





गुरुर्चिन्त्यं रूपं आहेतुं प्रमेयं ध्यानं विचिन्त्यं प्रमेय पाद्यं
ग्राहां सतां पूर्ण मदवै तुल्यं निर्वेद रूप मपरं गुरुवै सहेतुम्
यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कथन है, ऋषि का, एक महत्वपूर्ण चिन्तन है आचार्य का, महर्षि का, क्योंकि जीवन तब तक निस्सार है, व्यर्थ है, जब तक जीवन का कोई प्रयोजन ही नहीं है, जीवन का कोई चिन्तन ही नहीं है, फि़र जीवन क्या है? किसे हम जीवन कहें?
-क्या सांस लेने की क्रिया को हम जीवन कह सकते हैं?
-क्या जिन्दा रहने की कल्पना को जीवन कह सकते हैं?
यह सब तो जीवन नहीं, हो सकता, और जब जीवन का मूल्य और महत्व ही ज्ञात नहीं है, जब जीवन का अर्थ और जीवन का मकसद ही हमें पता नहीं है, तो फि़र हम वैसे ही पशु हैं जो डोलते रहते हैं, एक अज्ञात नकेल डाले हुए, उनको स्वयं को ज्ञान नहीं, कि वे किस तरफ़ जा रहे हैं?उनको खुद को पता नहीं कि वे कौन से रास्ते पर खड़े हैं? उनको खुद को यह ज्ञान नहीं कि उनकी मंजिल कहां समाप्त होगी?जिस रास्ते का प्रारम्भ पता नहीं है, जिस रास्ते का अता पता नहीं है, उस रास्ते पर चलना तो अंधो की तरह से चलना होता है, जिसका सूत्र हमारे हाथ मे नहीं, जिसका चिन्तन और ज्ञान हमारे हाथ में नहीं है, तो हम किन शब्दों में उसे जीवन कह सकते हैं?
हम तो केवल अपनी लाश को कंधो पर उठाये हुए शमशान की ओर बढ़ते चले जाते हैं, एक क्षण रुक कर सोचने की जरूरत है—- कि क्या हमारा जीवन पशु जीवन से ऊपर उठा है?– क्या हमने अपने जीवन के मकसद को समझा है?– क्या हम जानते हैं कि हमें जीवन में कहां तक पहुंचना है?– क्या हमने कभी निर्णय लिया है कि जीवन के किस भाग पर हम खड़े़ है?– हमने कभी सोचा ही नहीं। हमने तो भोग-विलास को ही जीवन मान लिया, हमने तो सांस लेने की क्रिया को ही जीवन मान लिया, हमने तो जिन्दा रहने की कल्पना को ही जीवन मान लिया— यह कितनी छोटी सी बात है। कपड़े पहनना, कपड़े उतार देना, सांस लेना, सांस छोड़ देना, भोजन करना, पानी पीना, अपने जीवन के अन्य क्रियाकलाप करना, ये तो जीवन के प्रकार हैं— जीवन तो नहीं है। जीवन तो किसी और ताने-बाने से बुना होता है।
जीवन तो वह होता है, जिसका सूत्र हमारे हाथ में होता है। जीवन तो वह होता है जिसका मर्म हमें ज्ञात होता है। हम जिन्दा तो हैं— सामाजिक और वैज्ञानिक परिभाषा में हम जीवित हैं, मगर शास्त्रीय पद्धति में हम मृत हैं, क्योंकि शास्त्र के अनुसार जिसमें चेतना नहीं है, जिसमें इस बात का होश नहीं है कि मैं क्या हूं?कहां जा रहा हूं? कहां पहुंचाना है? वह मृत है। हम एक क्षण भर अगर रुक के सोचे तो हमें ज्ञात ही नहीं कि हमें कहां पहुंचना है? हमने तो चांदी के चंद टुकड़ो को इकट्ठा करने की क्रिया को ही जीवन मान लिया। दो-चार मकान बना लेने की जीवन पद्धति को ही जीवन मान लिया है। यह तो जीवन का एक प्रकार है, कि भौतिक दृष्टि में, चाहे निर्धनता में जिएं, चाहे अमीरी में जिएं, वैभव में जिएं। जब तक जीवन के इस मूल चिन्तन को नहीं समझेंगे तब तक हम सही अर्थों में जीवित भी नहीं हो पाएंगे, तो फि़र जीवन की परिभाषा को समझायेगा कौन?
