





सिद्धाश्रम स्थित योगीराज गुणातीतानन्द जिन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन को केवल ललिता साधना में ही संलग्न कर एक ऐसी पद्धति खोज निकाली जो एक गृहस्थ द्वारा भी उतनी ही सहजता से अपनाई जा सकती है जिस प्रकार से किसी संन्यासी साधक द्वारा और बिना दुष्प्रभाव या तीव्रता के जीवन के सभी मनोवांछित कार्य मां भगवती जगदम्बा की ललिता स्वरूप में समाहित तीक्ष्ण शक्ति से सम्पन्न की जा सकती हैं।
आठ पीठ शक्तियों में रक्षात्मक, धनदायक, रोगनिवारक, शत्रु निवारक जैसी शक्तियां आठ रूपों में विभाजित हैं। इस ललिताम्बा यंत्र की स्थापना मात्र ही अपने-आप में दुर्गति का विनाश करने वाली कही गई है।
जिस प्रकार से एक बालक कष्ट में होने पर कभी भी अपनी मां को पुकार सकता है, यह साधना भी ठीक ऐसी ही पुकार है। वस्त्र पीले ही हो। पीले वस्त्र पहन कर साधक पूर्वाभिमुख होकर बैठे और विशेष प्रभाव के लिए लाल गमछा धारण कर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठे।
इस साधना में इस विशिष्ट यंत्र का पूजन देवी की प्रत्येक शक्ति का ध्यान करते हुए और उसे अपने अंदर समाहित करने की प्रबल भावना रखते हुए अष्टगंध की आठ बिन्दियों द्वारा ही करनी होती है, साधक को चाहिए की वह ‘शक्ति सुन्दरी माला’ के द्वारा मूल चैतन्य मंत्र की एक माला मंत्र जप करें। वह मंत्र जो केवल इस विशेष महायंत्र से ही सम्बन्धित है।
यद्यपि मूल साधना तो एक दिन की ही है
फिर भी पूरे नवरात्रि पर्व पर साधक नित्य इस मंत्र की 11 माला मंत्र जाप नित्य करे तो ललिताम्बा देवी की समस्त षोडश कलापूर्ण शक्तियां उसे निरन्तर प्राप्त होती रहती है। प्रतिदिन इस यंत्र का दर्शन करें।
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