





जीवन केवल साँसों का चलना मात्र ही नहीं, अपितु हर पग पर सचमुच जीना-सीखना है। आनन्द का जन्म परिस्थितियों से नहीं, अपितु उस चेतन अवस्था से होता है, जहाँ मन की शिकायतें समाप्त होकर अपने वास्तविक अस्तित्व को स्वीकार कर लेती हैं। इसलिये हमारे उपनिषदों ने कहा है- “आनन्द परिस्थितियों का उपहार नहीं, बल्कि हमारे ही चेतना का ही प्रकाश स्वरुप है।”
जिस मनुष्य के जीवन में हँसी खो गयी, वहाँ उपलब्धियाँ भी बोझ बन जाती हैं; और जिस साधक के भीतर आनन्द का जागरण हो गया, प्रेम का उदय हो गया, वहाँ साधारण क्षण भी उत्सव, नृत्य बन जाते हैं। उपनिषद् जिस आनन्द को आत्मा का स्वभाव कहते हैं, उसी की एक सहज अभिव्यक्ति है-‘हँसता-खेलता जीवन।’
पिछला अंक कर्म शक्ति के द्वारा महालक्ष्मी के विविध स्वरुपों की प्राप्ति पर आधारित था। जिससे यह तो स्पष्ट हुआ- “कर्म वह शक्ति है जिसके माध्यम से साधक को भविष्य की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि वह अपने उज्ज्वल भविष्य के स्वर्णिम सूत्रों का निर्माण स्वयं ही करता है।” जीवन के स्वर्णिम सूत्रों के निर्माण हेतु अब प्रस्तुत है सद्गुरुदेव के प्रवचन ग्रन्थमाला श्रृंखला की अगली कड़ी स्वयं पूज्यपाद सद्गुरुदेव के ही समृद्ध, गौरवपूर्ण तथा ओजस्वी वाणी में-
यह विशेष, महानतम रुप में दीपावली का महोत्सव, एक तो सामान्य रुप में अनेक उत्सव आते हैं और उन्हें हम अपने ईच्छा और भावना के अनुरुप सम्पन्न करते हैं। प्रत्येक मास में कालाष्टमी आती है, एकादशी का पर्व आता है, प्रदोष का पर्व आता है, ऐसे दिवसों को हम अपने भावना, मनोकामना के अनुसार सम्पन्न करते हैं। परन्तु महालक्ष्मी का पर्व समान्य रुप में सम्पन्न नहीं होता और इस पर्व को महोत्सव के रुप में अर्थात् महानतम् आनन्दमय स्थितियों की प्राप्ति के लिये…, महानतम् का तात्पर्य कि हम एक सामान्य मनुष्य हैं, सामान्य गृहस्थ हैं और उस गृहस्थ परिवार में कोई एक व्यक्ति मुखिया होता है जो परिवार का भरण-पोषण करता है, संचालन करता है। जिसके कारण वह सामान्य गृहस्थ से थोड़ा ऊपर होता है, पिताजी उससे सलाह लेंगे, दादाजी उससे पूछेंगे, दादी अम्मा अपने कार्य हेतु उससे सलाह लेती हैं।
इसी प्रकार गांव के अन्दर एक सरपंच अथवा मुखिया होता है; गांव के अन्दर जो भी अमुक समस्यायें हैं, पूरे गांव के दायित्वों के निर्वहन हेतु उस गांव के जनसंख्या के आधार पर उस व्यक्ति का चुनाव होता है। यही प्रक्रिया एक नगर के दायित्वों के आधार पर भी चलता है कि यह व्यक्ति नगर का महापौर है या नगर पालिका का अध्यक्ष है। अर्थात् पूरे नगर को कैसे मेंटेन करना है, वह देखने वाला है, और इसी मेंटेनेंस और दायित्वों के आधार पर ही विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री तथा राष्ट्रपति के रुप में पद उच्च होते जाते हैं। तो उत्तरोत्तर ज्यों-ज्यों उनकी वृद्धि होती है, त्यों-त्यों वे महानतम जिम्मेदारियों से युक्त होते हैं। ठीक उसी प्रकार कुछ सामान्य पर्व-त्यौहार, उत्सव भी होते हैं और कुछ विशेष उत्सव भी सम्पन्न किये जाते हैं। वट सावित्री, मकर संक्रान्ति, बसंत पंचमी आदि कुछ विशेष उत्सव होते हैं। और कुछ महानतम, अति विशेष रुप में पर्व-त्यौहार, उत्सव सम्पन्न किये जाते हैं। यह महालक्ष्मी का पर्व उन अति विशेष पर्व-त्यौहार, उत्सवों में से ही एक है और हम कुछ समय पूर्व से ही सम्पन्न करने की योजना बनाने लगते हैं, Planning करने लगते हैं कि यह कार्तिक अमावस्या का, महालक्ष्मी का महापर्व आ रहा है और किस प्रकार से इसे अद्वितीय रुप में सम्पन्न करना है, क्या नूतन कार्य करने हैं, घर में कौन सी वस्तुयें नयी लानी है, क्या परिवर्तन करना है…? यह सब चिन्तन-मनन 3-4 महिने पहले से ही करना प्रारंभ कर देते हैं, जिससे कि महालक्ष्मी का महोत्सव भव्यतम रुप में सम्पन्न किया जाता है।
हमें आनन्द, प्रसन्नता, समृद्धि प्राप्त हो; और लक्ष्मी कोई समान्य रुप में नहीं अपितु महानतम रुप में प्राप्त हो। हम सामान्य मजदूरी करें, सामान्य कार्य करें; जिससे थोड़ा सा धन प्राप्त हो जाये, तथा हम जीवन में भरण-पोषण कर सकें; यह कोई विशेष श्रेष्ठता या महानता नहीं है। महानता तो इसमें हैं कि ज्यों-ज्यों हमारी अभिलाषाओं, कामनाओं, ईच्छाओं में वृद्धि हो तो हम उनमें पूर्णता की प्राप्ति हेतु निरन्तर कार्य करते रहें।
“इसीलिये घर का कचरा बाहर निकालने के साथ-साथ हमें अपने मन की शिकायतों का कचरा भी बाहर निकालना पड़ेगा, क्योंकि लक्ष्मी प्राप्ति हेतु घर सजाना अत्यंत सरल है, लेकिन शांति की प्राप्ति हेतु मन खाली करना आप में बहुत बड़ी साधना है।” घर की सफाई हम नित्य करते ही हैं, ताकि घर में गंदगी, कीड़े, जानवर ईत्यादि अपना वर्चस्व स्थापित न कर सकें और हमारा बीमारियों से बचाव हो सके। दीपावली महापर्व पर हम और अधिक चैतन्य भाव से घर के एक-एक कोने में स्वच्छता का ध्यान रखते हैं। और हमारे मन में जो अनगिनत शिकायतों का कचरा है उसे निकालकर बाहर फेकें। हम कचरे को रोज बाहर फेंक देते हैं और हमें शिकायतें भी बहुत होती हैं-अपने सामने वाले के प्रति। सबसे ज्यादा शिकायतें हम अपने सामने वाले व्यक्ति से ही करते हैं, जो हमारे परिवार में हमारे साथ रहता है। आपकी शिकायत आपके पत्नी से, आपके बच्चों से, बहु से होंगी। और उनकी शिकायतें आपसे होंगी, आपके बच्चों से होंगी।
कुछ गिले थे, कुछ शिकवे थे, कुछ बात अधूरी रह गई,
जिसे भूलना था जीवन में, वही याद जरूरी रह गई।
इस प्रकार के शिकायतों का कचरा इस दीपावली महापर्व पर बाहर फेंकने की क्रिया शुरु करें। बेच दें उस क्षमा रुपी कबाड़ी को और खरीद लें ‘शुक्राना’ अर्थात् ‘शुक्रिया’। अपनों के प्रति, पड़ोसीयों के प्रति, बेगानों के प्रति, परिवार और रिश्तेदारों के प्रति, वर्तमान में चल रहे हालातों के प्रति और साथ में जिन्दगी से, भगवान से और खुद के प्रति। हमें अक्सर शिकायतें इन्हीं से ही होती है। घर की सफाई तो हर वर्ष होती ही है, परंतु मन की सफाई कितनी बार होती है? घर में वर्षों से पड़े सामान को हम कहते हैं-“कचरा है, बाहर निकालो।”
लेकिन मन में वर्षों से पड़ी हुई- पुरानी शिकायत, किसी के प्रति क्रोध, अपमान की स्मृति, असफलता की पीड़ा, किसी से तुलना, ईर्ष्या, अपेक्षा, मन-मुटाव को हम कचरा नहीं मानते। हम अक्सर यही सोचकर दुःखी होते रहते हैं-
उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?