-कौन बतायेगा कि हमारे जीवन का मकसद क्या है?
-कौन बताएगा कि यह जीवन व्यर्थ है?
-कौन समझायेगा कि जीवन को किस तरीके से जीवन चाहिए?
-क्या आपाधापी में भागते रहने को जीवन कहते हैं?
क्या हड़बड़ाहट में चलते रहने को जीवन कहते हैं?
-क्या हर समय व्यस्त रहने और तनाव में से गुजरने की क्रिया को ही जीवन कहते हैं?
– क्या वृ़द्वता और जर्जरता, बीमारी, अशिक्षा, अभाव, कष्ट और पीड़ा को जीवन कहते है।
– क्या कफ़न ओढ़ कर शमशान में सो जाने को जीवन कहते है।
शास्त्रों में तो इसको जीवन नहीं कहा जाता है। शास्त्रों में तो इस क्रिया को मृत्यु कहा जाता है, और हम सही अर्थो में जीवित मुर्दे हैं, जो चलते तो हैं, मगर होश नहीं है, खाते-पीते तो हैं, मगर उसका कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि हमने कभी इन रहस्यों को, इस चिन्तन को सोचा-समझा ही नहीं और नहीं सोचा-समझा, तो उसका आनन्द भी नही लिया जा सकता। जीवन का आनन्द तो वे लेते हैं, जो जीवन को समइते है। जो कभी मानसरोवर के किनारे गया ही नहीं, वह मानसरोवर के आनन्द को समझ ही नहीं सकता। जो छोटी-छोटी तलैयाओं के किनारे बैठा रहा हो, वह क्या जाने कि मानसरोवर में क्या आनन्द है, कितनी विस्तृत झील है, कितना अतल जल है, कितना स्वच्छ निर्मल पानी है, वह उसे वैभव को, वह उसकी सम्पदा को, वह उस झील की विशालता को नहीं समझ सकता, वह उस तलैया को ही जीवन मान बैठा है।
मेंढक जब कुएं के किनारे से चलना शुरू कर के और पूरा चक्कर लगाकर फि़र उसी स्थान पर आ जाए और कहे-यही पूरा विश्व है, तो उसके हिसाब से तो वही विश्व है, क्योंकि उसने पूरा चक्कर काटा है—- मगर यदि कभी मेंढक को तालाब में डाल दिया जाए तो उतने अथाह जल को देखकर वह आश्चर्य में पड़ जाएगा, अरे। मैंने तो कुछ नहीं देखा था, दुनिया तो कुछ और है, संसार तो कुछ और है—-और यदि वह भले से भी उस तालाब का पूरा चक्कर लगा ले और मन में प्रसन्नता व्यक्त कर ले, कि अब मैंने पूरा विश्व देख लिया है, पूरा जीवन देख लिया है, अब इससे बड़ा तालाब, इससे बड़ी जल राशि, इससे बड़ा जलाशय क्या हो सकता है। यह तो बहुत लम्बा-चौड़ा तालाब है, और मैंने प्रयत्न करके इसका पूरा एक चक्कर लगाया है, यही तो जीवन है— और यदि वह समुद्र में गिर जाए और समुद्र के अथाह जल को देखे तो उसे और अधिक आश्चर्यचकित हो जाना पड़ेगा, कि वह तो एक छोटा सा हिस्सा था, वह जीवन था ही नहीं।
