





उड़ीसा के श्री शैल पर्वत से सम्बन्धित चौरासी सिद्धों की कथा से सभी परिचित हैं, जिन्होंने भोग को ही मुक्ति का उपाय बताया और खुल कर पंचमकारों का सेवन किया। ऐसे ही चौरासी सिद्धों में एक प्रमुख सिद्ध सरहपाद की शिष्य परम्परा में आगे चलकर योगी जालन्धर नाथ हुए, जिन्होंने अपना पूर्ण स्वतंत्र नाथ सम्प्रदाय स्थापित किया, जिसमें आगे चलकर मत्स्येन्द्रनाथ एवं गोरखनाथ हुए। गोरखनाथ ने ही नाथ सम्प्रदाय में से वामाचार हटाकर पूर्णरूप से इसे हठयोग का रूप दिया।
भोग को जीवन में अत्यधिक महत्त्व देने के कारण यह स्वाभाविक था कि नाथ सम्प्रदाय के पूर्ववर्ती सभी योगी अप्सरा साधनाओं, यक्षिणी साधनाओं एवं किसी भी प्रकार की इतर साधनाओं को प्रमुखता देते थे। केवल उनके काल तक ही नहीं, बाद में भी गुरु गोरखनाथ की परम्परा में आगे चलकर अनेक सिद्धों ने तंत्र और भोग का सम्मिश्रण कर नए-नए साधना सूत्र ढूंढे और उनके ये सूत्र किसी भी पद्धति से अधिक तीव्र व प्रामाणिक रहे। उदाहरण स्वरूप गोरखनाथ के ही शिष्य करवाल भैरव हुए जिन्होंने भैरवी चक्र सम्प्रदाय को प्रारम्भ किया और अपने ग्रंथ ‘आनन्द मंगल’ में स्त्री के माध्यम से स्वर्ण बनाने की कुछ क्रियाओं को स्पष्ट किया, जिसमें से भैरवी साधना, भैरवी पूजन और भोग भैरवी क्रियाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
उनकी यह परम्परा और प्रयोग-साधना की लालसा केवल विषय विशेष तक अथवा स्त्री के माध्यम से स्वर्ण निर्माण तक ही सीमित नहीं रही, वरन और भी आगे बढ़कर उन्होंने उन अप्सराओं की साधना पद्धतियां खोजीं, जिनकी साधना पद्धति अन्य रूप में प्रचलित थी। यह एक प्रकार से उनका हठ था और उनकी परम्परागत तंत्र पद्धति को चुनौती थी। इसके माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया कि वे उन अप्सराओं को प्रकट कर सकते हैं जो अपने-आप में सौन्दर्य की साकार मूर्ति बताई गई हैं।
प्रमुख अप्सराओं के नाम के मध्य तिलोत्तमा का नाम उफनते यौवन की साकार मूर्ति के रूप में वर्णित किया गया है। उर्वशी, रम्भा, मेनका, घृताची सदृश्य उच्चकोटि की अप्सराओं में से हैं।
सुतवां अण्डाकार चेहरा, सामान्य से कुछ बड़ी लेकिन बोलती आंखें, हल्का सा सुनहरापन लिए खिलता हुआ गोरा रंग, रसीले अधर और गढ़ी हुई चिबुक———इन्हीं का सम्मिलित नाम है मेनका अप्सरा। सामान्य से कुछ लम्बी देह यष्टि और सांचे में ढला हुआ सारा बदन, जिस पर यौवन की लालिमा हल्की सी उत्तेजना के कारण जगमगा रही हो, और सारा जिस्म एक अनोखी सी मादकता से भीगा हो। सुडौल वक्ष-स्थल, जिसकी गठन से किसी भी साधक के दिल में सनसनी भर जाए और जिन पर कौंधती हुई सुनहरी लडि़यों से किसी का भी ध्यान उन उन्नत बिन्दुओं की ओर जाने को बाध्य हो ही जाए। सीधे, सपाट रोम रहित नाभि प्रदेश, जिसकी प्रत्येक पग में थिरकन हो, यौवन के गीत गा रही हो, ऐसी ही सौन्दर्यवती मेनका निसन्देह अपने संग की अप्सराओं के मध्य एक उच्च स्थान प्राप्त करने की स्वामिनी है ही।
उन्नत नितम्ब प्रदेश और कदली वृक्ष के नव पल्लवों की ही भांति शरद की सुनहरी धूप में कोमल आभा देती सुडौल और रोम रहित भारी जंघाएं, जिनकी कोई उपमा उनकी मासंलता में न समा रही हो। सम्पूर्ण देह यौवन की नृत्य मुद्राओं को प्रदर्शित करता हुआ जिसका उद्दाम नर्तन देखना तो सचमुच सौभाग्यशाली साधकों के जीवन की ही घटना हो सकती है। और इसी सौभाग्य के साक्षी रहे नाथ योगी, उन्होंने अपने मंत्र बल, साधनात्मक बल और पौरूष के दम पर न केवल इन विशिष्ट अप्सराओं को प्रकट होने को बाध्य किया वरन उनके यौवन का उपभोग कर यह स्पष्ट किया कि यदि साधक चाहे तो वह भी अपने जीवन इन्द्र से कम वैभव नहीं एकत्र कर सकता है।
