





संस्कृत नाम: भूनिम्ब, किराततिक्त आदि
अंग्रेज़ी: Andrographis, King of Bitters
वैज्ञानिक नाम: Andrographis paniculata
कुल: Acanthaceae
कलमेघ के पर्यायवाची शब्द:एंड्रोग्राफिस पैनिकुलाटा, एंड्रोग्राफिस, कालमेघा, कलामगे
इसका उपयोग कई औषधीय प्रयोजनों के लिये किया जाता है। भारत के अलावा यह दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के कई क्षेत्रों में पाया जाता है। इसका स्वाद अत्यंत कड़वा होता है, इसलिये इसे ‘हरा चिरेट्टा’ और ‘कड़वाहट का राजा’ (“King of Bitters”) भी कहा जाता है। आयुर्वेदिक दृष्टिकोण में तिक्त रस वाले द्रव्यों को सामान्यतः पाचन, अग्नि, लीवर की समस्याओं तथा शरीर में विभिन्न प्रकार के दोष-संतुलन से संबंधित उपयोगों में रखा गया है। यह रक्त वाहिकाओं को चौड़ा करके और रक्त प्रवाह बढ़ाकर रक्तचाप को नियंत्रित करने में भी मददगार है।
इसके पौधे की ऊँचाई सामान्यतः लगभग 30–100 सेंटीमीटर तक होती है। इसकी पत्तियाँ हरी और अपेक्षाकृत लंबी होती हैं तथा फूल छोटे सफेद रंग के होते हैं। औषधीय उपयोग में विभिन्न भागों, विशेषकर पत्तियों और पूरे पौधे का प्रयोग भिन्न-भिन्न रोगों के निवारण हेतु किया जाता है।
कालमेघ पाउडर को नारियल तेल के साथ त्वचा पर लगाने से एक्जिमा, फोड़े और त्वचा का संक्रमण नियंत्रित होता है क्योंकि इसमें एंटीऑक्सीडेंट, रोगाणुरोधी और सूजनरोधी गुण होते हैं। स्वाद में अत्यंत कड़वा होने के कारण इसका सेवन कुछ मीठा मिलाकर या पतला करके करना चाहिये।
कालमेघ के लाभ-
लिवर की बीमारी में सहायक: कालमेघ यकृत संबंधी समस्याओं में लाभकारी है। इसमें कफ और पित्त को संतुलित करने की प्रकृति के कारण इसमें यकृत-सुरक्षात्मक गुण होते हैं। यह मुक्त कणों के कारण यकृत कोशिकाओं को होने वाले नुकसान को रोकता है।
फ्लू (इन्फ्लूएंजा) के निवारण हेतु: कालमेघ में एंड्रोग्राफोलिड में एंटीवायरल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं। जो इन्फ्लूएंजा वायरस के गुणन को रोकता है। यह फेफड़ों की सूजन के लिये जिम्मेदार सूजन मध्यस्थों की गतिविधि को भी कम करता है।
साइनसाइटिस के रोकथाम: कालमेघ साइनसाइटिस के प्रबंधन में फायदेमंद होता है। इसमें रोगाणुरोधी, सूजनरोधी और प्रतिरक्षा-मॉड्यूलेटरी गुणों की प्रचुरता होती है। कालमेघ संक्रमण से लड़ने में मदद करता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है। ऐसा इसके कफ और पित्त को संतुलित करने वाले गुणों के कारण होता है।
भूख बढ़ाने में सहायक: कालमेघ भूख कम अथवा भूख न लगने जैसी पाचन संबंधी समस्याओं के उपचार में कारगर है तथा अपनी उष्ण (गर्म) प्रकृति के कारण यह पाचन अग्नि और यकृत के कार्यों को बेहतर बनाने में सहायक है।
सर्दी-जुकाम के निवारण हेतु: कालमेघ अपने कफ और पित्त को संतुलित करने वाले गुणों के कारण सामान्य सर्दी, फ्लू और ऊपरी श्वसन संक्रमण से लड़ने में मदद करता है। इसमें रोगाणुरोधी, सूजनरोधी और प्रतिरक्षा-संशोधक गुण होते हैं। यह नाक की श्लेष्म झिल्ली की सूजन को रोकता है तथा नाक के स्राव को भी कम करता है।
टॉन्सिलाइटिस में उपयोगी: रोगाणुरोधी गुण होने के कारण यह कफ एवं पित्त को संतुलित तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता पर सकारात्मक प्रभाव डालता है। यह टॉन्सिलाइटिस के कारण होने वाले बुखार और गले की खराश और खांसी जैसे लक्षणों को कम करने में सहायक होता है।
आंतों की सूजन का समाधान: कालमेघ सूजनरोधी और पित्त को संतुलित करने वाले गुणों के कारण आंतों की सूजन नियंत्रित करता है और मल त्याग को सुचारू बनाता है।