तुम्हारी भी स्थिति उस कुंए के मेंढक की तरह है, तुमने भी एक सीमित दायरे में घूमने की क्रिया को ही जीवन मान लिया है। पत्नी है, एक-दो पु़त्र हैं, थोड़ा-सा धन है, मकान है, समाज में सम्मान है, सम्पदा है और इसी को तुमने जीवन मान लिया है, क्योंकि इससे बाहर निकलने का तुमको ज्ञान ही नहीं रहा, कभी बाहर गये ही नहीं, कभी देखा ही नहीं कि इससे बड़ा भी एक समाज है, स्थान है— और जब तुम वहां जाओगे, तो तुम जो जीवन जी रहे थे, तुम जिस घेरे में आबद्व थे, वह एक बहुत छोटा सा हिस्सा है, जिसमें कोई आनन्द नहीं है, वह तो एक विवशता है, एक मजबूरी है। समाज में जिन्दा रहना तुम्हारी मजबूरी है। परिवार का पालन-पोषण करना तुम्हारी मजबूरी है। समाज सदैव तुम्हारे साथ, या परिवार तुम्हारे साथ नहीं चल सकता, परिवार का सहयोग तुम्हें जीवन में नहीं मिलेगा।
जब ’वाल्मीकि’ डाकू थे—ऋषि तो बहुत बाद में बने—उन्होने रामायण की रचना तो बहुत बाद में की, पहले तो वह भयानक डाकू था—-लूटना—–खसोटना—-मारना—-छीन लेना ही उसका कार्य था। एक बार नारद उसके हाथ में पड़ गये, नारद तो वीणा बजाते हुए नारायण करते चले जा रहे थे, और वाल्मीकि ने उन्हें पकड़ लिया, सुबह से कोई शिकार मिला ही नहीं, बडी मुश्किल से यह आदमी नजर आया, उसने उनकी वीणा छीन ली।
नारद ने कहा- अरे। तुम एक साधु को लूट रहे हो, तुम ये क्या रहे हो। उसने कहा – कोई दूसरा मिला ही नहीं, और जब तक मैं लूट-खसोट नहीं कर लूं, तब तक मैं भोजन करता ही नहीं, न कोई कार्य करता हूं—- तुम पहले ही व्यक्ति मिले, दोपहर हो गई, यह वीणा बेच कर कुछ तो धन मिल ही जाएगा, और तुम्हारे कपडे़ भी खोल लूं, ये कपडे़ भी बाजार में बेच दूंगा। नारद ने कहा – उचित तो नहीं—मगर मैं यह करूंगा जरूर, क्योंकि मुझे अपने परिवार का पालन-पोषण करना है। नारद ने कहा- क्या तुम्हारा परिवार तुम्हारा साथ देगा, क्योंकि तुम तो पाप कर रहे हो।
वाल्मीकि ने कहा – जरूर यह पाप कर्म है, किसी की हत्या कर देना पाप है, किसी को छल से लूट लेना पाप है—मैं जानता हूं कि यह पाप है, मगर मैं अकेला ही तो पाप नहीं कर रहा हूं, अपने परिवार के लिए कर रहा हूं, परिवार मेरा साथ देगा ही। नारद ने कहा – पहले तुम अपने परिवार वालों से पूछ लो। वाल्मीकि ने एक रस्सी से नारद को पेड़ से बांध दिया और घर चले गए। बूढ़ी मां से पूछा – तू मुझे बता, कि मैं जो छीना-झपटी, लूट-खसोट, हत्याएं कर रहा हूं, यह पाप तो है ही। मां ने कहा – बेटा जरूर पाप है।
वाल्मीकि ने कहा – मैं इससे तुम लोगों को रोटी खिला रहा हूं, अन्न दे रहा हूं, आवास दे रहा हूं तो तुम भी पाप में भागीदार हो। मां ने कहा – मैं तो पाप में भागीदार नहीं होती, यह तुम्हारा कर्त्तव्य है कि मां को रोटी खिलाओ, तू कैसे कमा कर लाता है यह तू जाने— पाप करेगा तो पाप का फ़ल तू ही भुगतेगा, मैं तो भुगतूंगी नहीं—–और मैंने पाप के लिए तुझे कहा भी नहीं, मैं इसमें भागीदार नहीं हो सकती। वाल्मीकि पत्नी के पास गए, पत्नी से कहा – देख, मैं डाकू हूं, और सैकड़ों लोगों की हत्याएं की हैं, लूटा है, खसोटा है, मारा है, औरतों के गहने छीने हैं और तुझे दिए हैं, तुझे पहनाए हैं, क्या छीनना, झटपना, लूटना, मारना पाप है। पत्नी ने कहा – निःसंदेह पाप है।
