





भौतिक जगत में इस शक्ति का सबसे श्रेष्ठ स्वरूप महालक्ष्मी हैं, जो सीमा-रहित, नित्य निवासिनी विष्णु की नारायणी शक्ति हैं और इसी शक्ति के विभिन स्वरूप- लक्ष्मी, श्री, पप्रा, पप्रालिनी, कमला, इत्यादि हैं। इस ‘‘अहन्ता’’ शक्ति की सिद्धि और विजय व्यक्ति को तभी प्राप्त हो सकती है, जब वह देवी के त्रिगुणात्मक स्वरूप की प्राप्ति करें।
जीवन पग-पग पर परिवर्तनशील है, न जाने कब, कौन-सी विकट परिस्थिति से गुजरना पड़ जाये? शत्रु तो हर मोड़ पर तैनात सैनिकों की तरह खड़े रहते हैं हमला करने के लिए। उस अचानक प्रहार से व्यक्ति संकट में फंस जाता है और उस प्रहार को झेल नहीं पाता, और ऐसी स्थिति में व्यक्ति निर्णय नहीं कर पाता कि अब वह क्या करें—- क्या नहीं करें।
‘दुर्गा रहस्य’ से अपने जीवन में आने वाले हर शत्रु को हर बाधा को, हर अड़चन को हमेशा-हमेशा के लिए दूर किया जा सकता है, फिर किसी टोने-टोटके की या तांत्रिक प्रयोग की आवश्यकता शेष नहीं रह जाती, फिर उसे हर प्रकार के डर, भय से छुटकारा मिल जाता है, क्योंकि इस दुर्गा रहस्य को जानने के बाद उसे ऐसा महसूस होने लगता है, मानों कोई शक्ति हर क्षण उसके साथ है और उसकी सहायता कर रही है। वह अपने-आप को सुरक्षित और निर्भय अनुभव करने लगता है, और उस शक्ति के माध्यम से ही उसमें दृढ़ता और विश्वास का जागरण होता है, जिसके फलस्वरूप उसमें शत्रुओं को परास्त करने की क्षमता स्वतः ही आने लगती है— लेकिन यह तभी संभव हो सकता है जब उसे इस रहस्य का पूर्ण ज्ञान हो और इसके प्रति पूरी श्रद्धा और विश्वास हो।
जहां स्वर्ण खप्पर युक्त त्रि-शक्ति दीक्षा से तीनों शक्तियां व्यक्ति के जीवन में उन तत्वों को निरन्तर उत्पन्न करती रहती हैं, जिससे उसके जीवन में कभी किसी भी तरह की कोई बाधा अड़चने आती ही नहीं। अपने सामर्थ्य से जो व्यक्ति स्वर्ण खप्पर युक्त त्रि-शक्ति दीक्षा को अपने में स्थापित करता है, उसका घर, धन-धान्य, पुत्र, स्त्री, लक्ष्मी से कभी रिक्त नहीं हो सकता और उसके जीवन में कभी किसी भी प्रकार का कोई अभाव रह ही नहीं सकता।
अगले पृष्ठ पर अंकित पांच पत्रिका सदस्य बनाने पर उक्त दीक्षा उपहार स्वरूप प्रदान की जायेंगी।
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