





सच्चिदानन्दरूपाय विश्वोत्पत्त्यादिहेतवे।
तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्ण वयं नुमः।।
सत्-चित, आनन्दस्वरूप, विश्व की उत्पत्ति, पालन एवं संहार के कारण भूत तथा दैहिक, दैविक और भौतिक पाप-दोषों के विनाशक, श्रीकृष्ण की हम वन्दना करते हैं।
भगवान श्री कृष्ण के साथ हमेशा राधा की की उपस्थिती मानी जाती है। जहां भी कृष्ण के साथ श्री का प्रयोग होता है वहां श्री राधा जी विद्यमान रहती हैं। श्रिया सहितः कृष्णः- श्रीकृष्णः। श्री रूप तो श्री राधा जी ही हैं, क्योंकि इस श्लोक में राधा सहित श्रीकृष्ण को प्रणाम ही अभिधेय है। श्री कृष्ण आन्नदस्वरूप हैं। वैष्णव सन्तों ने सत् से वृन्दावन धाम, चित से चित्स्वरूप श्री कृष्ण की लीला की परम सहायिका योगमाया और आनन्द से श्री कृष्ण की शक्ति श्री राधा को व्याख्यायित किया है। भाव यह है कि नित्य वृन्दावन धाम , नित्य योगमाया और नित्य श्री राधिका ही हैं, जिनकी लीला सदैव नित्य संचालित होती है।
‘रासे संभूय गोलोके या दधाव हरेः पुरा।’
गोलोक में श्री कृष्ण समीप पहुँची, वे राधा के रूप में प्रख्यात हुई।
श्रीमद्भागवत गीता के रचनाकार वेदव्यास जी ने राधा या अन्य किसी भी गोपी का नाम उल्लेख नहीं किया है ‘अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः’ यहां राधा का नाम संकेत किया है। राधा नाम का उल्लेख न करने के कारण व्यास जी स्वयं जानते थे कि राधा जी उनके पुत्र की परमगुरु एवं आराध्य हैं। यदि उनका नाम उल्लेख होता तो भगवान शुकदेव जी को समाधि लग जाती। तो फिर कैसे आगे बढ़ती भगवत कथा और कैसे होता राजा परीक्षित का उद्धार क्योंकि-
‘राधास्मरणमात्रेण मूर्च्छा षाण्मासिकी भवेत’
यदि कथाकार शुकदेव जी को छः महिने की मूर्च्छा आ जाती तो तब तक तक्षक अपना कार्य पूर्ण कर लेता। कैसे होती परीक्षित के बहाने कोटि-कोटि जनों को मृत्यु से निर्भयता की प्राप्ति? अतः भागवत में राधा का नाम उल्लेख नहीं किया गया।
श्री कृष्ण की प्रेम स्वरूपा
श्री राधा का समर्पण भाव
एक बार भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं के प्रति श्री राधा के समर्पण भाव और प्रेम को जगत में जाहिर करने के लिये झूठी बीमारी का बहाना किया। अनेक उपचारों के द्वारा भी रोग का निदान नहीं हुआ, दवा तो रोग की होती है, झूठे बहाने की नहीं। देवर्षि नारद जी भगवान की स्वास्थ्य की जानकारी के लिये उपस्थित हुए तो भगवान श्री कृष्ण ने बताया कि मेरा रोग सामान्य औषधि के ग्रहण करने से नहीं जा सकता, उसके लिये तो मेरे किसी समर्पित भक्तजन प्रेमी की चरणधूलि को मलने से मेरी पीड़ा ठीक हो सकती है।
आप कृप्या मेरे किसी प्रेमी भक्त की चरणधूलि ला दीजिये। नारद जी ने सोचा कि श्री कृष्ण तो वृन्दावन में निवास करते है अतः नारद जी स्वयं वृन्दावन पहुंचे और सभी गोप-गोपियों से अपनी चरणधूलि प्रदान करने के लिये कहा, किन्तु कोई भी अपनी चरणधूलि भगवान को देकर नरक भोगने को तैयार नहीं हुई। अन्त में यह बात श्री राधा जी के पास पहुंची तो वे तुरन्त अपनी चरणधूलि देने को तैयार हो गई। उन्होंने कहा कि यदि मेरे प्रियतम को मेरी चरणधूलि थोड़ा भी सुख प्राप्त होता है तो मैं एक बार नहीं हजार बार चरणधूलि देने को तैयार हूं, फिर चाहे मुझे जन्म-जन्मान्तर के लिये नरक की कठोरतम वेदना ही क्यों न सहन करनी पडे़।