मेरी ऐसी हालत कैसे हो गयी भगवान?
मेरे गुरु ने ऐसा मेरे साथ क्यों किया?
मुझे जीवन में Success क्यों नहीं मिल पाया?
ये सब शिकायतें हम अपनों से, ईश्वर के चित्र के सामनें, मन्दिर में, मूर्ति के सामने, अपने पूजा स्थल में, गुरु के सामने करते हैं। “मन्दिर में हम शिकायतें करने ही तो जाते हैं।” और उन शिकायतों का निवारण तलाशते हैं। परन्तु मुझे यह नहीं समझ में आता है कि जिस व्यक्ति ने आपको एक बार दुःख दिया, आपको अपमानित किया, आपकी उपेक्षा की, मन-मुटाव किया; आप उसे अपने मन में प्रतिदिन असंख्य बार दुःख देने की अनुमति क्यों देते हैं…?
पहली चोट दूसरे ने दी। लेकिन उसी घटना को बार-बार स्मरण करके स्वयं को पीड़ा देना, यह मन की पुनरावृत्ति है और यहीं से यह तत्व केवल शिकायत या घटना तक सीमित नहीं रहता अपितु मानसिक बोझ बन जाता है।
इसीलिये अपने जिन्दगी से, गुरु से, रब से, ईश्वर से जो भी शिकायते हैं। उसे इस दीपावली में छोड़ कर ‘शुक्राना’ अर्थात् ‘शुक्रिया’ अपनाना है। शुक्राना अपने सद्गुरु के प्रति कि तेरा लाख-लाख शुक्र है इस अनमोल जीवन का… क्योंकि ये जीवन तो बार-बार नहीं मिलता है। सामने रखा गुब्बारा अगर फुट जाये तो दूसरा गुब्बारा फुला लेंगे, यदि बल्ब फ्यूज हो जायेगा तो बाजार से दूसरा आ जायेगा परन्तु यह जिन्दगी बार-बार नहीं मिलती है। इसलिये शुक्रिया करना चाहिये अपने सद्गुरु का कि उनके द्वारा आपको ऐसी बेहतरीन जिन्दगी मिली। और साथ ही उस बेसकिमती सांसों के लिये जिसे मैं निरन्तर चौबीसों घण्टे ग्रहण रहा हूँ।
मुझे अनगिनत रुप में श्रेष्ठतम वस्तुओं की प्राप्ति हो इसलिये हमें ईश्वर के प्रति, सद्गुरु के प्रति नमन भावना रखनी चाहिये। क्योंकि उन्होंनें मेरे ऊपर अनेकों उपकार किये तभी मुझे और आपको यह सांसारिक जीवन प्राप्त हुआ। हमें इसी शुक्रिया, आभार और धन्यवाद ज्ञापित करने की क्रियायें करनी है। आप 40-50 वर्षों से हर दीपावली पर अपने घर का कचरा निकाल रहे हैं। फिर धीरे-धीरे गन्दगी को भरते रहेंगे फिर अगले साल की दीपावली आयेगी तब हम दूसरों को देखकर अपने घर की सफाई करेंगे, उसकी रंगाई, पोताई, चुनाई करेंगे। परन्तु अपने भीतर के कचरे को संग्रहित करते रहते हैं। शिकायतों का अंबार लगा रहता है।
शिकायतें होती हैं पति से, पत्नी से और समय आने पर माता-पिता से, बन्धु, रिश्तेदारों और पड़ोसियों से। माता-पिता, भाई-पड़ोसी की मृत्यु हो गयी तो फिर किससे शिकायत करेंगे? फिर हम दूसरों से शिकायत करते हैं। तो परिवार, रिश्तेदार, बेगानों से शिकायतों के भाव-चिन्तन को निकालने का प्रयास करना चाहिये और मेरे शिकायत करने होगा भी क्या…? फिर हमारे जीवन में जीवन सुचिता-श्रेष्ठता आयेगी कैसे? लक्ष्मी वहीं आती है जहाँ स्वच्छता, साफ-सफाई, सुन्दरता होती है। इसीलिये हम अपने पूजा स्थान में साफ-सफाई कर स्वच्छ रखते हैं और उचित प्रकार से विग्रह-चित्रों का श्रृंगार और पूजन करते हैं, पुष्प अर्पित करते हैं ताकि वैसा ही चैतन्य स्वरुप मेरा बने और इस हेतु उसके भाव को, साधना को आत्मसात करना ही होगा। तब महालक्ष्मी दीपावली का महापर्व या कोई भी सामान्य सा पर्व लक्ष्मीयों से युक्त हो पायेगा।
इसीलिये हमें “भावसंशुद्धि” करना होगा। “भावसंशुद्धि” अर्थात् दीपावली पर केवल घर को सजाना नहीं अपितु अपने “भावों की सफाई” करना भी एक साधना है। यानी-जिसके प्रति शिकायत है, उसे क्षमा करना; जो बात भीतर चुभी हुयी है, उसका परित्याग करना और जो व्यक्ति बार-बार स्मृति में आता है, उसे मन से मुक्त करो। क्योंकि दीपक को बाहर जलाने से पूर्व उसके भीतर जगह बनाना पड़ता है।
मनो हि द्विविधं प्रोक्तं शुद्धं चाशुद्धमेव च।
अशुद्धं कामसंकल्पं शुद्धं कामविवर्जितम्।।
“अमृतबिन्दु उपनिषद् कहता है-‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।’ अर्थात् बंधन भी मन के फलस्वरुप ही है और मुक्ति भी मन के। वास्तव में असली स्वच्छता केवल घर के कोनों से धूल हटाना नहीं, बल्कि मन के उन कोनों से शिकायतों को निकालना भी स्वच्छता ही है, जहाँ वर्षों से पुराने दुःख और कटु स्मृतियाँ जमा हैं।”
मन को दो प्रकार का कहा गया है-शुद्ध मन और अशुद्ध मन। जो मन निरंतर कामनाओं, इच्छाओं, वासनाओं और संकल्पों में उलझा रहता है, वह अशुद्ध मन है और जो मन कामना एवं आसक्ति से रहित होकर शांत, निर्मल और आत्मचिन्तन में स्थित रहता है, वह शुद्ध मन है और यहाँ “अशुद्ध” का अर्थ यह नहीं है कि मन बुरा है। बल्कि कामना से प्रभावित मन को अर्थात् जिसका मन किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति या परिणाम से जुड़ जाता है उसे ही अशुद्ध कहा गया है और यही काम-संकल्प है।
इसका तात्पर्य यह नहीं कि आपको संसार छोड़ देना है या अपनी सारी इच्छाओं को समाप्त करना है। अपितु इसका तात्पर्य यह है कि हमारी इच्छायें मन को नियंत्रित न करे। जब मन इच्छा का दास होता है, तब मनुष्य परिस्थितियों से संचालित होता है। जब मन कामना से ऊपर उठता है, तब साधक अपने विवेक से जीवन जीता है।
“मन जितना कामना से बंधेगा, उतना ही अशांत होता; और मन जितना कामना से मुक्त होगा, उतना ही आत्मस्वरूप के निकट पहुँचता जायेगा।”
इस श्लोक के आगे की बात उसके अगले श्लोक में आता है-
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्।।
मनुष्य के बंधन और मोक्ष-दोनों का कारण मन ही है। जब मन विषयों के प्रति आसक्त हो जाता है, तब मनुष्य को बंधन में डाल देता है और जब मन विषयासक्ति से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप की ओर उन्मुख होता है, तब वही मन मुक्ति का साधन बन जाता है।
एक ही परिस्थिति दो व्यक्तियों के सामने अलग-रुप में आ सकती है-
