





शासनाधिकारियों, राजनैतिकों, नगर श्रेष्ठियों या साधारण जन के घर में हर चीज को प्रयुक्त नहीं किया जा सकता है। चित्र का चयन और उसकी दिशा वास्तुनुसार ही प्रत्येक घर के लिए अलग-अलग होते है।
शास्त्रों में सभी देवताओं को प्रयोज्य नहीं माना गया है। दैत्य, गह, तारा गंधर्व, राक्षस, पिशाच, पितर, प्रेत, सिद्ध पुरूष, विद्याधर, नाग, चारण, भूतों का कुल, उनके शस्त्र-अस्त्र, सभी अप्सराओं के गुण इत्यादि भवन में प्रयोज्य या प्रशस्त नहीं माने गये हैं। हाथियों का ग्रहण, महाभारत जैसे संग्राम, देवासुर संग्राम तथा युद्ध के दृश्य भी प्रशस्त नहीं माने गये हैं। रौद्र, दीन, अद्भुत, त्रस, वीभत्स और करूण रस भी ठीक नहीं होते है। भवन अलंकरण में हास्य और श्रृंगार रस ही शुभ माने गये हैं। अन्य रस शुभ नहीं हैं। आंतरिक सज्जा में या भित्ति चित्रों में श्रृंगार रस की प्रधानता शुभ मानी गई है, परन्तु प्रणय दृश्य अंतःवास में शुभ होते हैं।
हस्तियान (हाथी से खींचे जाने वाला वाहन), वन, पुष्पफल से रहित वृक्ष, पक्षियों के रहने के दूषित वृक्ष, रूखे-टूटे, सुखे हुये, खंडित और कोठर वाले वृक्ष के साथि-साथ कदम्ब, शल्मली, शैलु, तार, क्षार आदि के वृक्ष भी ठीक नहीं माने गये हैं। कड़वे और कांटेदार वृक्ष भी प्रशस्त नहीं माने जाते है। साथ ही गिद्ध, उल्लू, कबूतर, बाज, कौवा और कंक आदि पक्षी भी अशुभ माने गये हैं और रात्रि में जागने वाले पक्षी और जंगल में रहने वाले पशु-पक्षियों का भी घर में निवास शुभ नहीं माना गया है। इनके कारण अर्थ हानि, घोर व्याधि और बंधन का भय होता है। घर में रोते हुये निराशाजनक भाव वाले चित्र भी अशुभ माने जाते हैं।
पर कुछ ऐसी वस्तुये है जिनका प्रयोग घर में शुभ माना गया है। इष्ट देवता का एक हाथ तक का चित्र शुभ है। भवन के दरवाजों के दोनों तरफ दो अलंकृत प्रतिहारों का चित्र या मूर्ति बनाना चाहिये। दोनों प्रतिहार या रक्षक बेंत की छड़ी हाथ में लिये हों। अलंकृत वस्त्राभूषणों से सजे प्रतिहार शुभ माने गये हैं।
बड़े भवनों में ऐसा निर्माण किया जाने लगा है। सेवक-सखियों से घिरी हुई नारी या रक्षिकाएं भी दरवाजे के दोनों तरफ प्रशस्त माने गये है। अपने अनुरूप शंख और कमल से चित्र मुख से निकलते हुये रत्न और अशर्फियों के ढेरों को धारण करते हुये खजाने भी शुभ हैं। इसी भांति पद्म पर बैठी हुई पूर्ण कुंभ वाली रत्न और वस्त्रों से विभूषित लक्ष्मी, टेढे़ एवं ऊँचे उठे हुए पुष्प, फल पत्तों से भरे हुये पूर्ण कुंभ, अंकुश छत्र और बिल्लवृक्ष, शीशा, शंख और मछलियों की मालाओं से अलंकृत अष्टमंगल गौरी से द्वार को सुशोभित करना प्रशस्त माना गया है। द्वारमंडल के मध्य भाग में स्थित हाथियों के द्वारा स्नान कराते हुये पद्म पर बैठी हुई और पद्मों को हाथ में लिये हुये खूब सजी हुई लक्ष्मी का द्वार पर नियोजन शुभ माना गया है। बैल को अपने बछड़े के साथ अथवा छत्र और माला से अलंकृत गाय भी शुभ मानी गई है। फल, पत्ते और लताओं का चित्रण भी अच्छा माना गया है। पुष्प और फलों से झुके हुये तिरछे वृक्ष शुभ माने गये हैं। हंस और पक्षियों का चित्रण, खेलते हुये कुमार, आभूषण, वस्त्र धारण की हुई नारियों का चित्रण भी शुभ माना गया है।
उन्नत और ऊंची शाखाओं वाले पेड़ों तथा लाल पत्ते वाले चंपक, अशोक, पुन्नाव, आम आदि वृक्ष या अन्य छायावृक्ष, पुष्प और फलों से युक्त वृक्षों को उद्यान में लगाना चाहिये। घरों में दीवार के चित्रों में ऋतुओं का चित्रांकन करते हुये पुष्प और फल इत्यादि से अलंकृत करें। दीवारों के निचले हिस्सों में कदम्ब, हिरण, कोंच पक्षी, हंस और सारस के चित्र हो तथा जल क्षेत्र के किनारे बेत के वृक्ष या केतकी के समृह या जल के भीतर तैरती हुई मछलियों या अन्य वनस्पतियों का चित्रांकन किया जाना चाहिये। इसके अलावा भांति-भांति के वाद्य यंत्र बजाने वाली, नृत्य और गीत में पारंगत, हंसती-खिलखिलाती ललनाओं का चित्रांकन प्रशस्त है। पिंजरे में बैठे चकोर तोते, सरिकाये, कोयल, मयूर आदि भी अच्छे माने गये है।
जीवन में निरन्तर सुख, शांति, समृद्धि, सौभाग्य, दैवीक कृपा आदि सुस्थितयों के विस्तार के लिये घर की साज-सज्जा भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। घर में रंग-बिरंगे दीवार, चित्र, पेंटींग्स, फूल, आदि सजावटों से हमारे मन-मस्तिष्क पर आनन्द का अनुभव होता है, व्यवस्थित ढंग से घर की सजावट करने पर मेहमानों पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है जिससे उन्हें आपके व्यक्तित्व व आपके घर की स्थितियों के बारे में ज्ञात होता है। साथ ही घर को व्यवस्थित ढंग से साज-सज्जा करने से परिवार के सभी सदस्यों पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है, घर में शांति का माहौल होता है, सभी का मन प्रसन्न रहता है, परिवार में सामंजस्य बना रहता है और दैवीक कृपा की प्राप्ति होती है।
निधि श्रीमाली
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