





हमारी सनातन संस्कृति आज भी यदि शाश्वत है तो निश्चय ही उसका आधार कही बहुत गहरा एवं ठोस धरातल पर टिका हुआ है, विश्व का धर्मगुरु बनने के लिये निश्चय ही कहीं न कहीं दिव्य प्राणश्चेतना चाहिये ही और भारतीय हमारी सनातन संस्कृति इस संदर्भ में सदा ही भाग्यशाली रही है, जब जब इस पर कहीं से भी कोई चोट हुई, कोई न कोई धर्म गुरु जीवन्त हो उठा और गुमराह की जाने वाली भोली भाली जनता को उसके व्यामोह एवं स्वार्थ परता से निकाल कर सनातनता का जय घोष देकर लड़खड़ाते पावों को थाम लिया। इस्लाम और ईसाई धर्म ने सैकड़ों वर्षों तक अपने तरीके से हमारी पुरातन पुनीत इस भारतीय संस्कृति पर जो कुठाराघात किया है, वह जग विदित है, इतना ही नहीं हमारे अपने ही देश के अन्दर इसी संस्कृति में उत्पन्न और विकसित अनेक धर्म एवं धर्माचायों ने मठ एवं मठाधीशों ने अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि के लिऐ नये नये सम्प्रदायों को अपने नाम से नामकरण किया, अलग मत मतानतर चलाकर अपने पीछे लोगों का एक समूह बना कर गढ़ निर्मित कर लिया, वे चाहे बौद्ध रहे हो अथवा जैनी, पारसी रहे हो अथवा मुस्लिम, सिख रहे हो या ईसाई, सभी का मूल उद्गम आर्य संस्कृति ही रही है, इस पुनीत सनातन संस्कृति की लोप होती हुई स्वस्थ परम्पराओं की रक्षा करते हुए अपनी आध्यात्मिक दिव्यता को पुनः अपने उसी अलौकिक पुरातन स्वरूप में प्रतिस्थापित करने का यह एक लघु पर ठोस प्रयास हे जिस महायज्ञ में नवीन रूप में प्राचीन मंत्र यंत्र विज्ञान पत्रिका के सभी पाठक साधक एवं पूज्यपाद गृहस्थ रूपी सदगुरू डॉ. नारायणदत्त श्रीमाली जी के सभी प्रेमी साधक एवं शिष्य एकजुट हो पिछले अनेक वर्षों से उनके निर्देशन में दिन रात सेवारत जुटे हुए है।
पूज्य गुरुदेव ने गृहस्थ रूप में रहते हुए भी धर्म एवं संस्कृति की रक्षा का जो बीड़ा उठाया है उसकी प्रेरणा एवं आधार उनका संन्यासी रूप परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्द ही रहा है, सिद्धाश्रम संस्पशित ही नहीं वरन सिद्धाश्रम के अधिष्ठाता एंव प्रमुख संचालक पूज्यपाद परमहंस स्वामी सच्चिदानन्द महाराज के प्रमुख शिष्य के रूप में वहां के चेतन्य संजीवन प्राण के रूप में आप अपने पूज्य गुरु के आदेश पर वर्तमान विडम्बनाओं एवं विभिषिकाओं से युक्त समाज का गरल पीते हुए अपना कर्म सम्पन्न करने में पूरे मनोयोग से चेतना प्रदान कर रहे है, हम सब जो भी जहां पर है, जहां भी जो किसी रूप में जुड़े हुए शुभ संकल्प से प्रतिज्ञा करे कि उनसे इस दिव्य पवित्र महायज्ञ में जो कुछ भी अधिक से अधिक बन पड़े करेगे तो निश्चय ही आप सब मिलकर आज पाश्चात्य संस्कृति के प्रभा एवं व्यामोह के चक्रव्यूह में फंसे आज के अपने इस भ्रष्ट समाज में नई चेतना संचारित कर नयी करवट ला सकते है।