एक व्यक्ति उस परिस्थिति को देखकर टूट जाता है और दूसरा उसी परिस्थिति से सीखकर और मजबूत हो जाता है। अर्थात् अंतर परिस्थिति में नहीं, मन की स्थिति में है। पिछलें श्लोक में भी कहा गया था कि कामना-संकल्प वाला मन अशुद्ध है और कामना से मुक्त मन शुद्ध है। यह श्लोक उसी बात को एक कदम आगे ले जाता है। अर्थात्, मन स्वयं बंधन नहीं है और स्वयं मुक्ति भी नहीं है; बल्कि मन जिस ओर आकर्षित होता है, उसी दिशा में मनुष्य का जीवन बंधने या मुक्त होने लगता है।
इसीलिये मैं हमेशा कहता हूँ-“किसी बाहरी शत्रु को जीतना उतना कठिन नहीं है, जितना अपने भीतर की कुस्थितियों अर्थात् वासना, मोह, लोभ, अहंकार और आसक्ति पर विजय प्राप्त करना।”
आप यहाँ से अनेक शिकायतें लेकर वापस जायेंगे। परन्तु उन शिकायतों का क्या होगा? यदि लेकर ही जाना है तो अच्छी और श्रेष्ठ बातें लेकर जाईये, एक श्रेष्ठ साधनात्मक चिन्तन लेकर जाईये। मुझे आपसे शिकायत है गुरुजी, पति से, पत्नी से शिकायत है। शिकायत करने से क्या होगा? आपके सद्गुरु द्वारा अवश्य ही कुछ न कुछ हेतु अथवा उद्देश्य रहा होगा तभी आपको पति मिला, पत्नी मिली, संतान मिला। निश्चित रुप से कोई उद्देश्य रहा होगा। आपको गुरु मिला, ईष्ट मिला, ईश्वर मिला, माता-पिता मिले तो निश्चित ही आपके पुण्य फल रहे होंगे, एक श्रेष्ठतम चिन्तन रहा होगा। उसे सहजता से स्वीकार करने की कोशिश करें आपके लिये यह ज्यादा उचित रहेगा।
यदि आप सहजता से स्वीकार नहीं कर रहे हैं तो इसका तात्पर्य कि आपके अन्दर मलिनता है, दूषितता का भाव है। इसलिये हम किसी के साथ प्रसन्नता पूर्वक नहीं रह पाते हैं। अक्सर हमारे शरीर पर, चेहरे पर तनाव, क्रोध, चिन्ता, मुंहफट की भावना, अनर्गल उत्तर देने की भावना आती रहती है क्योंकि हम उन्हीं तत्वों की वृद्धि करते रहते हैं, उन्हीं तत्वों का बार-बार विचार करते हैं। उसका समाधान न करने से नुकसान किसका हो रहा है? आप 20 वर्षों से किसी के प्रति ईष्या पाले हुये हैं, तो इसका नुकासान आपको ही होगा। आप 20 वर्षों से उससे बात नहीं कर रहे हैं, कोई सम्पर्क नहीं कर रहे हैं, आपने रिश्ते-नाते सब छोड़ दिये हैं; हो सकता है कि यह बहुत अच्छी बात हो परन्तु इससे आपको बेनिफिट क्या मिल रहा है? कुछ नहीं, अपितु सब नुकसान ही हो रहा है। इसीलिये मैं बार-बार कहता हूँ कि हमारी जिसके प्रति ईष्या-द्वेष की भावना होती है चौबीसों घण्टे ध्यान उसी के तरफ जाता है। हम अपने Normal Activities, सामान्य क्रियाकलाप भी भूल जाते हैं, स्वयं पर प्रॉपर ध्यान नहीं देते हैं। फिर आप कहते हैं मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है, मैं सही दिशा में काम नहीं कर पा रहा हूँ। जिसके प्रति हम द्वेष का भाव रखते हैं बार-बार हमारा ध्यान-चिन्तन उसी की तरफ लगा रहता है।
और मैं कहता हूँ कि यदि मैं किसी से ईर्ष्या या द्वेष रखूंगा तो होगा क्या? वह तो मुझसे या आपसे 200-500 किलोमीटर दूर है। आप बार-बार अपने भाई के बारे में, चाचा के बारे में, ताउ के बारे में सोचते रहेंगे, तो उससे आपके भाई, पड़ोसी, चाचा, ताऊ के ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा बल्कि आपके अन्दर ही विषता की वृद्धि होगी।
इसलिये यदि दीपावली को महालक्ष्मीमय सम्पन्न करना है तो जीवन को कान्तिमय, विभुतिमय, नम्रतामय, तुष्टीमय, पुष्टीमय, उत्कृष्टिमय, किर्तीमय, रिद्धिमय, सिद्धिमय, उन्नतिमय बनाने हेतु प्रयासरत होना ही होगा और प्रयास बहुत क्लिष्ट भी नहीं है। ये भाव आपको बहुत दूर हिमालय में नहीं मिलेगा, बाजार में नहीं मिलेगा, गुरु के पास भी नहीं मिलेगा। ‘गुरु से चेतना मिलता है’ कि किस प्रकार जीवन में, शरीर में ओज आयेगा, कान्ति और तुष्टि आयेगा, उन्नति-प्रगति, रिद्धि-सिद्धि का भाव आयेगा। और यदि हम इस चेतना को सकारात्मक भाव से आत्मसात करेंगे तब उक्त सद्गुणों की वृद्धि होगी।
सबका मोटीवेशन एक ही है कि मुझे असीम मात्रा में धन की प्राप्ति हो। परन्तु क्या किसी ने विचार किया है कि धन प्राप्ति से पूर्व मेरा हेल्थ अच्छा हो जाये, मैं पूर्णतः स्वस्थ हो जाऊं…? या मेरे पति का, बच्चे का स्वास्थ्य ठीक हो जाये। इस प्रकार का चिन्तन आप नहीं करते हैं यदि करते भी हैं तो 10 मिनट-15 मिनट, आधे घण्टे के लिये। उसके बाद बाकी के साढ़े तेईस घण्टे फिर से वही चिन्तन करते हैं कि पैसा कैसे आयेगा…? हम जिस वस्तु के बारे में जितना अधिक विचार करते हैं वह वस्तु उतना ही दूर हो जाता है। जब चौबीसो घण्टे हम यही सोचेंगे कि धन कैसे आयेगा, धन कैसे आयेगा? तो धन और दूर होता जायेगा। सोचने से नहीं आयेगा। बल्कि आपके अन्दर जो कचरा भरा हुआ है उसको निकाल अच्छे व श्रेष्ठ भावों को समाहित करने से आयेगा।
मैं एक पानी के बोतल में एक ही चीज डाल सकता हूँ। या तो मैं कचरा डाल दूंगा,मिट्टी डाल दूंगा या मैं दूध डाल दूंगा, उसमें केवल एक वस्तु ही आयेगी। मिट्टी भी, कचरा भी, दूध भी सारी वस्तुयें एक साथ नहीं आ सकती और यदि सारी वस्तुओं को मिश्रित भी कर दिया तो वह किसी काम के नहीं रहेंगे या तो मैं शुद्ध जल भरुं या तो गंदा जल भर लूं या कचरा उठाकर डाल दूं। मैं जो डाल दूंगा, अन्दर वही समाहित हो जायेगा। ठीक इसी प्रकार मैनें अपने मन में जिस प्रकार की स्थितियों को उत्पन्न किया वही स्थितियां मेरे मन में, जीवन में बनती हैं। एक बार आप खुद का मूल्यांकन करें। आप पिछले 20 वर्षों से, 40 वर्षों से, जो सोच रहे हैं, क्या जीवन में वैसी स्थितियां बन रही हैं? आप पायेंगे कि वैसी ही स्थितियां धीरे-धीरे निर्मित हो रही हैं। इसीलिये श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं-
‘यो यच्छ्रद्धः स एव सः।’
अर्थात्, “आप जिस प्रकार के भाव, विश्वास और श्रद्धा को धारण करेंगे, अंततः उसी के अनुरूप आपका स्वरूप निर्मित होता जायेगा।” इसलिये मनुष्य अपने भीतर जो बात सत्य मानकर धारण करता है, वही धीरे-धीरे उसके विचारों, व्यवहार, कर्म और व्यक्तित्व का स्वरूप निर्धारित करने लगता है।
