





नारायणो नित्यरभ्यः नित्यमुक्तः निरंजनः।
निरामयः निरवद्यः निखिलः निखिलेश्वरः।।
गुरु जीवन की पूर्णता है, गुरु को प्राप्त कर लेना शिष्य की पूर्णता है, और यही जीवन की सबसे बड़ी खोज है, उपलब्धि है, जिसे प्राप्त करके शिष्य धन्य-धन्य हो जाता है, बूंद समुद्र में समा जाने के बाद तद्रूप हो जाती है, फि़र उसकी सभी कशमकश तथा भटकाव समाप्त हो जाता है और इसी रहस्य को समझ जाना शिष्य की चैतन्यता है, यही सौभाग्यशालीता तथा कृतकृत्यता है।
साक्षात् नारायण स्वरूप, अतिरमणीय, बन्धन रहित, सर्वत्र रमणीय, रोग रहित, निन्दा रहित, विकार रहित गुरुदेव निखिल समस्त शिष्य समुदाय के एकमात्र अधिपति है।
शब्द इस भाव को प्रकट नहीं कर सकता, लेखन इस आनन्द को लिख नहीं सकता, वाचन इसे बोल नहीं सकता, इस अद्भूत भाव को हृदय के तारों के झंकार से, मधुरता से, मधुरता के अमृत रस से, प्रेम के आनन्द प्रवाह से, भक्ति की गहराईयों से, श्रद्धा के स्फ़ुरण से, दिव्यता के तेज से, अनुभव किया जा सकता है।
गुरु जन्मोत्सव वह पावन पर्व है, जब प्रत्येक शिष्य अपने प्राण-प्रिय पूज्य गुरुदेव के श्री चरणों में उपस्थित होकर, कृतज्ञता व्यक्त करते हुए श्रद्धा-सुमन अर्पित करता है। यही है गुरु और शिष्य का पावन सम्बन्ध, जहां अन्य सभी संबंध न्यून एवं नगण्य हो जाते हैं, क्योंकि शिष्य-गुरु का मिलन वैसा ही है, जैसे धरती और आकाश का मिलन हो, बूंद और समुद्र का मिलन हो और इस मिलन के बीच समस्त ब्रह्माण्ड रचा-पचा है— यह सम्बन्ध आज का नहीं अपितु युगों-युगों से है और शाश्वत है।
यह संबंध देह का नहीं, अपितु प्राणों का है। आत्मा का परमात्मा से मिलन है और जब कोई शिष्य गुरु से एकाकार होता है, तो सारा ब्रह्माण्ड शिष्य के पैरों तले होता है। वह शिष्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की झलक गुरु में देख कर विस्मय विमुग्ध हो उठता है क्योंकि यह तो स्व का आत्मा से, जीव का ब्रह्म से और चैतन्य का अचैतन्य से मिलन है— और यह मिलन कोई सामान्य मिलन नहीं है, अपितु जन्म-जन्मान्तर का मिलन है।
जब गुरु अपने शिष्य को आवाज देता है तो उनकी वाणी का एक उद्देश्य होता है कि वह शिष्य रूपी बूंद, गुरु रूपी समुद्र में पूर्णरूप से समाहित हो सके, वह सुगन्ध वसन्त में पूरी तरह से मिल सके जिससे कि यह बार-बार जन्म लेते रहने की प्रक्रिया, यह जन्म-मरण का चक्र एकबार में ही समाप्त हो सके और सद्गुरु जन्मोत्सव के अवसर पर गुरु इसी क्रिया को सम्पन्न करते हैं। वे शिष्यों के ललाट की दुर्भाग्य लिपि को बदलने की क्रिया करते हैं, उनके कर्म वासना रूपी मैल को धुलने का, समाप्त करने का प्रयास करते हैं, क्योंकि यह पर्व ही ऐसा है, जब गुरु शरीर स्थित अमृत-कुंड पर से परदा हटाने का प्रयास करते हैं, जिससे कि वह अमृत शिष्य के पूरे शरीर में रच-पच सके और उसके जीवन को पूर्णता की ओर पहुंचा सकें, क्योंकि ‘पूर्णिमा’ शब्द अपने-आप में पूर्णता प्रतीक है।
‘सद्गुरु’ का अर्थ है चौंसठ कलाओं से पूर्ण होना। जब चन्द्रमा प्रतिपदा तिथि से लेकर एकैकशः अपनी कलाओं को पूर्ण करता हुआ, सभी कलाओं से पूर्ण होकर अत्यन्त सौन्दर्य से भरपूर हो जाता है, उसी को ‘पूर्णिमा’ कहते है, और वह इसी सुन्दरता को पृथ्वी पर बिखेरता हुआ, अपनी शीतल चांदनी से सभी को आप्लावित करता है।
