





वर्ष का श्रेष्ठतम पर्व गुरु पूर्णिमा होता है। जिस दिन ब्रह्माण्ड की समस्त शक्तियाँ, सिद्धियां सद्गुरु के सामने नृत्य करती हैं और सद्गुरु भी श्रेष्ठ और अद्वितीय बना देना चाहते हैं अपने शिष्य को। पूज्य गुरुदेव ने अपने शिष्यों को नरकतुल्य जीवन से बाहर निकालने हेतु अपने रक्त की आहुतियाँ दी हैं। जीवन में क्रान्ति, परिवर्तन तथा जागृति लाने हेतु पूज्य गुरुदेव की लेखनी से प्रतिपादित कुछ ब्रह्म सूत्र जो काल के भाल पर खड़े होकर प्रत्येक साधक-साधिका को चुनौति देती है-
प्रत्येक साधक के अन्दर एक शाश्वत जिज्ञासा व्याप्त होनी चहिये, सदैव जीवित रहने की प्रबल धारणा शक्ति होनी चाहिए, एक ऐसी अकांक्षा होनी चाहिए जो हमें वहां न रुकने दे, जहां हम बेवजह ही रुककर जड़ हो गए हैं। तुम्हें निरन्तर अज्ञात की ओर उठते रहना है; क्योंकि तुम्हारी मंजिल अनंत की तरफ है, अद्वितीयता की तरफ है।
तुमने जो नहीं पाया है, जो तुम्हारे हाथ से बहुत दूर है; यदि वह मंजिल हिमालय का उत्तुंग शिखर भी है, तो भी वह तुम्हारे विचारों के आगे बौना सा प्रतीत होने लगेगा। सद्गुरु स्वरुप में मैं तुम्हारे आत्मा को निमंत्रण दे रहा हूँ; मैं तुम्हारे प्राणों में स्थापित हूँ, तुम मेरे प्राणों के धड़कन ही हो, जिससे सदैव तुम्हारे पैर धधकते हुये अंगारों, अज्ञानता के घटाटोप अंधकार एवं प्रचंड तूफान से टक्कर लेनें हेतु सदैव आगे ही बढ़ते रहेंगे।
हमें जीवन में चहूँ ओर से सर्वथा नवीन खोज चाहिए। जिसके जीवन में खोज नहीं है, वह मरा हुआ, बुझदिल, कायर इंसान है; वह स्वयं के जीवन को नारकीय करने में तुला हुआ है, वह सड़ेगा, नष्ट तो होगा परन्तु मानसरोवर के शिखर तक नहीं पहुंच सकेगा। सागर में तो केवल वे सरिताएं ही पहुंचती हैं, जो नित्य अनजान रास्तों को खोजती हुई, अपरिचित सागर की तलाश में चली जाती हैं। अंततोगत्वा एक दिन वे वहां पहुँच ही जाती हैं, जहां पहुँचने पर उसका अपरिचय का पथ मिट जाता है। उसके मिट जाने के बाद कुछ और प्राप्त कर लेने की कामना नहीं रह जाती।
तुम्हारे इस नवीन खोज का केंद्र कहाँ हो? यह खोज कहाँ केंद्रित हो? इस जीवन में वह किस जगह छिपी है? जहाँ शक्ति छिपी है, जहाँ वह अग्नि प्रज्वलित है, जिसके प्रज्वलन से मनुष्य जगमगाता हुआ दीपक बन जाये। कैसे हम उस प्रज्वलित दीपक को ऊपर की ओर ले जायें। आपको इस सब चिंताओं और विचारों से मुक्ति प्राप्त करनी है। सद्गुरुदेव के पास वह सामर्थ्य है, योग्यता प्राप्त कर लेने पर वह क्षण में ही तुम्हारे भितर के व्याप्त सुप्त शक्ति को जागृति प्रदान देंगे।
नीचे की तरफ बहाव प्रकृति का नियम है। जो साधक कुछ भी नहीं करेगा, वह नीचे की तरफ बहेगा। ऊपर की तरफ उठना प्रकृति के ऊपर उठना है, अपने आराध्य की तरफ उठना है। यह नियम से नहीं होता अपितु अपने जीवन में फैले नारकीय नियम को तोड़कर उस नियम को अपने प्रतिकूल बनाने से होता है। तुम्हें आवेग के साथ ऊपर की तरफ बढ़ना है और इस क्रिया के लिये आवश्यकता होगी शक्ति तत्व की। शक्ति पूर्ण तत्व है, प्राणों का अभिषेक है। वह प्राप्त होगा दीक्षाओं को आत्मसात कर अपने अन्दर गुरु को धारण करने से।
मैंने तुम्हें शिविर आने, योगासन करने, पूजा-प्राणायाम करने, ध्यान करने, मंत्र जप करने, साधना-दीक्षा को आत्मसात करने आदि का विकल्प दिया गया था, लेकिन उदासीनता, भ्रम तथा अपने स्वभाव के कारण आपने इनमें से किसी को भी नहीं चुना। आपने इन साधनाओं के गुढ़ आध्यात्मिक लाभ से खुद को वंचित रखा और ऐसा करते-करते ही हमने अपनी समृद्ध संस्कृति तथा विरासत को लगभग खो दिया है।
ब्रह्मांड की समस्त ध्वनियों तथा स्तुतियों से निर्मित तथा ऊर्जा प्राप्ति हेतु ‘निखिलेश्वरानन्द स्तवन’ को ‘आध्यात्म की पराकाष्ठा’ कहा जाता है । इस स्तवन के श्रवण अथवा पठन के आगे समस्त मंत्र जप, साधनायें, तीर्थ आदि गौण हैं। इस स्तवन के पाठ या श्रवण मात्र से असंभव से असंभव कार्य भी कुशलता पूर्वक संपन्न किये जा सकते हैं। अतः प्रत्येक साधक यह सुनिश्चित करे तथा प्रण ले कि वह नित्य संकल्प लेकर ‘निखिलेश्वरानन्द स्तवन’ का कम से कम 21 श्लोक अवश्य ही पढ़ेगा। इस स्तवन के बारे में कुछ भी कहना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है।