यही श्री राधा का कृष्ण के प्रति सुखित्व का प्रेम स्पद के सुख में स्वसुख वांछा का भाव। इसी प्रकार सूर्य ग्रहण के समय समस्त ब्रजवासी कुरूक्षेत्र में स्नानार्थ गये, जिसमें समस्त गोप-गोपियां और स्वयं राधाजी भी थीं। उधर द्वारका से भी समस्त द्वारका-निवासी जन और स्वयं श्री कृष्ण अपनी रानियों-पटरानियों के साथ उस स्थान पर पहुंचे। श्री रुक्मिणी जी को जब यह मालूम हुआ कि श्री वृन्दावन से हमारे पति की सहचरी श्री राधा जी भी आई हुई हैं तो उन्होंने राधा जी को अपने निजी महल का मेहमान बनाया एवं सब प्रकार के आतिथ्य का उत्तरदायित्व स्वीकार किया। अन्य सभी सेवा के साथ वे रात्रि-विश्राम के समय स्वयं अपने हाथों से उन्हें दूध पिलाया करती थीं। एक दिन रात्रि में श्री कृष्ण पादसंवाहन करते हुए श्री रुक्मिणी जी ने उनके चरणों में कुछ फफोले देखे तो वे आश्चर्यचकित हो गयीं, वे बार-बार श्री कृष्ण के चरणों में उभरे फफोलों के विषय में प्रश्न करने लगीं। अन्त में श्री कृष्ण ने जो उतर दिया, वह आश्चर्यजनक था। वे रुक्मिणी जी से बोले कि आज कदाचित तुमने राधा जी को अधिक गर्म दूध पिला दिया है अतः ये फफोले पड़ गये। श्री रुक्मिणी जी कुछ समझ न पाई और बोली कि राधा जी को गर्म दूध पिलाने और आपके चरणों में फफोलों से क्या सम्बन्ध? स्पष्टता बताइये, बहाना क्यों कर रहे हैं तब श्री कृष्ण ने कहा कि श्री राधा के हृदयारविन्द में मेरे चरणारविन्द विराजित रहते हैं और तुमने उन्हें अधिक गर्म दूध पिला दिया, जिससे मेरे चरणों में फफोलें पड़ गये।
श्री राधिकाया हृदयारविन्दे पादारविन्दं हि विराजते मे।
अहर्निशं प्रश्रयपाशबद्धं लवं लवार्द्ध न चलतयतीव।।
अद्योष्णदुग्धाप्रतिपानतोंघ्रा-वुच्छालकास्ते मम प्रोच्छलन्ति।
मन्दोष्णमेंव हि न दत्तमस्यै युष्माभिरूष्णं तु पयः प्रदत्तम्।।
श्री राधा का श्री कृष्ण के प्रति समर्पण भाव ऐसा था। श्री राधा जी के जीवन में सर्वाधिक भक्ति के भाव जाग्रत थे, जो आजतक किसी भक्त में नहीं पाये गये। स्वसुख-वांछाविरहित केवल कृष्णैक सुखस्वरूपा श्री राधा जी का चिन्तन।
निश्चल, निःस्वार्थ, सर्वस्व समर्पित भावना से अभिभूत हृदय वाली श्री राधा जी ही थीं। भक्ति की अविरल धारा श्री राधा। यही कारण है कि जहां श्रीराधा हैं वहीं श्री कृष्ण, जहां श्री कृष्ण हैं वहीं श्री राधा! राधा की बात तो जाने दीजिये, राधा शब्द में यदि ‘र’ न होता तो क्या होता, देखिये।
राधेा कै रकार जो न होतो राधेश्याम माहि।
मेरे जान राधेश्याम आधेश्याम रहते।।
मेरे भव बाधा हरो, राधा नागरि सोय।
जा तन की झांई परे स्याम हरित दुति होय।।
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