





जीवन के जटिल प्रश्नों में धर्म, दर्शन, मीमांसा और कई सम्प्रदायों से सम्बन्धित अनेकों प्रश्न हैं, परन्तु मूलभूत प्रश्न है- जीवन क्या है?- मृत्यु क्या है?- इस मृत्यु के बाद की स्थिति क्या है?- मृत्यु और जीवन के बीच की स्थिति क्या है?
ये प्रश्न वे हैं, जो प्रत्येक ज्ञानी मनुष्य के मन में उठते ही हैं, और जब वे प्रश्न व्यक्ति के मानस में उठते हैं, तो उसे चैन नहीं मिलता, जब तक कि उसे इनका उत्तर ज्ञात नहीं हो जाये। इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के लिए ही अनेकों ग्रंथ, उपनिषद् लिखे गये, फिर भी व्यक्ति संतुष्ठ नहीं हुआ— उसे ऐसा लगता, कि कहीं कुछ शेष बच रहा है, जहां तक मैं नहीं पहुंच पा रहा हूं— और यह शेष—यह खालीपन बाहर नहीं मेरे भीतर ही है— कैसे इस शेष को समझूं? कैसे इस खालीपन को भरूं?
और कठोपनिषद् में इन प्रश्नों से जूझने का प्रयत्न किया गया है। इसमें जीवन को जीने का तरीका सिखाया गया है। कठोपनिषद् में यह स्पष्ट किया गया है, कि मनुष्य के जीवन का क्या हेतु है, क्या प्रयोजन है, क्या लक्ष्य है? हमें जीवन किस प्रकार से जीना चाहिए? क्या हम जिस प्रकार से जीवन जी रहे हैं, वह जीवन है? या जो हम सांस ले रहे हैं, संतान पैदा कर रहे हैं, क्या इसको जीवन कहते हैं?
कठोपनिषद् कहता है-नहीं! यह जीवन नहीं है। जीवन तो बहुत बिरले ही लोग जी सकते हैं। लाखों में से एक या दो व्यक्ति ही जीवन जीने की कला जानते हैं और जिसने जीवन जीने की कला पहिचान ली, उसके जीवन में किसी प्रकार की न्यूनता रह ही नहीं सकती, क्योंकि वह उन प्रश्नों के समाधान की ओर अग्रसर हो जाता है, जिसको जीवन का आधार कहते हैं।
जीवन और मृत्यु नदी के दो छोर हैं। जहां जीवन है, वहां मृत्यु नहीं हो सकती, जहां मृत्यु है, वहां जीवन की कल्पना की ही नहीं जा सकती। जहां अधेरा है, वहां प्रकाश कैसे हो सकता है और जहां प्रकाश है, वहां अधेरा आ ही नहीं सकता। जीवन है, तो मृत्यु नहीं आ सकती—-और मृत्यु नहीं आ सकती, तो फिर हम समझ सकते हैं, कि जीवन का मूलभूत चिंतन—तथ्य क्या है? इसीलिए तो कठोपनिषद् को अद्वितीय उपनिषद् कहा गया है, क्योंकि उसमें उन प्रश्नों का विवेचन हुआ है, जो जीवन और मृत्यु जैसे अत्यन्त दुर्बोध व कठिन प्रश्नों को सुलझाने की ओर प्रेरित करते हैं। इन सारे प्रश्नों के उत्तर उठोपनिषद् में एक कहानी, एक कथा के माध्यम से स्पष्ट किये गए हैं। सामान्य आदमी सीधी-सादी बात समझता है, कठिन सूत्र समझने में उसे असुविधा होती है, जबकि कठोपनिषद् में प्रत्येक पंक्ति एक सूत्र रूप में है, जिसको समझने के लिए एक उच्चकोटि की विद्वता और उच्चकोटि का ज्ञान चाहिए।
सामान्य आदमी मूल कठोपनिषद् को समझ नहीं सकता, पढ़ तो सकता है, मगर उसके मर्म को नहीं समझ सकता, क्योंकि उसके मर्म को समझने के लिए उसी प्रकार की भावभूमि चाहिए, उसी प्रकार का ज्ञान चाहिए, उसी प्रकार का चिंतन, उसे स्वयं उस ऊंचाई पर पंहुचा हुआ ऋषि होना चाहिए, तभी वह स्वयं उस मर्म को समझ सकेगा, उस चिंतन को समझ सकेगा। महर्षि उद्दालक अत्यन्त श्रेष्ठ ऋर्षि हुए, राजा हुए- महान ऋर्षि और महान राजा भी। जो राजा हो सकता है, वह ऋर्षि भी हो सकता है। जो भोगी है, वह वैराग्य को भी समझ सकता है। जिसने वैराग्य को नहीं देखा, वह भोग को भी नहीं देख सकता। इसलिए उच्चकोटी के जितने भी चिंतक बने, कभी न कभी गृहस्थ बने।
-बुद्ध भी पहले भोगी थे, राजपुत्र थे, उसके बाद संन्यासी हुए और बुद्ध बन गए।
– महावीर राजपुत्र थे और फिर संन्यासी बन गए।
– शंकराचार्य को भी, मंडन मिश्र की पत्नी को पराजित करने के लिए परकाया प्रवेश द्वारा एक राजा के शरीर में रहते हुए गृहस्थ जीवन का अनुभव लेना पड़ा। जितने भी संन्यासी, योगी हुए उन्होंने जीवन के भोग को भी समझा, उन्होंने जीवन के संन्यास मार्ग को भी समझा और जाना, कि ये दोनों एक सिक्के के दो ही पहलू हैं, क्योंकि बिना भोग को समझे संन्यास समझा ही नहीं जा सकता।
– आखिर संन्यास क्या चीज है? – भोग की निवृत्ति, तृष्णाओं की निवृत्ति ही संन्यास है। -फिर वे भोग कौन-से हैं, जिनकी निवृत्ति हो?
इसे जानने के लिए जीवन मृत्यु को समझना जरूरी है, अगर जीवन को नहीं समझ सकते तो यह भी नहीं समझ सकते, कि मृत्यु क्या है? मृत्यु का स्वरूप क्या है? मृत्यु का सौन्दर्य क्या है? हम मृत्यु से कैसे आबद्ध होते हैं? मृत्यु के साथ कैसे समय व्यतीत कर सकते हैं?- और मृत्यु के साथ समय व्यतीत करने की कला छिपी है- कठोपनिषद् में——।
महर्षि उद्दालक ने ब्राह्मणों को एक लाख गाय दान करने का निर्णय किया। उसने मैदान में उन गायें को एकत्र किया, तभी उसका पुत्र नचिकेता वहां आया, नचिकेता ने उन गायों को देखा, छोटा-सा बालक— मगर छोटा सा बालक भी अपने-आप में पूर्ण ज्ञान रखने वाला व्यक्ति हो सकता है। कोई बालक नहीं होता, कोई वृद्ध नहीं होता। आयु और मन दोनों अलग-अलग चीज हैं। हो सकता है, कि किसी बालक की आयु पांच वर्ष की हो और मन की अवस्था, ज्ञान की अवस्था सौ साल हो। प्रहलाद की शारीरिक अवस्था तो पांच साल की थी, मगर उसके पास जो ज्ञान था, वह सौ साल का था, और ऐसे कई वृद्ध भी हैं, जिनकी आयु तो अस्सी साल की है, मगर उनका मन, उनका चिंतन अबोध बालकों जैसा है, इसलिए दोनों अलग-अलग अवस्थाएं हैं। यह जरूरी नहीं है कि पांच साल का बालक पांच साल की ही बुद्धि रखता हो। प्रत्येक बालक अपने-आप में वृद्धावस्था छिपाए हुए होता है। ठीक उसी तरह से एक वृद्ध के मन में भी एक बालक छिपा हुआ होता है, इसलिए साठ साल की आयु के बाद वृद्ध ठीक उसी प्रकार आचरण करने लग जाता है, जैसे बालक करता है।
-उस पांच साल के नचिकेता के मन मे अस्सी साल का ज्ञान बोल रहा था– उसने देखा और सोचा- मेरे पिता गायों का तो दान दे रहे हैं, मगर ये गायें अत्यन्त दुर्बल हैं, अत्यन्त कमजोर हैं, इनके दांत गिर गए हैं, इसके थनों में से दूध नहीं निकल सकता, दूध की एक-एक बूंद गायों के थनों से निकाली जा चुकी है। अब गायें उस हालत में पहुंच गई हैं कि यदि घर में रहती हैं, तो केवल चारा खाती हैं, पानी पीती हैं, मगर दूध नहीं दे सकतीं, क्योंकि ये अब वृद्ध हो गई हैं और ऐसी गायें ब्राह्मणों को दान दी जा रही हैं! नचिकेता सोचता है- इन गायों को दान देने से कैसे पुण्य प्राप्त होगा? दान में लेकर ब्राह्मण इन गायों से क्या प्राप्त करेंगे? जिनके थनों से दूध नहीं, उन गायों को लेकर वे ब्राह्मण करेंगे क्या?