अब इसे अपने मन के स्तर पर भी समझना पड़ेगा। वास्तव में हमारा मन एक पात्र की तरह है। उसमें यदि लगातार-भय, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ, चिंता, अभाव-बोध, शिकायत और नकारात्मक विचार डाले जाते रहेंगे, तो मन की आंतरिक दशा उन्हीं नकारात्मक भावों से निर्मित होगी और यदि उसमें-सद्भाव, श्रद्धा, आत्मविश्वास, कृतज्ञता, विवेक, अनुशासन, सेवा, परिश्रम और सकारात्मक संकल्प भरे जायेंगे, तो मन उसी प्रकार की सकारात्मक चेतना को विकसित करेगा।
आज दीपोत्सव है, महालक्ष्मी दीपावली का महापर्व है। क्या आज आपने प्रातः उठकर लक्ष्मी को नमन किया? क्या गुरु के प्रति नमन भाव किया था आपने…? मैं अक्सर देखता भी हूँ कि आप व्रत-उपवास ज्यादा करते हैं। एकादशी का व्रत करते हैं कि एकादशी में चावल नहीं खाना चाहिये, पूर्णिमा का व्रत करते हो, संकट हरण चतुर्थी और नवरात्रि के पर्वों में व्रत करते हैं।
उपवास का तात्पर्य दिन भर भूखे मरना नहीं है। सोमवार है, मंगलवार है, वीरवार है इसलिये आपने दिन भर नहीं खाया, उपवास का मतलब यह नहीं है। उपवास का मतलब जो मेरे अन्दर के दूषित भाव हैं, मैं उनका परित्याग कर सकूं। यह उपवास है, यह व्रत का फल है। सोमवार के पूरे दिन कुछ खायेंगे नहीं, भगवान शिव का अभिषेक करेंगे नहीं, उनका नाम भी नहीं लेंगे, महामृत्युंज्य मंत्र का और शिव चालिसा का पाठ नहीं होगा, ध्यान-चिन्तन नहीं होगा। शनि चालिसा पढ़ेंगे नहीं, तेल का दीपक जलायेंगे नहीं, उनका उपवास, ध्यान-चिन्तन नहीं करेंगे। बस शनि की साढ़ेसाती चल रही है, मिश्राजी ने बताया था कि सोलह शनिवार व्रत-उपवास करना। गुरुजी ने बताया था कि शनि की साढ़ेसाती है तो ढ़ाई वर्ष तुम्हारा ढईया रहेगा, अतः यह उपाय कर लेना। परन्तु उसके बताने से निष्कर्ष क्या निकला…? आपने कितना त्याग किया? कुछ भी नहीं।
जब शनि की साढ़ेसाती शुरु नहीं हुआ था तब भी वही हाल था और ढ़ाई वर्ष बीत गये तब भी वही हाल है। फिर परिवर्तन कैसे आयेगा…? यह उपवास-व्रत का अर्थ नहीं होता है। उपवास का अर्थ होता है कि मेरे भीतर के जो दोष हैं, हमको मालूम है कि हमारी क्या कमीयां और न्यूनतायें हैं। ये मेरी माताजी नहीं बता सकते हैं। मुझे पता है मेरे दोष क्या हैं…? और निस्तारण स्वयं को ही करना है। यदि मेरे अन्दर दोष है तो उसका निस्तारण संभव है।
आप हमेशा यही बोलते हो कि मेरे दोषों का निस्तारण असम्भव है, गुरुजी ऐसा नहीं हो पायेगा…, परन्तु मैं कहता हूँ कि यदि आपके अन्दर एक दोष है तो एक हजार अच्छे गुण भी हैं। हम और आप मिलकर उन दस हजार दोषों को समाप्त कर सकते हैं। और मैंनें कल भी यही बताया था कि आपके जीवन में, आपके अन्दर बस पाँच-छः ही मुख्य तकलीफें हैं। हम और आप मिलकर उसका निस्तारण तो कर ही सकते हैं।
इसलिये ही मैं आपसे कहता हूँ कि आप एकादशी का उपवास मत करिये, भरपूर चावल खाईये। उसमें कोई दोष नहीं लगने वाला है। दोष तब लगेगा जब हम अपने भीतर की गंदगी का निस्तारण नहीं करेंगे। एकादशी में चावल नहीं खाने से, शुक्रवार को खटाई नहीं खाने से, शनिवार को मांस-मछली, मदिरा, नशीली चीजें नहीं खाने से कुछ नहीं होने वाला। मैं हरिद्वार गया था, मैंने वहाँ पर करेला खाना छोड़ दिया। अब गुरुजी मैं करेला नहीं खाता हूँ। और मैं कहता हूँ करेला नहीं खायेगा तो क्या हो जायेगा…? उससे अपने जीवन में कितना परिवर्तन किया आपने, करेला खाना छोड़ दिया आपने, परन्तु अपने जीवन की कड़वाहट कितना खत्म किया। करेला छोड़ने से, कोई कड़वी वस्तु छोड़ने से कुछ नहीं होने वाला। हमें अन्तःकरण में परिवर्तन का भाव रखना है। जब अन्तःकरण में परिवर्तन होगा तब हमें महालक्ष्मी की प्राप्ति हो सकेगी।
हमें संकल्प लेकर नित्य कुछ न कुछ नवीन परिवर्तन करना है। मैं बार-बार कहता हूँ कि अपने चार-पाँच लक्ष्य बना लो कि मुझे 2026-2027 तक इस लक्ष्य को प्राप्त करना है। आपको यह पता है कि मेरे अन्दर कितना नॉलेज है, कितना ज्ञान है, कितना वर्क कैपेसिटी है और मैं अपने वर्क कैपेसिटी, अपने नॉलेज को कितना बढ़ा सकता हूँ। आपने M.B.A किया हुआ है और यदि आपसे कहा जाय कि आप नर्स का काम करो तो स्वभाविक है कि उससे यह कार्य नहीं हो पायेगा। किसी कम्प्यूटर साइंस किया है यदि उससे यह कहा जाये कि तुम मार्केटिंग का कार्य करो, नहीं हो पायेगा उससे यह कार्य। जो आपको ज्ञान है, आपको यह ज्ञात है कि मेरे अन्दर अमुक-अमुक ज्ञान है और अमुक-अमुक क्षेत्रों में मैं दस या पन्द्रह वर्षों से कार्य कर रहा हूँ। उस काम को आप कितना बढ़ा सकते हैं और यदि आपकी काम करने की क्षमता आठ घण्टे अथवा दस घण्टे है तो आप उसे बढ़ाकर सोलह घण्टे कर सकते हैं, यह क्रिया आपके हाथ में है। इसलिये आज ही लक्ष्य बना लो कि मुझे 2027 तक अमुक-अमुक लक्ष्यों को प्राप्त करना है।
अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतु अस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति।
स क्रतुं कुर्वीत।।
“छान्दोग्य उपनिषद्” इसी बात को समझाने का प्रयत्न करता है। “छान्दोग्य उपनिषद् कहता है-‘क्रतुमयः पुरुषः’ अर्थात् मनुष्य अपने संकल्पों और आंतरिक भावों से निर्मित होता है। इसलिये यदि मन में हर समय अभाव, शिकायत और असंतोष का भाव भरा रहेगा, तो जीवन की दृष्टि भी उसी दिशा में ढलती जायेगी। इसके विपरीत यदि मन में कृतज्ञता, संतोष और ईश्वर, और अपने सद्गुरु-कृपा का भाव दृढ़ हो जाये, तो आपको अपने जीवन में प्राप्त छोटी-छोटी वस्तुओं में भी कृपा अर्थात् ‘स क्रतुं कुर्वीत’ का अनुभव श्रेष्ठ रुप से होने लगता है। इसलिये मैनें श्रेष्ठ संकल्प लेने का आग्रह किया।