वाल्मीकि ने पूछा-यह तुम्हारे लिए कर रहा हूं क्योंकि ऐसा करने पर ही तो मैं तुम्हें अन्न दे सकता हूं, भोजन दे सकता हूं, आवास दे सकता हूं, गहने दे सकता हूं, और तुम्हारे लिए ही तो कर रहा हूं, तो तुम भी पाप में भागीदार हो। पत्नी ने कहा – मैं तो पाप में भागीदार नहीं हूं, एक पति का कर्त्तव्य है, धर्म है, कि वह पत्नी का भरण-पोषण करो—-कैसे करते हो, यह तुम्हारी जिम्मेदारी है, यह तुम्हारा धर्म है, पाप का फ़ल तुम्हे भोगना पडे़गा।
वाल्मीकि वापस आ गए, नारद को पेड़ से खोला और छोड़ दिया, उसी क्षण उन्होंने डाकू का कार्य छोड़ कर के, उन्होंने डाकू का कार्य छोड़ कर के, छीना-झपटी का कार्य छोड़ कर साधु जीवन प्रारंभ कर दिया—क्या तुम भी वाल्मीकि डाकू से कुछ कम हो?—क्या तुम छीना-झपटी नहीं कर रहे?— छल नहीं कर रहे?—झूठ, कपट और असत्य नहीं कर रहें?—और यह सब तुम परिवार वालों के लिए कर रहे हो, और तुम्हें यह गलतफ़हमी है, कि ऐसा करने पर परिवार वाले तुम्हारा साथ देंगे, पाप में भागीदार होंगे। पाप में भागीदार तो वे नहीं होंगे, असत्य और अधर्म के वे भागीदार नहीं बनेंगे। तुम्हें अकेले ही यह पाप भोगना पडे़गा, तुम खुद ही इसके जिम्मेदार हो।
– फि़र तुम कब इस चेतना को, इस जीवन को समझ सकोगे?
– कब तुम्हें नारद मिलेंगे?
– कब तुम्हें वे ऋषि मिलेंगे?
– कब तुम्हें समझा सकेंगे कि यह जीवन नहीं है, जो तुम कर रहे हो।
– तुम अपने लिये क्या कर रहे हो?
– और जब तक तुम ऐसा करोगे तब तक जीवन में तुम्हे कुछ मिलेगा ही नहीं, तब तक जीवन का तुम अर्थ समझोगें ही नहीं जरूरत तो तुम्हें यह है कि कोई ऋषि मिले, कोई नारद मिले, कोई नारद मिले, कोई गुरू मिले जो तुम्हे ज्ञान दे सके—
यह सब कुछ बेकार है। जिस रास्ते पर तुम चले रहे हो उस रास्ते से तो शमशान की यात्रा ही हो सकेगी, यह तो कफ़न ओढ़ कर श्मशान में सोने की साधाना है, प्रयोग है, जीवन है, इसमें कुछ पाना है ही नहीं खोना ही खोना है, और तुम प्राप्त नहीं कर रहे हो— जो कुछ तुम प्राप्त कर रहे हो यह मकान, यह धन, ये चांदी के टुकड़े ये कागज के चंद नोट, यह पत्नी, यह पुत्र—- ये तो मृत्यु के साथ पीछे खड़े रह जाएंगे, यह तुम्हारे साथ-साथ चलेगा ही नहीं, तुम्हारे साथ उनकी यात्रा नहीं है, और जो तुम्हारे साथ नहीं है, वे तुम्हारे साथ उनकी यात्रा नहीं है, और जो तुम्हारे साथ नहीं है, वे तुम्हारे सहयोगी नहीं है।