पारिवारिक भूमध्यसागरीय बुखार (वंशानुगत सूजन संबंधी विकार) के निवारण में सहायक: यह एक दुर्लभ आनुवंशिक और जन्मजात सूजन संबंधी बीमारी है। इस बीमारी में बिना किसी बाहरी संक्रमण के ही शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र अचानक सक्रिय हो जाता है, जिससे मरीज को बार-बार बुखार आना, फेफड़े, हृदय, छाती या जोड़ों में गंभीर दर्द और पेट की परतों में सूजन होना शामिल है। कालमेघ में मौजूद एंड्रोग्राफोलिड में सूजनरोधी और दर्द निवारक गुण होते हैं। यह रक्त में नाइट्रिक ऑक्साइड और सूजन मध्यस्थों के स्तर को सामान्य करता है।
गठिया के रोकथाम में सहायक: कालमेघ गठिया के प्रबंधन में लाभकारी होता है। यह एक ऑटोइम्यून विकार है। आयुर्वेद में रुमेटॉइड आर्थराइटिस को आमवात (गठिया) कहा जाता है। गठिया की शुरुआत पाचन अग्नि के कमजोर होने से होती है, जिससे आम (अपर्याप्त पाचन के कारण शरीर में बचे विषाक्त पदार्थ) जमा हो जाते हैं। ये अपचित और विषैले तत्वों के माध्यम से शरीर के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचते हैं, लेकिन अवशोषित होने के बजाय जोड़ों में जमा हो जाते हैं। नियमित रूप से कालमेघ का सेवन रुमेटॉइड आर्थराइटिस के लक्षणों को नियंत्रित करने में सहायक होता है। यह पाचन अग्नि को बढ़ाकर आम को कम करता है।
हृदय रोग के निवारण हेतु: कालमेघ उच्च रक्तचाप के प्रबंधन में लाभकारी होता है। यह रक्त वाहिकाओं को फैलाने और रक्त प्रवाह के सुधार में सहायक है। इसमें मौजूद एंड्रोग्राफोलिड में एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं जो लिपिड पेरोक्सीडेशन के कारण होने वाली क्षति से रक्त वाहिकाओं की रक्षा करता है। यह ऑक्सीजन की कमी के कारण हृदय कोशिकाओं को होने वाली क्षति से भी बचाता है।
परजीवी संक्रमणों के निराकरण के लिए कालमेघ: इसमें उच्च मलेरियारोधी गतिविधियां पायी जाती हैं। इसमें जीवाणुरोधी और परजीवीरोधी गुण होते हैं जो इसके तिक्त और पित्त को संतुलित करने वाले गुणों के कारण होता है।
त्वचा संबंधी विकारों की समाप्ति: कालमेघ में रक्त शुद्ध करने का गुण होता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट, रोगाणुरोधी और सूजनरोधी गुण होने के कारण यह रक्त से विषाक्त पदार्थों को निकालता है और इस प्रकार त्वचा रोगों के उपचार में सहायक होता है। इसका कारण इसका तिक्त (कड़वा) स्वाद और पित्त को संतुलित करने वाला गुण है।
कालमेघ का उपयोग करते समय बरती जाने वाली सावधानियां:
कालमेघ का स्वाद बहुत कड़वा होता है, इसलिये इसे प्राकृतिक मीठे पदार्थ के साथ ही खाएं।
गर्भावस्था, स्तनपान के दौरान कालमेघ के उपयोग से बचें।
कालमेघ में प्रतिरक्षा-संशोधक प्रभाव होते हैं। इसलिये यदि आप प्रतिरक्षा-संशोधक दवाओं का सेवन कर रहे हैं तो कालमेघ लेते समय डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।
कालमेघ रक्त शर्करा के स्तर को कम कर सकता है। इसलिये आमतौर पर मधुमेह रोधी दवाओं के साथ कालमेघ लेते समय अपने रक्त शर्करा के स्तर की निगरानी करना उचित होता है।
कालमेघ रक्त शर्करा के स्तर को कम करता है, तिक्त (कड़वा) रस और कफ को संतुलित करने वाले गुणों के कारण मधुमेह रोधी दवाओं के साथ कालमेघ का सेवन करते समय अपने रक्त शर्करा के स्तर की निगरानी करते रहें।
कालमेघ रक्तचाप के स्तर को कम करता है। इसलिये, आमतौर पर उच्च रक्तचाप रोधी दवाओं के साथ कालमेघ लेते समय अपने रक्तचाप की निगरानी करना उचित रहता है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,