





चराचर माया ने जब सूर्य नारायण की छाया से गर्भ धारण किया, तब शनि देव उत्पन्न हुए, अतः मां माया और पिता सूर्य होने के कारण उन्हें ‘सूर्य पुत्र’ कहा गया।
‘शनि’ की उपासना करने से पूर्व उसके स्वरूप और उसकी कार्य क्षमताओं से परिचित हो जाना आवश्यक हो जाता है सात ग्रहों में सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि का अलग व्यक्तित्व है, क्योंकि दुःख, हानि, कष्ट आदिका आक्षेप इसी पर अधिक लगाया जाता है, जबकि ऐसा है नहीं। वह किन्हीं परिस्थितियों में ही सम्भव होता है।
शनि को अंग्रेंजी में Saturn (सेटर्नद्ध कहते हे।, तो अरबी में जौहाल, फ़ारसी में केदवान व संस्कृत में असित, मन्द शनैश्चर, सूर्य पुत्र कहते हैं। इस ग्रह के बारे में आज भ्रमक धारणाओं ने मनुष्यों के दिलों में घर कर लिया है। जिस कारणवश हर कोई इस ग्रह से भयभीत तथा आशांकित दिखाई देता है।
भारतीय ज्योतिष में एक भ्रामक धारणा दिनों दिन बलवती हो रही है, शनि सदैव अहित ही करता है, उसका प्रभाव सदैव अंमगलकारी अशुभ एवं विघटनकारी ही होता है। अशांन्ति का कारण शनि ही है। दुःख का कारण भी शनि ही है लड़का भाग गया, स्त्री भाग गई, संतान कुमार्गी हो गई, व्यापार में घाटा हो गया आदि सभी शनि ग्रह के कारण बताए जाते हैं।
शुक्र की राशि तुला में शनि जहां उच्च का होता है। वहीं मंगल की राशि मेष में नीच का होता है। मकर व कुम्भ स्वयं शनि की राशियां है। जन्मकुण्डली में शनि जिस भाव में स्थिति है, उससे सातवें भाव को देखता ही है तथा साथ ही तीसरे और दसवें भाव को भी पूर्ण दृष्टि से देखत है। जहां दैत्य, गुरु, शुक्र तथा बुध मित्र हैं। वहीं गुरु प्रबल शत्रु तथा सूर्य, चन्द्र, मंगल के साथ ही शत्रुवत व्यवहार करता है।
शनि की राशि मकर, जो 270 से 300 अंश है, घुटनों तक प्रभावी रखती है। इसका प्राकृतिक स्वभाव उत्तरोत्तर उन्नति की ओर अग्रसर होता है, कुम्भ शनि की दूसरी राशि है, यह 300 से 330 अंश तक पैरों पर प्रभावशाली रहती है।
लोहा व शीशा शनि की विशेष धातु हैं, तथा ‘नीलम-रत्न’ को धारण करने से शनि बाधा दोष कम हो जाता है। शनि नपुसंक लिंगी एवं तामस भाव का स्वामी है। जन्मकुण्डली में स्थितिनुसार आयु, मृत्यु, दृव्य हानि, चौर्यकर्म, कारावास, मुकदमा, फ़ांसी शत्रुता, दुष्कर्म कार्यादि का ज्ञान शनि द्वारा ही किया जाता है। शनि को ज्योतिष में ‘विच्छेदात्मक ग्रह’ माना गया है। जहां एक ओर शनि मृत्यु प्रधान ग्रह माना गया है, वहीं शनि दूसरी ओर शुभ होने पर भौतिक जीवन में श्रेष्ठता भी देता है।
भारतीय समाज में कुछ कहावतें शनि को लेकर प्रचलित हैं, जैसे-व्यापार चौपट हो तो शनि का प्रभाव है, आज कल तो शनि का चक्कर है या किसी व्यक्ति को सम्बोधित करते हुए कह देते हैं, कि यह तो शनि की तरह मेरे पीछे पड़ गया है। दो चार ढोंगी ज्योतिषी भी ऐसे होते हैं जो लोग शनि की दशा बताकर भयभीत कर देते हैं, जैसे आपके भाग्य पर शनि की क्रूर दृष्टि, लाभ-स्थान पर नीच का शनि, कर्म भाव पर शनि वक्री है, तथा शनि की साढ़े साती को सुनकर ही जातक का हृदय कांप उठता है।
शनि सर्वाधिक मैलाफ़ाइड, अकस्मात, कुप्रभाव देने वाला ग्रह माना जाता है, अतः भय तो सहज स्वाभाविक है। यह समय-मृत्यु, अकाल मृत्यृ, रोग, भिन्न-भिन्न कष्ट, व्यवसाय हानि अपमान, धोखा, द्वेष, ईर्ष्या का कारण माना जाता है, पर वास्तविकता यह नहीं है, सूर्य पुत्र शनि हानिकारक न होकर लाभदायक भी सिद्ध होता है, क्योंकि-
1- शनि तुरन्त एवं निश्चित फ़ल देता है।
