





पुराणों के अनुसार महर्षि पुलस्य के पुत्र योगीराज विश्रवा ने भारद्वाज की कन्या इलविला से विवाह किया था और इसी से कुबेर की उत्पत्ति हुई थी। बाल्यावस्था से ही कुबेर ब्रह्मा के भक्त बने और ब्रह्मा ने ही कुबेर को संसार की समस्त सम्पत्ति की साधना सम्पन्न कराकर, सम्पत्ति का अधिकारी बनाया और कैलाश पर्वत के समीप अलकापुरी के ये स्वामी बने।
सही अर्थों में देखा जाए, तो वेदों और पुराणों में लक्ष्मी की साधनाएं कम दी गई हैं, इसकी अपेक्षा कुबेर साधना पर विशेष बल दिया गया है। पूर्ण ऐश्वर्य जीवन की प्राप्ति केवल कुबेर साधना द्वारा ही सम्भव है।
कुबेर साधना के लाभ
1- कुबेर साधना सिद्ध करने से धनाधीश कुबेर प्रसन्न होते हैं और साधक के जीवन में सभी दृष्टियों से समृद्धता एवं सफलता प्रदान करते हैं।
2- इस साधना के द्वारा साधक को जीवन में ‘अक्षय कोष सिद्धि’ की प्राप्त होती है। वह ज्यों-ज्यों खर्च करता है, त्यों-त्यों उसकी सम्पत्ति अकूत बढ़ती ही जाती है। यह पता ही नहीं चलता, कि इतना धन कहां से आ रहा है और किस प्रकार से आ रहा है। ऐसी स्थिति निर्मित होना इस साधना के प्रभाव से ही संभव है।
3- कुबेर साधना के द्वारा साधक को विशेष सिद्धि प्राप्त हो जाती है, जिसे ‘भूगर्भ सिद्धि’ कहा गया है। इसके द्वारा साधक को जमीन के अन्दर छिपे हुए धन या खजाने का पता चल जाता है कि वहां पर कितनी गहराई में कितना स्वर्ण भण्डार या द्रव्य गड़ा हुआ है और उसको किस प्रकार से निकाला जा सकता है।
आज भी ऐसे योगी हैं जो देखते ही क्षण मात्र में बता सकते हैं, कि अमुक स्थान पर इतना इतना द्रव्य गड़ा हुआ है और जमीन में कितनी गहराई पर गड़ा है। साथ ही उसको कैसे निकाला जाए, इन सबका प्रामाणिक उपाय भी उनको ज्ञात होता है, इसके पीछे कुबेर सिद्धि ही छिपी होती है। परन्तु स्वयं को समाज के समक्ष प्रकट न होने की इच्छा से वे अपनी सिद्धियों को उजागर नहीं करते हैं और एक निर्लिपत संन्यासी की भांति विचरण करते रहते हैं या सामाजिक जीवन जीते हुए भी साधारण से बने रहते हैं।
कुबेर यंत्र अपने आप में पूर्णतः गोपनीय रहा है। यद्यपि इस यंत्र से सम्बन्धित कई ग्रंथों में वर्णन आया है परन्तु इसका सही रूप में अंकन कहीं पर भी प्राप्त नहीं हुआ। इस यंत्र के बारे में कहा जाता है कि पिता को चाहिए कि वह कुबेर मंत्र का ज्ञान अपने पुत्र को भी न दे और गुरु को चाहिए कि वह अपने जीवन में अत्यंत प्रिय शिष्य को ही इस मंत्र का ज्ञान दे। दोनों ही तथ्यों में स्पष्ट है कि यह मंत्र अत्यंत गोपनीय रहा है और इसकी प्रामाणिक साधना पद्धति का और यंत्र प्राण प्रतिष्ठा का कहीं लिखित रूप में विवेचन भी नहीं है।
परन्तु इस मंत्र की श्रेष्ठता और प्रभाव को लगभग सभी तांत्रिकों ने एकमत से स्वीकार किया है, सभी मंत्र मर्मज्ञों ने इस यंत्र की सराहना की है। प्राचीन समय में जितने भी आश्रम थे, उन आश्रमों में पूर्ण विधि-विधान के साथ कुबेर यंत्र की स्थापना अवश्य की जाती थी, जिससे कि वे आश्रम धन धान्य से समृद्ध रहते थे, हजारों शिष्यों का पालन-पोषण ऐसी श्रेष्ठ साधना को पूर्णरूपेण सिद्ध कर धन आगम का निरन्तर प्रवाह बनाने से सम्भव हो पाता है और वे आश्रम राजाओं से भी ज्यादा समृद्ध माने जाते थे। इन सबके मूल में कुबेर यंत्र का ही प्रभाव था।
पुराणों के अनुसार लंकानरेश रावण ने तपस्या कर महादेव से कुबेर यंत्र प्राप्त किया था और इस यंत्र को सिद्ध किया था, जिसके फलस्वरूप वह और उसका राज्य पूर्णतः समृद्ध हो सका तथा उसकी लंका सोने की बन सकी थी।
एक प्रसिद्ध उद्योगपति का कहना है, कि उनके परदादा की सेवा से प्रसन्न होकर एक महात्मा ने एक यंत्र दिया था और कहा था कि मात्र इस यंत्र को अपनी तिजोरी में रख देना और दीपावली की रात्रि को इसका पूजन कर लेना और नित्य इस का एक बार दर्शन कर लेना। तब से उनकी तीन पीढि़यां महात्मा जी के बताए नियम का पालन करती आ रही हैं और आज जो इतना बढ़ा हुआ उद्योग है, लक्ष्मी है, वैभव है, सब मात्र उस यंत्र के प्रभाव से ही है। वह यंत्र और कोई नहीं बल्कि ताम्र पत्र पर हाथ से अंकित एक जर्जर कुबेर यंत्र था, जिसे कांच में मढ़वा कर सुरक्षित ढंग से रखा गया था।
