





माता वैष्णो देवी का प्रसिद्ध तेजमय दिव्यतम मूर्तरूप आर्यावर्त का एक प्रमुख तीर्थ स्थल होने के साथ-साथ 52 शक्तिपीठों में श्रेष्ठ मानी जाती है। मान्यता है कि यहां पर मां सती का हाथ गिरा था। मां वैष्णो देवी की गफ़ुा में महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती पिंडी रूप में स्थापित हैं।
पुराणों के अनुसार एक गरीब श्रीधर नामक ब्राह्मण माता के परम भक्तों में से एक था। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर एक दिन माता तथा अन्य देवियों के साथ उसके सामने बालिका रुप में प्रकट हुईं तथा उसे कहा कि वह उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर वहां उपस्थित हुईं हैं और उसकी पूजा की पूर्ति के फ़लस्वरूप वहां आईं है। इस पर श्रीधर अत्यन्त प्रसन्न हुआ तथा माता की पूजा से प्रसन्न होकर मां ने आशीर्वाद दिया कि वह भण्डारा का आयोजन करें।
अगले दिन सारा गांव जब आने लगा तो श्रीधर को यह चिंता सताने लगी कि उसने उस दिव्य बालिका की बातों से प्रेरित होकर सारे गांव को बुला तो लिया है पर इतने लोगों को वह कैसे खिला पाएगा, उसके घर में तो एक अन्न का दाना भी नहीं है। खिलाना तो दूर, वह तो इतने लोगों को अपने घर में बिठा भी नहीं सकता!
तभी मां वहां बालिका के रुप में पुनः उपस्थित हईं और कहा कि तू क्यों घबरा रहा है, सब को अंदर तो बुला।
तभी वहां भैरवनाथ आ पहुंचा। भैरवनाथ अपने 360 शिष्यों के साथ हर हर महादेव का नारा लगाते हुए पहुंचा। श्रीधर का उपहास करते हुए भैरवनाथ ने कहा, मूर्ख तुझे मालूम नहीं कि हमें तो स्वयं देवराज इंद्र भी भोजन नहीं करा सकते, फि़र तुझ जैसे गरीब ब्राह्मण की क्या औकात ? यह सुनकर श्रीधर ने शांत चित होकर कहा, प्रभु मेरी क्या बिसात कि मैं आपको भोजन करा सकूं। यह सब तो मैंने उस दिव्य कन्या के कहने पर किया है। यह सुनते ही भैरवनाथ ने अकड़ कर कहा कि कहां है वह दिव्य कन्या ? इतने में मां बालिका रुप में वहां उपस्थित हो गई और कहा, मैं यहां हूं भैरव नाथ! भैरवनाथ उस बालिका को पकड़ने के लिए जैसे ही आगे बड़ा तो देवी अन्तधर्यान हो गयी। अपने योग बल से भैरवनाथ ने यह देखा कि वह दिव्य बालिका त्रिकूट पर्वत की ओर जा रही है। भैरवनाथ अपने योग बल से उनका पीछा करता हुआ उस पर्वत पर जा पहुंचा। भैरवनाथ को आता देखकर मां एक गफ़ुा में ध्यानमग्न हो गईं। भैरवनाथ नौ महीनों तक उन्हीं जंगलों में भटकता रहा। आखिरकार उसे वह गफ़ुा मिल ही गई जिसमें मां ध्यानमग्न थीं।
भैरवनाथ को आता देख माता ध्यान से जाग उठीं और गफ़ुा से दूर जाने लगीं। मां के मना करने के बाद भी भैरवनाथ ने मां का पीछा नहीं छोड़ा। क्रोधिात हो मां ने शत्रुसंहारक चण्डी रुप धारण किया जिसे देख कर भैरवनाथ कांप उठा। मां ने भैरवनाथ पर अपने त्रिशूल से वार किया और उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। वह मां से क्षमा याचना करते हुए बोला, हे मां! मुझे माफ़ं कर दो। भला पुत्र के कपूत होने पर माता कुमाता तो नहीं हो जाती। मुझे क्षमा करो मां!
भैरवनाथ की करुणामयी विनती से मां का हृदय भर आया और उसे आशीर्वाद देते हुए अमरता का वरदान प्रदान किया और कहा कि जिस जगह तेरा शिश गिरा है, वहां तेरे मंदिर की स्थापना होगी। जो भी भक्त मेरे दर्शन को आएगा, उसकी यात्रा तभी पूर्ण तथा सफ़ल होगी जब वह मेरे दर्शन के बाद तेरे भी दर्शन करेगा। आज भी माता वैष्णों देवी के मंदिर से मात्र कुछ दूरी पर भैरव मंदिर स्थित है और लोग मां के दर्शन के उपरान्त भैरव के दर्शन कर ही अपनी यात्रा को पूर्णता प्रदान करते हैं।
ऐसी ही चेतनामय दिव्य शक्तिपीठ तीर्थमय स्थान पर सद्गुरूदेव निखिलेश्वरानन्द जी के आह्वान पर महाकाली महासरस्वती और महालक्ष्मी के त्रिगुणात्मक स्वरूप में मन्जुल महोत्सव साधनात्मक शिविर का आयोजन किया गया है। इस साधना शिविर में वे ही साधक भाग लें जो अपने आपको पूर्ण रूपेण त्रिशक्ति से आप्लावित करने की धारणा रखते हैं। जिससे कि दैहिक दैविक तापों से मुक्त हो सकें, ज्ञान बुद्धि और चेतना से अपने आपको संसार में स्थापित कर सके और विश्वामित्र की चेरी के रूप में महालक्ष्मी को धारित कर सके।
इस मन्जुल महोत्सव में भाग लेने के लिए रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य है। पंजीयन कराने पर कटरा (जम्मू) में त्रिशक्ति भाव को आत्मसात करने के लिए ध्यान, योग, साधना प्रदान की जायेगी। उसके बाद दूसरे दिन गुरूदेव के सान्निधय में कदम ताल मिलाते हुए माता वैष्णोदेवी के दर्शनों की अभिलाषा रखते हुए यात्रा प्रारंभ होगी। छः सात घण्टे की यात्रा के बाद माता के दरबार में पहॅुंचने पर अपने आपको शुद्ध स्वच्छता से युक्त कर त्रिशक्ति पिण्ड के दर्शन गुरूदेव के सान्निधय में संपन्न कर महाकाली महासरस्वती महालक्ष्मी से युक्त त्रिशक्ति दीक्षा प्रदान की जायेगी साथ ही विश्वप्रणीत लक्ष्मी माला गुरूदेव द्वारा धारण करायी जायेगी। थोड़े विश्राम के बाद भैरवनाथ मन्दिर प्रांगण में कालभैरव चैतन्य शक्ति दीक्षा प्राप्त होगी और गुरूदेव के सान्निधय में पुनः कटरा में प्रत्यागमन होते हुए घर को लौटेंगे।
शुल्क राशि कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर अथवा गुरूधाम दिल्ली में व्यक्तिगत रूप से जमा कराऐं अथवा ड्राफ्ट् भेज कर पंजीकरण कराना होगा। (पंजीकरण शुल्क: 4300/-)
ऐसी देवभूमि पर गुरूदेव का सान्निधय हो और सद्गुरूदेव का मन्जुल महोत्सव का दिव्यतम अवसर हो। ऐसी बेला में समर्पित साधक और शिष्य की समस्त इच्छाऐं निश्चिन्त रूप से पूर्ण होती ही हैं।
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