-आखिर मेरे पिता इतने स्वार्थी क्यों हो गए हैं? एक बालक यदि अपने पिता के बारे में ऐसा सोचता है, तो उसका ज्ञान अस्सी साल की आयु के बराबर है। उद्दालक का चिंतन पन्द्रह साल के बालक के बराबर है, वह सोचता है- ये गायें मेरे घर में भार स्वरूप हैं। अब इन गायों को दान में देना चाहिए, जिससे कि मेरे घर से यह भार हटे, जिससे इसके स्थान पर मैं दूसरी और भरपूर दूध देने वाली गायें को ला सकूं— परन्तु नचिकेता तो दुःखी है, वह तो उन गायों को ताक रहा है, जिनकी आंखों में आंसू हैं, जिनकी आंखों में विवशता है, जिनकी आंखों में दुर्बलता है, जिनकी हड्डियां साफ-साफ दिखाई दे रही हैं।
यह हमारा दुर्भाग्य है, यह हमारा घटियापन है कि हम दान उस चीज का देते हैं, जो हमारे लिए व्यर्थ होती हैं। ऐसा दान अपने-आप में कोई प्रयोजन नहीं रखता। इसलिए शास्त्रों में यह स्पष्ट किया गया है- दान वह किया जाये, जो तुम्हें बहुत प्रिय हो, जो तुम्हारे लिए अत्यन्त आवश्यक हो, जिसके बिना तुम्हारा काम चल नहीं सकता, उस चीज का दान दो। और उद्दालक, उन गायों को दान देना चाहता था, जो गायें व्यर्थ थीं— नचिकेता उन गायों को और अपने पिता की चालाकी को देख रहा था। वह पांच साल का बालक मंथन कर रहा था, यह विचार कर रहा था- क्या इनका दान दिया जाना चाहिए? यह परम्परा मेरे पिता से मुझ तक और आने वाली सभी पीढि़यों तक जायेगी, तो क्या यह उचित रहेगा? यदि इस दुर्बुद्धि को यही नहीं रोका गया, तो आने वाली पीढि़यां एक अजीब अपराध वृत्ति से ग्रस्त हो जायेगी। वे उन वस्तुओं का दान देने की कोशिश करेंगी, जो उनके लिए व्यर्थ हैं।
वह पिता के पास गया और हाथ जोड़कर पूछा- आप ये गायें दान में क्यों दे रहे हैं? इन्हें दान देने से क्या लाभ होगा? ये गायें तो वृद्ध हो गई हैं, ये साल-दो साल में मर जायेंगी, इनको दान देने से ब्राह्मणों का क्या हित होगा? ब्राह्मण तो लालचवश या भयवश ले लेंगे, कि राजा दान दे रहे हैं, यदि नहीं लेंगे, तो कल राजा हमको दुःख दे सकते हैं, तकलीफ़ दे सकते हैं, राज्य-निकाला दे सकते हैं—- आप इन गायों को दान में क्यों दे रहें हैं? क्या यह उचित हैं? एक छोटा सा बालक अगर पिता से ऐसा प्रश्न करे, तो पिता को क्रोध आना स्वाभाविक है, क्योंकि वह तो समझता है, कि मैं बड़ा हूं, इसलिए क्रोध करना मेरा धर्म है, मेरा कर्त्तव्य है, मैं क्रोध कर सकता हूं- और जहां पर भी मनुष्य के अहं पर चोट लगती है, उसकी भूल पर, दोष पर चोट लगती है, तो वह क्रोधित होता ही है। सत्य स्वीकार करने पर क्रोध नहीं आता, मगर यदि किसी के मन में पाप है, छल है, झूठ है और उस पर यदि प्रहार किया जाये, तो क्रोध आना स्वाभाविक है। उद्दालक के मन में भी कुबुद्धि थी, वह समझता था- ये जो गायें हैं, जो फालतू घास खा रही हैं, जो व्यर्थ हैं, इनको निकाल देना चाहिए, यह धूर्तता उसके मन में थी— और नचिकेता ने इसी छल पर प्रहार किया, उसके मन पर प्रहार किया। उद्दालक को क्रोध आया और क्रोध के मारे आंखें लाल करके उसने गुस्से से मुट्ठियों को भींचा, सोचने लगे- यह छोटा सा बालक मेरे सामने खड़ा होकर जुबान लड़ाता है। बड़े-बड़े महिपति जब मेरे सामने सिर ऊंचा नहीं उठाते तो इस लड़के की इतनी हिम्मत, कि यह मुझसे आंखें मिला कर बात करे और उसने उसे फटकार दिया। नचिकेता ने हाथ जोड़कर प्रश्न किया- यदि आप इन गायों को इसलिए दान में दे रहे हैं, क्योंकि ये सब व्यर्थ हैं, आपके घर में भार तुल्य हैं, तो जब मैं भी भार तुल्य बन जांऊगा, आप मुझे भी दान दे देंगे?
एक बड़ा तीक्ष्ण प्रश्न था, कि मैं कभी वृद्ध हो जांऊगा, तो मुझे भी दान दे दिया जायेगा? -‘‘और दे देंगे, तो किसको दान देंगे? ब्राह्मणों को?— क्या आप उन्हें मुझे दान देंगे? उद्दालक तो क्रोधा के घोड़े पर सवार थे, उन्होंने कहा- ‘‘हां! हां! यदि तू भार स्वरूप होगा, तो तुझे भी दान में दे दूंगा।’’ नचिकेता ने कहा-‘‘आप मुझे किसे देंगे, मुझे कौन स्वीकार करेगा?’’ क्रोध के आवेश में उद्दालक कहते हैं- ‘‘मैं तुझे मृत्यु को दे दूंगा, तू मृत्यु के पास जा।’’ नचिकेता ने पिता की आज्ञा को स्वीकार किया। अन्तर था दोनों में, एक क्रोधमय था— दूसरा शान्तमय था और क्रोध में आदमी का विवेक समाप्त हो जाता है। क्रोध में आदमी को अच्छे बुरे का ज्ञान नहीं रहता। क्रोध मे उद्दालक उसे दान देने को कहते हैं, जो उनका पुत्र हैं- मैं तुझे मृत्यु को दे रहा हूं— इससे ज्यादा क्रोध की स्थिति और क्या हो सकती है—- और इससे ज्यादा नम्रता की क्या स्थिति बन सकती है, कि नचिकेता हाथ जोड़कर विनीत भाव से प्रश्न करता है।
-‘‘क्या मैं मृत्यु के पास चला जांऊ?’’और फिर सोचकर स्वयं उत्तर देता है-‘‘आप ठीक कहते हैं, यदि आप मुझे मृत्यु को देते हैं, तो यह मेरा सौभाग्य है क्योंकि पिता की आज्ञा का पालन करना प्रत्येक पुत्र का कर्त्तव्य और धर्म हैं— और मैं आपकी आज्ञा का पालन करूंगा, मैं जरूर मृत्यु के पास जांऊगा। जिस प्रकार से ये गायें ब्राह्मणों के पास जा रही हैं, उसी प्रकार से मैं मृत्यु के पास चला जाऊंगा।’’ उद्दालक की विचार सारणी में झटका लगता है, और वे सोचते हैं- ‘‘मैंने ऐसा कैसे कह दिया? मेरे मुंह से ऐसी गलत बात कैसे निकल गई? वे पश्चाताप करते हैं, हठबुद्धि हो जाते हैं—- यह मैंने क्या कर दिया?— और नचिकेता ने तो यह बिल्कुल सही मान लिया— वह मृत्यु के पास जाने के लिए तैयार हो गया है।’’ इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से उद्दालक की आंखों में आंसू आ जाते हैं, शरीर थरथराने लगता है, क्रोध तो कभी का समाप्त हो गया था। उन्होंने बेटे को अपनी गोदी में उठाया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-‘‘मैंने तो क्रोध में कह दिया। तू तो मेरा एकमात्र पुत्र है, मैं तुझे मृत्यु को कैसे दे सकता हूं, यह तो सम्भव ही नहीं हैं, यह तो मेरे मुंह से अकस्मात निकल गया। मैं तेरा पिता हूं, तू मेरा वंशज हैं, तेरे बिना मेरे जीवन का मतलब क्या होगा?’’ नचिकेता ने कहा-‘‘नहीं! एक बार दान दी गई वस्तु को वापिस ग्रहण नहीं किया जाता। अपने मुझे दान दे दिया है, अब मेरे ऊपर मृत्यु का अधिकार है, अब मुझ पर आपका अधिकार नहीं रहा और जो वस्तु आपकी नहीं है, उसको आप गोदी में भी नहीं ले सकते, उसके सिर पर हाथ भी नहीं फ़ेर सकते, उसको बहका भी नहीं सकते, उसको बहला भी नहीं सकते। आप मुझे वापिस घसीटिए मत, दिये दान को वापिस मत लीजिए, इस समय मैं मृत्यु की धरोहर हूं। अब तो मृत्यु जो भी आज्ञा देगी उस आज्ञा का पालन करना मेरा धर्म है, कर्त्तव्य है।’’
