





एक ऋण को उतारने के लिए वह दूसरा ऋण लेता है और इस आशा से रहता है, कि किसी न किसी तरह से ऋण को उतार दूंगा, लेकिन यह दलदल ऐसा है, कि जिससे उभर कर बहुत ही कम व्यक्ति आ पाते हैं। मनुष्य के जीवन में तीन प्रकार के ऋण प्रमुखतः होते हैं, जिनकों उन्हें समय रहते उतार देना चाहिए। इसमें प्रथम ऋण माता-पिता का, द्वितीय गुरु का और तृतीया ऋण धन का होता है।
मता-पिता का ऋण व्यक्ति पर इसलिए होता है, कि उनके कारण ही वह मनुष्य जीवन में प्रवेश कर सका है और इस संसार में सभी प्रकार के आनन्द व सुख का मार्ग प्राप्त कर सका है। अतः जो व्यक्ति अपने जीवन में माता-पिता की सेवा नहीं करता है, उसे ऋण दोष लगता है और यह दोष उसे इस जीवन में नहीं, तो अगले जीवन में उतारना ही पड़ता है।
दूसरा ऋण गुरु ऋण होता है। गुरु का तात्पर्य है, जो आपको दीक्षा दे, ज्ञान दे, जीवन के वास्तविक स्वरूप का दर्शन कराए, उस गुरु के प्रति यदि जाने-अनजाने दोष हो जाए, अवज्ञा हो जाए, गुरु का अपमान हो जाए, गुरु के वचनों का पूर्ण रूप से पालन न किया जाए या गुरु सेवा में कमी बनी रहे अर्थात् मन, वचन, कर्म से किसी भी रूप में गुरु के प्रति श्रद्धा में कमी आने पर गुरु का ऋण सहस्रगुणा बढ़ जाता है। गुरु ऋण व्यक्ति के जीवन में इस प्रकार जुड़ जाता है, कि उसे सांसारिक जीवन में बाधाओं के चंगुल में फ़ंसा देता है और इस महाचंगुल से मुक्ति पाने का उपाय गुरु के पास ही होता है।
व्यक्ति के जीवन में जो तीसरा ऋण है, वह आर्थिक ऋण है, जो व्यक्ति अपनी क्षमता के बाहर अपनी महत्वकांक्षाओं की पूर्ति हेतू सांसारिक भोग-विलासों में डूबने हेतू, झूठी शान-शौकत में वृद्धि करने हेतू ऋण लेता है, उसे जीवन में आर्थिक ऋण का बोझ ढ़ोना पड़ता है। इसके अतिरिक्त असत्यभाषी, आलसी, क्रियाहीन और साधनहीन व्यक्ति भी जीवन में आर्थिक ऋण के बोझ से व्यथित रहता है।
यदि व्यक्ति अपने जीवन में उपरोक्त ऋणों में से कोई एक भी ऋण पूरा नहीं करता है, तो ये दोष उसके जीवन में प्रभाव डालते हैं और इन्हीं कारणों से मनुष्य दरिद्रता का सामना करता है, उसे आगे बढ़ने के साधना उपलब्ध नहीं होते हैं। घर-परिवार में कलह का वातावरण रहता है, व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक तौर पर दुःखी रहता है और उसका जीवन एक प्रकार से नीरस एवं कष्ट से गुजरते हुए बीत जाता है।
यदि कोई व्यक्ति ऋण भार से ग्रस्त हो जाता है, तो उसका निवारण एकमात्र गुरु मार्गदर्शन एवं साधनात्मक उपाय से ही संभव है। ऋण-मुक्ति के तो कई साधनात्मक उपाय व विधान हैं, परन्तु भगवती भुवनेश्वरी की साधना से श्रेष्ठतम कोई अन्य उपाय नहीं है। यह एक सौम्य महाविद्या साधना है, जिसे स्त्री अथवा पुरुष कोइ भी निःसंकोच सम्पन्न कर सकता है। महर्जि वशिष्ठ ने कहा है, कि भुवनेश्वरी महाशक्ति लक्ष्मी का साक्षात् रूप हैं, और जो जीवन में आर्थिक समृद्धता एवं सम्पन्नता चाहते हैं, उन्हें तो भुवनेश्वरी साधना तो करनी ही चाहिए।
‘त्रिजटा अघोरी’ का कहना है, कि भुवनेश्वरी देवी की साधना से एक तरफ़ जहां लक्ष्मी प्रसन्न होकर पूर्णता देती है, वहीं दूसरी ओर यह साधना शत्रुसंहार में भी अद्भुत सफ़लतादायक है।