तीन कमरों वाला मेरा फ्लैट होना चाहिये, आपने ये लक्ष्य बना लिया और ये मालुम कर लिया कि दिल्ली में, मुंबई में, रायपुर में फ्लैट की कितनी कीमत है। तीस लाख में तीन कमरों का फ्लैट मिल जायेगा। आप अपने कमरे में, हॉल में फ्लैट का फोटों बनाकर लगा दीजिये, एक संकल्प लिया कि मुझे 2027 में UPSC Clear करना है। और उसके अनुरुप ही नित्य आप स्टडी करेंगे तो आपको UPSC एग्जाम के लिये एक नवीन चिन्तन प्राप्त होगा। फ्लैट खरीदने के लिये एक नवीन चिन्तन प्राप्त होगा कि आज मैंने इतना धन संग्रह किया। बच्चे भी अपना लक्ष्य लिखकर, कि मुझे बोर्ड परीक्षा में 75 परसेंट नंबर लाने हैं, और उसे दीवार पर लगा दें। निश्चित रुप से जब आप उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये प्रयास शुरु करेंगे तो एक दिन उसकी पूर्णता अवश्य ही प्राप्त होगी। आप निन्यानबे प्रतिशत अपने लक्ष्यों की तरफ अवश्य ही अग्रसर हो जायेंगे।
ये आपका दुर्भाग्य है कि आपने अपने जीवन में कोई लक्ष्य नहीं बनाया है। आप अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं, कोई लक्ष्य बनाया है आपने? अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, CA, ऐडवोकेट बनाना है या कुछ अलग बनाना है आपने कोई लक्ष्य नहीं बनाया। बस उनको पढ़ाई कराना है, ग्रेजुऐशन और पोस्ट ग्रेजुएशन कराना है, बस इतना ही लक्ष्य बनाया है आपने। परन्तु इससे आगे उठकर उन्हें अचीवमेंट क्या प्राप्त करना है, क्या आपने इसका लक्ष्य बनाया…? उसे नौकरी लगवाना है या बिज़नेस करना है, उसी के अनुसार उसे भाव प्रदान करना पड़ेगा। यदि उसे व्यापार करना है तो नित्य वह चिन्तन करेगा कि आज मैं पिताजी के साथ व्यापार करने हेतु दुकान कितनी बार गया, फेरी करने कितनी बार गया। तब हम अपने जीवन के अभीष्ट को, लक्ष्यों को प्राप्त कर सकेंगे। इसलिये सदैव याद रखना “लक्ष्यों को प्राप्त करने का भाव ही लक्ष्मी का भाव है और वही महालक्ष्मी का स्वरुप है।” ‘ऊँ जय लक्ष्मी माता, मैया! जय लक्ष्मी माता’ हम करते ही हैं, परन्तु वह बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है। उपलब्धि तो इस बात में है कि पल-पल, एक-एक दिवस का उपयोग हम कैसे कर रहे हैं।
मैं अक्सर शिष्यों से पूछता हूँ कि क्या कर रहे हो; तो सदैव एक ही उत्तर आता है-“गुरुजी! समय काट रहा हूँ।” खाली बैठा हूँ।
प्रतिदिन तुम्हारा जीवन समाप्त होता जा रहा है और तुम समय काटे जा रहे हो। समय का, एक-एक पल का तो उपयोग करना था। तुम्हे कुछ श्रेष्ठ चिन्तन करना था, अपने जीवन में कुछ उतारना था। मेरा बेटा बहुत अच्छा करेगा, बेटी श्रेष्ठमय कार्य करेगी, मेरे पति-पत्नी ऐसा कार्य कर देंगे। हमारी हर समय दूसरों पर थोप देने की आदत कब सुधरेगी..? ‘मैं स्वयं अपने लिये क्या चिंतन कर रहा हूँ’ हमें यह चिन्तन करना है और आपके अन्दर जब यह भाव जागृत होगा तब आप अपने आप में बहुत बड़ा अचीवमेंट प्राप्त कर सकेंगे।
वास्तव में जिंदगी बहुत छोटी है, सत्तर-अस्सी वर्ष की। अस्सी वर्ष की जिंदगी में 30 वर्ष पढ़ाई में, एजुकेशन ग्रहण करने में व्यतीत हो जाता है। जीवन के 30 वर्ष हमने पढ़ाई में ही समाप्त कर दिया। उसके बाद नौकरी करने में लग जाते हैं और माता-पिता की तरह संतान उत्पन्न कर लेते हैं। उनकी परवरिश कर उनको बड़ा करते हैं, शिक्षा देते हैं। इन क्रियाओं में ही 55-60 वर्ष व्यतित हो जाते हैं। उनके संतान भी बीस-बाईस वर्ष का हो गया। और जब तीस वर्ष की उम्र में उसकी शादी होगी तब तक 60 वर्ष की आयु हो गयी फिर दिन ही कितने बचे आपके पास?
ज़माना हो गया ख़ुद से मुझे लड़ते-झगड़ते,
मैं अपने आप से अब सुल्ह करना चाहता हूँ।
आप जीवन में किसके लिये कर रहे हैं। स्वयं के लिये तो कुछ नहीं कर रहे हैं। एक बार आप स्वयं से प्रश्न करके तो देखें, कि मैं किसके लिये कर रहा हूँ…? बच्चों के लिये, पत्नी के लिये कर रहे हैं। परन्तु यह जीवन तो खुद का है, हमनें स्वयं के लिये, अपने लिये क्या किया? आपके मर जाने के बाद क्या बच्चे भूखे मर जायेंगे, पत्नी भूखे मर जायेगी? वास्तविकता तो यही है कि आपके न रहने से कोई भूखे नहीं मरेगा। मृत्यु जीवन का बहुत बड़ा Loss नहीं है। मृत्यु जीवन की एक घटना है जो घटित हो जाती है। इसलिये आपको जीवन में कुछ सूत्र आपको याद रखना चाहिये।
पहला सूत्र- अच्छे से कमाओ। धन की वृद्धि से पूर्व धन की शुद्धता आवश्यक है। आपके अन्दर ये कैपेसिटी होनी चाहिये कि यदि मुझे बारह लाख या आठ लाख का पैकेज मिल रहा है, तो उसमें ही संतोष की प्राप्ति हो जाये। इसलिये “धन कमाना भी एक साधना है। महत्व केवल इस बात का नहीं है कि आपने कितना धन कमाया, बल्कि इस बात का भी है कि आपने किस प्रकार कमाया और आपने उसका उपयोग किस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु किया।”
दूसरा सूत्र- अच्छे से खाओ; अर्थात् पौष्टिक भोजन ग्रहण करना चाहिये। आप कमा रहे हैं परिवार के लिये परन्तु आपको भोजन समय पर नहीं मिलता है, फिर जीवन में कमाने से क्या लाभ…? भारतीय चिंतन में भोजन को केवल भूख शांत करने का साधन नहीं माना गया है, बल्कि उसे मन और चेतना पर प्रभाव डालने वाला तत्व भी माना गया है। इसलिये हमें संतुलित और शुद्ध भाव से निर्मित भोजन को ग्रहण करना चाहिये, जो शरीर को स्वस्थ, मन को स्थिर और जीवन को सक्रिय तथा समर्थ बनाने में सहायक हो।
तीसरा सूत्र-आराम से सो जाओ। डॉक्टरों ने भी बात की पुष्टि किया है कि जिस व्यक्ति को कम से कम छः घण्टे बराबर नींद आती है और जो एक घण्टे सूर्य का प्रकाश नित्य ग्रहण करता है, उससे कोरोना जैसी और कई प्रकार की बीमारीयां समाप्त होती ही हैं। सूर्य के रुप में प्रकृति हमें इतना अच्छा उपहार दे रही है परन्तु हम उसका उपयोग नहीं कर पाते। और वर्तमान प्रत्येक मनुष्य के लिये यह तीनों सूत्र अत्यंत आवश्यक हैं।
चौथा सूत्र-जीवन में आने वाली प्रत्येक चुनौति को स्वीकार करो। आपके परिवार में या कहीं भी कोई हादसा या घटना घटित हो जाता है तो आप तुरंत आकर बोलते हैं- गुरुजी! मेरे साथ बहुत बड़ा हादसा हो गया, मेरे जीवन में बहुत बड़ी तकलीफें आ गयी। संसार का सबसे दुःखी प्राणी मैं ही हूँ।
फिर मैं पूछता हूँ- तुम्हीं सबसे दुःखी प्राणी क्यों हो? तुम्हारी बराबर सांस चल रही है, एकदम स्वस्थ हो शरीर से, एकदम चल-फिर रहे हो तो फिर दुःखी प्राणी कैसे हुये…?
