





विश्व की धरोहर हिमालय की गोद में जहाँ सरस्वती का उद्गम स्थल है और जहां से कैलाश मानसरोवर की यात्रा प्रारम्भ होती है। ऐसे दिव्य स्थल पर सप्त पुरीयों में सर्वश्रेष्ठ बद्रीनाथ धाम है। भारत की पवित्र भूमि में पूर्व में जगन्नाथ पुरी, पश्चिम में द्वारिका पुरी, दक्षिण में रामेश्वरम् और उत्तर में बद्रीनाथ धाम स्थित है। हिमालय की धवल हिम श्रृंखलाऐं, फूलों की घाटी और अद्भुत दिव्य अलौकिक शांति, सम्मोहित साधनात्मक वातावरण ने देवताओं और ऋषियों तथा संन्यासियों को भी सदैव-सदैव आकर्षित किया है।
श्री बद्रीनाथ धाम में भगवान बद्रीनाथ का पवित्र मंदिर चतुर्भुजाकार में भगवान विष्णु की मूर्ति शालीग्राम से बनी है। द्वापर युग, त्रेता युग, सतयुग से और कलियुग में भी बद्रीनाथ धाम पूर्ण योग सिद्धि प्रदान करता रहा है। यहां बद्रीनारायण, विष्णु-लक्ष्मी की पूर्वाभिमुखी मूर्ति है। यहां भगवान नारायण ने नारद ऋषि को मूल मंत्र का उपदेश दिया। इसी से प्रेरित होकर देवरूपी वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों की रचना की। जोशीमठ में नृसिंह भगवान का मंदिर हैं यहाँ शालिग्राम-शिला में भगवान नृसिंह की अद्भुत मूर्ति है।
जब पुजारी निर्वाण समय के दर्शन कराते है, तब भली-भांति दर्शन होता है। भगवान नृसिंह की एक भुजा बहुत पतली है और लगता है कि पूजा करते समय वह मूर्ति से कभी भी अलग हो सकती है। कहा जाता है कि जिस दिन यह हाथ अलग होगा, उसी दिन विष्णुप्रयाग से आगे नर-नारायण पर्वत मिल जायेगा और बद्रीनाथ का मार्ग बंद हो जाता है। और उसी दिन से से कोई बद्रीनाथ नहीं जा पायेंगा।
श्री बद्रीनाथ जी की मूर्ति पहली बार देवताओं ने अलकनन्दा में नारदकुण्ड से निकालकर स्थापित कि यह बद्रीनाथ जी की मूर्ति शालिग्राम शिला से बनी ध्यानमग्न चतुर्भुज है। बद्रीनाथ जी की मूर्ति मलेछों के कारण फिर नारदकुण्ड में छिपा दी गई थी। उसके पश्चात् आद्यशंकराचार्य जी ने पुनः बद्रीनाथ जी की मूर्ति नारदकुण्ड से निकाल कर स्थापित की थी और पूजा पद्धति प्रारम्भ की। बद्रीनाथ की अलकनन्दा में स्नान करना अत्यन्त कठिन है यहा तो केवल अलकनन्दा के दर्शन ही किया जा सकते है।
भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म में मनुष्यों के देह त्याग के बाद जो पिण्ड दान की प्रक्रिया गया (बिहार) में की जाती है। उससे भी श्रेष्ठ हम अपने पूर्वजों का पिण्ड दान भागीरथी और सरस्वती में करें जहां कपाल कुण्ड स्थल है। उसमें करने से मृत आत्मायें भटकती नहीं है और निश्चित रूप से मोक्ष को प्राप्त होती है। साथ ही सशरीर रूप में सिद्धाश्रम में प्रवेश करती है। क्योंकि प्रत्येक मनुष्य का यह ध्येय रहना चाहिए कि अपने पूर्वजों की आत्मा को सिद्धाश्रम में स्थापित करें। यही ब्रह्मकपाल तीर्थ है जिसको (कपाल-मोचन) भी कहते है। कहते है