





तब मैं मात्र उन्नीस वर्ष का युवक था— कितनी ही अभिलाषाएं थीं मेरी, और मैं स्वयं की चरम सीमा पर खड़ा किसी को तलाश रहा था—- कोई ऐसा साथी, जो हाथ पकड़ कर मेरा मार्गदर्शन करे, जो मुझे परेशानियों से उबारे, जो मुझे वह सब प्रदान कर सके, जो कि मेरा अभीष्ट था—-
पर कौन है ऐसा साथी ? क्या मैं कभी उससे मिल पाऊंगा ? बस इसी ऊहापोह में मेरे जीवन की हर भोर मुझे अमावस्या की काली रात की भांती डंसती थी। जिस अभाव से मैं उन दिनों गुजर रहा था, उसका वर्णन शब्दों में सम्भव नहीं। तभी एक दिन—– वह एक विचित्र पुस्तक थी और देखने में काफ़ी प्राचीन प्रतीत हो रही थी। उसके जर्जर पृष्ठ इस बात की घोषणा कर रहे थे, कि निश्चय ही वह कई हाथों से गुजरती हुई आखिरकार मेरे पास आ रुकी थी। पुस्तक साधनात्मक थी—- यक्षिणी और अप्सरा साधनाओं से परिपूर्ण। कुछ पृष्ठ पढ़ते ही मैं इतना तो समझ ही गया, कि वह कृति किसी अनुभवी की कलम द्वारा रचित है— अतः उसकी प्रामाणिकता पर संदेह होना खुद संदेहप्रद प्रतीत हो रहा था।
तब मुझे इस बात का किंचित एहसास नहीं था, कि यह पुस्तक ही मेरी मंजिल की प्रथम सीढ़ी है, अतः मैंने पुस्तक को एक सामान्य रूप से ही लिया। उस साहित्य को पढ़ने पर मेरा रुझान यक्षिणी और अप्सरा साधनाओं की ओर हुआ तो सही, परन्तु मन में एक भय भी व्याप्त था, जो मुझे उस पुस्तक के ज्ञान को क्रियान्वित करने से रोक रहा था। मैंने सुना था, कि यक्षिणी और अप्सराएं निश्चय ही व्यक्ति को सब कुछ प्रदान करती है, परन्तु वे अत्यधिक ईर्ष्यालु भी होती हैं और यदि साधक किसी अन्य स्त्री से बात भी करता है, तो वे उसका सर्वनाश कर देती हैं—- एक अद्भुत घटना मेरे साथ यह हुई, कि जब भी मैं उस पुस्तक को उठाता, तो स्वतः ही एक पृष्ठ खुलता, जिस पर अंकित था
‘चन्द्रज्योत्सना’—– और यही घटना मेरे साथ दस-बारह बार हुई—- जब भी वह पृष्ठ खुलता, मैं अपनी सुध-बुध खो बैठता और एक चुम्बकीय शक्ति मुझे अपनी ओर खींचती हुई सी प्रतीत होती— पर हर बार पूर्ण मनोवेश से मैं उस अदृश्य शक्ति के पाश से अपने आप को छुड़ा लेता।
—- इस पुस्तक ने मेरी तृष्णाग्नि में घृत का काम ही किया था। कहीं मैं अपना मानसिक सन्तुलन ही न खो बैठूं, इसलिए मैंने कुछ दिनों के लिए देहरादून जाकर समय बिताने का निश्चय किया—- आज जब मैं पलट कर पीछे देखता हूं, तो प्रतीत होता है, कि मानो कोई अदृश्य शक्ति ही मुझे ठेलकर वहां ले गई थी—
हालांकि इस बात पर भी भैरवानन्द ने विशेष जोर दिया, कि साधक को मर्यादा के प्रतिकूल कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। मेरा आश्चर्य तब द्विगुणित हो गया, जब उन्होंने मुझे ‘‘सौन्दर्ययुक्त चन्द्रज्योत्सना’’ अप्सरा साधना को सम्पन्न करने का आदेश दिया। क्या यह कोई आश्चर्यजनक संयोग या अटल नियति—यह मेरी समझ तो इसके निराकरण के लिए बौनी प्रतीत हो रही थी— भैरवानन्द ने मुझे सम्पूर्ण साधना विधि समझाई और मुझे सफ़लता का आशीर्वाद भी दिया।
‘‘ ॐ ह्लीं सौन्दर्य चन्द्रज्योत्सना आगच्छ—’’ मंत्र की धवनि मेरे मुख से उच्चरित हो, मेरे एकांक कक्ष के वातावरण में फ़ैल रही थी- — रात्रि के करीब बारह बजे थे। भैरवानन्द ने मुझे नित्य तीन दिनों तक मंत्र की ग्यारह मालाएं ‘चन्द्रज्योत्सना चैतन्य यंत्र’ के आगे जपने को कहा था। आज द्वितीय दिवस था— जप समाप्त होते-होते मुझे एक अत्यधिक तीव्र, मादक गंध अनुभव हुई— कुछ क्षण तो मैं सुध-बुध खोए बैठा रहा, पर शीघ्र ही अपने ऊपर नियंत्रण प्राप्त कर बाकी जप पूर्ण किया। उस रात्रि को मुझे नींद नहीं आई, मैं तो उस गंध में ही मदमस्त हो, अपने-आपको भी भुलाए हुए लेटा हुआ था—