कुबेर साधना विधि
यह साधना तीन चरणों में सम्पन्न की जाती है। प्रथम दिवस का पूजन, दूसरे चरण में दीपावली रात्रि में आहुति एवं तीसरे चरण में प्रथम दिवस के साधना विधान को पुनः दोहरा लिया जाता है। प्रथम चरण में अर्थात कार्तिक कृष्ण अहोई अष्टमी 27-10-2013 के दिन रवि पुष्प योग शुभ मुहूर्त में कुबेर यंत्र का स्थापन कर पूजन किया जाता है। दूसरे चरण में दीपावली के दिन कार्तिक अमावस्या में वृषभ लग्न में कुबेर मंत्र से 108 बार तिल और जौ की आहुति दी जाती है और फिर तीसरे चरण में कार्तिक शुक्ल पक्ष की अक्षय नवमी को पुनः प्रथम चरण वाली साधना सम्पन्न करनी चाहिए। ऐसा करने से साधक को धनाधीश बनने से कोई रोक नहीं सकता है। यह मुहूर्तों का ऐसा संयोग है, जिसमें सम्पन्न की गई कुबेर साधना कभी निष्फल जाती ही नहीं। अक्षय का तात्पर्य है, जहां क्षय हो ही नहीं। कुबेर साधना का अभिजीत मुहूर्त में प्रारम्भ, मध्य में स्थिर लग्न दीपावली का लक्ष्मी सिद्धि मुहूर्त और अक्षय नवमी को पूर्णता, इन तीनों का संयोग मात्र एक ही साधना में यदि हो रहा हो, तो इससे श्रेष्ठ साधना और कोई हो ही नहीं सकती है।
27 अक्टूबर से 17 नवम्बर के मध्य साधना सम्पन्न करनी चाहिए।
प्रथम चरण साधना
अहोई अष्टमी रविवार 27 अक्टूबर को सांध्य बेला के बाद शुभ मुहूर्त में अपने आसन पर बैठ जाएं। पूजा की आवश्यक सामग्री, गुरु चित्र आदि पास रख लें। गुरु चित्र को गीले वस्त्र से पोंछ कर चरणों में कुंकुंम, पुष्प, अक्षत आदि चढ़ाएं, धूप दीप दिखाएं। तत्पश्चात साधक अपने सिर के भीतर स्थित सहस्त्र दल कमल के बीच में गुरुदेव का चिन्तन करते हुए उनका ध्यान करते हुए निम्न ध्यान मंत्र का उच्चारण करें।
सहस्त्र दल पंकजे सकल शीत रश्मि प्रभम्।
वराभय कराम्बुजं विमल गन्ध पुष्पाम्बरम्।।
प्रसन्न वदनोक्षणं सकल देवता रूपिणम्।
स्मरेत् शिरसि हंसर्ग तदभिधान पूर्व गुरुम्।।
ब्रह्मानन्दं परम सुखदं केवलं ज्ञान मूर्तिम्।
द्वन्द्वातीतं गगन सदृशं तत्वमस्यादि लक्ष्यम्।।
एकं नित्यं विमल अचल सर्वश्री साक्षी भूतम्।
भावातीतं त्रिगुण रहितं सद्गुरुं तं नमामि।।
हंसो हंस गुरुः श्रेष्ठः सुखानन्दः सुखात्मनः।
तस्य स्मरण मात्रेण मुक्तिस्तत्र न संशय।।
इसके बाद दाहिने हाथ में जल लेकर निम्न
विनियोग बोलकर जल को भूमि पर छोड़ें-
ऊँ अस्य मंत्रस्य विश्रवा ऋषिः छन्दः।
शिवमित्र धनेश्वरी, दारिद्रय विनाशन पूर्ण
समृद्धि सिद्धचर्ये जपे विनियोग।
दोनों हाथ जोड़कर कुबेर का आव्हान् करें-
मनुजबाह्यविधान वरस्थितं गरुड़ रत्ननिभं
निधि नायकम्। शिवसखं मुकुटादि
विभूषितं वर-वदे दधतं भज तुंदिलम्।।
इसके बाद ताम्र पात्र में कुंकुंम से एक
त्रिकोण बनाकर उसके भीतर ‘कुबेर यंत्र’ को
स्थापित करें। त्रिकोण के तीनों कोनों में तीन दीपक
जलाएं। तत्पश्चात ‘वैभव श्री माला’ से निम्न मंत्र
की 11 माला मंत्र जप सम्पन्न करें-
प्रत्येक माला पूर्ण होने पर एक चम्मच जल मिश्रित दुग्ध यंत्र पर अर्पित करें। जप समाप्ति के बाद यंत्र को पोछ कर लाल कपड़े में लपेट कर तिजोरी में रख दें। जल को प्रसाद रूप में पूरे परिवार को दे।
इसके पश्चात् मध्य चरण में दीपावली की रात्रि 03 नवम्बर रविवार को वृषभ लग्न में उपरोक्त मंत्र बोलकर, मंत्र के अंत में ‘स्वाहा’ लगाकर तिल-जौ की 108 आहुति दे। तृतीय पूर्ण चरण में अक्षय लक्ष्मी कार्तिक पूर्णिमा 17 नवम्बर रविवार को यही साधना क्रम दोहरा लें। स्थायी रूप से यंत्र को तिजोरी में रखे और माला को जल में प्रवाहित कर दे।
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