कि शंकर जी ने जब ब्रह्मा का पाँचवा मस्तक कटुभाषी होने के दोष के कारण काटा, तब वह उनके हाथ में ही चिपक गया। जब समस्त तीर्थों में घूमते शंकर जी यहाँ आये, तब वह कटा हाथ स्वतः छूटकर गिर पड़ा। इस ब्रह्मकपाली तीर्थ के नीचे ही ब्रह्मकुण्ड है यही पर ब्रह्मा जी ने तपस्या की थी। बद्रीनारायण धाम की भूमि योग, ध्यान और तपस्या के लिए श्रेष्ठतम है। माता लक्ष्मी भगवान बद्री के साथ में श्रृंगारिक मुद्रा में स्थित है। माता लक्ष्मी की पूजा विष्णु भगवान की पत्नी वामांगी हृदय में स्थित देवी शक्ति के रूप में सम्पन्न होती है।
आर्य संस्कृति में प्रारम्भ में ही मनुष्य की इच्छा रही है कि वह अपने जीवन को श्रेष्ठमय और भैतिक तथा आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्ति के लिए आर्यावृत में स्थित चार धाम बद्रीनाथ, द्वारिका, रामेश्वरम् और पुरी में से एक धाम में जीवन के कुछ क्षण इस तरह के निकाले जिससे की उस दिव्य स्थान में गुरु की छत्रर-छाया में रह कर जीवन की मलिनता और दूषितता को समाप्त कर सके। जिससे कि वह अनेक-अनेक पापों से तथा दुर्भिक्षता और दुःखो से युक्त जीवन से पूर्ण विर्निमुक्त हो सके और हर दृष्टि से जीवन में पुण्योदय और भाग्योदय जाग्रत हो सके। ऐसे ही श्रेष्ठमय उपलब्धियों को प्राप्त करने तथा इच्छाओं की पूर्णता के लिए सद्गुरुदेव निखिलेश्वरानन्द जी महाराज के आज्ञानुसार और सैकड़ों साधकों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए ऐसी दिव्य तपो भूमि पर 21 अक्टूबर से 27 अक्टूबर तक सप्त-दिवसीय साधानात्मक शिविर का आयोजन सम्भव किया गया है जिससे कि इन सात दिवसों में साधक सप्त-पुरीयों को पूर्णता से आत्मसात कर सकें इन साधना दिवसों में सर्व पूर्व-जन्म कृत पाप मोचनी दोष निवारण साधना, कुबेर वैभव लक्ष्मी साधना, अहम ब्रह्मास्मी सहस्त्रार चक्र जागरण साधना सम्पन्न होगी। समयबद्ध कार्यक्रम के तहत नित्य प्रतिदिन योगा, प्राणायाम, मंत्र जाप, दीक्षा, पूजन, हवन, अभिषेक और पवित्र दिव्य अलौकिक स्थानों का भ्रमण किया जायेगा।
नारायण का तात्पर्य साधक या शिष्य जो कि नर के रूप में इस संसार में आकर थूक, मज्जा, रक्त और रस से युक्त यह देह को हम ईश्वरमय बना सके, नारायणमय, ब्रह्ममय बना सके। जिससे कि जीवन में अहम ब्रह्मास्मी का पूर्ण चिन्तन भाव आ सके अर्थात इस सृष्टि में जो कुछ भी हूं वह मैं ही हूं मेरे भीतर ही ब्रह्म का भाव है, नारायण का भाव है और इसी चिन्तन के फलस्वरूप जीवन को आनन्द विलास भोग योग, भौतिक आध्यात्मिक सभी दृष्टियों से यह सांसारिक देह पूर्णमद पूर्णमिदः से युक्त नर से नारायण बना सके। भगवान में या गुरु में आस्था नहीं हो, जो तर्क-कुतर्क करता हो, नियमित रूप से पूजा-अर्चना नहीं करता हो, जिसके पास स्वयं का दिमाग ज्ञान बुद्धि नहीं हो, जो पूर्णतया नास्तिक हो, ढुल-मुल नीति पर चलते हो, हर कार्य या क्रिया में मीन-मेख निकालने का हर समय भाव हो, ऐसे व्यक्ति शिविर में नहीं आये।