तीसरा दिन—- शुरु से ही कक्ष का वातावरण एक रहस्यमय ढंग का हो गया था, ऐसा प्रतीत हो रहा था, कि यह मेरा कक्ष नहीं, अपितु कोई राजभवन अथवा इंद्र का कक्ष हो- — एक दिव्य गंध मेरे नथुनों से होती हुई मेरे मस्तिष्क को संज्ञा शून्य कर रही थी और मैं बड़ी ही मुश्किल से आसन पर दृढ़ हो पा रहा थ। तभी ‘छन-छन’ करती घुंघरुओं की धवनि मेरे कर्णद्वारों पर चोट करने लगी— मैंने तुरन्त अपनी आंखे खोलीं, तो एक आश्चर्य मिश्रित चीख मेरे मुख से स्वतः ही निकल गई—
एक नारी बिम्ब मेरे सामने था, जो कि धीरे-धीरे प्रत्यक्ष हो रहा था—- मेरी दशा विचित्र थी— मंत्र जप तो कभी का ही रुक गया था— और मैं बुतवत्, सम्मोहित सा उस तराशी हुई संगमरमर की सौन्दर्य मूर्ति को निहार रहा था—
जो स्त्री मेरे सामने उपस्थित थी वह अपने आपमें ही विलक्षण थी। लम्बी, छरहरी, गौर वर्णीय देह, जिस पर लम्बे, काले रेशमी बाल यूं बिखरे हुए थे, मानो कमल के पुष्प पर भौंरों का समूह गुंजरण कर रहा हो– उसके चेहरे का सम्मोहन इतना तीव्र था, कि मैं चाह कर भी अपने नेत्र वहां से हटा नहीं पा रहा था। मृग के समान उसकी आंखे इतनी गहरी थी, कि वे मुझे स्पष्ट निमंत्रण दे रही थीं।
एक कोमलांगी मृगी के समान ही उसके नासापुट फ़ड़क रहे थे और अधखुले, गुलाबी ओंठ किसी ऋषि की तपस्या के भंग होने के व्यंग्न में मुस्कुराते हुए प्रतीत हो रहे थे—- पीत और लाल वर्ण के वस्त्र उसके शरीर पर चार चांद लगा रहे थे एवं स्वर्णिम आभूषणों में वह और भी आकर्षक लग रही थी।
उसका वक्षस्थल अत्यधिक उत्तेजक था, जिसमें यौवन का अपार समुद्र उमड़ रहा था— कमर इतनी लचीली, इतनी आकर्षक, मानों किसी ने विशेष रूप से उसे तराश हो— और उस पर भंवर की भांति गहरी नाभि, अच्छे से अच्छे साधक को भी विचलित करने में सक्षम थी—- उसकी मांसल जांघाये, नाजुक पांव बरबस ही ध्यान अपनी ओर खींच रहे थे—-
वास्तव में ही अब तक मैंने नारी सौन्दर्य का इतना अनूठा चित्रण कभी नहीं देखा था– -अद्भुत—- अलौकिक—- अनिवर्चनीय—- उत्तेजना की तरंगे स्पष्टतः मैंने अपने शरीर के रोम-रोम में अनुभव की। मैं बेसुध सा उसकी ओर देख रहा था, कि तभी मेरी माला जमीन पर गिरते-गिरते बची—
मैं तुरंत प्रकृतिस्थ हुआ। भैरवानन्द की बात मुझे याद आई – ‘तुम्हें किसी भी हालत में जप अधूरा नहीं छोड़ना है, उसे पूरा करके ही तुम अप्सरा के किसी भी प्रश्न का जवाब देना।’ अतः मैंने अपने मस्तिष्क को नियंत्रण में लिया, उस ओर से नजर हटाई और आखिरी माला जपने लगा। चन्द्रज्योत्सना ने न जाने कितने ही प्रयास किये मुझे बीच में ही उठाने के— पर मैं दृढ़ रहा। जब मेरा जप समाप्त हुआ, तो मैंने पहले से ही मंगाई हुई गुलाब की पुष्पों की माला उसे पहना दी—-
‘मैं तुमसे प्रसन्न हूं। तुमने मुझे सिद्ध किया है, अतः मैं तुम्हारा वरण करती हूं और वादा करती हूं, कि सदैव तुम्हारी सहयोगिनी रहूंगी, दिन में एक बार स्वतः शाम को उपस्थित होऊंगी और तुम्हारा हर प्रकार से ख्याल रखूंगी’ — और ऐसा कहते-कहते उस दिव्य सुन्दरी ने वहां दूसरी रखी माला मुझे पहना दी—