यह गुरु पर्व भी ऐसा ही है, जब पूज्य गुरुदेव अपनी चौंसठ कलाओं से पूर्ण, अपने ज्ञान की गरिमा को, अपनी शीतलता को शिष्यों के बीच बिखेर कर उनके हृदयों को आनन्द से सराबोर कर देते हैं, क्योंकि गुरु तो पूर्ण ईश्वर का ही स्वरूप हैं, एक मस्त-मादक फ़ुहार है, जिसमें भीग कर शिष्य आनन्द से सराबोर हो सकता है। अपने-आप को प्यार में, मस्ती में, मादक तरंग में पूरी तरह से भिगो कर उस विराटता के दर्शन कर सकता है, जो जीवन का वास्तविक आनन्द है, धयेय है, सर्वस्व है। गुरु से एकाकार होना ही, उनकी कृपा-फ़ुहार में भीग जाना ही उस विराटता को प्राप्त कर लेना है और शिष्य वही है, जो उस ब्रह्मानन्द से एकाकार होकर अपने-आप को गुरु-चरणों में सम्पूर्णता के साथ समाहित कर दें।
गुरु जन्मोत्सव तो जीवन का वह स्वर्णिम क्षण है, जब शिष्य गुरु-चरणों का पूजन-अर्चन आदि कर अपने समस्त विकारों, न्यूनताओं और समस्त संचित पाप कर्मों से मुक्ति पा जाता है, तथा उनके विशेष आशीर्वाद व कृपा-दृष्टि से उनकी श्रेष्ठता, उच्चता और पवित्रता को ग्रहण कर पाता है, अतः इस दिन गुरु-चरणों में पहुंचना तथा उनकी सामीप्यता पाना ही जीवन की श्रेष्ठ उपलब्धि कही जा सकती है, क्योंकि इस दिन गुरु-चरणों में होना ही समस्त तीर्थों में स्नान करने के तुल्य है, तो फि़र कोई अज्ञ ही होगा, जो इस पर्व पर गुरु-चरणों में पहुंच कर उनके आशीर्वाद और कृपा-दृष्टि तले अपने-आप को उस रासानन्द की फ़ुहार में भिगो कर आप्लावित न कर सके।
जो व्यक्ति गुरु की महत्ता को व इस दिन के महत्व को नहीं समझ पाता, उसके जैसा हतभागी और कोई नहीं होता, क्योंकि इन दिव्य क्षणों में गुरुदेव के समक्ष न होना जीवन के बहुत बड़े सौभाग्य से वंचित रह जाना है और यह बात वही जान सकता है, जिसने गुरु के अर्थ को अर्थात् ‘गुरु-तत्व’ को जाना हो।
गुरु-शिष्य की परम्परा तो आदिकाल से ही चली आ रही है। हर बार गुरु, शिष्य को बहुत कुछ देता है, परन्तु शिष्य अपने गुरु को कुछ नहीं दे पाता और उस पर गुरु-ऋण चढ़ता ही जाता है, यही तो एक मौका, एक सुअवसर शिष्य के जीवन में आता है, जब वह पूर्णता के साथ उनमें समाहित होकर, उनसे एकाकार होकर इस गुरु-ऋण को उतारने का प्रयास कर सकता है, क्योंकि गुरु का प्राकट्य स्वरूप गुरु-हृदय में सम्पूर्णता के साथ समावेश होने का दुर्लभ अवसर है।
गुरु जन्मोत्सव मात्र ‘गुरु पर्व’ न होकर ‘शिष्य को पूर्ण मानव बनाने की क्रिया है। जिस प्रकार चन्द्रमा अपनी एक-एक कला को ग्रहण करता हुआ, सेालह कलाओं से पूर्ण होकर, अपूर्व सौन्दर्य से पूर्ण हो जाता है, उसी प्रकार शिष्य भी इस पर्व पर गुरु द्वारा अपने जीवन में समस्त कलाओं से युक्त होकर अपूर्व सौन्दर्य से भरपूर हो जाता है, क्योंकि मात्र गुरु में ही शिष्य को पुरुष से पुरुषोत्तम बना देने की क्षमता होती है।