गुरु, व्यक्ति और समाज का मार्गदर्शन कर प्रगति और एकता की ओर अग्रसर करता है। विवेकानंद ने कहा था-‘संप्रदाय में जन्म लेना अच्छा है, लेकिन उसमें मरना नहीं।’ गुरु अपने साधक, शिष्य को इस सम्प्रदाय के दलदल से बाहर निकालकर तमाम विघ्न और बाधाओं के परे, उस परम् सत्य की ओर धकेल देता है जिसे परम आनन्द कहा जाता है।
जो शिव का स्वरूप है वही सद्गुरु का स्वरूप है। सद्गुरु का कोई लक्षण नहीं बतलाया जा सकता, जिसमें सब है, जो स्वयं ही सब हैं, जो सबसे अलग और सर्वथा नवीन हैं, वही ब्रह्म हैं, ईश्वर हैं।
सफलता प्राप्त करने में अनुशासन और परिश्रम का विशेष महत्व होता है। जो व्यक्ति अथवा साधक इन बातों को आत्मसात कर लेता है, इन्हें अपने जीवन में उतार लेता है, उसके लिए कोई भी लक्ष्य, कोई भी साधना कठिन नहीं होता है। आपको प्रत्येक कार्य उसके उचित समय पर करना है। जो इन बातों को हमेशा ध्यान में रखते हैं वे जीवन में निरंतर प्रगति करते हैं। ऐसे लोगों को धन लक्ष्मी, ज्ञान लक्ष्मी, कार्य-व्यापार लक्ष्मी का विशेष आर्शीवाद प्राप्त होता है। लक्ष्मी परिश्रम करने वालों से ही प्रसन्न रहती हैं।
इस सदी का सबसे बड़ा दुश्मन हमारे हाथों में व्याप्त मोबाईल-फ़ोन है। अतः प्रत्येक साधक दिन में कम से कम 1-2 घंटे के लिए फ़ोन से पूरी तरह दूर रहें। उस समय का उपयोग अपने कौशल को बढ़ाने, आत्म चिंतन, ध्यान-चिंतन अथवा मंत्र जप हेतु करें। जिससे आपको शक्ति की प्राप्ति हो सके।
तुम्हें अपने जीवन में व्यक्तिगत क्रांति लानी ही पड़ेगी और क्रांति की पहचान उसके वित्तीय लाभ अथवा उससे मिलने वाली प्रसिद्धि से नहीं होगी। आपकी क्रांति न तो दूसरों पर थोपी जाती है और न ही छल-कपट से प्रेरित होती है; इसमें अहंकार का कोई स्थान नहीं होता। यदि सफल रही, तो उन गुणों को उजागर करेगी जिनके बारे में आपने कभी सोचा भी नहीं था, क्योंकि आप स्वयं को ऐसी परिस्थितियों में डालेंगे जो आपको चुनौती देंगी और आपको बेहतर बनने के लिए प्रेरित करेंगी।
जब ब्रह्मांड की शक्तियों को साधने और उसका उचित उपयोग करने की चमत्कारी पद्धतियों का सर्वथा लोप होता है, तो सृष्टि के आंतरिक और बाहरी ऊर्जाओं के संतुलन पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। साथ ही समाज में फैले अंधविश्वासों के कारण प्राचिन गुढ़ विद्यायें पूर्णतः नष्ट सी हो जाती हैं। उसी हेतु सिद्धाश्रम से उच्चकोटि के योगी को इस लोक पर कल्याण भावना को विकसित करने के हेतु भेजा जाता है।
पूज्य गुरुदेव द्वारा प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘प्राचिन मंत्र यंत्र विज्ञान’ जीवन के सर्वांगीण विकास और प्रगति हेतु गुप्त और अप्रकट भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान का एक विविध संग्रह है। जिसका मुख्य उद्देश्य प्राचीन भारतीय विद्वत्ता की सहायता से भौतिक और आध्यात्मिक जीवन को उन्नत करना तथा आम आदमी को इन लुप्त ज्ञान-विज्ञान तथा साधनाओं से पुनः अवगत कराते हुये सफलता प्राप्त करना है। यदि एक वाक्य में कहें तो यह पत्रिका साधना, दीक्षा, ज्योतिष, मंत्र-तंत्र, कुंडलिनी जागरण, योग क्रिया, ध्यान सिद्धि, काल निर्णय आदि विषयों का निचोड़ है।
प्रत्येक शिष्य को इस मासिक पत्रिका को व्यापक रुप में विस्तृत करना ही है। अपने सद्गुरु की चेतना को फैलाना वास्तव में ही बहुत बड़ा गुरु कार्य है। यह उनकी चेतना को आत्मसात करने की प्रथम कड़ी है, जीवन में स्वयं को निर्भिक, निडर तथा अद्वितीय बनाने की कुंजी है। अतः इस पत्रिका को प्रत्येक जन-मानस को सौंपने की जिम्मेदारी आपको सौंप रहा हूँ।
देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं।
रह भरोसे भाग के दुख भोग पछताते नहीं।
काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहीं।
भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं।
हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले।
सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले।।
तुम्हारे सद्गुरुदेव की कलम से-
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