साथ तो तुम्हारे जीवन चलेगा, तुम्हारी प्राणश्चेतना चलेगी, तुम्हारी भावनाएं चलेंगी। यदि तुम ऐसा चिन्तन करते हो, यदि तुम्हारे मन में ऐसा विचार है, तो तुम जीवन का पहला सबक सीख सकते हो, पहला अध्याय पढ़ सकते हो, मगर उसके लिए तो जरूरत है, दमखम के साथ कहने वाले गुरू की, समझाने वाले व्यक्तित्व की। एक ऐसे व्यक्तित्व की, जो तुम्हें डाकू जीवन से मनुष्य जीवन दे सके, एक ऐसे व्यक्तित्व की, जो तुम्हे समझा सके, कि तुम जो कुछ कर रहे हो वह तुम खुद कर रहे हो, उसके लिए कोई सहयोगी नहीं है। तुम्हारे पाप कार्य में कोई भागीदार नहीं है, तुम जो झूठ और छल कर रहे हो, उसका फ़ल भी तुम्हें ही भोगना पड़ेगा—और जिन्होंने भी अपने जीवन में झूठ, छल, कपट और असत्य का आचरण किया, उनका बुढापा अत्यन्त दुःखदायी अवस्था में व्यतीत हुआ— रोगों से जर्जर, अभावों से पीडि़त, असत्य, परेशान, दुःखी, अतृत्प। जब बेटे उनको पूछते ही नहीं जब बहुएं उनका साथ देती ही नहीं और समज उन्हे धिक्कारता है कि इसने जीवन भर छल-कपट किया है।
– क्या तुम ऐसा जीवन चाहते हो?
– क्या तुम ऐसा बुढापा चाहते हो?
– क्या तुम ऐसा चाहते हो कि मृत्यु तुम्हारा गला पकड़ ले और तुम छटपटाओं?
– क्या तुम ऐसा चाहते हो कि मरते समय तुम्हारी आंखों में से आंसू ढुलके और कोई हमदर्दी दिखाने वाला न हो?
– क्या तुम ऐसा जीवन चाहते हो कि मृत्यु के बाद सब लोग तुम्हें धिक्कारें, और कोई तुम्हारे प्रति कृतज्ञता ज्ञापित नहीं करें?
– किसी की आंख नहीं भीगें, किसी के मन में रूलाई नहीं फ़ूटे, क्या तुम ऐसा जीवन चाहते हो?
– ऐसा तुम्हारा जीवन किस काम आएगा, क्या प्रयोजन है इस जीवन का? क्योंकि इस जीवन को लाश की तरह उठा कर के तो तुम इस जीवन में कुछ प्राप्त कर ही नहीं कर सकते, और इसीलिए नहीं कर सकते कि यह सब जीवन है ही नहीं। जो जीवन है, वह तो पत्थरों के ढेर है, कपट के पत्थर हैं, असत्य और व्यभिचार के, उनसे प्राप्त होता है दुःख, परेशानियां, अड़चनें, बाधाएं, रोग, जर्जरता, बुढापा और मृत्यु—- ये ही तुम्हारे समाने हैं। दो-चार कदम चलने पर ही इनका सामना करना पडेगा, फि़र कोई तुम्हारा साथ नहीं देगा, घर वाले भी नहीं, पत्नी भी नहीं, पुत्र भी नहीं, बन्धु-बांधव भी नहीं, समाज भी नहीं।
क्योंकि तुने अपने जीवन में ऐसा मार्ग दर्शक ढूंढा ही नहीं जो तुम्हें ज्ञान दे सके, झकझोर सके, चेतना दे सके, दमखंम के साथ तुम्हारे साथ खड़ा हो सके, तुम्हें कह सके कि यह सब गलत है, तुम्हे कह सके कि तुम गलत रास्ते पर हो, तुम्हे कह सके कि यह रास्ता श्मशान की ओर जाता है—अमृत की ओर नहीं, सुख और सौभाग्य की ओर नहीं, आनन्द की ओर नहीं। और यदि आनन्द की यात्रा नहीं है तो वह जीवन नहीं है। ऐसे तो तुम्हारे बाप-दादा, परदादा हजारों लोग जाकर श्मशान में मृत्यु को प्राप्त हो गए, और आज उनका नाम लेने वाला भी कोई नहीं है। तुम भी उसी तरीके से मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे—और तुम्हे कोई पूछने वाला नहीं होगा, कोई तुम्हारे लिए विचार करने वाला भी नहीं होगा, कोई अहसास करने वाला भी नहीं होगा, कि तुमने कितना परिश्रम किया है।