गुरुजी! मेरा बीस लाख का लॉस हो गया, बहुत कर्ज हो गया, मेरे साथ अमुख आदमी ने चीटिंग कर लिया।
ठीक है, तुम्हारा नुकसान हो गया, कर्ज हो गया, इसमें थोड़ी गलती तुम्हारी भी रही होगी। परन्तु उसके लिये अब रोने से क्या होगा…? किसी ने OTP पूछ लिया, किसी ने पिन पूछ लिया, किसी ने पासवर्ड पूछ लिया और आपने बता दिया। मुर्खतापूर्ण कार्य आपने स्वयं किया। तुम्हारे मोबाईल में एक मैसेज आया कि आपके लिये 50 लाख यूएस डॉलर की लौटरी लगी है, बस आपके मोबाईल पर एक OTP आयेगा फिर सारा अमाउण्ट आपके खाते में चला जायेगा और तुमने बता भी दिया। मुझे यह नहीं समझ आता है-आपका भाई आपको 50 रुपया नहीं दे सकता है, यदि आप अपने पिता से दो सौ रुपया मांगे तो वो दो सौ रुपया नहीं दे सकता है। तो बेवकूफों को यह बात समझना चाहिये कि 50 लाख डॉलर की लौटरी कोई कैसे दे सकता है…? पचास हजार डालने पर 50 लाख कैसे आ सकता है भला… ये बहुत चिन्तनीय है कि अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे, ग्रेजुएट, श्रेष्ठ पद पर आसीन ज्ञानी जन भी मूर्ख बन जाते हैं।
पाँचवा सूत्र-अपनी पसंद की चीजों में खर्च करें। पसंद की चीजों का मतलब मेरा लुक्स अच्छा हो, मेरा ड्रेस अच्छा लगे, ईश्वर द्वारा प्रदत्त शरीर को मैं सजा-सँवारकर रखूँ, अपने हेल्थ को मेंटेन कर रखूँ। आप स्वयं कमा रहे हैं, अतः थोड़ा-बहुत आपको भी अधिकार है अपने ऊपर खर्च करने का, अच्छे कपड़े पहनने का। यदि मैं फटे पुराने कपड़े पहनूं, फटा कुर्ता होगा, धोती होगी तो आप भी कहेंगे कि गुरुजी आपने इतना मैला-मैला सा क्यों पहना है। अच्छा नहीं लगेगा। और यदि वहीं उम्र के हिसाब से स्वच्छ वस्त्र हों, अच्छी वेशभूषा हो, हल्की साज-सज्जा हो तो चेहरे पर एक सम्मोहन सी व्याप्त हो जाती है।
उस के चेहरे की चमक के सामने सादा लगा,
आसमाँ पे चाँद पूरा था मगर आधा लगा।
इसलिये अपने ऊपर खर्च करने की भी इच्छा शक्ति रखिये। बाहरी वस्तुयें, चाट-पकौड़ी खाने की ईच्छा मत रखीये। लॉकडाउन के दिनों में छः-आठ महिने आपने चाट-पकौड़ी, गोलगप्पे, छोले-भटूरे, मोमोज नहीं खाया, क्या आपके शरीर के अन्दर, हार्मोंस में कोई परिवर्तन आया…? एकदम परिवर्तन नहीं आया। यदि छोले-भटूरे, मोमोज, पिज़्ज़ा नहीं मिलने से प्रलय तो नहीं हुआ…।
हम अपने घर-परिवार में भी छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करते हैं। कभी थोड़ी दाल कम मिल गया, मिक्स वेजिटेबल कम हो गया, चाय बनाने में दस मिनट की देरी हो गयी। यदि काम में व्यस्तता के कारण, किसी भूलवश या रोज के कलह-तनाव के कारण 10 मिनट की देरी हो भी गया होगा तो उसमें इतना क्रोध करने और चिल्लाने की क्या बात है। पति-पत्नी में, भाई-भाई में, भाई-बहन में, पिता-पुत्र में इन्हीं छोटी-छोटी बातों पर हम अपनी सारी ऊर्जा शक्ति गवां बैठते हैं। हम दोष दूसरों के ऊपर थोप देते हैं।
छठा सूत्र-इतना हसिये कि पेट दर्द हो जाये। आप स्वयं मूल्यांकन कीजिये कि आप चौबीस घण्टों में कितना हंसते हैं। आज आप सबसे दिन भर मिलते रहे, बात करते रहे, आपने सबके साथ कितना हँसी-मजाक किया, आपको कितना आनन्द, मजा आया। अपने चेहरे से मुस्कान को गायब कर दिया है आपने। इसलिये ही ‘लाफ्टर क्लब’ बने ताकि मेरे उम्र के या उषा कपूर और रवि कपूर के उम्र के लोग थोड़ा खिलखिला सकें। इसलिये गोरखनाथ कहते हैं-
हसिबा खेलिबा रहिबा रंग। काम क्रोध न करिबा संग।।
हसिबा खेलिबा गाइबा गीत। दृढ़ करि राखिबा अपना चीत।।
हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान। अहनिसि कथिबा ब्रह्म गियान।।
हसै-खेलै न करै मन भंग। ते निहचल सदा नाथ के संग।।
आपस में हँसी-मजाक…, पति-पत्नी आपस में बातचीत तो करते नहीं फिर हँसी-मजाक कहाँ से करेंगे। यदि किसी विषय पर थोड़ी बातचीत हो भी जाये तो एक ही उत्तर आता है-आप मेरे ऊपर कमेंट कर रहे हो, टोंट कर रहे हो, व्यंग्य-क्रोध कर रहे हो। इसलिये हमें जीवन में आनंद चाहिये, लेकिन आसक्ति नहीं; उत्साह चाहिये, लेकिन क्रोध नहीं; संसार चाहिये, लेकिन संसारिक बंधन नहीं। गोरखनाथ यही कह रहे हैं-‘काम क्रोध न करिबा संग।’ अर्थात् आनंद में रहो, परन्तु वासना में मत डूबो। उत्साह में रहो, परन्तु उत्तेजना को, क्रोध को अपना स्वामी मत बना डालो। “क्रोध” का तात्पर्य केवल गुस्सा नहीं, अपितु इच्छा पूरी न होने से पैदा होने वाली मानसिक विक्षिप्तता भी है।
सातवां सूत्र-नृत्य जरुर करें। भले ही आपको नृत्य करना नहीं आता हो, लेकिन उछलें अवश्य। मुझे भी डांस करना नहीं आता परन्तु मैं भी उछलता-कूदता हूं, हाथ-पांव इधर-उधर करता रहता हूँ। आपने देखा भी होगा, किसी पार्टी में या किसी कार्यक्रमों में गाना अलग चलता है और डांस अलग हो रहा होता है। वास्तव में वे अपने अन्दर की खुशी, जुनुन निकालने का प्रयत्न करते हैं। गोरखनाथ भी यही कह रहे हैं-“हँसो, खेलो, गाओ, नृत्य करो, परन्तु अपना चित्त दृढ़ रखो, ध्यान मत छोड़ो। यानी बाहर संसार चलता रहे और भीतर से चित्त अचल रहे। आनंद में रहते हुये भी आपका मन इधर-उधर न बहे।” हम दुनिया का चेहरा देखते हैं और स्वयं संकोच में पड़ जाते हैं। कितनी देर समाज या माता-पिता बोलेंगे, भाई कितने देर बोलेगा? आठ-दस दिन तक यही क्रियायें करने पर समाज, परिवार, भाई-बहन सभी बोलना ही बन्द कर देंगे। “अपने आनन्द, खुशी को जागृत करने के लिये इस प्रकार के लिये नृत्य, गीत आदि की क्रियायों को अवश्य ही अपनाना चाहिये।”
आठवां सूत्र-बिल्कुल छोटे बच्चे बन जाइये। छोटा बच्चा जब हँसता है तो हमें बहुत खुशी होती है। जब वह छोटे हाथों से ताली बजा देता है, अपना जीभ निकाल दे तो हमें बहुत खुशी मिलती है और अभी यदि मैं ताली बजाने लगूं या जीभ दिखाने लगूं तो आप बोलोगे कि गुरुजी! आप ये क्या कर रहे हैं, आप भी छोटे बच्चे हो गये हैं क्या…? बच्चा बनने का अर्थ उम्र में छोटा होना नहीं, बल्कि मन की उस अवस्था में लौटना है जहाँ अहंकार कम और ग्रहणशीलता अधिक होती है। क्योंकि बच्चों के भीतर तीन विशेष गुण होते हैं-जिज्ञासा, ग्रहणशीलता, सरलता। बच्चे बहुत ही सरल और जिज्ञासु होते हैं और जहाँ सरलता है, वहाँ सीखने की क्षमता है; जहाँ जिज्ञासा है, वहाँ ज्ञान का द्वार खुलता है; और जहाँ ग्रहणशीलता है, वहाँ प्राप्त ज्ञान जीवन में आत्मसात होने लगता है। इसलिये हमें हर क्षण छोटे बच्चे की तरह रहना चाहिये। जितना हम अपने अन्दर बचपन का चिन्तन लेकर चलते हैं, जीवन में उतनी ही युवावस्था बनी रहती है।
