





सूरत से एक परिवार जिसमें माता, पुत्र तथा बहु थे, अत्यन्त तनावग्रस्त होकर गुरूदेव से मिलने की प्रतीक्षा कर रहे थे, उनके चेहरे देखने से वे काफी परेशान लग रहे थे, माता तथा बहु अत्यन्त व्यथित हो रहे थे, बहु की आँखे अक्सर नम हो जा रही थीं। उनका पूरा परिवार अत्यन्त सौम्य व शालीन लग रहा था, लेकिन उनके व्यथित होने का कारण नहीं समझ में आ रहा था, एक-दो बार उनसे बात करने की चेष्टा भी की, परन्तु सफल नहीं हो पाया, उस परिवार का प्रत्येक सदस्य चुप तो था ही, कुछ पूछने पर भी कोई उत्तर नहीं देता था।
और गुरूदेव से मिलकर दूसरे दिन वह परिवार चला गया, अत्यन्त व्यस्तता के कारण मैं उनसे मिल भी नहीं पाया। उन्हें न जानते हुये भी उनके विषय में जानने की आकांक्षा थी।
अचानक छः महीने बाद पुनः वापिस देख कर उनसे मिलने की इच्छा प्रबल हो उठी, इस बार उस परिवार के प्रत्येक सदस्य के चेहरे पर प्रसन्नता झलक रही थी। मैंने उनसे ‘जय गुरूदेव’ कर उनकी स्थिति के बारे में पूछा, तो उनकी मां बोली-‘पूज्य गुरूदेव की कृपा से हमारा पूरा परिवार बच गया।’
बातचीत के दौरान उनसे ज्ञात हुआ, कि उनके परिवार में सिर्फ तीन लोग ही है, वे स्वयं, उनका पुत्र व उनकी बहु। उनका परिवार एक अत्यन्त विकट अवस्था से गुजर रहा था। उनके विरोधियों ने उनके पुत्र को मार कर उनके वंश को समाप्त करने की धमकी दी थी।
इसके अलावा उनके परिवार में एक दुःखद स्थिति यह भी थी- यदि पहला पुत्र उत्पन्न होता था, तो वह पांच या छः वर्ष की अवस्था में मृत्यु हो जाती है, उनकी बहू को भी पहला बच्चा पुत्र है, जिसकी अवस्था छः वर्ष की होने को आई थी। घर में अत्यधिक तनाव की स्थिति बनने लगी थी, एक तरफ पुत्र की चिंता दूसरी तरफ पौत्र की, घर की स्थितियां डांवाडोल हो रही थी, पिछली बार जब हम पूज्य गुरूदेव से मिलने आये थे, तो इसी समस्या से हम सभी अत्यन्त व्यथित थे, इसका कोई उचित व सटीक हल नहीं मिल रहा था।
पूज्य गुरूदेव से मिलने से पूर्व लगा, कि शायद अब कोई हल मिल जायेगा, पर समय ऐसा चल रहा था, कि किसी भी प्रकार से कोई राहत अनुभव नहीं हो रही थी।
पूज्य गुरूदेव ने अत्यन्त कृपा कर ‘कटुम्ब रक्षा’ और ‘अकाल मृत्यु निवारण’ साधना प्रदान की। यदि इसे पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से किया जाये, तो यह अत्यन्त शीघ्र फलदायी है। ‘ऐसे ही साधना के माध्यम से सावित्री सत्यवान को यम के पाश से छुड़ाकर वापस ला सकीं।’
इतना कह कर वह पूज्य गुरूदेव के प्रति अत्यन्त विनम्र भाव से बोली-‘गुरूदेव की कृपा से मेरा पौत्र अपनी छः वर्ष की आयु पूरी कर चुका है और पूर्णतः स्वस्थ है, उसे किसी प्रकार की मृत्यु बाधा नहीं है और मेरे पुत्र के पीछे जो लोग पड़े थे, सब शांत हो गये हैं वे मेरे पुत्र से क्षमा मांग कर सहायतार्थ प्रस्ताव भी दिया है। ’
इसके बाद एक दिन गुरूदेव से साधारण सी चर्चा में ही पूछ बैठा- वट सावित्री साधना क्या हैं? इसके द्वारा क्या सम्भव है तथा इसे किस प्रकार से सिद्ध कर सकते हैं?
