





तुम ही माता हो। अनेक-अनेक धनों को देने वाले पिता तुम्हीं हो। असंख्य उपकार करने वाली माता भी तुम ही हो। इतनी स्तुति करने के बाद भक्त आगे कहता है- मेरे प्रभु! हम आपसे आपकी प्रसन्नता मांगते हैं। हमेशा हम पर प्रसन्न रहना, अपने बच्चों से कभी रूठना नहीं। क्योंकि, अगर आप प्रसन्न है तो फिर कुछ मांगने की जरूरत नहीं है। फिर तो बिना मांगे ही सब कुछ मिल जाता है। पिता प्रसन्न है तो सन्तान को सब सुख दे देगा। भक्त ने यह कहा कि मेरे प्रभु! तू एक बार मुझ पर प्रसन्न हो फिर मुझे कुछ मांगने की जरूरत है ही नहीं। तुम अपने आप मुझे सब कुछ दे ही दोगे जो हमारे लिये जरूरी है।
कहीं-कहीं ऐसी भी प्रार्थना है- जहाँ यह कहा गया कि हे दयालु देव वह दिन ला, जिस दिन मैं और आप दो न रहें, एक हो जाये अर्थात मैं जल की धारा की तरह सागर में अपने आपको अर्पित कर दूं। मेरा प्रेम, मेरी श्रद्धा, मेरी भक्ति, इतनी ऊँचाई पर पहुँच जाये कि मैं अपने चैतन्य को आप महा चैतन्य से अपने आपको जोड़ दूं। गीता में तो भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- मेरा जो प्यारा भक्त है- प्राणिमात्र के प्रति बैर न करता हो, मित्रता से युक्त हो, करूणा से ओत-प्रोत हो, अहंकार से रहित हो, जिसके अन्दर पदार्थों की आसक्ति न हो, श्रमवान हो, अन्तःकरण जिसका सन्तुष्ट हो। सबकी मंगल-कामना में जो तल्लीन है उसी को भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि वह मेरा प्यारा भक्त है। मेरे प्यारे भक्तो की पहचान यही है। वेदों में भी यही कहा गया है। भगवान कहते हैं कि मेरे भक्त के लक्षण है-
मेरे भक्त वे हैं जो प्रकाश का अवलम्बन करते हैं, प्रकाश का विस्तार करते हैं, प्रकाश का प्रसार करते हैं। जो संसार में ज्ञान की धारा को फैलाते हैं, अज्ञान को तोड़ते हैं, अंधेरे में भटके हुये जीवों को जो रास्ता दिखाते हैं, अनेक-अनेक कष्ट सह लें पर समाज को पतन की तरफ न ले जाने दें। पतन की तरफ जाते हुये समाज को जो रोक सकें। मेरे भक्त की पहली निशानी यही है।
दूसरी निशानी कही है- जिनके दिन बिताने के ढंग सुन्दर हों। जो पापरहित निर्दोष हों। जिनका ध्यान सदैव मेरी तरफ लगा हुआ हो। जो अपने अन्दर महान ज्योति को जगाये हुये हों। संसार में उस ज्योति को जगाने में प्रयत्नशील है जो जनकल्याण के लिये लगा हुआ है। जिनकी ज्ञानधारा संसार को अपनी बुद्धि के द्वारा, सुख देने में जो अपने मन को लगाये हुये हैं। जो ऐसे लोग हैं वे मेरे भक्त कहलाते हैं।
‘उच्छन्नुपसः’ ‘ऊषा’ बेला की जो कामना करते हैं। ज्ञान प्रकाश में, प्रसार में जिनकी मनोवृत्ति है। अर्थात जो यह सोचते हैं कि दुनिया में ज्ञान का प्रसार होना चाहिये, ज्ञान का फैलाव होना चाहिये और ज्ञान क्या है? सबसे पहले मनुष्य इस बात को सोचें कि दुःख का एकमात्र कारण यह भी है कि अज्ञान के कारण ही हम दुःखों को भोगते हैं। जैसे-जैसे समझ बढ़ती जाती है, संसार की उलझनें हटती जाती है। दुनिया में इन्सान अपने दुःख के कारण ही दुःखी है। जैसे ही ज्ञान आने लग जाता है, विधि के विधान की समझ आ गई तो दर्दनिवारक चीज हाथ में आ जाती है और पता चल जाता है कि ऐसा करने से मेरा भला हो जायेगा।
इसलिये सद्गुरू जो ज्ञान का प्रकाश करने वाले होते हैं, वे केवल यही तो हमको समझाते हैं कि किस तरह से हम अपने दर्द को दूर कर सकते हैं। हमारी पीड़ा कहाँ बसी हुई है। इसलिये अपने विकास की यात्रा पर निकलो तो सबसे पहले तो एक परिचय जानना बहुत जरूरी है। आपके अन्दर शरीर में पांच कोष हैं। पहला कोष अन्नमय कोष कहलाता है, अर्थात आहार, निद्रा और अनुशासित, संयमित दिनचर्या के द्वारा यह शरीर ठीक होता है। तो क्या खाना है और क्या नहीं खाना है? इस बात पर पहले ध्यान रखना है।
