





समुंद्र मंथन में आठवें रत्न के रूप में सौंदर्य के विधान व शोभा स्वरूप भगतवती लक्ष्मी जी का उद्रम हुआ था। जिनकी प्राप्ति की कामना देवता, ऋषि, असुर सभी को थी। क्रम में आठवें का तर्क अष्टधा प्रकृति (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार है) माँ भगवती ने नारायण का वरण इसलिये किया क्योंकि केवल नारायण ही इन अष्ट शक्तियों के अधिपति है।
वहीं असुर, तामसी होते है, देवता राजस प्रवृत्ति के होते है और ऋषिगण सात्विक प्रकृति के होते है परन्तु नारायण प्रकृति के परे है व पूर्ण प्रकृति ही उनमें समाहित है। माँ लक्ष्मी जी ने नारायण का वरण इसीलिये किया क्योंकि प्रकृति में व्याप्त जीव को माँ लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त हो सके-चाहे वह ऋषि हो देव या असुर। अगर प्राण किसी भी रूप् में हो वह भगवान नारायण की आराधना करते है तो माँ लक्ष्मी अवश्य ही अपना आशीर्वाद प्रदान करती है। माँ भगवती के अष्ट स्वरूप-आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, सन्तानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी प्रत्येक गृहस्थ साधको के लिये जीवन का मूलभूत आधार है। इनके अभाव से जीवन नश्वर है। लक्ष्मी का अर्थ केवल धन नहीं अपितु जीवन की पूर्णता व प्रत्येक सुख की प्राप्ति है, साथ ही जीवन में आने वाली प्रत्येक विकट स्थितियों पर विजयश्री होना का अर्थ ही लक्ष्मी प्राप्ति है।
कार्तिक अमावस्या के दिवस पर माँ भगवती का अष्टगम स्वरूप में उद्गम हुआ था, इस दिवस को हम धन-धान्य व वैभव के स्वरूप में दीपावली पर्व मनाते है। गृहस्थ साधक के लिये यह अति महान पर्व, दिवस है जब एक साधक तांत्रिक व सात्विक साधना एक स्वरूप में कर सकते है। यहां तांत्रिक साधना का अर्थ यह नहीं कि आपको कोई जटिल शमशान साधना करनी है अपितु अपने पूर्ण परिवार के साथ पूर्णता को प्राप्त करने का दिवस है। इस दिवस पर कोई भी लक्ष्मी साधना करने से आपको जीवन की विष रूपी नकारात्मकता का शमन होता है।
इस दीपावली आप अपने जीवन की सभी नकारात्मक व असुरी तृष्णा व लोभ का अन्त कर अपने जीवन को विष्णुमय लक्ष्मीमय, नारायण मय-भगवतीमय बनाने हेतु पूर्ण विधिवत साधना अवश्य ही करे जिससे आप को सुख संपति, धन-वैभव, ऐश्वर्य की प्राप्ति हो। जीवन में प्राप्त करने के लिये अनंत साल जितनी कामनायें है, परन्तु इस अनंत कामनाओं में कई विष रूपी इच्छायें है जो आपके जीवन को कष्ट कारी बनाती है परन्तु साधना वह मंथन है जो आपकी कामनाओं में से विष को निकालने की क्रिया है। इस 6-7-8 नवम्बर को आप सहस्त्र लक्ष्मी कुबेर श्री सौभाग्य सुखदा दीपावली साधना महोत्सव में सम्मिलित होकर अपने जीवन की विष पूर्ण स्थितियों का अन्त करें।
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