उद्दालक मौन हो गये, किंकर्त्तव्यविमूढ़ होने के कारण वे समझ नहीं पा रहे थे, उनके मुंह से ऐसा कैसे निकल गया? वे समझ नहीं पा रहे थे कि यह क्या हो रहा हैं? -मैं तो गायों को दान में दे रहा था— और कहां पुत्र ही हाथ से निकल गया। मैंने क्रोध से कहा, तो पुत्र ने पालन किया— और वास्तव में जो दान में दे ही दिया, उस पर मेरा क्या हक हो सकता है? क्या अधिकार हो सकता है? मैंने तो उसे मृत्यु को सौंप दिया। नचिकेता खड़ा हो जाता है, अन्तिम बार अपने पिता को प्रणाम करता है, उनसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करता है-‘‘मैं धन्यभागी हूँ, जो आप जैसे पिता मुझे मिले। यह मेरा सौभाग्य है, कि आपने मुझे मृत्यु को दान दिया, और मैं अवश्य ही मृत्यु देवता यमराज के पास जाऊंगा, उनके चरणों में बैठूंगा, जो भी वे देंगे, उसको स्वीकार करूंगा। यदि मेरे भाग्य में कुछ लिखा है, तो मैं उसे प्राप्त कर लूंगा। यदि मेरे भाग्य में कुछ नहीं लिखा तब भी यह प्राण, शरीर, चेतना सब यमराज की धारोहर है, वे जैसा भी चाहेंगे, मेरे प्राणों का उपयोग करेंगे।’’ -और यह कह कर नचिकेता वहां से तुरन्त रवाना हो गया। उद्दालक टुकुर-टुकुर ताकते रहे, आंखों से आंसुओं की धारा बहती गई, हिचकियां भर गई, गला रुंध गया— मगर नचिकेता के हृदय पर कोई प्रभाव नहीं था, वह समझ रहा था- अब वह उद्दालक की धरोहर नहीं रहा, अब वह यमराज की पूंजी है, उसके शरीर व प्राणों पर यमराज का अधिकार है। नचिकेता यमलोक पहुंचा और यम के द्वार पर खड़ा हो गया। पहली बार यह एक विशेष घटना घटी ब्रह्माण्ड में। इस घटना को समझने की जरूरत है। प्रत्येक व्यक्ति के द्वार पर मृत्यु आती है, पर यहां पर मनुष्य स्वयं मृत्यु के द्वार पर पहुंचा, बिल्कुल विपरीत स्थिति बनी। आज तक तो यह हुआ, कि यमराज स्वयं व्यक्ति को लेने के लिए आए और यहां पहली बार यह बात हुई, कि कोई स्वयं यमराज के दरवाजे पर पहुंच गया! -पर जो हिम्मत और हौसला रखता है, जो दृढ़ता रखता है, जो मौत के दरवाजे पर पहुंच जाता है, उसे वहां मौत नहीं मिलती।
मौत तो कायरों को मिलती है, जो कायर दुबक कर घर में घुस कर बैठ जाते हैं, मौत उनको दबोचती है, मगर जो स्वयं चलकर मौत के दरवाजे पर पहुंच जाते हैं, उन्हें प्राप्त नहीं होती। यहां उपनिषद् के एक मूल मर्म की व्याख्या है। नचिकेता जाता है यम के द्वार पर, लेकिन वहां पर यम नहीं मिलते—- जो व्यक्ति मृत्यु के द्वार पर स्वयं चलकर पहुंचता है, और कहता है, मैं देखता हूं- मृत्यु क्या है? -मृत्यु का सौन्दर्य क्या है? -मृत्यु मेरा क्या अहित कर सकती है?- जो व्यक्ति इतना हौसला और हिम्मत रखता है, मृत्यु उसके पास नहीं पहुंचती। मृत्यु के दरवाजे उसके लिए नहीं खुलते हैं। उसके लिए अमृत्यु के दरवाजे खुलते हैं, जीवन के दरवाजे खुलते हैं, पूर्णता के दरवाजे खुलते हैं, क्योंकि मृत्यु कायरों को प्राप्त होती है- जो ज्ञानवान हैं, जो चेतनावान हैं, जो श्रेष्ठ हैं, उनको मृत्यु प्राप्त नहीं हो सकती है।
– और नचिकेता भी स्वयं चलकर मृत्यु के द्वार पर पहुंचा और मृत्यु वहां नहीं थी, मगर नचिकेता तो यह निश्चय करके गया था, कि यदि मैं मृत्यु के द्वार पर पहुंचूगा, तो मैं तब तक वहां बैठा रहूंगा, जब तक मृत्यु मुझे मिलेगी नहीं, जब तक यमराज मुझे दिखाई नहीं देंगे, तब तक मैं वहां बैठा रहूंगा और इसी दृढ़ संकल्प के साथ वह दरवाजे पर बैठ गया। यम की पत्नी यमी बाहर आई, एक बालक को देखा भूखा-प्यासा, उसने कहा-‘‘तुम भोजन कर लो, जब यम आयेंगे तब मिल लेना’’। बालक ने कहा-‘‘नहीं! यह मेरा शरीर, मेरी पूंजी तो यम की है, जब वे आज्ञा देंगे, तभी मैं भोजन करूंगा, अब अधिकार उनका है, जैसी आज्ञा देंगे, उसे पालन करना मेरा कर्त्तव्य और धर्म है। मैं तब तक यहां बैठा रहूंगा, जब तक कि वे यहां नहीं आ जाते।’’ तीन दिन तक नचिकेता यम के द्वार पर भूखा-प्यासा बैठा रहा। यहां पर उपनिषद् का एक और मर्म हमारे सामने स्पष्ट होता है। वह तीन दिनों तक भूखा रहा और जो भूखा रह सकता है, उसको मृत्यु प्राप्त नहीं हो सकती। तीन दिन-उन तीन गुणों के द्योतक हैं, जिन्हें तामसिक, राजसिक और सात्विक कहा गया है। लोग आमतौर पर मानते हैं, कि सात्विक स्थिति श्रेष्ठ है, पर वास्तव में ऐसा है नहीं। इस उपनिषद् में बताया गया है, कि इन तीनों गुणों से परे जो स्थिति आती है, वह सर्वोत्तम है, योगियों के लिए उपयुक्त है— और भूख तो इन तीन गुणों की भी नहीं होनी चाहिए- उपवास ही जीवन का मूल धर्म, चिंतन और विशेषता है, क्योंकि उपवास के द्वारा जीवन की पूर्णता प्राप्त होती है। नचिकेता ने उपवास किया और उपवास की परम्परा वहीं से प्रारम्भ हुई।
जो जितना ही ज्यादा खाता है, वह उतनी ही जल्दी मरता है। जिसका आहार जितना कम होगा, वह उतना ही अधिक स्वस्थ और दीर्घायु होगा, इसलिए आहार पर नियंत्रण प्राप्त करना जरूरी है। इसलिए बुद्ध ने, महावीर ने उपवास की परम्परा को और आगे बढ़ाया, क्योंकि हमारा शरीर अपने-आप में एक अद्भुत, महत्वपूर्ण यंत्र है। यदि हम उपवास करते हैं, तो तीन या चार पांच दिन के बाद तो भूख लगती है, मगर उसके बाद हमें भोजन की कोई इच्छा नहीं होती। हमारे अन्दर भोजन का जो संग्रह है, हमारे अन्दर जो बढ़ा हुआ मांस है, उस चर्बी को पिघलाकर शरीर अपनी सुरक्षा कर लेता है- यह शरीर की बहुत बड़ी विशेषता है।
-अन्य साधु संत जहां वेदों की और पुराणों की पढ़ी-पढ़ाई बात करते हैं, जो कुछ उन्होंने पढ़ा, वह कहते हैं, वहीं मैंने जो कुछ जीवन में देखा है और अनुभव किया हैं, उसको कहता हूं। खाली आंखिन देखी बात नहीं करता हूं, पोथिन पढ़ी बात भी नहीं करता हूं। जो जीवन में मैंने अनुभव किए हैं, वे ही मेरे शब्दों को सार्थकता प्रदान करते हैं। यदि कोई मंत्र सही है और मैंने उसे अनुभव किया है, तभी मैं बताने की क्षमता रखता हूं। इसलिए व्रत और उपवास का सारभूत अर्थ समझा रहा हूं, तो उन अनुभवों के आधार पर ही समझा रहा हूं, जिनको मैंने स्वयं परखा है। कालचक्र तो घूमता ही रहता है, समय तो अपने-आप में परिर्वतन होता ही रहता है। कोई भी कार्य, कोई भी संकेत कम-से-कम गुरु की तरफ से तो अकारण होता ही नहीं। प्रत्येक शब्द का अपने-आप में एक महत्व होता है, प्रत्येक घटना का अपने-आप में एक सम्बन्ध होता है। गुरु ठीक समय पर ठीक कार्य करते ही हैं, न एक क्षण पहले, न एक क्षण बाद में। यह बात अलग है कि कोई किसी भी घटना को और कार्य को किस रूप में परखे, अनुभव करे, या विश्वास करे या नहीं करे, यह उस व्यक्ति की बात है।
गंगा नदी बह रही है, आप स्नान करें या नहीं करें, आप दूषित जल कहें, आप पवित्र जल कहें, आप उसका पानी पीयें या नहीं पीये, यह आपकी बात है। गंगा नदी आपको नहीं कहेगी, कि आप मेरे जल मे स्नान करें और पवित्र हों—- आपकी विचारधारा और आपका चिंतन कैसा है— वह तो आप पर निर्भर है। कई लोग उसको प्रदूषण युक्त नदी कहते हैं, और उसके पास में नहीं खड़े होते। हरिद्वार के सैकड़ो-हजारों लोग नदी में मल विसर्जन करते हैं, उनका चिंतन वैसा है।
कुछ लोग जाते हैं, तो उस नदी में खड़े होकर स्नान करते हैं, बहुत शीतलता अनुभव होती है— यह तो अपने-अपने चिंतन की बात है। यह ज्ञान की सरिता भी अपने-आप में बह रही है, कोई उसको अनुभव करे या नहीं करें, समझे या नहीं समझे, लाभ उठाये या नहीं, वह तो विवेक पर आधारित है।