2- शनि संतुलन तथा न्याय प्रिय है।
3- शनि शुभ होकर मनुष्य को अत्यन्त व्यवस्थिति, व्यवहारिक, घोर, परिश्रमी, गम्भीर एवं स्पष्ट वक्ता बना देता है।
4- संकुचित व्यक्ति, भरपूर आत्मविश्वास, प्रबल इच्छा, शक्ति युक्त, महत्वाकांक्षी मितव्ययता पूर्ण आचरण करने वाला, हर कार्य में सावधान रहने वाला व्यक्ति ही व्यवसाय में चतुर तथा कार्यपटु होता है।
5- मनुष्य का भेद में शनि प्रधान व्यक्ति दक्ष होता है।
6- शनि प्रधान व्यक्ति सामाजिक व आर्थिक क्रांति के प्रयत्नपूर्ण, त्यागमयी जीवन व्यतीत करने वाले, पूर्ण सामाजिक व मिलनसार, परोपकार के कार्यों में समय व्यतीत करने वाले, लोक-कल्याण के सतत् कार्य संलग्न, विद्वान, मंत्री, उदारमना तथा पवित्रतापूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं।
7- अध्यात्मवाद की ओर विशेष झुकाव रहता है।
8- योग्याभ्यासी, गूढ़ रहस्य का पता लगाने में दक्ष, कर्म, कांड, व धार्मिक शास्त्रों का अभ्यास,ग्रंथ प्रकाश, तत्वज्ञ, लेखन कार्य का यश व सम्मान पाते हैं।
शनि अशुभ होने पर स्वाथी, धूर्त, कपटी, दुष्ट, आलसी मंदबुद्धि, उद्योग से मुंह मोड़ने वाला, नीच कर्म लिप्त, अविश्वास करने वाला, ईर्ष्यालु, विचित्र मनोवृत्ति युक्त, असंतोषी,दुराचारी, दूसरों की आलोचना करने वाला, वीभत्स बोलने वाला, अपने को श्रेष्ठ मानना पसंद करता है, वह दम्भी, झूठा और दरिद्री होता है, ऐसा व्यक्ति व्यर्थ इधर-उधर घूमना पसंद करता है, ऐसा व्यक्ति आजीवन विपत्तियों से घिरा रहता है।
ज्योतिषीय विवेचना के अनुसार शनि की साढे़ साती जातक के पैरों में पीड़ा पहुंचाती है, मस्तिष्क विकृत एवं सिर दर्द, धन-धान्य, सम्पत्ति का नाश, संतान को कष्ट, स्वयं को व्यभिचारी व कुमार्गी बना अपमानित करती है।
इस प्रकार शनि की साढ़े साती दशा के कारण ही मानव मन में यह भ्रांति उत्पन्न हो गई है, कि शनि केवल हानिकारक, अमंगलकारी एवं विघटनकारी ही होता है।
शनि ग्रहकी शान्ति के लिए जब यह ग्रह प्रतिकूल फ़ल दे रहा हो अथवा शनि की साढ़े साती इत्यादि अवधियों में व्यक्ति को ग्रह शान्ति हेतु मंत्र जप अवश्य करना चाहिए।
समस्त ग्रहों में शनिदेव ही ऐसे ग्रह हैं, जो अत्यन्त क्रोधी होते हुए भी अत्यन्त दयालु कहे गए हैं। उनके विषय में कहा गया है, कि जब ये किसी पर क्रोधित होते हैं, तो उसका सर्वनाश कर डालते हैं। इसी प्रकार जब ये किसी से प्रसन्न होते हुए हैं, तो रंक को भी राजा बना देते हैं।
जब सृष्टि की रचना आरम्भ हुई, तो सृष्टि रचना का कार्यभार ब्रह्मा ने संभाला, विष्णु ने जीवों को पालन एवं उनकी रक्षा का उत्तरदायित्व लिया है और भगवान शंकर की आवश्यकता पड़ने पर सृष्टि का संहार एवं दुष्ट जनों के विनाश का कार्य सौंपा गया।
अपने भक्तों की रक्षा एवं पतितों को उनके पापों को दण्ड देने के लिए शिवजी ने अपने गुणों की उत्पत्ति की। सूर्य पुत्र यम एवं शनि को भी उनके गुणों में सम्मलित किया गया शनि अत्यन्त पराक्रमी होने के साथ उद्दण्ड भी थे, तोड़-फ़ोड़, मार-काट एवं विनाशकारी कार्यों में इनकी आरम्भ से ही रुचि थी।
यह देखकर शिवजी ने यम को तो मृत्यु का देवता बनाया और शनि को दुष्ट जनों के उनके पापों का दण्ड देने का कार्य सौंपा। शनि भगवान शंकर के शिष्य, सूर्य के पुत्र तथा यम के भाई हैं।
शनि सर्वदा प्रभु भक्तों को अभय दान देते है। और उनकी हर प्रकार से रक्षा करते हैं। शनि समस्त सिद्धियों के दाता हैं। साधना, उपासना द्वारा सहज ही प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की समस्त कामनाओं को पूरा करते हैं।