अपने साथ जो भी व्यक्ति-मित्र, माता-पिता, पुत्र-पुत्री आए उनका पंजीकरण अवश्य कराए जिससे कि आप सभी का जीवन ब्रह्म-शक्ति जो कि सृष्टि के रचियता है आप भी उसी ब्रह्मस्वरूप में अपने परिवार के श्रेष्ठ रचियता बन सके इसके लिए आवश्यक है कि पहले स्वयं का भीतरी और बाहरी देह पूर्ण शुद्धिकरण हो सके, इस शुद्धता के बाद ही जो भी आप साधना पूजन करेंगे तब ही कुबेर वैभव लक्ष्मी युक्त, सहस्त्रार चक्र जागरण की प्राप्ति हो सकेगी और जीवन की दूषितता और मलिनता समाप्त हो सकेंगी। लक्ष्मी विष्णु के बिना अधूरी हैं जैसे शक्ति के बिना शिव पूर्ण नहीं हैं इसीलिए शिव-शक्ति और विष्णु-लक्ष्मी रूप में पति-पत्नी को साथ-साथ यात्रा और साधना करने पर ही उसका फल तीव्रता से मिलना प्रारम्भ होता हैं। अपने साथ आने वाले परिवार के सभी सदस्यों और मित्रों का पंजीकरण आवश्यक है।
आप के जीवन में सर्वथा पहली बार ऐसा दिव्यतम साधनात्मक कार्यक्रम सद्गुरुदेव के आशीर्वाद से सम्पन्न हो रहा है, इसीलिए वे ही साधक-साधिकाएं इस शिविर में आये जो कि अपने जीवन को न्यून से उच्चतम बनाना चाहते है, प्रत्येक साधक-साधिका का पंजीकरण आवश्यक है 25 वर्ष से 65 वर्ष तक के शिष्य ही इस साधना शिविर में आये साथ ही आवश्यक है कि प्रत्येक साधक-साधिका अपने माता-पिता अथवा बुर्जुगों से आज्ञा लेकर ही शिविर का पंजीकरण कराये।
25 वर्ष से कम उम्र के बालक-बालिकाओं का शिविर में पंजीकरण नहीं किया जायेगा।
20 अक्टूबर 2013 रविवार को सायं काल तक हरिद्वार पहुँचना अनिवार्य है।
20 अक्टूबर 2013 को मध्य रात्रि में ही हरिद्वार से बद्रीनाथ की यात्रा बस द्वारा प्रारंभ की जायेगी।
हरिद्वार में ठहरने की कोई व्यवस्था गुरुदेव के कार्यकर्ताओं द्वारा सम्भव नहीं हो सकेगी इसी लिए आप इस तरह की व्यवस्था करे की 20 अक्टूबर की सायं तक हरिद्वार पहुंच सके और अपनी ही स्वयं की व्यवस्था से निवृत होकर निर्धारित स्थान पर पहुंच कर शुभ एवं पूर्ण फलदायी साधनात्मक यात्रा के लिए समय पर प्रस्थान कर सके।
बहिन, बेटियां माताऐं किसी भी स्थिति में अकेली नहीं आऐं। बीमार, असक्त, सामान्य या क्लीष्ट रोगी इस शिविर में भाग नहीं लें। डाक्टर की कोई भी व्यवस्था नहीं हैं।
मौसम ठंडा रहने के फलस्वरूप गर्म कपड़े अवश्य लाये।
मौसम की खराबी अथवा वाहन की खराबी होने पर यात्रा में देरी हो सकती है साथ ही कोई घटना या दुर्घटना की पूर्ण जिम्मेदारी यात्री अथवा साधक की स्वयं की होगी।
बद्रीनाथ में ठहरने की व्यवस्था DORMITORY अर्थात् हॉल में सामूहिक रूप से ही की गई है। सात्विक प्रसाद और भोजन की व्यवस्था गुरुदेव द्वारा प्रदान की जायेगी।
हेमन्त ऋतु के प्रारम्भ पर साधना नियोजित रूप से प्रारम्भ हो सकेंगी।