विवेकवान होना चाहिए, किन्तु विवेक का प्रयोग सृजनशील कार्यों के लिए ही करना चाहिए। विवेक का प्रयोग जब कुतर्क और विनाशपूर्ण कार्यो के लिए करते हैं, तब उसे बुद्धि शब्द से संबोधित करते हैं और तब बुद्धि अपने-आप में वेश्या की तरह हो जाती है। किन्तु इसी विवेक का प्रयोग जब सृजन के लिए किया जाता है, तब विवेक को श्रद्धा शब्द से सम्बोधित करते है और श्रद्धा एक पतिव्रता स्त्री की तरह होती है। इस प्रकार विवेक के दो पक्ष हुए बुद्धि और श्रद्धा।
बुद्धि विभ्रम पैदा करती है और कुमार्ग पर गतिशील करती है, वह संदेह पैदा करती है, वह मनुष्य को भटकाती है, वह मानव को अंहकार देती है—–और अहंकार अपने-आप में जीवन का नाश है, बुद्धि की अतिक्रमणता जीवन का पतन है।
बुद्धि का पश्चिम के लोगों ने बहुत प्रयोग किया, तो उन्होंने आपको क्या दिया? उन्होंने आपको दी एड्स बीमारी, उन्होंने आपका अणु बम दिया, उन्होंने आपको अशांति दी। तीन ‘अ’ दिये, चौथी चीज नहीं दे सके वे—- आनन्द नहीं दे सके, सुख नहीं दे सके, प्रसन्नता नहीं दे सके, हंसी नहीं दे सके, मुस्कराहट नहीं दे सके- मृत्यु दे सकते हैं—- ईराक में हजारों लोगों को मार कर दिखा दिया— यह तो बहुत घटिया बात हुई- वापिस उनको जीवित कर दें, यह बहुत बड़ी बात होगी। ऐसा पश्चिमी सभ्यता नहीं कर सकती, बुद्धि नहीं कर सकती। इसके विपरीत श्रद्धा अपने आप में उत्पन्न करने की क्रिया है, श्रद्धा जीवन देती है। मरे हुए व्यक्ति के मन में भी एक चिंतन होता है, कि मैं कुछ क्षण जिन्दा रहूं, गुरु चरणों में बैठूं, देवताओं के चरणों में बैठूं, मैं गीता, रामायण का पाठ सुनूं, वह और जिन्दा रहने का प्रयत्न करता है, श्रद्धा के अतिरेक में, श्रद्धा के विश्वास में।
हम में जो बुद्धि की अतिक्रमणता है, वह पश्चिम की देन है, हमारी देन नहीं है, हमारे पूर्वजों की देन भी नहीं है, वे इतने अधिक बुद्धि ग्रस्त नहीं थे, वे श्रद्धा करने वाले थे- गंगा नदी पर, देवताओं पर, हिमालय पर, गुरु पर, अपने पूर्वजों पर- एक श्रद्धा थी, एक आत्मविश्वास था, मां बाप के प्रति, सम्बन्धियों के प्रति और रिश्तेदारों के प्रति, उनमें प्रेम था— हमने उस प्रेम को वासना के अर्थ में लेकर एक घटिया और गन्दा शब्द बना दिया— लिखते हुए भी अब संकोच होने लगा है, कि मैं प्रेम शब्द लिखूं, कि नहीं लिखूं— मैं लिखूंगा और आपका सीधा माइण्ड वहीं जायेगा, कि प्रेम मीन्स प्यार, प्यार मीन्स— फ्लर्ट। यह आपका चिंतन है, मेरे मन में तो ऐसी कोई बात ही नहीं। ‘‘महावीर स्वामी’’ अपनी साधनाओं के माध्यम से अत्यन्त उच्चतम भाव भूमि पर अवस्थित थे, उन्होंने तपस्या के माध्यम से साधना के उस स्तर को प्राप्त करा लिया था, जहां वे देह भाव से ऊपर उठ गये। एक गांव में पहली बार महावीर स्वामी गए, तो वहां के लोगों ने सोचा-यह नग्न व्यक्ति कहां से आ गया? लोगों ने कई प्रकार की बातें भी की, पर महावीर स्वामी शांत रहे। उनके एक शिष्य ने कहा-‘‘स्वामी जी! बहुत अटपटा लग रहा है, गांव के लोगों की बात सुनकर, कि आप नग्न हैं।’’ -‘‘मैं नग्न—!’’
महावीर बोल-‘‘मैं तो नग्न हूं ही नहीं, उनकी आंख में नंगापन है, इसलिए वे केवल यही देख रही हैं, कि मैंने कपड़े नहीं पहने हैं—- जबकि मुझे तो कुछ ऐसा पता ही नहीं पड़ रहा हैं। इसी प्रकार यह आप पर निर्भर है, कि आप मेरे किसी शब्द का क्या अर्थ लगायें, वही अर्थ लगायेंगे, जो आपका दूषित मन कहेगा। आपके मन में छल है, आपके मन में पाप है, तो आप उल्टा सोचेंगे ही। किसी घड़े में अगर घास-फूस हो और मैं उसमें पानी डालूं, और पानी से घड़ा भरूं, तो पहले बाहर क्या निकलेगा?– -घास-फूस निकलेगी, पहले शुद्ध जल तो नहीं निकलेगा। इसी तरह जब गुरु ज्ञान डालता है, तो शिष्य के अन्दर जो छल है, मल है, द्वेष है, झूठ है, गुरु के प्रति अश्रद्धा है, वह सब निकलता है बाहर। आपके अन्दर जो है, घड़े के अन्दर जो है, वही तो निकलेगा बाहर। मगर जीवन के क्रम में शुद्धता रहनी चाहिए। गुरु बार-बार यह बात दोहराता है, तो इसलिए, कि जीवन में एक अनुकूलता पैदा हो, जीवन में सुख पैदा हो। तुम्हारे जीवन में वैभव भी हो, धन भी हो—- गुरु ऐसा नहीं कहता कि तुम निर्धन बन जाओ।
महावीर स्वामी, बुद्ध किसी ने भी नहीं कहा, कि तुम निर्धन बन जाओ या भूखे रहो, उन्होंने यह अवश्य कहा- ‘‘त्याग और उपवास करें’’— किन्तु बाद में उनके अनुयायियों ने, जो उनके चिंतन को समझ नहीं सके, उन्होंने यह कहा, कि व्रत रखो, भूखे रहो, जितने भूखे रहोगे, उतने ही ज्यादा धार्मिक कहलाओगे, और तभी से यह क्रम आरम्भ हुआ, कि भूखे रहना चाहिए, दो दिन व्रत करना चाहिए, पांच दिन व्रत करना चाहिए, ग्यारह दिन व्रत करना चाहिए और औरतों को तो तीस दिनों में तीस दिन व्रत करना चाहिए- आज एकादशी का व्रत है, आज पूनम का व्रत है और आज तीज का व्रत है—-औरत बेचारी सूख के कांटा होती रहती है, व्रत करती रहती और उसे मिलता कुछ नहीं!
उपवास तो अलग चीज है, उसका उद्देश्य भी सर्वथा अलग है, जो कि अपने-आप में एक गूढ़ चिंतन युक्त है। मुझे कोई बताऐ तो सही, कि कहां ऐसा विधान लिखा हुआ है। कोई वेद, कोई पुराण, कोई उपनिषद्, कोई शास्त्र, कोई तो चीज मेरे सामने लाकर रखे, कि देखो इसमें व्रत-विधान लिखा हुआ है। व्रत जैसा कोई चिंतन है ही नहीं कहीं। पीछे जो ढोंगी पैदा हुए उनको कुछ आता ही नहीं था, कथा लिख दी, कि एक राजा था, राजा ने तीन दिन व्रत किया, उसके घर में पुत्र पैदा हो गया। बस—ठान लिया, कि तीन दिन व्रत रखने से पैदा हो जाता है लड़का! अब तीन दिन भूखे रहने से ही बच्चे पैदा होते, तो फिर चाहिए ही क्या, पूरे संसार में सभी के ही पुत्र पैदा हो जाते- किसी ने लिख दिया आपने मान लिया।
तुम भी एक कथा लिख दो—- और उस कथा में कुछ भी लिख दो, कि ग्यारह दिन तक व्रत करने से दरिद्र आदमी के सामने लक्ष्मी खुद आकर प्रकट हुई, ऐसे तो पांच सौ लोग निकल ही आयेंगे, जो ग्यारह दिन भूखे मरने बैठ जायेंगे, क्योंकि यह लिखा हुआ है, छपा हुआ है—-असल में लिखा हुआ है, इसलिए प्रामाणिक है ऐसा नहीं सोचना चाहिए, अपने-आप अनुभव करके देखना चाहिए क्योंकि अनुभव द्वारा ही वास्तविकता का बोध होता है। आप पहले ग्यारह दिन भूखे रहिये, और अगर आपके संतान हो जाय, तो फिर लिखिए, वह तो होगा नहीं, बस आपको तो पोथी छापनी है और दो रुपये में बेचनी है, पोथी लिख दी— लिख दी और बिक गई, सब कुछ प्राप्त कर लेने की इच्छा रखने वाले मिल ही जायेंगे—-ऐसा वास्तविक जीवन में नहीं होता।
इसलिए मैंने लिखा कि भूखे मरना और निर्धन रहना अपने-आप में कोई विशेष्ता नहीं है, यह तुम्हारी कोई विशेषता नहीं है, तुम्हारी कायरता है, यह तुम्हारी बुजदिली है—– क्योंकि तुम कुछ कर नहीं सकते, इसलिए तुमने भूखे रहने की क्रिया को बहुत महान मान लिया- महावीर स्वामी बहुत महान हैं, क्योंकि वे भूखे रहे थे। बुद्ध भी भूखे नहीं रहे थे, अपितु उन्होंने उपासना की और ज्योंही सुजाता आई, उसने श्रद्धाभाव से खीर दी, तो उन्होंने सुजाता की भावना को ध्यान रख कर खीर खा ली— खा लिया, ऐसा कहकर मैं उनकी आलोचना नहीं कर रहा हूं। मैं यह कह रहा हूं, कि व्रत रखने से उनको कैवल्य ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था, कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ था- तपस्या के माध्यम से, चिंतन के माध्यम से, विचारों के माध्यम से—-ज्ञान और भूख का कोई सम्बन्ध नहीं है।