ऐसी ही अनेक साधनाओं में से एक विशिष्ट साधना, जो मेनका के प्रत्यक्षीकरण से सम्बधित है उसका विवरण मैं आगे की पंक्तियों में करुंगा जिसके माध्यम से मेरे कथन की प्रामाणिकता स्पष्ट हो सकेगी। यद्यपि प्रारम्भ का कार्य, जब इन साधनाओं की रचना की गई वह भिन्न था और साधक समाज से कट कर अपने विशिष्ट ढंग से इनकी सिद्धि करते थे। जबकि आज ऐसा नहीं रह गया है और न ऐसा आवश्यक ही है कि इन साधनाओं को समाज से अलग हटकर, एकान्त में बैठकर सिद्ध किया जाए। सच तो यह है कि अप्सरा साधनाओं की आवश्यकता गृहस्थ के जीवन में ही है, क्योंकि जीवन में भोगयुक्त रहना तथा जीवन के सभी सुखों का आस्वादन करना केवल गृहस्थ के द्वारा ही सम्भव होता है, सौन्दर्य की यथार्थ परिभाषा और सौन्दर्य का प्रत्यक्षीकरण उसके लिए ही आवश्यक होता है। काल के परिवर्तन के साथ नाथ योगियों के परम्परागत उपायों के स्थान पर यंत्रें के विधान रचे गए।
मैंने अप्सराओं के विषय में अत्यधिक रोचक प्रसंग सुने और पढ़े थे, कि उनके साथ रहने पर हर क्षण हृदय में ताजगी का अनुभव होता है, परन्तु अप्सराओं का साहचर्य किस प्रकार की आनन्दानुभूति प्रदान करता है, यह मैं प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहता था।
इसके लिए मैं कई ऐसे साधकों से मिला, जो स्वयं को कहते थे, कि उन्होंने अप्सरा को सिद्ध कर रखा है और अप्सरा उनकी सहचरी है। जब मैंने उनसे अप्सरा सिद्ध करने की विधि पूछी, तो मुझे निराशा हाथ लगी, किसी-किसी ने मुझे विधि तो बताई, परन्तु मुझे नाममात्र का भी एहसास नहीं हुआ। मुझे निराशा भी होती, परन्तु एक आस में निरन्तर अप्सरा साधना की विधि पाने के लिए बेचैन था। एक दिन मुझे एक मित्र ने बताया, कि मेरे गुरुदेव हैं, यदि तुम उनसे जाकर मिलो, तो हो सकता है कि तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो जाये। उनके कहने पर मैं पूज्य गुरुदेव से दिल्ली आश्रम में मिला। उनके चेहरे पर अद्भुत तेज झलक रहा था। मैं उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। उन्हें देखकर मुझे लगने लगा कि शायद यहीं पर मेरी मनोकामना पूर्ण हो जाए।
मैं जब उनसे मिला और उनके समक्ष अपनी इच्छा व्यक्त की, तो उन्होंने मुझे बताया-‘अप्सरा एक या दो नहीं होती हैं, अप्सराएं तो 108 प्रकार की होती हैं, परन्तु मानव को उसी अप्सरा को सिद्ध करने का प्रयत्न करना चाहिए, जो उसके अनुकूल हो। उन्होंने मुझे ‘मेनका अप्सरा’ सिद्ध करने के लिए कहा और बताया की यह अप्सरा प्रसन्न होकर सिद्ध हो जाती है, फिर उन्होंने मुझे अप्सरा साधना सिद्ध करने की साबर विधि बताई और कहा, कि इसे तुम यदि पूर्ण दृढ़ भाव और विश्वास से करो तो मेनका अप्सरा अवश्य तुम्हारी सहचरी बनेगी। उनकी आज्ञानुसार मैं इस साधना को सम्पन्न करने के लिए बैठ गया। मैं उनके निर्देशन में ही साधना को पूर्ण करना चाहता था, इसलिए दिल्ली में ही साधना की थी। प्रथम दिन तो मुझे कोई अनुभव नहीं हुआ। मैं दुविधामय विचारों में झूलने लगा, परन्तु गुरुदेव की दृढ़ता और विश्वास की बात को याद कर पुनः स्वयं के विचारों में स्थिरता स्थापित की और दूसरे दिन की साधना सम्पन्न करने के लिए बैठा।
अभी मंत्र जप आधा ही हुआ था, कि अचानक मुझे अनुभव हुआ, कि जैसे मेरे आसपास के वातावरण में असंख्य फूल खिले हैं या इत्र छिड़का हुआ है, जिसकी सुगन्ध से मुझे अत्यन्त आनन्द का अनुभव हो रहा था। धीरे-धीरे दूसरे दिन की साधना सम्पन्न हो गई, परन्तु अगले दिन भी मुझे अपने शरीर में व्याप्त सुगन्ध का एहसास हो रहा था। ऐसा लग रहा था, कि मैंने इत्र में स्नान किया हो। मुझे अपने चेहरे पर कुछ अलग सी चमक अनुभव हो रही थी। स्वयं को अनुभव हो रहा था, कि आनन्द का झरना बह रहा हो।