‘योगीराज विशुद्धानन्द’ ने कहा है कि, भुवनेश्वरी यंत्र में सैकड़ों लक्ष्मीदायक शक्तियों का निवास है। यह यंत्र शुत्रुओं पर भी विजय प्राप्त करने में भी अद्भुत सफ़लतादायक है।
वास्तव में देखा जाए, तो ऋण भी एक प्रकार से मनुष्य का शत्रु है, जो कि नित्य व्यक्ति को मानसिक यंत्रणा देकर डराता रहता है। इसके कारण व्यक्ति न तो ठीक से भोजन कर पाता है, न तो सो पाता हैं और न अपने अधुरे कार्यों को पूर्णता ही दे पाता है।
जो साधक जीवन में पूर्णता, गृहस्थ सुख- शांति, व्यापार में उन्नित, आर्थिक स्थिरता, ऋणों से मुक्ति या दूसरे शब्दों में भोग और मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें ऋण मुक्ति के लिए भगवती भुवनेश्वरी साधना अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए।
व्यक्ति के जीवन में जाने-अनजाने में दोष हो ही जाते है, न चाहते हुए भी उसे उक्त वर्णित ऋणों में से किसी न किसी ऋण से ग्रसित होना पड़ता है और इसका सर्वश्रेष्ठ उपाय यहीं है कि वह ऋण मुक्ति की यह दुर्लभ साधना सम्पन्न कर ले।
भगवती भुवनेश्वरी का स्वरूप अपने आप में पूर्ण रूप से ममतामय है। दस महाविद्याओं में इनका एक पृथक और विशिष्ट स्थान है। गुरु गोरखनाथ ने तो भुवनेश्वरी साधना सिद्ध करने के पश्चात् अपने ज्ञानबल और साधनाबल से यह अनुभव किया था, कि जीवन में अन्य देवी-देवताओं की साधना करना ही व्यर्थ है। यदि कोई साधक पूर्ण रूप से भुवनेश्वरी साधना सम्पन्न कर लेता है, तो उसके जीवन में किसी भी दृष्टि कोई भी अभाव नहीं रहता हैं
तंत्रसार के अनुसार भुवनेश्वरी साधना सिद्ध करने से पुरुष अथवा स्त्री का सारा शरीर एक अपूर्व सम्मोहन अवस्था में आ जाता है, जिसके व्यक्तित्व से लोग प्रभावित होने लगते हैं और वह जीवन में निरन्तर उन्नति करता रहता है। इस प्रकार यह अनुभव किया गया है, कि भगवती भुवनेश्वरी साधना से ऋण मुक्ति के साथ-साथ असाध्य रोग भी समाप्त से हो जाते है।
भगवती भुवनेश्वरी साधना की शास्त्रों में अनेक विधियां प्रचलित है, किन्तु ऋण मुक्ति की यह साधना अत्यन्त महत्वपूर्ण और दुर्लभ साधना है, जिसको सम्पन्न करने पर साधकों ने तत्काल लाभ प्राप्त किया है। ज्ञानेन्द्र कुमार एक अच्छी कम्पनी में इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे। उन्हें कम्पनी की तरफ़ से अच्छा वेतन व अन्य सुविधाएं प्राप्त होती थीं, किन्तु वे वेतन से धन की बचत नहीं कर पाते थे। सेवा निवृत्ति के कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने कम्पनी से मकान बनवाने हेतू ऋण लिया, जिसे उन्हें वेतन से मासिक किश्तों पर अदा करना पड़ता था। किन्ही कारणवश वह सेवा निवृत्ति तक ऋण को अदा नहीं कर पाएं, जिसके कारणवश कम्पनी ने उनका नया मकान अपने कब्जें में ले लिया। साथ ही उनके भविष्यनिधि खाते की राशि व अन्य देय भुगतान भी रोक दिया और कम्पनी ने जो मकान दिया था, उसे भी खाली करने का आदेश कर दिया।