जैनियों में एक प्रथा है, जब वे साठ, सत्तर साल के होते हैं, तो वे संतारा लेते हैं। संतारा का अर्थ हैं- सांसारिक क्रियाओं से स्वयं को विरक्त कर देना और अपना पूरा ध्यान अपने इष्ट के प्रति लगा देना। बहुत कठिन तपस्या होती है, जिसे बहुत दृढ़ निश्चय वाले व्यक्ति ही कर पाते हैं। जैन लोग बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति के होते हैं और अधिकांश व्यक्ति आधी उम्र पार करने के बाद अपना पूरा चिंतन महावीर स्वामी के प्रति ही रखते हैं। जब उनको यह एहसास होने लगता है, अब मृत्यु सन्निकट है, तो वे अन्न, जल सभी का त्याग कर देते हैं। संतारा लेने के पीछे एक अत्यन्त दिव्य भावना मोक्ष प्राप्ति की क्रिया है। किन्तु युग परिर्वतन के साथ ही साथ लोग संतारा के मूल तथ्य को भूल गये और सिर्फ इतना ही याद रखा, कि जब व्यक्ति की मृत्यु होने वाली हो, तो उसे दाना-पानी कुछ भी नहीं देना चाहिए। इस तरह की भावना को देखकर सुनकर बहुत कष्ट होता है, कि हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में, अपने मूल चिंतन से कितना भटक गये हैं।
आप खुद कल्पना कर सकते हैं, कि ऐसी प्रथा कैसे और कब आरम्भ हो गई? और किसने ऐसा लिख दिया? महावीर स्वामी के ग्रंथ जैन वाणी में कहीं ऐसा लिखा हुआ नहीं है। जो महावीर स्वामी ने लिखा है, उसमें किसी जैन ने कुछ और जोड़ दिया और आप उसको पकड़कर बैठ गए—- मगर यह उनका धर्म है, उनका चिंतन हैं, मैं उनकी आलोचना नहीं कर रहा हूं, किन्तु यह बता रहा हूं, कि लोगों ने कितना विकृत कर दिया है धर्म को। हम एक प्रकार से रूढि़ग्रस्त हो गए हैं। प्रश्न आरूढ़ता का नहीं है, प्रश्न अनुभव का है। इसलिए इस आरूढ़ता को मिटाने के लिए किसी भी धार्मिक कृत्य के मूल को समझें, फिर अपनायें।
पत्नी व्रत करती है, पति पूछता है-‘‘ तुम क्यों भूखी मर रही हो? किस के लिए जब मैं इतना कमा रहा हूं, तो फिर तुम भूखी क्यों मर रही हो?’’ वह कहती है ‘‘आपको मालूम नहीं हैं।’’ ‘‘चलो मुझे मालूम नहीं है, तुझे मालूम है, तो तू ही बता दे। तू दो दिन भूखी मरती है, तीन दिन— महीने से सत्रह दिन तो भूखी मरती ही है और केवल तेरह दिन खाना खाती है। बेशक दो चार दिन व्रत और कर ले, सूख के कांटा हो जायेगी और मैं क्या कह सकता हूं। मैं तुझे रोकूं, तो तू समझेगी नहीं—- औरते रुकती नहीं हैं, वे तो व्रत रखने में ही सब पुण्य समझती हैं—- वे सोचती हैं कि घर में जो कुछ उन्नति हो रही है, उनके भूखे रहने से हो रही है।’ -‘‘तुम कुछ नहीं समझते जी, ऐसी नास्तिकों वाली बात क्यों करते हो।’’ नहीं समझते, तो कोई बात नहीं, तू ही समझ’- और क्या कह सकता है पति—वह समझती रहती है, भूखी मरती रहती है, पति बेचारा झींकता रहता है, दवा पर रुपये खर्च करता रहता है। क्योंकि उन्होंने धर्म का एक विकृत रूप पकड़ रखा है। शास्त्रों में धनहीन या भूखे रहने के लिए नहीं लिखा है। शास्त्रों में लिखा है-‘‘हम समृद्ध रहें, प्रत्येक भौतिक सुख सम्पदा से युक्त रहे।’’ वशिष्ट, विश्वामित्र, अत्रि, कणाद आदि जितने भी हमारे ऋषि हुए हैं, देवता हुए हैं, उनमें गरीब तो कोई भी नहीं था, मुझे बताइये, कि उनमें से कौन गरीब था? देवताओं के चेहरे, लाल सुर्ख हैं, इतने लाल सुर्ख चेहरे तुम्हारे तो हैं ही नहीं।
ऐसा इसलिए, क्योंकि कि तुम में मंत्रों के प्रति आस्था नहीं रही, जबकि मंत्र के माध्यम से ही जीवन में पूर्णता आ सकती है, अन्य किसी तरीके से नहीं आ सकती। अगर सिर्फ मेहनत-मजदूरी के माध्यम से या और किसी तरीके से पूर्णता आ सकती, तो कोई गरीब नहीं रहता। सैकड़ो-हजारों लोग हैं, जो दिन भर मजदूरी करते हैं, पत्थर उठाते हैं, दिन भर मेहनत करते हैं और शाम को सौ रुपये लेकर घर जाते हैं, दो सौ रुपये लेकर घर जाते हैं। जो भाग्यवान होते हैं, या जिन्होंने पूर्वजन्म में तपस्या की होती है या इस जन्म में तपस्या की है, वे ही पूर्ण बन सकते हैं। पूर्वजन्म के किये-कराये हिसाब तो हमें मिलते ही हैं- उस पूर्वजन्म के कर्मों का फल तो हमें इस जन्म में भोगना पड़ता ही है, अच्छा हो या बुरा। इसलिए हिरण्यकश्यप के घर में प्रहलाद पैदा हो जाते हैं। हिरण्यकश्यप जैसे राक्षस, सताने वाले के घर में प्रहलाद जैसा भला, एकदम सात्विक व्यक्ति पैदा हो, तो जरूर उसने पूर्वजन्म में कुछ किया होगा, इस जन्म में तो कुछ किया ही नहीं था। हम आश्चर्य करते हैं, कि हम रोज चार घंटे पूजा करते हैं लक्ष्मी की, शिव जी की और ऐसे लोगों के घर में लक्ष्मी आ जाती है, जो रोज लोगों को गालियां देते हैं, देवताओं की कभी पूजा नहीं करते, हाथ नहीं जोड़ते, फिर भी उनके घर में पैसे बरसते हैं—- ये क्या खेल है? हमें आश्चर्य होता है क्योंकि हमने पिछले जीवन की कड़ी को नहीं देखा, पिछले जीवन की कड़ी और इस जीवन की कड़ी जुड़ी हुई हैं।
जीवन में भौतिक उन्नति और आध्यात्मिक उन्नति का समन्वय हो सके, क्योंकि खाली आध्यात्मिकता से काम नहीं चलेगा और खाली भौतिकता से भी नहीं चलेगा, उन दोनों का हमारे जीवन में सम्बन्ध होना चाहिए। हमारे जीवन में एक परितृप्तता आनी चाहिए, हम जीवन में सम्पन्न भी रहे, हम जीवन में आनन्दयुक्त भी रहें, दोनों जीवन चले—- और यही जीवन की पूर्णता है। यह तो प्रसंगवश मैं व्रत और उपवास के अन्तर को समझा रहा था, मैं पुनः उसी मूल चिंतन पर आता हूं। इसलिए नचिकेता ने यह निश्चय कर लिया, कि मैं उपवास के माध्यम से यम को प्राप्त करूंगा, और यम से वह प्रश्न पूछूंगा, जिसके द्वारा जीवन का मर्म, जीवन का उद्देश्य, जीवन का लक्ष्य और जीवन का ध्येय स्पष्ट हो सके।
नचिकेता तीन दिन तक भूखा-प्यासा यम के द्वार पर बैठा रहा। चौथे दिन यम आए तो उनकी पत्नी ने कहा-‘‘एक ब्राह्मण पुत्र तीन दिनों से भूखा प्यासा दरवाजे पर बैठा है और हमारा कर्त्तव्य है, कि पहले अतिथि को भोजन कराएं, उसके बाद हम भोजन करें।’’ अतिथि, जो बिना तिथि बताए घर आए। जो पहले से सूचना देकर आए, वह अतिथि नहीं है, जो पहले से बताकर आए और हम उनके घर जाने की खुशी में सभी तैयारी करके रखें, यह जीवन की श्रेष्ठता नहीं है। श्रेष्ठता तो यह है कि हम हर समय तैयार रहें। यम बाहर आए, नचिकेता खड़ा हो गया। यम ने कहा-‘‘मुझे ज्ञात हुआ है कि तुम तीन दिनों से भूखे प्यासे मेरे दरवाजे पर खड़े हो—-पर क्यों खड़े हो? क्या चाहते हो? क्या इच्छा है? तुम क्यों आए हो?- जिनकी आयु समाप्त हो जाती है, उन्हें मैं स्वयं लेने के लिए जाता हूं। तुम खुद चलकर मेरे दरवाजे पर आए हो, मौत के दरवाजे पर आए हो, ऐसा तो कभी हुआ ही नहीं!’’