शिष्य के मन में जब अपने इष्ट और गुरु के प्रति भेद नहीं रह जाता है, जब वह इष्ट की वाणी व गुरु की वाणी से एक ही प्रकार की आनन्दानुभूति का अनुभव करने लगता है, क्योंकि गुरु का दिव्य शरीर इष्ट रूप में ही कल्याण निहित बना है, तभी वह जीवन में सफ़लता की आशा कर सकता है और यदि उसके मन में एक क्षण के लिए भी यह भाव आ जाता है कि वह गुरु एक साधारण मानव है, तो वह शिष्य अपने लक्ष्य की ओर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता और न ही अपने जीवन के धयेय को और जीवन की पूर्णता को प्राप्त कर सकता है, क्योंकि गुरु साधारण मानव के रूप में केवल दुष्ट विचारों वाले दम्भियों को ही दिखाई देते हैं, जो कि अपने तर्क के जाल में ही उलझे रहते हैं और ऐसे व्यक्ति जीवन में गुरु की सामीप्यता प्राप्त करके भी दुराचारी व दुर्भाग्यशाली बने रहते हैं।
गुरु प्राप्त होना तो जीवन की श्रेष्ठ उपलब्धि है और उनके चरणों में अपने-आप को श्रद्धा पूर्वक समर्पित कर देना ही जीवन का सर्वस्व कहलाता है, क्योंकि गुरु तो साक्षात् विचरण करते हुए सजीव, सप्राण देवालय हैं, उनका रोम-रोम मंदिर की पवित्रता हैं और चरण समस्त तीर्थों के सम्पूर्ण दर्शन, इसीलिए यह कहा जाता है कि संसार के सभी तीर्थ और पुण्य क्षेत्र गुरु-चरणों में साकार रूप में उपस्थित होते हैं। किन्तु उन्हें देखने के लिए वे दिव्य चर्मचक्षु चाहिए, जो गुरु-कृपा के द्वारा ही प्राप्त किए जा सकते हैं।
गुरु तो सही अर्थों में पवित्र, दिव्य, उज्ज्वल और निर्मल मानसरोवर है, जिसमें डुबकी लगाने से कौआ भी हंस बनने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। शिष्य तो वह है, जो अपने ‘स्व’ को गुरु-चरणों में विसर्जित कर दें, अपना नाम, पद, गरिमा, उच्चता जैसे भावों को गुरु-चरणों में तिरोहित कर दे, क्योंकि शरीर, मन, प्राण, देह, रोम-प्रतिरोम ये सभी कुछ गुरु का ही तो है, तथा यह सब गुरु को अर्पित कर देना ही गुरुमय हो जाना है और इस क्रिया को क्रियान्वित करने का अवसर ही पुनीत पर्व है, जब शिष्य पूर्णरूप से गुरुमय होकर अपने जीवन के वास्तविक आनन्द को, जीवन की श्रेष्ठता को, जीवन की सर्वोच्चता को प्राप्त कर लेता है, क्योंकि गुरु का तात्पर्य ही पूर्णता है, सिद्धि है, सर्वोच्चता है। यह महोत्सव तो पूर्णिमा की चांदनी है, जो मन के अंधियारे को दूर करने में समर्थ है।
यह महोत्सव तो छलकते हुए जाम की तरह है, जिसे पीने पर शरीर का रोम-रोम पुलकित हो उठता है, हृदय मोहित हो उठता है तथा चारों तरफ़ वासन्ती धूप खिल उठती है और भक्ति-रस चारों तरफ़ से इस प्रकार बरसने लगता है कि इसे अभिव्यक्त करने के लिए कोई शब्द नहीं है।
गुरु जन्मोत्सव तो जीवन के सभी बन्धनों से मुक्त होने का मार्ग है। पशुवत जीवन से मुक्ति पाकर वास्तविक जीवन को समझने का रास्ता है, यह तो गुरु-शिष्य के प्रेम की पूर्णता की चेतना को प्राप्त करने का श्रेष्ठत्म दिवस है और बड़े-बड़े ऋषि, मुनि, योगी भी पूर्णिमा की इस चांदनी में स्नान करने के लिए, अपने-आप को उनकी कृपा-फ़ुहार में भिगो देने के लिए व्यग्र हो उठते हैं, क्योंकि गुरु पूर्णिमा दिव्य चंद्र रूपी गुरु की चांदनी में अपने-आप को तृप्त कर लेने का पर्व है, जिसमें सभी शिष्य स्नान कर तृप्त व आनन्द युक्त होकर अपने जीवन को धन्य-धन्य कर सकते हैं।
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