मैं पचास साल की हो गयी, मैं साठ साल का हो गया, अब कुछ करने से क्या होगा, अब तो मेरे जीवन का अंतिम पड़ाव आ गया; किसी कार्य को टालने के लिये यह सबसे अच्छा वाक्य है। अंतिम पड़ाव मृत्यु नहीं है, मृत्यु कोई लॉस नहीं है। “जिन्दगी होते हुये भी आप जिन्दगी का सही रुप से उपयोग नहीं कर पाये, यह वास्तविक लॉस है।” मृत्यु हो जाने और खत्म हो जाने से कोई बहुत बड़ा नुकसान नहीं हुआ। बल्कि आप सत्तर-अस्सी वर्ष तक जिन्दा रहे परन्तु जीवन का कोई उपयोग नहीं कर पाये, जीवन का आनन्द नहीं ले पाये, यह लॉस है जिन्दगी का।
नवां सूत्र-जीवन है छोटा, अतः काम से भी खुश हों आराम से भी खुश हों। मैं हमेशा कहता हूँ कि प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले व्यक्ति के पास ज्यादा नॉलेज होता है क्योंकि उनका बॉस सही तरह से उनसे काम लेता है, 12-15 घण्टे उन्हें काम करना पड़ता है, उनके पास एक्सपीरियंस ज्यादा होता है, वे क्विक डिसीजन ले लेते हैं और उन्हें निर्धारित समय पर सही काम करके उसका रिपोर्ट देना पड़ता है। वहीं गवर्नमेंट सर्विस वाले व्यक्ति का कार्य फिक्स है, 9 बजे जाना है और 4 बजे आना है। शिक्षकों का 4 घण्टे का कार्य है, 4-6 लेक्चर देना हैं बस। हमारा शरीर उसी प्रकार से क्रियान्वित हो जाता है। जीवन में केवल कर्म करते रहना ही पर्याप्त नहीं; एक स्वस्थ मनुष्य के लिये कर्म के बीच विश्राम और विश्राम के बीच संतोष भी आवश्यक है। काम जीवन को दिशा देता है और आराम जीवन को ऊर्जा देता है। इसलिये जब भी काम करें तो पूरे मन से करें, लेकिन काम करते समय आराम की चिंता न करें और जब आराम करें तो स्वयं को काम की चिंता में न उलझायें।
आप काम कर रहे हैं, आपकी एक दुकान है और आपने लक्ष्य बना लिया कि प्रतिदिन दो सौ रुपये की कमाई अर्थात् बचत होनी चाहिये। तो आप ये मान लीजिये कि आपके पास दो सौ रुपये से ज्यादा आयेगा ही नहीं क्योंकि आपने अपने टारगेट को फिक्स कर दिया है। हम जीवन में जो टारगेट बना लेते हैं, उसी टारगेट को आर्काइव (प्राप्त) कर पाते हैं। इसलिये अपना लक्ष्य बनाइये, आप अपना लक्ष्य बनाते ही नहीं हैं।
आपके जीवन में आनन्द की प्राप्ति हो, आपके चेहरे पर प्रसन्नता हो इन तत्वों को प्राप्त करना ही महालक्ष्मी का भाव-चिन्तन है। इसलिये जहाँ प्रेम रहता है, जहाँ आनन्द रहता है, जहाँ प्रसन्नता रहती है, जहाँ सुख-सौहार्द रहता है, वहाँ लक्ष्मी का आगमन होता है। जिस घर में क्रोध होता है, लड़ाई-झगड़ा होता है, ईर्ष्या-द्वेश, मनमुटाव की भावना रहती हैं, चाहे जितना भी प्रयत्न कर लो, वहाँ लक्ष्मी का आगमन हो ही नहीं सकता। इसी कारण से करोड़पति, अरबपति बन जाता है और एक गरीब व्यक्ति बहुत दारिद्रय बन जाता है। मध्य वर्ग का विस्तार होता जा रहा है, और अमीर व्यक्ति बहुत अमीर होता जा रहा है क्योंकि वे सदैव आगे बढ़ने हेतु प्रयत्नशील, संघर्षशील रहते हैं।
वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है।
दस वर्ष पूर्व तक जियो कंपनी को कोई नहीं जानता था, आज हमारे और आपके मोबाईल फोन में ‘जियो’ का नेटवर्क चल रहा है परन्तु दस वर्ष पूर्व किसी को नहीं पता था। एक अकेले व्यक्ति ने हजारों व्यक्तियों को रोजगार प्रदान कर दिया और आज ‘15 लाख करोड़’ की एक सम्पत्ति बना चुका है। बस दस सालों में ही। क्योंकि उसने प्रयास किया। उस समय भी उसकी मार्केट में कई कम्पनियों से टक्कर थी। परन्तु यह कैसे सम्भव हो सका…? क्योंकि उसने लक्ष्य बनाया था। और हम भी अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। ‘15 लाख करोड़’ के मालिक भले ही न बन पायें परन्तु करोड़पति अवश्य ही बन सकते हैं। बस भीतर में परिवर्तन करने की भावना-चिन्तन होनी चाहिये। तब हमारे लिये महालक्ष्मी की पूजा करना सार्थक हो सकेगा, तब उसके भाव-चेतना की प्राप्ति हो सकेगी।
प्रत्येक वस्तु की एक क्षमता होती है। जैसे आपकी आँखों की क्षमता है कि आप अधिकतम पाँच सौ मीटर तक देख सकते हैं। आपके कान का उपयोग आँखों से देखने में नहीं आ सकता, उसका उपयोग सुनने में ही होगा। नासिका का कार्य प्राणवायु को ग्रहण करने और छोड़ने तथा सुगंध लेने में होता है। मुख का कार्य अच्छे पदार्थ को ग्रहण करना होता है। हमारे शरीर के प्रत्येक भाग का, अंग का अपना-अपना इर्म्पोटेंस (महत्व) है। और एक अंग दूसरे अंग का कार्य नहीं कर सकता। ऐसा नहीं है कि आज मेरे मुख में छाले हो गये हैं जिसके कारण मुख खुल नहीं रहा है, साथ ही मुख में बहुत दर्द भी हो रहा है अतः मैं अपने कान से भोजन ग्रहण कर लूं; ऐसा संभव ही नहीं है। आज मुझे जुखाम हो गया है अतः मैं अपने नेत्रों से सांस ले लूं, ऐसा करना भी इम्पॉसिबल होगा।
अतः हमारे शरीर के प्रत्येक अंग का अपना उपयोग है। हमें उसे अंग को चैतन्य, जागृत करना है। इसलिये आपको आपके शरीर के तरफ ध्यान देना है, उसकी साफ-सफाई रखना है, उसको बराबर सक्रिय और क्रियाशील रखना है। चाहे उसके लिये योग-प्राणायाम करना पड़े और मेंटेन करने की क्रिया पड़े। हम अपने मस्तिष्क में देश-दुनिया की अनेक प्रकार की अनर्गल बातों का, घर के दोषों का कितना कचरा भरेंगे। वाईडेन के साथ ये क्या हो गया, डोनाल्ड ट्रम्प क्या कर रहा है, यदि मैं ये होता तो पाकिस्तान को तहस-नहस कर देता…., जिन्हें परिवर्तित करने की हमारे पास कैपेसीटी नहीं है, उन बातों के बारे में फिजुल चिन्तन करने से क्या लाभ?
“मेरा, स्वयं का उद्भव-विकास कैसे हो, मेरे शरीर का, शरीर के एक-एक अंग का, रोम-प्रतिरोम का, समस्त कर्मेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों का, सहस्त्र चक्रों का जागरण कैसे हो; हमें तो यह चिन्तन-विचार करना चाहिये।” इसके बारे में आप मनन ही नहीं करते। थोड़ा कचरे से भरे जीवन से बाहर झांककर तो देखो।
तुम्हारे दिमाग में सैकड़ों प्रकार का कचरा भरा पड़ा है और मनुष्य की प्रवृत्ति यह है कि जो व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो गया हम उससे विचार करना बंद कर देते हैं। मेरे चाचा-दादा खत्म हो गये तो मैं उनके बारे में चर्चा करना बन्द कर दूंगा, क्योंकि अब तो वे सुनने वाले ही नहीं हैं। तो अब मैं दूसरे जीवित व्यक्तियों को सुनाउंगा, ताकि वह किसी तीसरे से मेरे बारे में चर्चा कर सके। आप किसी के बारे में, किसी दूसरे व्यक्ति से कमेंट, व्यंग, निंदा, शिकायत, ईर्ष्या भाव के बारे में बताते हैं कि मेरा पति ऐसा है, पत्नी ऐसी है, भाई ऐसा है ताकि वह मैसेंजर के रुप में काम कर सके। आप अपने अन्दर का कोई भाव नहीं निकाल रहे होते हैं, आपने इस व्यक्ति को बताया कि मेरा भाई नालायक है, मेरे चाचा बदमास हैं और वह व्यक्ति मैसेंजर के रुप में कार्य करते हुये आपके भाई से, चाचा से ये बात कह सके। इसी प्रकार के कचरों का चक्रण हमनें अपने जीवन में कर रखा है। और कोई दूसरा व्यक्ति क्या कर सकता है, झगड़ा या विवाद मेरे और उनके बीच है तो थर्ड पर्सन को बताने से क्या लाभ?