मेरी आकांक्षा पूर्ण हो चुकी थी, मुझे एक विश्वसनीय साथी, एक सहगामिनी प्राप्त हो गई थी, जिसकी वजह से मुझे स्वतः ही मान, सम्मान, यश, श्री एवं प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। परेशानियों में वह मुझे एक मंत्री की तरह सलाह मशवरा देती, मेरा आत्मबल बढ़ाती, मित्र की भांति सुख-दुःख में मेरा साथ देती, तो एक प्रेयसी के रूप में मुझे प्रेम प्रदान करती—
चन्द्रज्योत्सना ने ही मेरे विवाह के लिए उपयुक्त स्त्री खोजी, वह मेरी हर मुश्किल को आसान कर देती। अधिकारियों के आगे जो कुछ मैंने कहा उन्होंने माना, क्योंकि साधना के उपरान्त मेरे अन्दर स्वतः ही एक अत्यन्त तीव्र सम्मोहन आ गया था और जो भी मेरी तरफ़ एक बार देख लेता, वह मेरे करीब आने को लालायित हो जाता—
इसी तरह दस साल बीते, मेरे दो पुत्र हुए— फि़र बीस साल और तीस साल— परन्तु वृद्ध होने के बावजूद भी मैं आज 30-35 साल के युवक से ज्यादा नहीं दिखता— लोग आश्चर्य करते हैं, परन्तु यह रहस्य मैंने आज तक किसी के सामने नहीं खोला, अपने पुत्रों एवं पत्नी के आगे भी नहीं।
हर शाम मैं बेसब्री से उसका इंतजार करता हूं एवं उसके सुखद आगोश में कुछ घंटे व्यतीत करता हूं, वह भी अपने वचनानुसार नित्य मेरे पास आती है। एक दिन भी मुझे ऐसा स्मरण नहीं, कि वह न आई हो—- और आज जब मैं आयु की उस अवस्था में, जब मेरी पत्नी देह त्याग चुकी है और मेरे पुत्र भी विदेशों में अपनी-अपनी गृहस्थियों में मग्न है, वह आज भी नित्य आती है।
यह साधना अप्सरा साधनाओं में श्रेष्ठ एवं अद्वितीय है, इसको सम्पन्न करने हेतु साधक को कुछ बातें विशेष रूप से ध्यान में रखनी चिाहए, जो कि निम्न है –
1 यह साधना किसी भी शुक्रवार से प्रारम्भ की जा सकती है।
2 यह पांच दिवसीय रात्रिकालीन साधना है, अतः साधक को रात्रि दस बजे से साधना प्रारम्भ करनी चाहिए। हर दिन साधना उसी समय शुरु करनी चाहिए।
3 इस साधना में पीला आसन उपयोग में लाया जाना चाहिए, साधक स्वयं भी स्वच्छ एवं सुन्दर वस्त्र धारण करें, गुलाब का इत्र लगाए और उत्तर दिशा की ओर मुंह कर जप करें।
4 इस साधना में मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठित ‘सौन्दर्य चैतन्य यंत्र’ एवं ‘चन्द्रज्योत्सना अप्सरा माला’ की आवश्यकता होती है, अतः साधक को इनकी व्यवस्था कर लेनी चाहिए।
5 बाहर की चीजों को भोजन रूप में ग्रहण न करें।
6 तीसरे दिन पहले से ही गुलाब की दो मालाएं मंगा कर साधना के दौरान पास में रख लेनी चाहिए।
7 साधक अपने समक्ष बाजोट पर पीलें रंग का वस्त्र बिछाएं तथा उस पर कुंकुंम से रंगे चावलों से अष्टदल कमल बनायें। कमल के मधय में ‘सौन्दर्य चैतन्य यंत्र’ स्थापित करे। यंत्र पर कुंकुंम, अक्षत, इत्र तथा पुष्प चढ़ाएं।
8 घी का दीपक लगाएं, दीपक में भी इत्र की कुछ बूंदे डाल दें। सुगंधित अगरबत्ती का उपयोग करें।
9 ‘चन्द्रज्योत्सना अप्सरा माला’ से पांच दिन तक ग्यारह माला निम्न मंत्र जप करें –
10 नित्य मंत्र जप समाप्त होने के बाद माला को यंत्र के ऊपर रखें।
11 पांचवे दिन जब अप्सरा प्रत्यक्ष हो, तो उसे गुलाब के पुष्पों की एक माला पहना दें।
12 साधना समाप्ति के अगले दिन यंत्र तथा माला नदी में प्रवाहित कर दें।
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