





अप्सरा की साधना जहां देवताओं के लिये उचित मानी गई है वहां मनुष्यों के लिये भी अनुकूल कही गई है क्योंकि अप्सराएं स्वयं मनुष्यों की तरफ़ आकर्षित रहती है, स्वयं युवकों का सानिध्य चाहती हैं, देवलोक में और देवताओं के बीच रहती हुई वे ऊब गई हैं, देवताओं के स्थूल शरीर आत्मघाती हैं, अप्सरा तो नवीनता चाहती है कि कोई मनुष्य साधना करके उसे प्राप्त करे अप्सरा स्वयं ऐसे व्यक्ति के साथ समय बिताने के लिये आतुर है, प्रयत्नशील है आवश्यकता है साधना के द्वारा उसे प्राप्त करने की ।
जो वास्तव में ही समर्थ होते हैं, जो यौवन रस से ओत-प्रोत हैं, जिनके हृ्दय में उमंग की लहरें प्रवहित हैं, वे अवश्य ही उर्वशी साधना सम्पन्न करतें हैं और उसे प्रेमिका रूप में प्राप्त कर जीवन का आनन्द, मस्ती और उमंग से तरोताजा बना देते हैं। उर्वशी साधना सम्पन्न करने पर प्रेमिका रूप में उसे प्राप्त करने से शरीर की दुर्बलता और कमजोरी स्वतः समाप्त हो जाती है, उसकी पौरुषता बढ़ जाती है, उसकी आंखों में चमक और चेहरे पर ओज आ जाता है, सारे शरीर में यौवन का समुद्र लहराने लगता है, और वह मनुष्य आकर्षक, सुन्दर, यौवनरस से परिपूर्ण और उर्वशी की आंखों में छा जाने वाला बन जाता है।
ऐसे युवक को देखकर जब अप्सराएं मोहित और पागल हो जाती हैं, जब वे जीवन भर के लिये प्रेमिका के रूप में साथ रहने के लिये उद्यत हो जाती हैं, तो फि़र मनुष्यों की तो बात ही क्या, उसका चौढ़ा वक्षस्थ्ल, लम्बी भुजायें आकर्षण युक्त चेहरा, काले बाल, लम्बा कद और पूर्ण पौरुषता देख कर कोई भी मर मिटने को तैयार हो जाती है और यह सब उर्वशी साधना से सम्भव है।
पुरुरवा और उर्वशी की गाथा तो विश्व विख्यात है। पुरुरवा एक मनुष्य ही था जिसने साधना सम्पन्न कर के उर्वशी को प्रेमिका के रूप में सिद्ध किया था। जिस समय पुरुरवा ने इस साधना को सिद्ध किया था उसकी उम्र ढलने लगी थी, बाल सफ़ेद हो गये थे, शरीर कमज़ोर होने लगा था, परन्तु उसके मन में यौवन का सागर लहलहा रहा था और उसने उर्वशी को प्रेमिका के रूप में सिद्ध कर के ही दम लिया। साधना समाप्त होते ही अनिद्य सौदर्यवती उर्वशी उसके पास आ कर बैठ गयी और अपने हाथों से ताजे गुलाब के पुष्पों की माला पुरुरवा के गले में डाल दी। उसी क्षण पुरुरवा के शरीर में एक विद्युत प्रवाह हुआ और उसकी आंखों में एक चमक आ गयी, बाल काले हो गये, शरीर की स्थूलता और कमजोरी मिट गई।
पुरुरवा ने लिखा है कि उस एक क्षण में उसके सारे शरीर में यौवन और पौरुष का ऐसा सागर लहलहाने लगा कि वह अपने आपे में नहीं रहा, उसे ऐसा लगा कि इक्कीस वर्षीय सौन्दर्य उसके सामने बैठा है, उसकी आंखों में निमन्त्रण का भाव है और उसी क्षण पुरुरवा ने उसे अपनी बाहों में भर लिया। कई वर्षों तक यह प्रणय सम्बन्ध चलता रहा। उर्वशी ने उसे धन, जवाहरात, वस्त्राभूषण आदि से परिपूर्ण कर दिया।
पुरुरवा ने एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पुस्तिका लिखी है, जो उर्वशी साधना के नाम से प्रसिद्ध है। पत्रिका पाठक इस साधना को सम्पन्न कर सकते हैं। यह साधना सिद्धाश्रम सम्पक्त स्वामी हरिहरानन्द जी से प्राप्त हुई है जिसे पुरुरवा ने लिखा था। जीवन में कुछ भी असम्भव नही होता, यदि व्यक्ति निश्चय कर ले तो कुछ भी कर सकता है फि़र यह तो अत्यन्त सरल साधना है।
यह तीन शुक्रवारों की रात्रि कालीन साधना है और किसी भी शुक्रवार से प्रारम्भ की जा सकती है।
इस साधना में अप्सरा माला और उर्वशी यन्त्र तथा चित्र की आवश्यकता पड़ती है।
साधक को स्नान कर पीले वस्त्र धारण करने चाहिये और पीले आसन पर बैठ जाना चाहिये। अपने गले में गुलाब की माला पहन लेना चाहिए और अपने वस्त्रों पर हीने का इत्र छिङक लेना चहिए।
सामने एक तेल और एक घी का दीपक जला देना चाहिए और उनको उर्वशी यन्त्र तथा चित्र के सामने रख देना चाहिए।
अब अप्सरा माला से निम्न मंत्र कि इक्कीस माला मंत्र जाप करें।
मंत्र जप की समाप्ति के बाद वहीं पर सो जाएं।
इसी प्रकार अगले शुक्रवार भी करें।
तीसरे शुक्रवार को गुलाब की एक माला स्वयं धारण करें और एक माला पास ही रख लें।
जब उर्वशी प्रत्यक्ष हो और आपके शरीर में उसका स्पर्श अनुभव होने लगे तो गले में पहनी हुई माला उसके गले में डाल दें।
इस स्थिति में उर्वशी पास पङी दूसरी माला साधक के गले में पहना देती है। इसके बाद साधक वचन ले ले कि जीवन भर वह प्रेमिका रूप में साथ रहेगी और सभी तरह से पूर्णता प्रदान करेगी। यह साधना जितनी भी बार साधकों ने सम्पन्न की है उन्हे पूर्ण सफ़लता प्राप्त हुई है।
वास्तव में ही यह साधना एक अत्यन्त आवश्यक साधना है। इस साधना से साधक अपने जीवन में पुनः हर्ष्, उल्लास, उमंग और कुछ कर गुजरने का हौसला प्राप्त कर लेता है।
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