और इसीलिए जीवन में गुरू की जरूरत होती है—जरूरत होती है। उस गुरू को प्राप्त करने की क्रिया भी तुम्हें ही करनी पडे़गी, गुरू स्वयं तुम्हारे पास आकर के खड़ा नहीं होगा, तुम्हें ढूंढना पडे़गा। नदी को खुद गंगोत्री से चलकर समुद्र की ओर जाना होगा, समुद्र उठकर गंगोत्री के पास नहीं पहुंचेगा। तुम्हें खुद उठ कर पत्तों के पास, पुष्पों के पास पहुंचना पडे़गा, जहां सुगंधित हवा है, जहां आनन्द की हिलोरे हैं— वे खिलखिलाते, झूमते पुष्प तुम्हारे पास आकर के खडे नहीं हो जाएंगे। यात्रा तो तुम्हें स्वयं को करनी होगी, तुम्हें स्वयं को खोजना होगा। जिस प्रकार से तुम धन खोजते हो, पुत्र खोजते हो, उसी प्रकार से गुरू की खोज भी तुम्हारे लिए अनिवार्य है, अनावश्यक है – ऐसा गुरू, जो सशक्त हो – जो समर्थ हो – जो योग्य हो – जो प्रहार करने वाला हो – जो हाथ पकड़ के समझाने वाला हो – जो तुम्हें चेतना देने वाला हो।
इस यात्रा में तुम्हारे अन्दर कई प्रकार की भ्रांतियां आएंगी, क्योंकि तुमने इन भ्रांतियों को ही पाल रखा है। तुमने अपने अन्दर शक, संदेह, कपट और व्यभिचार को पाल रखा है, और वे सब तुम्हारे सामने तन कर खड़े हो जाएंगे, तुम्हारे मार्ग को भ्रष्ट करेंगे, तुम्हे कुमार्ग पर गतिशील करेंगे, वे कहेंगे – गुरू की खोज व्यर्थ है, तुम्हे यह कहेंगे – यह समय बरबाद करना है। तुमने अपने जीवन में छल को प्रश्रय दिया है। तुमने अपने जीवन में कपट का साथ दिया है, तो वे इस समय तुम्हारे सामने खड़े रहेंगे, क्योंकि इससे उनका स्वार्थ सिद्ध होता है। कायर और बुजदिल हताश हो जाते हैं, निराश हो जाते हैं, खोज बंद कर देते हैं, मगर जो हिम्मती हैं, दृढ निश्चयी हैं, जो एक क्षण में जल उठने वाले हैं, जो निश्चय कर लेते हैं, कि मुझे कुछ करना है, खोज करनी है, मुझे ऐसा घिसा-पिटा जीवन नहीं जीना है, मुझे अपने जीवन में वह सब कुछ प्राप्त करना है, जो जीवन का आनन्द है, जो जीवन का ऐश्वर्य है, जो मृत्यु से अमृत्यु की ओर जाने वाला है, जो आनन्द प्रदान करने वाला है, ऐश्वर्य प्रदान करने वाला है, जो सही अर्थो में पूंजी देने वाला है, धनवान बनाने वाला है, और उसकी खोज में जो पहला कदम आगे बढा देता है, वही साधक है, शिष्य है।
जो निश्चय करके यह प्रयत्न करता है, कि मुझे गुरू को प्राप्त करना ही है, वह संन्यासी है, वह योगी है। दूसरा, जो इस रास्ते पर गतिशील होने की क्रिया करता है, वह सही अर्थो में तपस्वी है। जंगलों में खाक छानने वाले को तपस्वी नहीं कहते, जो जीवन के मर्म को समझने की कोशिश करते है।, वे ’योगी’ और ’सन्यासी’ हैं। जो गुरू की खोज में आगे बढ़ते हैं वे साधु हैं, जो गुरू को प्राप्त करके ही रहते है।, वे शिष्य हैं—- और जो प्राप्त कर लेता है, उसे जीवन में एक रास्ता मिल जाता है, उसे जीवन में एक चेतना मिल जाती है, वह निश्चय ही उस जीवन-पथ पर तेजी के साथ अग्रसर हो जाता है।
