





दीक्षा का शाब्दिक अर्थ है “दक्ष” (Able) हो जाना, अर्थात् अयुक कार्य के पूर्ण करने के लिये आवश्यक गुणों को अपने अन्दर आत्मसात या ऊर्जा से उत्पन्न करना। वह गुण जो आपको पूर्णता प्राप्त करने में सहायक है, वह गुण जो आपके जीवन में न्यूनता को समाप्त करने में सहायक है, पर जब सामान्य मनुष्य को अपने इन गुणों का आभास ही नहीं- ज्ञान ही नहीं तो वे कैसे अपने गुणों को चेतना प्रदान करेंगे?
एक छोटे बच्चे को अपने चलने की क्षमता का ज्ञान नहीं होता वह जब तक चलने में सक्षम नहीं हो जाता जब उसकी मॉं उसे हाथ पकड़ कर चलना नहीं सिखाती, पैर तो थे उस बच्चे के पास पर वह आत्मविश्वास नहीं कि वह अपने माता-पिता, दादा-दादी की भाति चल सकता है। दीक्षा भी वही चेतना है जो एक साधक को पूर्ण होने की, सफल होने की, प्रयासों को सफल होने की चेतना प्रदान करती है। केवल प्रयत्न व परिश्रम से आप पूर्णता, सफलता प्राप्त नहीं कर सकते हो। जो प्राप्त करना है उसके लिये आपको दक्ष होना होगा और वो दक्षता उसे केवल गुरू ही प्रदान कर सकते हैं। गुरू को धारण कर ही साधक स्वयं को गुरू के हाथों में सौंप देते हैं व गुरू ही इस भौतिक जीवन में भी पूर्णता प्रदान करवाते है।
जब आप अपना हाथ गुरू के हाथों में सौपते हैं तो वह आपको इस संसार रूपी भव सागर से पार लगाते हैं। दीक्षा जीवन के उस परम सुख की प्राप्ति है जब आप गुरूमय हो गये, जब आपके मन, कर्म दोष मुक्त हो गये। दीक्षा वह तप है जो एक साधक को स्वर्णमय बनाती है। दीक्षा वह दिव्य चेतना है जो साधक को निरन्तर गतिशील बनाये रखती है, शक्ति युक्त बनाये रखती है। जिससे साधक दैनिक जीवन में होने वाली समस्याओं का निवारण कर सके। अर्थात् दीक्षा आपको दक्ष बनाती है, ताकि आपको अपने जीवन की समस्याओं के लिये किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। भौतिक जीवन में कई प्रकार के अवरोध आते हैं, पर उनको पार कैसे लगाना है, व राह में आने वाली समस्याओं का निराकरण कैसे होगा, उसका ज्ञान केवल गुरू को होता है।
गुरू दीक्षा के माध्यम से आपको वो ऊर्जा तो प्रदान करते ही हैं परन्तु आपका पूर्ण समर्पण भाव, पूर्ण श्रद्धा भाव, पूर्ण विश्वास, गुरू के प्रति चिन्तन और गुरू को अपनी आखों में समा लेने की क्रिया करनी होगी।
इस युग में जहां छोटी-से-छोटी चीज को पाने के लिये कड़ा संघर्ष है, कड़ी मेहनत है व भाग्य, परिस्थिति व अपनो का अनुकूल होना होता है, इन सबको संभव कर पाना केवल ऐसे लोगों के बस में है, जिनमें गुरू की चेतना आत्मसात है, जो विपरीत परिस्थिति को भी अपने अनुकूल बना कर मनोवांछित फल को प्राप्त करने के सक्षम है दक्ष है। इस दिव्य चेतना को आत्मसात करने के लिये आप 30-31 दिसम्बर व 01 जनवरी को कुल-वंश वृद्धि शाकम्भरी सर्व सुखदा प्राप्ति नूतन वर्ष साधना महोत्सव, बिलासपुर में सपरिवार आना श्रेष्ठ रहेगा।
आपका अपना
विनीत श्रीमाली
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,