परमात्मा ने जो छोटी-छोटी चीजें आपको दी हैं उनको पाकर अपने अन्दर खुशी जगाओ, भगवान की दी हुई देन का धन्यवाद दो। मनुष्य बड़ी-बड़ी चीजों के पीछे भागता है और सोचता है कि ये बड़ी-बड़ी चीजें संसार के पदार्थ हैं, लेकिन बाद में समझ में आता है कि जो छोटी-छोटी चीजें तेरे पास है वे ही ज्यादा कीमती हैं, बड़ी-बड़ी चीजें तो बेकार की हैं। इसलिये ज्ञान के मार्ग पर ध्यान देना बहुत जरूरी है।
बहुत लोग प्रार्थनाये किया करते हैं कि हे! भगवान, रास्ता जीवन का सरल बना। मुसीबतों का बोझ कम कर दे, चिन्ताये खत्म कर दे। दुनिया में तो दिन भी है और रात भी है, सुख भी है, दुःख भी है। उन्नति है तो अवनति भी है, मान है तो, अपमान भी है, लेना है तो देना भी है। यह तो क्रम है जीवन का, इसके बीच तो जीना ही पड़ेगा। एक जैसे दिन तो हो ही नहीं सकते। एक जैसा मौसम तो हमेशा नहीं रहता। एक जैसी जमीन तो हर जगह मिलेगी नहीं। जिन्दगी भी इसी तरह से है, कहीं ऊंची और कहीं नीची, कहीं पहाड़ है तो कहीं घाटिया है, कहीं संयोग है तो कहीं वियोग है। जीवन तो ऐसा ही है।
प्रार्थना करनी है तो केवल एक ही प्रार्थना करो की मेरे मालिक एक ही कृपा कर कि उबड़-खाबड़ रास्ते पर चलना मुझे आ जाये, इतनी शक्ति तू मुझे दे। यह मत कहना कि जिम्मेदारियां बहुत हैं। इन्हें तू कम कर दे भगवान! बोलो कि जितनी बढ़ा सकता है बढ़ा, लेकिन जिम्मेदारियों को उठा सकने की ताकत भी तो दे। हम उल्टी प्रार्थना कर रहे हैं। दुःख की आंधियां भी चलती हैं, मेरी मुस्कुराहट के दीये को बुझा न पाये, यह आशीर्वाद दे मुझे।
भगवान कहते हैं कि मेरा भक्त वह है जिसको सूझ है, विवेक है, मेरी कृपाओं को समझ सकें, संसार को समझ सके वही मेरा प्यारा भक्त है। अपनी उलझनों में रोज उलझता रहे, खुद भी दुःखी रहे, औरों को भी दुःखी करे। वह भक्त नहीं हो सकता। चाहे वह कितना भी घंटे-घडि़याल बजाता रहे। भक्ति की पहली सीढ़ी बताई गई है- प्रसन्नता, सूझ, ज्ञान, विवेक को अन्तर में उतारो।
दूसरा शब्द कहा है- ‘सुदिना’। मेरा भक्त वह है जो दिन को बहुत सुन्दर ढंग से जीता है। जिस कार्य में उतरें पूरी शक्ति उसमें लगा दें। जहां जाये वहां की रौनक बन जायें। जिस किसी को देखें उसी का आदर्श बन जायें। हर किसी के लिए प्रेरक बन जाये।
जीवन को, संसार की उपलब्धियों को जीने-मरने का प्रश्न बना करके उसके पीछे मत दौड़ो। इस चक्कर में पड़ोगे तो अशान्ति आयेगी। जो उसने दिया है उसमें खुशी मनाओ। बौद्धिक सम्पदा भगवान की दी हुई बहुत बड़ी सम्पदा है। अपनी बुद्धि का विकास करते रहना चाहिये। महान पुरूषों की किसी पवित्र पुस्तक के साथ थोड़ा-सा भी समय बिताओगे तो वह थोड़ी-सी संगति भी आपके जीवन के अन्दर खुशियां भर देगी। इसलिये कभी-कभी महान पुरूषों के पवित्र ग्रंथों के साथ अपने मन को जोड़ने की आदत बनानी चाहिये।
हम जितना चाहते हैं उतना ना मिल पाये तो शिकायतों पर उतर आते हैं। यह उचित नहीं। भगवान के ध्यान में अपने आपको लगाये। प्रभु की महकती ज्योति को हृदय में प्राप्त करो, शुक्र मनाओ उनका। भगवान की तरफ एक दिशा में चलते हुये अपना कल्याण करना चाहिये।
सस्नेह आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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