आपका समय व्यतित होता जा रहा है, आपको आपके बहुमुल्य समय का कीमत नहीं पता है। एक बार अपने हृदय में हाथ रखकर चिन्तन कीजिये कि आप इस दीपावली महोत्सव में बैठे हैं और सुबह से अब तक कितना सकारात्म भाव-विचार आपके हृदय में आया…? खुद की उन्नति-प्रगति के लिये आपने क्या प्लानिंग किया? क्या आपने सद्गुरुदेव के छत्र तले बैठकर यह चिन्तन किया कि कल मैं छत्तीसगढ़, दिल्ली, मुम्बई पहुँच जाऊंगा उसके उपरांत मुझे 15 दिसम्बर तक अमुक कार्य करना है तथा 01 जनवरी तक अमुक कार्य करना है, आपने कोई विचार-चिन्तन नहीं किया। आपने आज भी कोई प्लानिंग नहीं किया, 2 दिन बाद भी कोई प्लानिंग नहीं करेंगे और 2 महिने या 2 वर्ष के बाद प्लानिंग करने की उम्मीद नहीं है।
आज के दिन ही समुद्र मंथन में चौदहवें रत्न के रुप में धनवन्तरी की प्राप्ति हुयी थी। पहला रत्न था विष और चौदहवां रत्न था धनवन्तरी, जो अरोग्यता के रुप में था। अर्थात् अथक प्रयास करने से अंत में महालक्ष्मी की प्राप्ति होती है। जब हम अपने आपका मंथन करेंगे तो अन्दर की गंदगी का निस्तारण होगा और जब गंदगी साफ हो जायेगी तब अमृतरुपी, आनन्दरुपी स्थितियों को प्राप्त कर पायेंगे।
और आज ही भगवान विष्णु ने स्वर्ग में महालक्ष्मी को प्राप्त किया था। देवी-देवता हर युग में अवतार लेते रहते हैं। राम के रुप में, कृष्ण के रुप में, शंकराचार्य के रुप में, गुरुनानक के रुप में, पैगम्बर मोहम्मद साहब के रुप में, सद्गुरु के रुप में और भी अलग-अलग स्वरुपों में उनका होता है। और हमारा जन्म भी अलग-अलग स्वरुपों में होता रहता है। उसी कारण से जनसंख्या में बहुत वृद्धि हो गया है। 1947 में देश की कुल जनसंख्या थी ‘छत्तीस करोड़’, और 1947 से अब तक अर्थात् लगभग अस्सी वर्षों बाद वर्तमान में है ‘एक सौ सैतालिस करोड़’। अर्थात् हमारा पुर्नजन्म तो हो रहा है परन्तु किस रुप में हो रहा है यह हमें ज्ञात नहीं।
कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि को ही रक्तबीज और चण्ड-मुण्ड जैसे महादैत्यों के मर्दन करने हेतु ‘भगवती महाकाली’ का अवरतण हुआ था और जब उन दैत्यों को संहार करते हुये महाकाली ने विशालतम रौद्र रुप धारण कर लिया, प्रलयकारी बन गयी और पूरी सृष्टि को समाप्त करने पर आतुर हो गयी तब भगवान महादेव को उनके श्री चरणों में लेटना पड़ा, तब वह शांत अवस्था में आ पायी। इसीलिये महाकाल के छाती पर महाकाली का एक पैर रखा हुआ है। हम तो आरती में भी गुनगुनाते हैं-
चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे।।
कभी-कभी जीवन में अतिक्रोध भी प्रलयंकारी बन जाता है। हमें क्रोध होना चाहिये परन्तु अपने शरीर में विद्यमान आलस्य के प्रति, अनर्गल विचारों के प्रति, अपने अन्दर व्याप्त द्वेष के प्रति। क्रोध इन नकारात्मक तत्वों पर करना चाहिये। पति-पत्नी के ऊपर, माता-पिता के ऊपर, बच्चों के ऊपर क्रोध के अंगारे गिराकर आप क्या कर लेंगे? वे तो घर में ही रहते हैं, यदि वास्तव में क्रोध करना ही है तो पड़ोसी के ऊपर करो, सड़क के सामने किसी अनजान व्यक्ति से, अपने ऑफिस के बॉस से करो तब यह ज्ञात हो जायेगा कि आपका क्रोध कितना वास्तविक है। बच्चों के ऊपर, परिवार के सदस्यों के ऊपर, नौकर के ऊपर और अपने से कमजोर व्यक्तियों के ऊपर क्रोध करने से क्या हो जायेगा।
“आपके अन्दर जोश आना चाहिये, उन्माद आना चाहिये-आगे बढ़ने के लिये, प्रगति करने के लिये, प्रोगेस करने के लिये, अपने लक्ष्य पर अग्रसर होने के लिये; यही क्रोध का वास्तविक अर्थ है।”
जिस प्रकार देव शक्तियां विकसित होती हैं, उसी प्रकार से असुर शक्तियां भी विकसित होती हैं। प्रत्येक युग में ऐसा होता ही है। असुर कभी खत्म नहीं होंगे और देव शक्तियां भी कभी समाप्ति की ओर अग्रसर नहीं होंगे तथा मनुष्य भी कभी समाप्त नहीं होंगे। प्रकृति और सृष्टि निरन्तर अबाध रुप से क्रियाशील रहेगी। लाखों प्रकार की वनस्पतियां आयेंगी, लाखों प्रकार के कीट-पतंग आयेंगे, जलचर-खेचर आयेंगे परन्तु उनके बीच में सबसे उच्चता लिये हुये मनुष्य भी आयेगा। इसलिये ही देवताओं से श्रेष्ठ मनुष्य को बताया गया है। जो मनुष्य उनकी साधना-आराधना कर उन्हें प्राप्त करता है उसे वे प्राप्त हो जाते हैं।
सद्गुरु तो एक ही हैं। मैं उनसे ये आराधना करता हूँ कि “मुझे ज्ञान-बुद्धि से युक्त करना, सद्चेतना प्रदान करना जिससे मैं ज्यादा से ज्यादा अपने साधकों-शिष्यों की सेवा कर सकूं।” मेरा यह चिन्तन नहीं रहता है कि मेरा विवाह हो जाय, मुझे पुत्र-पुत्रियों की, रोजगार की प्राप्ति हो जाय।
परन्तु एक छोटे बालक की मनोकामना रहेगी कि हे सद्गुरुदेव! मुझे अच्छी नौकरी प्राप्त हो जाये। एक व्यक्ति की कामना होगी कि मेरा रोजगार अच्छे से चले। सद्गुरु एक ही हैं परन्तु इच्छायें लाखों व्यक्तियों की है और उनकी इच्छायें पूरी करते ही हैं, अपने किस भाव से उनको पुकारा है, आत्मसात किया है, आपका और उनका, उनका और आपका तारतम्य कितना है, जुड़ाव कितना है; उसी अटैचमेंट के अनुसार हमें परिणाम प्राप्त होते हैं।
आपके जीवन में इस प्रकार ही शुभ-प्रकाशमय महालक्ष्मी दीपावली पर्व हजारों बार आये, आप निरन्तर सहस्त्र लक्ष्मीयों से युक्त हों, जीवन में आरोग्य, चैतन्यमयता व्याप्त हो, सावित्री सुहाग-सौभाग्य शक्तियों से युक्त हों और कामदेव अनंग आपके शरीर को सदैव चैतन्यता प्रदान करते रहें, साथ ही आपके कार्य-व्यापार में उन्नति-प्रगति हो ऐसा ही शुभ-मंगलकामना करते हुये आशीर्वाद प्रदान करता हूँ।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,