





वैज्ञानिक नाम : Murraya koenigii
संस्कृत नाम : सुरभिनिम्बा
कैडर्योऽन्यो महानिम्बो रामणो रमणस्तथा।
गिरिनिम्बोमहारिष्टः शुक्लशालः कफाह्वयः।
नाम: कैडर्य, महानिम्ब, रामण, रमण, गिरिनिम्ब, महारिष्ट, शुक्लशाल और कफाह्वय।
अन्य नाम : कुररी पत्ता, कथनीम, नरसिंघा, बरसंगा, कार्तफुल्ली, गोरेनिम्ब, भुरसंगा, करेपाकु, करिवेपिली आदि……
कैडर्यःकटुकस्तिक्तः कषायः शीतलो लघुः
सन्तापशोषकुष्ठास्रक्रिमिभूतविषापहः।
कढ़ी पत्ता स्वाद में कटु (तीखा), तिक्त (कड़वा) और कषाय (कसैला) होता है। तासीर में यह ठंडा (शीतल) और पाचन में हल्का (लघु) है। यह शरीर की जलन/बुखार (सन्ताप), कमजोरी/रूखापन (शोष), त्वचा रोगों (कुष्ठ), रक्त विकारों, क्रिमि, बैक्टीरिया-संक्रमण और विषैले प्रभावों को दूर करता है।
आयुर्वेद में कढ़ी पत्ते का वर्णन कुछ इस प्रकार मिलता है-
सुरभिनिम्बा कटुस्तिक्तो ग्राही दीपको लघुः।
कफपित्तहरो रुच्यः कृमिकुष्ठविषापहः॥
करी पत्ते, जिन्हें आमतौर पर कढ़ी पत्ता कहा जाता है, भारतीय व्यंजनों में स्वाद बढ़ाने के लिये व्यापक रूप से उपयोग किये जाते हैं। कढ़ी पत्तों की अपनी एक विशिष्ट सुगंध होती है और उनमें कई विशिष्ट औषधीय गुण भी होते हैं। इसका इस्तेमाल बुखार, दस्त, पेचिश, उल्टी, एनीमिया, स्किन पिगमेंटेशन वगैरह में होता है। कढ़ी पत्ता बालों के लिए बेहतरीन टॉनिक, खून साफ़ करने वाला और कैल्शियम का एक अच्छा नेचुरल सप्लीमेंट है। कढ़ी पत्ते को खाली पेट खाने से पाचन क्रिया में सुधार होता है क्योंकि इसमें गैस कम करने वाले गुण होते हैं और यह पेट फूलने से भी राहत दिलाता है। यह शरीर में ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर कम करने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में भी मदद करता है।
सामान्य ग्रामीण अंचल में इसे ‘खट्टे फलों का रिश्तेदार’भी कहा जाता है। ये दोनों ही रटेशिया पादप परिवार से संबंधित हैं। इसलिए पत्तियों से तीखी, हल्की खट्टी सुगंध आना स्वाभाविक है।
आयुर्वेद के अनुसार, खाने के आखिरी हिस्से में तीखी, कड़वी और कसैली चीज़ें होनी चाहिये। ऐसी कड़वी और कसैली चीज़ें ढूंढना मुश्किल होता है जो दूसरे व्यंजनों के साथ अच्छी तरह मेल खाये। कढ़ी पत्ता एक बेहतरीन चीज है जो छाछ, दही और चावल के साथ अच्छी लगती है और इसे सब्जी या सलाद में भी शामिल किया जा सकता है। इसे कच्चा या पकाकर खाया जा सकता है।
कढ़ी पत्ते में मधुमेह-रोधी और सूजन-रोधी गुण होते हैं, जो रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में भी सहायक हो सकते हैं। इनमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट गुण मुक्त कणों से लड़ते हैं और कोशिकाओं को क्षति से बचाते हैं, जिससे शरीर कई बीमारियों से सुरक्षित रहता है।
आयुर्वेद के अनुसार, कढ़ी पत्ते को अपने नियमित आहार में शामिल करने से (उदाहरण के लिए पोहा, कढ़ी या सांभर में)वजन कम करने में मदद मिलती है क्योंकि इसमें दीपन और पाचन के गुण विद्यमान होते हैं।
कढ़ी पत्ते का पेस्ट या तेल बालों के लिये फायदेमंद होता है क्योंकि इसे लगाने से बालों का प्राकृतिक रंग बना रहता है। करी पत्ते में मौजूद विटामिन सी बालों की जड़ों को पोषण देता है, जिससे बालों का विकास होता है और बालों का झड़ना कम होता है।
कढ़ी पत्ते का फेस पैक के रुप में चेहरे पर लगाने से विटामिन सी जैसे एंटीऑक्सीडेंट की उपस्थिति के कारण त्वचा के रंग को बनाए रखने में मदद करता है।
इनकी पत्तियों में प्रोटीन, खनिज, कैरोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, विटामिन C , विटामिन A , निकोटिनिक एसिड, कैल्शियम और ऑक्सालिक एसिड पाए जाते हैं।
इनका उपयोग विश्व भर में आयुर्वेदिक चिकित्सा में विभिन्न रोगों के उपचार और रोकथाम के लिए व्यापक रूप से किया जाता रहा है। कढ़ी पत्ता अपने शक्तिशाली औषधीय और जैविक प्रभावों के लिये जाना जाता है जिनमें एंटीऑक्सीडेंट, मधुमेहरोधी, सूजनरोधी और ट्यूमररोधी गुण शामिल हैं।
इन पौधों के विभिन्न भागों, जैसे पत्ते, बीज, फूल और फल में ऐसे घटक पाये जाते हैं जो अनेक जैविक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने के लिये जिम्मेदार होते हैं तथा विभिन्न आणविक मार्गों को विनियमित करके मधुमेह और कैंसर रोधी प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कढ़ी पत्ते के घरलू उपचार
कढ़ी पत्ते के कुछ अन्य फायदे
कढ़ी पत्तों का उपयोग करते समय बरती जाने वाली सावधानियां
हालांकि कढ़ी पत्ते खाने के लिए सुरक्षित हैं, लेकिन अधिक मात्रा में सेवन से पाचन संबंधी कुछ समस्याएं जैसे जलन महसूस होना हो सकती हैं।
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