22 अक्टूबर को करवा चौथ दिवस पर बहिन, बेटिओं माताओं के लिए फलाहार की व्यवस्था की जायेगी।
27 अक्टूबर को प्रातः बेला में पुनः बद्रीनाथ से हरिद्वार को लौटने की यात्रा प्रारम्भ होगी पूर्व में ही ऐसी व्यवस्था कर आये उसी दिन रात्रि में सीधे घर को प्रस्थान कर सकें जिससे की गुरुदेव के सानिध्य में जो साधना, योगा, प्राणायाम, मंत्र जाप, पूजन, हवन, दीक्षा अभिषेक और पवित्र दिव्य अलौकिक स्थानों का भ्रमण किया है उसका पूरा लाभ आप को जीवन भर अक्षुण्ण बना रहे इसीलिए इधर-उधर ना भटक कर सीधे घर को लौटना श्रेयष्कर रहता है।
वे ही पंजीकरण करवायें जो अपनी स्वयं की बुद्धि-ज्ञान और विवेक से जीवन में कर्मशील रहते है अपने आपको दैवीय शक्ति से युक्त करना चाहते है। पूर्व में ही पंजीकरण अनिवार्य हैं। जिससे की आप ही से सम्बन्धित साधना सामग्री मंत्र सिद्ध चैतन्य की जा सकें।
(पंजीकरण शुल्क: 21000/-) (Rs. Twenty One Thousand Only)
इस पंजीकरण शुल्क में हरिद्वार से बद्रीनाथ की यात्रा बस द्वारा, बद्रीनाथ में DORMITORY अर्थात हॉल में सामूहिक रूप से ठहरने की व्यवस्था, सात्विक भोजन-प्रसाद, साधना सामग्री पूजन हवन, अभिषेक, दीक्षा, पवित्र स्थानों का भ्रमण साथ ही बस द्वारा बद्रीनाथ से हरिद्वार की यात्रा का शुल्क सम्मिलित हैं।
न्यौछावर राशि भेजने के लिए आप ‘प्राचीन मंत्र यंत्र विज्ञान’, “Pracheen Mantra Yantra
Vigyan” Jodhpur के नाम का ड्रॉफ्रट अथवा आप चाहे तो उक्त राशि स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, यूआई- टी-, जोधपुर ‘‘प्राचीन मंत्र यंत्र विज्ञान’’ खाता क्रमांक 31763681638 अथवा स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया, यू-आई-टी-, जोधपुर ‘‘कैलाशचन्द्र श्रीमाली’’ खाता क्रमांक 31706102525 में भेज कर भी लाभ प्राप्त कर सकते है। उक्त नाम से अपने वहां की बैंक शाखा में जमा करवा कर PAY IN SLIP की कॉपी भिजवा सकते हैं। पंजीकरण शुल्क आप सीधे अपने वहां के बैंक में जमा करा सकते हैं। बैंक ट्रांसफर का चालान नं- sms अथवा फैक्स करने पर पंजीकरण स्वीकार कर लिया जाएगा। न्यौछावर राशि बैक ट्रांसफर करने पर उसी दिन कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर कार्यलय में मोबाइल नम्बर पर अपना पूरा पता लिखवा दें। आप प्राचीन मंत्र-यंत्र विज्ञान जोधपुर कार्यालय के फोन न- 0291-2517025 अथवा मोबाइल नं- 07568939648, 08769442398 पर सम्पर्क कर विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
अहम ब्रह्मास्मी सहस्त्रहार चक्र जागरण, कुबेर वैभव लक्ष्मी साधना शिविर में भाग लेने वाले प्रत्येक साधक-साधिका को साधना सफ़लता विजय चिन्ह (MEMENTO) गुरुदेव द्वारा सम्मानित कर प्रदान किया जायेगा।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,