नचिकेता बोला-‘‘मेरे पिता ने मुझे आपको सौंप दिया है, अब इस शरीर पर, मेरे मन पर, मेरे प्राणों पर, मेरी चेतना पर मेरा कोई अधिकार नहीं है, इन सब पर आपका अधिकार है। आप जो भी आज्ञा देंगे, मैं उसका पालन करूंगा। यम ने कहा-‘‘तुम्हारे यहां आने का क्या प्रयोजन है, क्या लक्ष्य है? तुम तीन दिन से मेरे दरवाजे पर भूखे प्यासे बैठे रहे हो, इसलिए तुम तीन वरदान मांग लो, मैं तुम्हें तीनों वरदान दूंगा।’’ नचिकेता ने उत्तर दिया-‘‘आपने पूछा है, मैं किस प्रयोजन से आया हूं? मेरा क्या उद्देश्य है? मेरा क्या लक्ष्य है?—- तो मेरा लक्ष्य यह है कि मैं उस विद्या को जानना चाहता हूं, उस क्रिया को जानना चाहता हूं, जिसके माध्यम से हम (मनुष्य) मृत्यु से परे हो सकें, जिससे मृत्यु हमारा कुछ बिगाड़े नहीं, मृत्यु हमें लेने के लिए आए ही नहीं।’’
क्या कोई ऐसी विद्या है?-‘‘क्या कोई ऐसी क्रिया है, जिसके द्वारा हम मृत्यु को जीत सकें?’’ -‘‘मैं आप पर विजय प्राप्त कर सकूं, ऐसी कोई स्थिति है?’’ -‘‘ऐसा कौन सा चिंतन है? ऐसी कौन सी साधना है?’’ नचिकेता ने कहा-‘‘यदि आप मुझे वरदान देने के लिए संकल्प बद्ध हैं, तो पहला वरदान यह दीजिए, कि मेरे पिता को कभी क्रोध न आए, वे शांत और सहज भाव से रहें और दिव्यता से जीवन यापन करें, उनके जीवन में सुख और सौभाग्य हो।’’ बड़ा अदभुत वरदान था, अपने लिए कुछ नहीं मांगा! उसने मांगा, कि मेरे पिता अक्रोधी हों, क्योंकि अक्रोध से ही जीवन की पूर्णता पाई जा सकती है। जो क्रोध कर लेता है, वह बीच में ही समाप्त हो जाता है। क्रोध मृत्यु का ही दूसरा रूप है। यमराज ने कहा-‘‘तथास्तु! तुमने वास्तव में ही एक उत्तम कार्य सम्पन्न किया है।’’
यहां उपनिषद् एक बहुत मर्म की बात कहता है। जो तुम पर क्रोध करता है, उस पर भी तुम अक्रोध करो। पिता ने नचिकेता को यम को दे दिया, क्रोध किया, फिर भी नचिकेता के मन में उनके प्रति क्षमा का भाव था, यही तो जीवन का मर्म है। उपनिषद् की यही तो व्याख्या है, कि जो हमारा अहित सोचे, जो हमें गाली दे, जो हमें मारने के लिए तैयार हो जाये, उस पर भी हम अक्रोध करें, करुणा की वृष्टि करते रहें, दया करें, उसके लिए भी हम अच्छा ही सोचें—- नचिकेता के ऐसा ही किया। यम ने कहा- ‘‘तुम दूसरा वरदान भी मांग लो।’’ नचिकेता ने कहा-‘‘यदि आप मुझे वरदान भी देना चाहते हैं, तो मुझे अग्नि विद्या दीजिए। जिस विद्या के द्वारा मैं अपने जीवन को अग्निमय बना सकूं, क्योंकि उस अग्निमय स्वरूप द्वारा ही मेरे जीवन की पूर्णता सम्भव है।’’
यहां पर भी उपनिषदकार ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही है। हमारा शरीर इसलिए ऊष्ण है, इसलिए स्वस्थ है, इसलिए जीवित है, क्योंकि वह अग्निमय है, अग्नि तत्व प्रधान है और जिस समय अग्नि तत्व क्षीण होने लगता है, तब शरीर ठण्डा हो जाता है, शरीर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। जब तक शरीर में अग्नि है तब तक शरीर मृत्यु को प्राप्त हो ही नहीं सकता। नचिकेता यहां एक बहुत मर्म की बात पूछ लेता है, वह कहता है-‘‘मुझे वह अग्नि विद्या सिखाइए, जिसके द्वारा मैं निरन्तर अपने हृदय में, अपने शरीर में, अपने प्राणों में अग्नि को प्रज्वलित बनाए रखूं।
नचिकेता ने कहा जिस अग्नि में मेरा क्रोध खत्म हो जाये, मेरा लोभ खत्म हो जाये, मेरा मोह खत्म हो जाये, मेरा अज्ञान खत्म हो जाये, मेरे जीवन की चिंताएं खत्म हो जायें, जिस अग्नि में जलकर मेरी सभी न्यूनताएं भस्म हो जायें, मैं ऐसी अग्नि विद्या चाहता हूं। मैं उस अग्नि विद्या को सीखना चाहता हूं, जिसके द्वारा मैं तेजस्वी बन सकूं, उन मर्मों को स्पष्ट कर सकूं, जिनके द्वारा पूरे संसार को एक ज्ञान, एक चेतना, एक श्रेष्ठता दी जा सकती है। और वास्तव में ही अग्नि विद्या है, जिसके द्वारा निर्मित होता है- अत्यन्त शांत, अत्यन्त सरल और ऐसा अद्वितीय व्यक्तित्व, जिसमें क्रोध नहीं हो, जिसमें छल नहीं हो, जिसमें पाप नहीं हो, जिसमें व्याभिचार नहीं हो———– और ऐसे ही तेजस्वी पुंज में परिवर्तित होना जीवन की महानता है। महापुरुष बनने की यही तो परिभाषा है, छठी इंद्रिय जागरण का यही तो मार्ग है, इसी को तो देवत्व कहा जाता है, इसी को तो श्रेष्ठत्व कहा जाता है, इसी को तो ऋषित्व कहा जाता है।
नचिकेता ने दूसरा वरदान अत्यन्त महत्वपूर्ण मांगा, जिस अग्नि मंत्र के माध्यम से अन्दर की प्राणाग्नि को प्रज्जवलित किया जा सकता है। यद्यपि कि मानव शरीर में जठराग्नि है, और जठराग्नि का तात्पर्य है- जो कुछ मैं भोजन करता हूं, वह मैं पचा सकूं, उसका रक्त बना सकूं और उस रक्त से अपने पूरे शरीर को जीवित रख सकूं, यह तो जठराग्नि हुई—- मगर प्राणों को जीवित बनाए रखने के लिए प्राणाग्नि की जरूरत है। प्रत्येक के शरीर में प्राणाग्नि तो है, मगर वह बुझी हुई है, उसमें चेतना नहीं है, उसमें हलचल नहीं है। यह तो ठीक वैसा ही हुआ, जैसे कि हमारे घर में कोई वस्तु है, और हम उसका उपयोग जानते ही नहीं, यदि उपयोग नहीं जानते, तो उसका कोई प्रयोजन नहीं है। हमें यह भी पता नहीं है कि प्राणाग्नि को कैसे प्रज्वलित किया जाये और जब तक प्राणाग्नि प्रज्वलित नहीं होगी, तब तक साधना में सिद्धियां प्राप्त नहीं होगी। जब तक सिद्धियां प्राप्त नहीं हो सकती हैं, तब तक व्यक्ति उस मृत्यु को नहीं जीत सकता। मृत्यु को जीतने के लिए, सैकड़ो-हजारों वर्षों की आयु को प्राप्त करने के लिए पहली और अनिवार्य शर्त है, कि हम प्राणाग्नि को प्रज्वलित करें।
ऊँ प्राणाः सतम् वै प्राणः त्वं पूर्वों हूं वदां तां पूर्व वद वदैं ह्रीं
ऋर्षि की वाणी वेद में स्पष्ट होती है-‘‘अगर मेरे जीवन का सौभाग्य हो तो मेरी प्राणाग्नि जो बुझी हुई है, प्रज्जवलित हो जाय, उस प्राणाग्नि का प्रज्जवलन करके मैं जीवन के उन रहस्यों को ढूंढ सकूं, जिनके माध्यम से जीवन की श्रेष्ठता प्राप्त हो सकती है। मैं वापिस यौवनवान बन सकूं, चेतनावान बन सकूं, मैं ऐसा बन सकूं कि लोग मुझे देखें और एहसास कर सकें, कि वास्तव में पुरुषत्व क्या होता है, स्त्रीत्व क्या होता है? अपने आप में अद्वितीय सौन्दर्य प्राप्त कर सकूं- और यह सब दूसरों को सम्मोहित करने की कला प्राणाग्नि के माध्यम से ही सम्भव हो सकती है।’’ जो वास्तव में ही अद्वितीय योगी और संन्यासी होते हैं उनके चेहरे में एक विशेष प्रकार का प्रभाव होता है। उन्हें जो देखता है, वह सम्मोहित हो जाता है, मोहित हो जाता है, उस चेहरे को भूल नहीं पाता, आंखों को भुला नहीं पाता, हर क्षण उनके मन में रहता है, कि जरूर ही उस व्यक्ति में ऐसा कुछ है, उसकी आवाज में जादू है—-