आज आप जिधर भी निकल जाय विज्ञान एवं भौतिकवाद का भूत अपने खूनी पंजों से सबको दबोचे हुए सब पर हावी है, बेतहाशा लक्ष्यहीन दौड़ में सब लगे हुए है, पागल है एक रात में लखपति बन कोटी, महल, अकूत धन दौलत सब कुछ पाने को, धार्मिक मर्यादाओं एवं परम्पराएं ताक में रख छोड़ी है, पाश्चात्य चका-चौंध में जो स्वयं. में प्रताड़ित हो किकर्त्तव्यमूढ बन भौचक्की है उसकी ही नकल करे हमारी आपकी पीढ़ी स्वयं के अस्तित्व को दांव पर लगाये हुये मृ्ग मरीचिका का शिकार हो रही है।
इसी विडम्बना से तो अपने आपको बचाकर नई पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित रखना ही होगा अन्यथा कल की भावी संतान हमे किसी भी कीमत पर माफ नहीं करेगी, चरमरा कर टूट जायेगी हमारी मर्यादाओं एवं परम्पराओं की सभी सीमाएं भारतीय संस्कृति के उज्ज्वल मुखौटे पर नकली आवरण का कलंक लग जायेगा, धर्माचार्यों के नये नये प्रयोग, उनके रेशमी एवं आडम्बर युक्त परिवेश में बुने गये सब्जबाग धर्म प्रेमी एवं धर्म भीरू जनता को एक ऐसे मोड़ पर ले जाकर खड़ा कर देगे जहां पर वापिस लौट कर प्रायश्चित करने की भी कोई गुंजाइश बाकी नहीं बचेगी ।
अपने आप में भगवान कहलाने वाले योगी, विदेशों में भारतीय योग दर्शन के नाम पर दुकान खोले भगवा पहने छद्मवेश धारी योगी हो चाहे पाखण्डी साधु संन्यासी, सभी केन्द्रीय भूत लक्ष्य एक ही है, जल्दी से जल्दी करोड़ो की लागत का आश्रम कैसे भी बना कर अपनी व्यक्ति पूजा करा संसार का सारा भोग ऐश्वर्य स्वयं में समेट लेना |
यही दौड़ संस्कृति के नाम पर भ्रष्टाचार फैला रही है, यही दौड़ राजनेतिक नेताओं एवं व्यापारियों को चैन की नींद नहीं सोने दे रही हि, पूरे समाज को श्रष्टता में डुबो कर रख छोड़ा है, सीधी सच्ची शान्त जिन्दगी, सात्विक चिन्तन की कल्पना आज सपना हो गई है, आश्रम पर आश्रम बने जा रहे है लेकिन प्रत्येक की नींव के नीचे दबी हुई वासना, भोग, अहं और सब कुछ हड़प लेने की भयंकर अजगरी वृत्ति।
इसी चिन्तन इसी प्रश्न का तो उत्तर है आपके ये साधना शिविर, जो पूज्यपाद सद्गुरुदेव के प्रत्यक्ष संरक्षण एवं दिशा निर्देश में पिछले कई वर्षों से निरन्तर लगाये जा रहे है जिनकी महत्ता एवं सफलता इसी से स्पष्ट हे कि इन प्राचीन आध्यात्मिक देव भूमि पर होने वाले शिविरों में भाग लेने के लिए भारत के कोने कोने से और विदेशों तक से साधक और साधिकायें दौड़ दौड़ कर आते है, साधना सम्पन्न करते है, और सारे मानसिक तनावों से मुक्त होकर दिन प्रति-दिन की भौतिक समस्याओं का समुचित एवं सटीक हल प्राप्त करते है, आध्यात्मिक स्तर पर साधना काल में ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो झूम झूम जाते है।
साधक साधिकाओं की अनुभूति के आधार पर उन्हें साधना काल में और साधना के उपरान्त प्राप्त हुई उपलब्धियों के आधार पर इन शिविरों की कुछ विशेषताये पत्रिका पाठकों के लिए स्पष्ट कर देना उचित रहेगा।