– शिष्य किसी हाड़-मांस के पिण्ड को नहीं कहते।
– शिष्य तो भाव है।
– शिष्य तो चेतना है।
– शिष्य तो समर्पण का एक प्रकार है।
– जिसमें समर्पण नहीं, वह शिष्य हो ही नहीं सकता।
किसी आंख, नाक, कान, हाथ, पैर वाले को शिष्य नहीं कहते। चलने-फि़रने वाल व्यक्ति को शिष्य नहीं कहते, शिष्य तो उसे कहते हैं, जिसमें श्रद्धा और समर्पण है, जो इन दोनों से निर्मित होता है वह शिष्य कहलाता है—-और अगर वह शिष्य बनता है, तो उसे रास्ते का ज्ञान होता है, भान होता है, वह जीवन के रास्ते पर गतिशील हो सकता है। मात्र दीक्षा लेने वाले को शिष्य नहीं कहते, सिर मुंडाने को भी शिष्य नहीं कहते, हरिद्वार में स्नान करने वाले को भी शिष्य नहीं कहते, और गुरू के पैर दबाने वाले को भी शिष्य नहीं कहते, ये तो सब उनके प्रकार हैं।
शिष्य का तात्पर्य है कि नजदीक होना। गुरू के बहुत अधिक नजदीक हो जाना, और इतना अधिक नजदीक हो जाना कि गुरू और शिष्य में कोई अन्तर ही नहीं रहे, अगर अन्तर रह गया हो तो वह शिष्य बना ही नहीं फि़र वह अपने-आप को शिष्य नहीं कह सकता। गुरू और शिष्य में इतना भी गैप नहीं रहना चाहिए, इतना भी अन्तर नहीं रहना चाहिए कि बीच में से हवा भी न निकल सके—उसके जीवन का सारा चिन्तन, सारा क्रियाकलाप गुरूमय ही हो जाता है— गुरू ही उसका ओढना—गुरू के शब्दों का श्रवण करना—-और गुरू की सेवा करना—गुरूमय हो जाना—- और उसकी आंखों में गुरू का भाव तैरने लगता है।
इस जीवन मार्ग पर केवल शिष्य चल सकता है, साधक तो बहुत छोटी सी चीज है, शिष्य के सामने साधक की कोई औकात नहीं होती। योगी, तपस्वी उसके सामने कहीं ठहर नहीं पाते, उसके सामने यक्ष, गन्धर्व, किन्नर और देवता अपने-आप में कोई मूल्य नहीं रखते, क्योंकि शिष्य एक चेतनापुंज होता है, एक दीपक होता है वह अपने – आप में श्रद्धा का एक पूर्ण स्वरूप होता है, समर्पण की साकार प्रतिमा होता है, जो गुरू के जागने से पहले जागता है, गुरू के सोने के बाद सोता है।
जो केवल इस बात का चिन्तन करता है कि गुरू की कैसे सेवा की जाए? हम गुरू के किस प्रकार से हाथ पैर बनें, नाक बनें, आंख बनें, सिर बनें, विचार बनें, भावना बनें, धारणा बनें, किस प्रकार से बनें? किस युक्ति से बनें? जो केवल इतना और केवल इतना ही चिन्तन करता है, वही सही अर्थो में शिष्य कहलाता है—-और सच्चा शिष्य—सही अर्थो में बना हुआ सच्चा शिष्य ही अपने – आप उस रास्ते पर खड़ा हो जाता है, जो पूर्णता का रास्ता होता है, जो पवित्रता का रास्ता होता है, जो ब्रहा तक पहुंचने का रास्ता होता है। इसीलिए शिष्य की समानता तो देवता, यक्ष, गन्धर्व, कर ही नहीं सकते, तपस्वी और साधु तो बहुत छोटी सी बात है।
– सद्गुरूदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्द जी।
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