और यह आवाज में जादू चेहरे का आकर्षण प्राणाग्नि प्रज्वलित होने पर सम्भव है। लाखों करोड़ो व्यक्तियों में से किसी एक की ही प्राणाग्नि प्रज्वलित हो सकती है और वह प्रज्वलित हो सकती है-‘‘गुरु चेतना के माध्यम से, गुरु ही उसे ज्ञान दे सकता है, क्योंकि इस अग्नि को प्रज्वलित करने की क्रिया केवल गुरु जानता है। वही जानता है, कि किन मंत्रों के माध्यम से, किस क्रिया के माध्यम से प्राणाग्नि प्रज्वलित हो सकती है।’’ कुछ विशिष्ट क्रियाएं हैं और प्रत्येक क्रिया अपने-आप में अद्वितीय है। सौ क्रियाओं के द्वारा सौ बीजोद्भव हुआ, ‘‘साम चैतन्य’’ तीसरा बीजोद्भव हुआ ‘‘आतोऽतान्ताम’’ यह चौथा बीजोद्भव हुआ ‘‘पूर्वत्वं सः पूर्वदवदं’’ यह पांचवा बीजोद्भव हुआ और इस प्रकार से सौ बीजोद्भवों का उच्चारण करना लोम और विलोम गति से, उस प्राणाग्नि को प्रज्वलित करने की प्रक्रिया है। कुछ विशेष मुद्राओं के माध्यम से उन बीजोद्भवों को सम्पृत्तफ़ करना, अपने-आप में प्राणाग्नि को प्रज्वलित करना है। जब यह प्राणाग्नि प्रज्वलित होती है, तो स्वतः ही चेहरे पर एक चैतन्यता प्रकट हो जाती है। अपने-आप आंखों में एक लपक पैदा हो जाती है, एक चमक पैदा हो जाती है, एक तेजस्विता, एक प्रकाश-पुंज पैदा हो जाता है।
यम ने कहा- ‘‘मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि तुम्हारी प्राणाग्नि प्रज्जवलित हो और तुम मृत्यु से परे हो सको।’’ यहां उपनिषद ने एक और गूढ़ बात कही, जिस पर विचार करना आवश्यक है। यम ने कहा-‘‘ मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि तेरी प्राणाग्नि प्रज्वलित हो।’’ इसका तात्पर्य यह हुआ, कि प्राणाग्नि प्रज्वलित करने के लिए दो तरीके हैं- एक तरीका मुद्राओं, क्रियाओं और मंत्र के माध्यम से, और दूसरा तरीका किसी अद्वितीय योगी के आशीर्वाद के माध्यम से भी। यदि गुरु चाहे—-जिसकी स्वयं की प्राणाग्नि प्रज्जवलित है, जो अपने-आप में अति विशिष्ट योगी है, जो सही अर्थों में गुरु है—-तो वह आर्शीवाद देकर भी शिष्य की प्राणाग्नि प्रज्जवलित कर सकता है, जैसा कि यम ने आशीर्वाद देकर नचिकेता की प्राणाग्नि प्रज्जवलित की।
नचिकेता ने कोई मुद्रा नहीं सीखी, उसने किसी मंत्र का उच्चारण नहीं किया, मगर फिर भी उसकी प्राणाग्नि प्रज्वलित हुई, इसलिए क्योंकि यम ने उसको आशीर्वाद दिया- — और आशीर्वाद देने का तात्पर्य है, कि मेरे पास जो प्राणाग्नि प्रज्वलित है, उसमें से ही कुछ भाग मैं तुम्हें देता हूं, जिससे कि तुम्हारी प्राणाग्नि प्रज्वलित हो। जिस प्रकार से एक दीप से दूसरा दीप जल सकता है, ठीक उसी प्रकार से अगर शिष्य, गुरु के पास आ जाय, तो उसके ज्ञान का बुझा हुआ दीया भी जल सकता है, प्राणाग्नि प्रज्वलित हो सकती है- और दूसरी क्रिया मंत्र के माध्यम से भी, उन सौ बीजोद्भवों का, सौ क्रियाओं के माध्यम से उच्चारण करें, लोम गति से और विलोम गति से भी । इस प्रकार निरन्तर जप करने से भी प्राणाग्नि प्रज्जवलित हो सकती है। यद्यपि यह रास्ता बड़ा है, लम्बा है, मगर फिर भी इस रास्ते पर चलकर कई योगियों, संन्यासियों और ऋषियों ने प्राणाग्नि प्रज्जवलित की है—–और कर सकते हैं।
-‘‘इन दोनों के अतिरिक्त एक विकल्प भी है, जहां गुरु के आशीर्वाद के माध्यम से, प्राणाग्नि प्रज्वलित हो सकती है, वहीं गुरु की निकटता प्राप्त कर भी प्राणाग्नि प्रज्वलित हो सकती है।’’ ‘क्योंकि गुरु तो एक जलता हुआ दीया है, जो रोशनी बिखेर रहा है और तुम उस दीपक की भांति हो, जिसमें तेल तो भरा हुआ है, मगर उसमें रोशनी नहीं है, यदि इन दोनों के बीच में एक सूत भर भी अन्तर रह गया, तब भी दीया नहीं जलेगा। दीया जलने के लिये यह जरूरी है, कि वह दीया उस दीये से मिल जाय—-दोनों के एक-दूसरे से मिलने की क्रिया से दीया जलेगा। दीया जलने का मतलब है, शिष्य की प्राणाग्नि प्रज्जवलित हो जाती है, वह अपने आप में एक अद्वितीय योगी बन अमृत्युवान हो जाता है, वह स्वस्थ रह सकता है, तन्दरूस्त रह सकता है, दीर्घायु हो सकता है और मृत्यु से परे जा सकता है।
जहां मृत्यु नहीं, वहां पीड़ा भी नहीं है, परेशानी नहीं है, बाधाएं नहीं हैं, और जब हम मृत्यु से भयभीत नहीं हैं, तो फिर हमें किसी बात की चिन्ता भी नहीं हो सकती, क्योंकि पीड़ा, बीमारियां, कष्ट और वृद्धता मृत्यु के संकेत हैं, मृत्यु के आने की पहली थरथराहट हैं। जब रोग आ रहे हैं, तो समझ लेना चाहिए, कि अब मृत्यु पास आ रही है, वह पहली दस्तक है, जब मृत्यु के आने की स्थिति निर्मित होती है, तो वह सौ बार दरवाजे पर ठकठक करती है, कभी तकलीफ के द्वारा, कभी बीमारी के द्वारा, कभी हाथ में दर्द है, तो कभी दांत गिर रहे हैं- ये सारी की सारी स्थितियां बार-बार दरवाजे पर ठक-ठक कर रही हैं, कि अब मैं आ रही हूं—- वह अचानक नहीं आती, आती है आवाज देती हुई, दरवाजे को ठोकती हुई, दरवाजे पर ठक-ठक करती हुई। जब ब्लड प्रेशर होता है, तो यह पहली आवाज होती है, कि मैं आ रही हूं, जब आंखों की रोशनी कम होती है, तो वह दोबारा कहती है, कि अब मैं आ रही हूं -यह अलग बात है, कि हम सुने नहीं, मौत तो लगातार आवाज देती रहती है। मगर जब प्राणाग्नि प्रज्वलित हो जाती है, तो उस प्राणाग्नि में यह बुढ़ापा स्वतः ही समाप्त हो जाता है, वह अपने-आप में जल जाता है, उस व्यक्ति को न पीड़ा रहती है, न बुढ़ापा कष्ट रहता है, वह मृत्यु से परे हो जाता है-नचिकेता के साथ भी ऐसा ही हुआ।
यम ने कहा-‘‘अब तू दीर्घायु होगा, मृत्यु तेरे अनुकूल रहेगी— तू चाहेगा, तो मृत्यु आयेगी, तू चाहेगा, तो मृत्यु नहीं आयेगी— मृत्यु नहीं आयेगी, तो फिर रोग भी नहीं आयेगा, जब मृत्यु नहीं आयेगी, तो फिर बुढ़ापा भी नहीं आयेगा।’’ नचिकेता ने कहा- ‘‘आपने मुझे तीसरा वरदान मांगने को कहा और मैं आपकी आज्ञा का पालन करते हुए तीसरा वरदान मांग रहा हूं।’’ -‘‘आप मुझे ब्रह्म विद्या का उपदेश दें। जिसके माध्यम से व्यक्ति पूर्ण ब्रह्ममय बन जाता है, पूर्ण ब्रह्माण्ड युक्त बन जाता है और अहं ब्रह्मास्मि शब्द से स्वयं को सम्बोधित करने की क्षमता प्राप्त कर लेता हैं।’’ यम ने कहा-‘‘तूने तीसरा वरदान बड़ा कठिन मांगा है। मैं तुझे कहता हूं, कि तू इस तीसरे वरदान को मांगने की हठ छोड़ दे। लाखों गायें तुम्हें दे देता हूं, मगर तू यह वरदान मत मांग।’’ नचिकेता ने कहा-‘‘जो मैंने मांगा है, मैं वही प्राप्त करना चाहता हूं।’’ नचिकेता ने कहा- ‘‘मैं इस स्वर्ण ढेर को लेकर क्या करूंगा? वह तो समाप्त हो जायेगा, वह तो मेरे शरीर के साथ ही अपने-आप में व्यर्थ हो जायेगा, मैं तो उस ब्रह्म विद्या को जानना चाहता हूं, जो अमृतत्व है, जो अमृत कुण्ड है, जो अपने-आप में सिद्धाश्रम है, पूर्णता है, श्रेष्ठता है।’’ यम एक बार फिर उसको प्रलोभन देते हैं-‘‘नचिकेता सुन्दर स्त्रियों को मांग ले, मैं तुझे असंख्य सुन्दर स्त्रियां देता हूं, जिनका तू भोग कर सकता है, मगर इस विद्या को मत प्राप्त कर, यह वरदान मत मांग।’’