शनि सभी ग्रहों में महाशक्तिशाली और घातक हैं। कहते हैं कि सांप का काटा और शनि का मारा पानी नहीं मागता जब शनि का प्रभाव पड़ा, तो कृष्ण को द्वारिका में शरण लेने पड़ी भीलों के देश में और राम को, जिनका, राज तिलक होने वाला था, सब छोड़कर नंगे पांव वन में दर-दर भटकने को विवश होना पड़ा। शनि के प्रभाव से जब अवतारी पुरुष् नहीं बच सके, तो भला सामान्य लोगों को शनि के प्रकोप से बच पाना सम्भव कहां है? ये सभी बातें एक सीमा तक सत्य हैं, परन्तु इनके आधार पर भ्रमित हो जाना विद्वता नहीं है वस्तुतः शनि ग्रह की व्याख्या ही अधूरी है। शनि का तात्पर्य है ‘जीवन की गति’। शनि पीड़ादायक हो सकता है, लेकिन यदि शनि अनुकूल बना लिया जाए तो सर्वोच्चता भी प्रदान कर सकता है।
1- यह प्रयोग आप शनैश्चरी अमावस्या या किसी शनिवार या रवि पुष्य योग से प्रारम्भ करें। साधना प्रातः ब्रह्म मूहुर्त में अर्थात् पांच बजे प्रारम्भ करें।
2- स्नान कर काले या गहरे नीले वस्त्र धारण करें। गुरु पीताम्बर ओढ़ लें और पूर्व दिशा की ओर मुख कर बैठ जाएं।
3- अपने सामने भूमि पर काजल से त्रिभुज बनाएं और उस पर एक पात्र रखें। पात्र में काजल से ही अष्टदल कमल बनाएं और उस पर ‘शनि यंत्र’ स्थापित करें।
4- यंत्र पर काजल से रंगे हुए चावल चढ़ाते हुए ‘‘ऊँ शं ऊँ’’ मंत्र का उच्चारण करते रहें, इसके प”चात् निम्न करन्यास तथा हृदयादिन्यास सम्पन्न करें –
शनैश्चराय अंगुष्टाभ्यां नमः।
मन्दगतये तर्जनीभ्यां नमः।
अधोक्षजाय मध्यमाभ्यां नमः।
कृष्णांगाय अनामिकाभ्यां नमः।
शुष्कोदराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
छायात्मजाय करतल कर पृष्ठाभ्यां नमः।
शनैश्चराय हृदययाय नमः।
मन्दगतये शिरसे स्वाहा।
अधोक्षजाय शिखायै वषट्।
शुष्कोदराय नेत्रत्रयाय वौषट्।
छायात्मकजाय अस्त्राय फ़ट्।।
5- ‘शनि साफ़ल्य माला’ से निम्न मंत्र की 24 माला मंत्र जप करें।
मंत्र
।। ऊँ शं शनैश्चराय सशक्तिकाय सूर्यात्मजाय नमः ।।
6- मंत्र जप पूर्ण होने के बाद यंत्र पर तीन काले अथवा नीले रंग के फ़ूल चढ़ाएं, यदि काले रंग के फ़ूल न मिल सकें, तो सफ़ेद फ़ूल को (काजल के तिल के तेल में घोल कर) रंग लें।
7- साधना के पश्चात् शनि की प्रार्थना इन दस नामों से करनी चाहिए।
कोणस्थः पिंगलो वभ्रु कृष्णों रौद्रान्तको यमः
सौरिः शनिश्चारो मन्दः पिप्पलादेन संस्तुतः।
एतानि दश नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्
शनिश्चर कृता पीडा़ न कदाचित भविष्यति।।
हिन्दी में इस शनि स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है- कोणस्थ, पिंगल, वभ्रु, कृष्ण, रौद्र, अन्तक, यमः सौरि, शनिश्चर, मन्द इन दसों नामों का उच्चारण जो व्यक्ति प्रातः काल करता है, उसे शनिदेव पीड़ा नहीं देते। इस का ग्यारह बार पाठ करना चाहिए।
8- हाथ जोड़ कर श्रद्धापूर्वक निम्न वन्दना करें-
नीलद्युति शूलधरं किरीटिनं, गृधरस्थितं त्रसकरं धनुद्धर्रम्।
चतुर्भुजं सूर्यसूतं प्रशन्तं, वन्दे सदाऽभीष्टकरं वरेण्यम्।।
9- साधना समाप्ति के बाद यंत्र तथा माला को उसी स्थान पर रहने दें तथा अगले दिन प्रातः या सायं काल यंत्र के सम्मुख हाथ जोड़कर पुनः उपरोक्त श्लोक का उच्चारण करें तथा ‘ऊँ शं ऊँ’ मंत्र बोलते हुए यंत्र वा माला का किसी काले वंस्त्र में लपेट कर पूजा स्थान में रख दें। अगले शनिवार को वस्त्र सहित यंत्र व माला को जल में प्रवाहित कर दें।
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