इन परिस्थितियों के कारण ज्ञानेन्द्र कुमार अत्यन्त दुःखी हो गए। उनको कुछ भी उपाय न सूझा और वे एकदम हताश व निराश हो गए। संयोगवश उन्हीं के एक मित्र ने उन्हें पूज्यगुरुदेव से भेंट करने को कहा और उन्होंने गुरुदेव से भेंट की और उन्हें सारी व्यथा कह सुनाई। पूज्य गुरुदेव ने आश्वासन देते हुए कहा, कि चिन्ता करने की कोई बात नहीं है, यदि भुवनेश्वरी साधना सम्पन्न कर ली जाए, तो समस्या का समाधान शीघ्र ही हो जाएगा।
घर आकर पूज्य गुरुदेव के निर्देशानुसार ज्ञानेन्द्र कुमार ने साधना सम्पन्न की। साधना समाप्ति के मात्र दो ही दिनों बाद कम्पनी ने उनका नवनिर्मित भवन सौंपते हुए ऋण को किश्तों में चुका देने की सुविधा प्रदान कर दी। साथ ही कम्पनी ने उन्हें उनके भविष्यनिधि की जमा राशि का आधा भुगतान कर दिया। इसकी सूचना उन्होंने पूज्य गुरुदेव को दी। पूज्य गुरुदेव ने उन्हें एक श्रेष्ठ मुहूर्त पर उस धन से एक व्यवसाय आरम्भ करने की सलाह दी।
धीरे-धीरे इंजीनियरिंग से सम्बन्धित व्यवसाय अच्छा चलने लगा और कुछ समय पश्चात् उन्होंने कम्पनी का सम्पूर्ण ऋण अदा कर दिया। आज उनकी आर्थिक स्थिति अत्यन्त सुदृढ़ है और वे पूर्ण सुख-समृद्धि के साथ जीवन जीते हुए आध्यात्मिक उन्न्ति की ओर भी अग्रसर है।
ऋण मुक्ति की जो गोपनीय साधना उन्होंने पूज्य गुरुदेव से प्राप्त की थी, वह इस प्रकार है –
यह प्रयोग किसी भी सोमवार की रात्रि 9-00 बजे स्नानादि से निवृत्त होने के उपरान्त, स्वच्छ सफ़ेद वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुंह कर सफ़ेद ऊनी आसन पर बैठकर प्रारम्भ करें।
अपने सामने बाजोट पर सफ़ेद वस्त्र बिछाकर उस पर दाहिनी और गुरु चित्र स्थापित करे। तांबे के किसी पात्र में ‘‘भुवनेश्वरी यंत्र’’ स्थापित करें। यंत्र के सम्मुख ‘श्वेताभ माला’ स्थापित करें।
गुरु पूजन करें और शुद्ध घी का दीपक प्रज्ज्वलित होना चाहिए। इसके पश्चात् संकल्प लें। जल अपने दाहिने हाथ में लेकर अपने नाम व गोत्र का उच्चारण करते हुए, तिथि, संवत्, वार, स्थान आदि का स्पष्ट उच्चारण करते हुए कहें, ‘‘मैं ऋण मुक्ति तथा समस्त रोग दोष निवारण के लिए यह साधना सम्पन्न कर रहा हूं और मुझे इसमें पूर्ण सफ़लता प्राप्त हो।’’
जल को भूमि पर छोड़ दें।
इसके पश्चात् स्वयं के माथे पर कुंकुम का तिलक करें और ‘‘भुवनेश्वरी यंत्र’’ को पवित्र जल से स्नान कराकर स्वच्छ कपड़े से पोंछ लें। यंत्र पर कुंकुम का तिलक करें और पुनः उसी स्थान पर स्थापित कर दें। ‘श्वेताभ माला’ को भी पवित्र जल से स्नान कराएं। यंत्र तथा माला का पूजन कुंकुम, अक्षत, धूप, दीप, नैवेद्य से करें।
इसके पश्चात् हाथ जोड़कर भगवती
भुवनेश्वरी का निम्न रूप से ध्यान करें-
चंचन्मौक्तिक हेम मंडन युताः माताति रक्ताम्बरा,
तन्वंगी नयनत्रयातिरुचिरा बालार्क वद् भासुरा,
या दिव्यांकुशपाश भूजितकरा देवी सदा भीतिहा,
चित्तस्था भुवनेश्वरी भवतु नः सेयं मुदे सर्वदा।।
इसके पश्चात् साधक 21 बार गुरु मंत्र का जाप कर निम्न मंत्र का ‘श्वेताभ माला’ से 21 माला मंत्र जप करें-
साधना सम्पन्न होने के उपरान्त पूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद प्राप्त करें। साधना समाप्त होने के अगले दिन यंत्र तथा माला नदी में प्रवाहित कर दें तथा 21 दिन तक नित्य प्रातः 51 बार उपरोक्त मंत्र का जप करें।
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