पूज्य गुरूदेव ने उत्तर दिया-‘यह तो वैसी ही साधना है, जिसे सम्पन्न कर सावित्री यम के पाश से सत्यवान को बचा कर ले आई थी। जिस दिन सावित्री सत्यवान को लेकर आई थी, वह दिन ‘वट सावित्री दिवस’ के नाम से मान्य हुआ।’
ऊपर तो मैंने संतप्त परिवार का एक ही उदाहरण दिया है, जबकि वर्तमान समय में प्रायः सभी परिवारों में अनेक प्रकार की समस्यों उत्पन्न होती रहती है। जिससे परिवार का प्रत्येक व्यक्ति छुटकारा चाहता है और गृहस्थ सुख का पूर्ण आनन्द प्राप्त करना चाहता है। परन्तु इन समस्याओं के कारणों से वह इसका सुख प्राप्त नहीं कर पाता।
आज परिवार के आंतरिक क्लेशों के कारण आपसी सम्बन्धी ही एक दूसरे के विरोधी और खून के प्यासे हैं।
परिवार में एक अनचाहा सा तनाव सदैव व्याप्त रहता है।
परिवार के सभी सदस्य व्यथित से रहते हैं।
पति या पुत्र की रक्षा के लिये हर समय संशय की स्थिति बनी रहती है।
न जाने कब आकस्मिक घटना घट जाये और वह घटना अकाल मृत्यु का कारण बन जाये।
आंतरिक तनावों के कारण या घर में आपसी मतभेद के कारण परिवार में बिखराव की स्थिति बन जाती है।
परिवार विखंडित हो रहा है, तो यह साधना सम्पन्न करना अत्यन्त ही लाभदायक है।
यह साधना सम्पन्न करने पर घर के सदस्यों के बीच आपसी तारतम्यता बनने लगती है तथा उनकी मानसिकता में परिवर्तन आने लगता है, उनके मध्य प्रेम और सौहार्द का वातावरण उपस्थित होने लगता है, जिससे पूरा परिवार फिर से संगठित हो जाता है।
इस साधना से-
साधना विधि
साधना हेतु- 5 सौभाग्य सावित्री जीवट, दीर्घायु जीवन प्राप्ति माला, पांच काम्य गुटिका तथा पूर्णत्व प्राप्ति यंत्र (धारण) करें।
यह साधना 16 मई, शनिवार, वट सावित्री अथवा किसी गुरूवार के सांय को प्रारम्भ करें। साधक स्नान कर पूर्ण रूप से स्वच्छ होकर, उत्तराभिमुख बैठ कर साधना सम्पन्न करें। साधक पीला या लाल वस्त्र धारण करें। साथ ही पीला वस्त्र बाजोट पर बिछाकर यंत्र को स्थापित करें। घी का दीपक प्रज्जवलित करें। यंत्र का पूजन करें। गुलाब के पुष्प चढ़ायें। जिस कामना हेतु यह प्रयोग सम्पन्न कर रहे हैं, वह कामना बोलें। निम्न मंत्र का 9 माला मंत्र जप करें-
मंत्र
।। ऊँ श्रीं सावित्रीयै सौभाग्य पूर्णत्व प्राप्ति आगच्छ आगच्छ फट्।।
दूसरे दिन प्रातः वट वृक्ष के पेड़ को मौली से लपेटते हुये 5 परिक्रमा करें। परिक्रमा करते समय अपने हाथ में पांचों काम्य गुटिका रखें तथा कामना बोलें, दूध और गंगाजल युक्त जल वृक्ष में अर्पित करें। लगातार 5 दिवस तक यह क्रम पूर्ण करें। साधना पूर्ण होने के बाद सामग्री पेड़ की जड़ में रख दें।
सांसारिक गृहस्थ जीवन को सुखमय बनाने के लिये आवश्यक है कि देवी-देवताओं की शक्तियों से युक्त हो सकें तब ही जीवन में आनन्द, हर्ष, उल्लास, मनोरथ पूर्णता की क्रिया सम्पन्न होती है। साधक में पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और मानसिक एकाग्रता होने पर ही दैविक शक्तियों का वरदहस्त प्राप्त होता है। जीवन को सुमंगलमय धन लक्ष्मी, आयु वृद्धि, अखण्ड सौभाग्य, वंश वृद्धि की प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि वर्ष का सबसे बड़ा मास ज्येष्ठ मास में वट सावित्री सुख-सौभाग्य प्राप्ति दीक्षा ग्रहण करें, जिससे पारिवारिक शांति, कार्य, व्यापार में वृद्धि हो सके और हमारा जीवन उद्धिग्नता, क्रोध, तनाव और विषम चिंताओं से मुक्त हो सके।
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