इन साधना शिविरों के माध्यम से साधक साधिकाओं को मंत्र तंत्र के प्रति भ्रामक चिन्तक एवं प्रचार करके पर्दाफाश करते हुए सही दृष्टि देना और सही मूल्यांकन करके लोप होते हुए इस आधार को सशक्त बनाना, सार भूत अपनी भारतीय विद्याओं के प्रति अनास्था एंव अज्ञात से लोगों को बाहर निकाल सही मायनों में इन विद्याओं का रहस्योद्याट्न करना ।
वेदों की गरिमा और मंत्रों के प्रभाव के प्रति पाश्चात्य सभ्यता ने हम भारतीयों को भी गुमराह करके एक बड़ा प्रश्न चिन्ह हमी से हमारे चिरन्तन शाश्वत ज्ञान पर लगवा दिया है जिसे समय रहते यदि हम नहीं हटा सके तो आने वाले कल का नक्शा रंग हीन दिखाई पड़ेगा, इन साधना शिविरों के माध्यम से पूज्य गुरुदेव का प्रयास रहा है कि सही वस्तु स्थिति सबके सामने रखकर मंत्र साधना एवं वैदिक यज्ञ अनुष्ठान सम्पन्न कराते हुए साधारण जन को इनका प्रत्यक्ष लाभ एवं महत्व दिखा सके।
वेदिक यज्ञों को सम्पन्न करा कर व्यक्तिगत राष्ट्रीय स्तर पर समस्याओं का समाधान करके अनुकूलता दिलाना पूज्य गुरुदेव का विशेष लक्ष्य रहा है, उनका दावा है कि आज भी इन यज्ञ और अनुष्ठानों के माध्यम से प्रकृति को वश में करके मन मुताबिक कार्य सम्पन्न कराया जा सकता है अनेक बार साधक और शिष्यों के बीच ऐसा कराया और किया गया है, वरुण यज्ञ एवं पुत्रेष्टि यज्ञ के माध्यम से क्रमशः वर्षा एवं पुत्र रत्न की प्राप्ति आज भी संभव कराई गई है।
जिन साधकों और साधिकाओं ने तपश्चर्या शिविरों के ऋषितुल्य जीवन जी कर भाग लिया है उन्हें मालूम है कि मंत्रों की विस्फोटक शक्ति आज भी गोली की तरह असर करती है, यज्ञ कुंड से अग्नि आज भी मंत्र से प्रज्ज्वलित होती है, मंत्र से आज भी देवी देवता सकता है, मंत्रों के माध्यम से सम्मोहन वशीकरण, उच्चाटन, विद्वेषण और मारण पहले की भांति आज भी संभव है, इन शिविरों में अनेक प्रकार के प्रयोग साथकों ने सम्पन्न किये हे।
तंत्र सही मायनों में साधना की एक विशिष्ट पद्धति है जिसके माध्यम से अपने शरीरगत सभी नाड़ी संस्थानों को विशेष क्रम में क्रियाशील करके तुरन्त सफलता पाई जाती है, मांस, मदिरा सम्भोग की आड़ ले कर भोग लिप्सा में लिप्त भ्रष्ट लोगों ने अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिये तंत्र के प्रति लोगों में एक भयावह चिन्तन एवं डर व्याप्त कर दिया है ताकि उनका प्रभाव भोली भाली जनता में बना रहे, वरना शास्त्रों में कहीं पर भी इन वस्तुओं की तंत्र में आवश्यकता नहीं बताई है, इन शिविरों में साधक और महिला साधिकाओं में साथ-साथ तंत्र साधना में भाग लेते हुए पूर्ण सात्विक एवं मर्यादित जीवन में रह कर पूर्ण सफलता प्राप्त की है।
इन साधना शिविरों के माध्यम से भूत सिद्धि साधना सम्पन्न करते हुए साथकों को पहली बार आभास कराया गया कि भूत-प्रेत पिशाच भी मनुष्य की तरह ही भिन्न-भिन्न योनियां होती है जो पूर्ण सेवा, समर्पित और विश्वसनीय है, इनसे मनुष्य का कोई भी अहित नहीं होता उल्टा एवं इन्हें सिद्ध कर अपने जीवन में इनसे कार्य लेता हुआ उन्हें मुक्ति प्रदान करने में समर्थ और सफल होता है ।