तीसरे दिन जब साधना शुरु की, साधना क्रम जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था, सुगन्ध का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। धीरे-धीरे मुझे एहसास होने लगा, कि मेरे अलावा भी कोई और कक्ष में उपस्थित है। परन्तु गुरुदेव की आज्ञा थी, कि जब तक पूर्ण मंत्र जप सम्पन्न न हो जाये, तब तक आसन को न छोड़ो और न ही मंत्र जप को रोको। दो मालाएं अभी बाकी थीं, कि मेरे सामने प्रत्यक्षतः एक आकृति स्पष्ट हो रही थी, जो किसी स्त्री की लग रही थी। मैंने मंत्र जप पूर्ण करके गुरुदेव को स्मरण कर प्रणाम किया और प्रार्थना की।
गुरुदेव को प्रणाम करके जब मैंने आंखे खोली तो मैं मंत्रमुग्ध सा सामने खड़ी आकृति को देखता रह गया। उसके पास से मुझे वैसी ही सुगन्ध का एहसास हो रहा था, जो कि मुझे दो दिनों से एहसास हो रहा थी। मैं उसके सौन्दर्य को देखता रह गया- चन्द्रमा की भांति नेत्रों को शीतलता प्रदान करने वाला मुख—-भ्रू भंगिमा ऐसी प्रतीत हो रही थी, जैसे कि कामदेव ने अपने धनुष की प्रत्यंचा खींची हो घायल करने के लिए—- उसके समूचे सौन्दर्य का वर्णन करना चाहता हूं, लेकिन उसका स्मरण होते ही मैं विस्मृत हो जाता हूं। आज भी पूज्य गुरुदेव की कृपा से वह अप्सरा मेरी सहचरी बनी हुई है और जब भी उसका साथ मिला है, वह पग-पग पर मेरे सुख-दुःख में मेरी सहयोगी बनी है, उसका साहचर्य प्राप्त कर मैं स्वयं को धन्य अनुभव करता हूं।
साधना विधान
बुध अष्टमी की रात्रि में घी या तेल का दीपक लगाकर साधक अपने समक्ष मेनका अप्सरा यंत्र स्थापित कर मेनका अप्सरा गुटिका पर त्राटक करते हुए मेनका आकर्षण माला से निम्न मंत्र की 7 माला मंत्र जप करें। इस प्रकार मात्र 7 दिन करें। सातवीं रात्रि को निश्चय ही मेनका अत्यन्त ही सुन्दर और आकर्षक वस्त्र पहन कर उपस्थित होती है और वचन देती है कि मैं पूरे जीवन भर प्रेमिका रूप में तुम्हारे वश में रहूंगी और तुम्हारी प्रत्येक इच्छा पूरी करूंगी तब सातवें दिन अपना हाथ आगे बढ़ाकर वचन लें। उसके बाद साधक इन्द्र की तरह जीवन भर आनन्द उठाता रहता है।
मंत्र जप के उपरान्त गुटिका को पीले कपड़े के साथ अपनी दाहिनी भुजा पर इस प्रकार बांधना है, जिससे कि वह शरीर से निरन्तर स्पर्श करती रहे। बिना आसन अथवा दीपक आदि की औपचारिकता निभाए, नित्य रात्रि में अथवा जब भी समय मिले तब उपरोक्त मंत्र की एक माला मंत्र-जप कर लेना पर्याप्त है।
इस प्रकार साधक को शनैः शनैः पहले तो एक बिम्ब के रूप में और बाद में पूर्ण नारी शरीर के रूप में अप्सरा प्रत्यक्षीकरण सम्भव होता है, जो जीवन-पर्यन्त, उसके सुखद साहचर्य की प्रतीक होती है। साधक जिस प्रकार अपनी प्रेमिका से व्यवहार करता है उसी प्रकार अप्सरा से भी वार्तालाप हंसी, मजाक आदि कर सकता है। इस साधना में प्रयुक्त मेनका अप्सरा यंत्र व माला को संभाल कर रख लेना चाहिए तथा समय-समय पर पूर्ण विधि-विधान से साधना को पुनः सम्पन्न कर लेना चाहिए। इससे जो न्यूनताएं आ जाती हैं अथवा वातावरण आदि के दोष के कारण जो प्रत्यक्षीकरण में बाधा आने लगती है, उसका निवारण सम्भव होता है।
साबर मंत्रों द्वारा अप्सरा साधना की यह विधि पूर्णतः परीक्षित है। जिन साधकों ने इसे सम्पन्न किया है, उन्होंने ऐसे समस्त सुखों और वैभव को प्राप्त किया है जिसकी धारणा और कामना उनके मन में होती है।
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,