर दृष्टि से अनुकूल होता है।
– इस यंत्र के स्थापन से व्यक्ति के जीवन में यश, मान, प्रतिष्ठा, धन, वैभव एवं अटूट लक्ष्मी का आगमन होता ही रहता है।
– उसके घर में रोग, शोक, भय, व्याधि आदि रह नहीं पाते, वह समस्त ऋणों से मुक्त होता हुआ प्रसन्नता पूर्वक अपना जीवन व्यतीत करता है।
– घर-परिवार में सुख, शांति, समृद्धि बनी रहती है, पत्नी, सन्तान आदि अनुकूल बने रहते हैं और उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। वह स्वयं सच्चरित्र जीवन व्यतीत करता है।
– यदि घर में कोई तांत्रिक कुप्रभाव भी हो, तो विनष्ट होता है, जिससे दुर्घटनाये, आकस्मिक मृत्यु योग आदि समाप्त हो जाते हैं।
– घर में एक अनिवर्चनीय आध्यात्मिक वातावरण का सृजन होता है, जिससे परिवार के सभी सदस्य हमेशा उच्चता की ओर ही अग्रसर होते रहते हैं और उनकी आने वाली पीढ़ियां भी सच्चरित्र, विद्वान और पूजनीय होती हैं।
वास्तु कृत्या यंत्र अपने आप में एक अद्वितीय और दुर्लभ यंत्र है जिसे गुरूदेव ने अपने सानिध्य में ज्ञान, चेतना तथा अपने मुख से निःसृत मंत्रों तथा ईशान और अग्नि कोण से संस्पर्शित प्राण प्रतिष्ठित कर इस यंत्र को दिव्य और प्राण संजीवन क्रिया से आपूरित किया है। बिना किसी तोड़-फोड़ या स्थान परिवर्तन के भवन, दुकान, फैक्ट्री, कारखाने आदि में आनेवाली बाधाएं वास्तु कृत्या यंत्र के स्थापित करने से समाप्त हो जाते हैं तथा आपके भौतिक और आर्थिक जीवन को सुखमय तथा समृद्धिशाली बनाता है, साथ ही वंश वृद्धि, यश और कीर्ति की वृद्धि में पूर्ण सक्षम है।
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