गृहस्थ शिष्य एवं साधक, साधिकाओं को गृहस्थ के सब दायित्व निभाते हुए भी महाविद्या साधना शिव साधना, दुर्गा साधना, भूत भविष्य संबंधी पंचांगुली साधना, महालक्ष्मी साधना, महाकाली साधना, भैरव साधना, साबर मंत्र साधना, आयुर्वेद साधना, हादी-कादी, पर काया प्रवेश, वायुगमन आदि साधना सम्पन्न करा कर सिद्ध एवं सक्षम बनाना और अपनी इन गौरवशाली विद्या की थाती को जीवित बनाये रखना यही पूज्य गुरुदेव का इन शिविरों के माध्यम से अचूक लक्ष्य रहा है, उनका तो हर पल यही कथन है कि ये साधना ही अपने आप में पूर्ण ब्रह्मानन्द की प्राप्ति है, जो साधक एक शिविर में भाग ले लेता है वह इस आनन्द का रसपान कभी जीवन भर भुला नहीं सकता।
शास्त्रोक्त गुरु दीक्षा के माध्यम में पूज्य गुरुदेव अपने शिष्य को पुत्रवत् स्नेह मातृत्व ममत्व प्रदान कर सीने से लगा आशीर्वाद एवं शक्तिपात क्रिया से उसके पापों का क्षय कर उसे उच्च जीवन प्रदान करते है, साधनाओं के द्वारा उसे स्वयं का बोध करा ब्रह्मत्व की ओर अग्रसर करते है, शिष्य उनके चरणों में बेठकर अपना जीवन धन्य समझता है।
अमरीका में इस सिद्धान्त का प्रतिपादन एक शिविर में करके पूज्य गुरुदेव ने अमेरिका वासियों को और दुनिया के सभी वैज्ञानिकों को मंत्र मुग्ध करके आश्चर्य में डाल दिया जो विज्ञान को अभी भी करने में सैकड़ों साल लगेंगे, फिर भी कर पाये यह संभावना नहीं की जा सकती, आज मंत्र एवं सूर्य सिद्धान्त के माध्यम से सिद्धहस्त साधक कुछ ही क्षणों में करके दिखा सकता है।
अनास्थावादी आज की पीढ़ी जो हर कदम पर वैज्ञानिकता का दम भरती है, इन साधना शिविरों में भाग लेकर नतमस्तक हो जाती है, सारा गरूर उसका धुएं के बादल सा उड़ जाता है, फिर भी जिनकी प्रवृति जहर उगलने की है, उन्हें आप कितना भी दूध पिलाये वे तो जहर उगलेंगे ही, वणिक वृति के आधार पर पैसे के बल से सिद्धियां खरीदना चाहेंगे, स्वयं अकर्मण्य बन कर पंडितों से मंत्र जप करा कर पूरा फल चाहेंगे, ऐसे लोग स्वयं तो श्रम के शिकार हो गुमराह होते ही है, दूसरों को भी गुमराह करने से बाज नहीं आते, आप स्वयं साक्षीभूत हो कर एक बार, कम से कम एक बार अवश्य ही अपना बहुमूल्य समय निकाल कर इन साधना शिविरों में भाग ले, आपको निश्चय ही लगेगा कि पीताम्बर धारण कर तपश्चर्या भवन में बैठकर ऋषितुल्य स्वरूप में मंत्रजप, योग-आसन, मुद्राएँ प्राणायाम करके आप कितना सूकून महसूस करते है, आपको लगेगा कि निश्चय ही यही वह जीवन है जो अपने आप में सार्थक और सही है, गृहस्थ में रहते हुए इस आनन्द का भी साल में एक दो बार रसपान अवश्य करे ताकि ये सिद्धियां आपके जीवन को संवार और सजा कर भोग और मोक्ष दोनों में ही पूर्णता प्रदान कर सके।
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