पर नचिकेता कहता है-‘‘जो चीज मुझे चाहिए, अगर वह ही प्राप्त नहीं हो, तो मैं हजारों-हजारों सुन्दर स्त्रियों को लेकर भी क्या कर लूंगा, उसका क्या प्रयोजन होगा? यहां उपनिषद का एक नवीन गूढ़ रहस्य को स्पष्ट करता है, कि इस उच्चकोटि के ज्ञान, अहं ब्रह्मास्मि के रहस्य सूत्र को प्रदान करने के पूर्व गुरु कई पासे फेंकता है, गुरु प्रलोभन देता है-यह विद्या तेरे किसी काम की नहीं हैं, तू इस विद्या को प्राप्त मत कर, मैं तुझे लक्ष्मी साधना दे देता हूं, मैं तुझे तारा साधना दे रहा हूं, मैं तुझे अप्सरा साधना दे रहा हूं, उस अप्सरा साधना के माध्यम से तू जीवन का आनन्द प्राप्त कर सकेगा, अप्सरा हर क्षण तेरे पास रहेगी, लक्ष्मी आबद्ध क्रिया दे रहा हूं, जिसके माध्यम से लक्ष्मी चौबीसों घंटे तेरे पास रहेगी और धन की वर्षा होती रहेगी। गुरु भी अपने-आप में टटोलता है- और गुरु को टटोलना भी चाहिए, यह जरूरी है गुरु के लिए। यदि गुरु ऐसा नहीं करे, तो एक अपात्र को यह विद्या मिल जायेगी। मगर जो योग्य शिष्य हैं, कर्मठ शिष्य हैं, वे इन प्रलोभनों में नहीं आते, उनका तो एक ही लक्ष्य होता है, एक ही उद्देश्य होता है और वे मात्र अपने लक्ष्य के विषय में ही सोचते हैं।
नचिकेता यदि चाहता, तो बीच में रूक जाता और प्रलोभनों में आ जाता। वह स्वर्ण ढेर लेकर शांत हो जाता, सुन्दर स्त्रियों को प्राप्त करके रूक जाता। गुरु के द्वारा प्रदत्त प्रलोभन से शिष्य यदि बीच में ठहर जाता है, तो समझ लेना चाहिए, कि यह शिष्य तो अपात्र है, अयोग्य है। यह शिष्य ब्रह्म विद्या प्राप्त करने का अभिलाषी नहीं है, ब्रह्म विद्या को प्राप्त करने की इसमें ललक नहीं है, इसमें एक जीवट शक्ति नहीं हैं। ब्रह्म विद्या को प्राप्त करने का तात्पर्य है, कि व्यक्ति अपने-आप में कर्मठ हो, योग्य हो, साहसी हो, प्रलोभनों से परे हो—-और यदि ब्रह्म विद्या को प्राप्त करने के बाद प्रलोभनों में घिर जाय, तो उससे घटिया शिष्य तो कोई बन ही नहीं सकता—- ब्रह्म विद्या को जानने वाला शिष्य यदि उन स्त्रियों के चक्कर में पड़ जाय, तो बहुत बड़ा अहित हो जाएगा, इसलिए शिष्य की परीक्षा लेनी जरूरी होती है, उसको अन्य कोई तरीकों से चेतना देना जरूरी होता है। गुरु तो एक पासा फेंकता है, एक चालाकी बरतता है, एक प्रलोभन देता है—-और गुरु प्रलोभन देता ही है।
पर नचिकेता दृढ़ निश्चयी रहा और बोला-‘‘ अगर आप मुझे दें, तो ब्रह्म विद्या ही दें, क्योंकि मैं तो ब्रह्म विद्या ही प्राप्त करना चाहता हूं। यम बहुत प्रसन्न होते हैं, और ब्रह्म विद्या देते हैं ‘‘सः ब्रह्म सः पूर्णं सः चिन्तयं सः अद्वितीयं सः सोहं सः पूर्वः सः चिन्त्यं’’ ‘तू अपने आप में पूर्ण विरक्त बन, तू अपने आप में पूर्ण निस्पृह बन, इस गृहस्थ में रहता हुआ भी तू गृहस्थी मत बन, इस संसार में रहकर भी तू संसारी मत बन, जीवन में पूर्णता से ब्रह्मतत्वमय बन। तू मेरे पास आया है, तूने मुझे गुरु बनाया है, मुझे अपने-आप को सौंपा है, मैं तुझे अपने आर्शीवाद के द्वारा ब्रह्म विद्या दे रहा हूं।’’ आशीर्वाद के द्वारा भी, मंत्रों के द्वारा भी- शिष्य दोनों तरीकों से गुरु के द्वारा उस ब्रह्म विद्या को जान सकता है। गुरु यदि प्रसन्न हो जाते हैं, तो उसे आशीर्वाद देकर भी ब्रह्म विद्या में पूर्ण सिद्ध कर सकते हैं, ब्रह्ममय बना सकते हैं, पूर्ण ब्रह्मर्षि बना सकते हैं। यम ने ऐसा ही किया, नचिकेता के सिर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और उसे अपने वरदान द्वारा पूर्ण ब्रह्म ऋर्षि बनाया, उसे मृत्यु के परे पहुंचने की कला सिखाई, उसे मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की विद्या सिखाई, उसे सिद्धाश्रम की प्राप्ति कराई।
जहां मृत्यु है ही नहीं, जहां आनन्द ही आनन्द है, जहां श्रेष्ठता है, जहां पूर्णता है, अपने-आप में पूर्णता है- उसी को तो सिद्धाश्रम कहते हैं। सिद्धाश्रम का तो तात्पर्य ही यह है, कि जहां मृत्यु नहीं है, जहां किसी प्रकार की वृद्धता नहीं है, जहां किसी प्रकार की कमी नहीं है, जो चीज चाहें, वह उसी क्षण प्राप्त हो जाय, हम अपने-आप में तेजस्वी पुष्ठ बन सकें—– और ब्रह्ममय बनना, सिद्धाश्रम में जाना श्रेष्ठ गुरु के द्वारा ही सम्भव है, श्रेष्ठ गुरु के द्वारा ही ब्रह्म विद्या को जानने की क्रिया सम्भव है। जो शिष्य प्रलोभनों से परे हो जाता है, जो अपने-आप को इष्ट, अपने गुरु के चरणों में समर्पित कर देता है, जो अपनी देह को, अपने प्राणों को गुरु के चरणों में समर्पित करता हुआ इस विद्या को जानने का अभीप्सित बनता है, जो निश्चय कर लेता है, कि मुझे यह विद्या जाननी ही है, तो वह दोनों तरीकों से जान सकता है।
पहला तरीका है-उस मंत्र को सीख कर , जो ब्रह्म विद्या से सम्बन्धित है, ब्रह्म दीक्षा को प्राप्त करके, पूरे शरीर की चैतन्यता प्राप्त कर, उन क्रियाओं के माध्यम से, मुद्राओं के माध्यम से, उस मंत्र का निरन्तर जप करने के माध्यम से ब्रह्म विद्या को प्राप्त कर सकता है। यह जीवन की श्रेष्ठतम विद्या है, अद्वितीय विद्या है। इस विद्या की तुलना इस विश्व में हो ही नहीं सकती। इसके द्वारा वह सब कुछ प्राप्त करने का अधिकारी बन जाता है, सारे वेद, पुराण उसे कंठस्थ हो जाते हैं, वह जीवन में जिस वस्तु की कामना रखता है, वह वस्तु उसे प्राप्त हो जाती है, फिर वह अत्यन्त भोगी होते हुए भी योगी बना रहता है—इसीलिए तो श्रीकृष्ण को सोलह हजार रानियों के पति होते हुए भी योगेश्वर कहा गया—-फिर वह भोग में योग की कला को जान लेता है, फिर वह योग में ही भोग को देख लेता है, वह अपने-आप में निस्पृह होता है, जैसे कमल जल में रहते हुए भी निर्लिप्त रहता है, ठीक उसी प्रकार से वह संसार में निर्लिप्त रहता है—–और फिर अहं ब्रह्मस्मि वाक्य को उद्घोषित करने का अधिकारी बन जाता है, क्योंकि वह ब्रह्म से साक्षात्कार कर, उससे एकाकार हो चुका है, उसने ब्रह्म को अपने अन्दर उतार लिया है, अपने-आप में रचा पचा लिया है।
-और दूसरा तरीका है- कि विद्या आशीर्वाद के द्वारा भी सम्भव है, अर्थात गुरु के द्वारा आर्शीवाद प्राप्त करके भी वह पूर्ण ब्रह्मर्षि बन सकता है-और प्राप्त कर सकता है, जीवन का असली आनन्द चैतन्यता, मस्ती, खुमारी और अमरत्व। दोनों माध्यमों से पूर्णता सम्भव है। दो भिन्न मार्ग हैं, परन्तु एक ही सार तत्व दोनों को जोड़ता है और वह यह है, कि दोनों क्रियाएं गुरु ही सम्पन्न कर सकते हैं- मंत्र का ज्ञान भी गुरु के मुख से प्राप्त हुआ है तो फलीभूत होता है—-और आशीर्वाद भी गुरु ही दे सकते हैं, तभी गुरु की अनन्त महिमा को हर वेद, हर उपनिषद्, हर योगी, हर ऋषि, संन्यासी ने एकमत हो स्वीकारा है-
गुरु ब्रह्मा गुरु र्विष्णुः गुरु र्देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।।
-पूज्यपाद गुरुदेव डॉ- नारायण दत्त श्रीमाली जी
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