





सभी देवताओं में मात्र भगवान शिव ही ऐसे देव हैं, जो देवाधिदेव हैं, क्षण मात्र में प्रसन्न होने वाले हैं और जब प्रसन्न हो जाते हैं, तो मनचाहा वर दे डालते हैं। फिर उस समय वह इस बात को नहीं देखते कि याचक कौन है, वह मनुष्य है अथवा राक्षस या देव। भगवान शिव तो बस अपने भक्तों की पुकार सुन लेते हैं।
भगवान शिव को यह ताण्डव स्तोत्र इतना अधिक प्रिय है, कि जब कोई भक्त इसका भक्ति भाव से गायन करता है और यदि उसके हृदय के तार भगवान शिव से जुड़े हैं, तो शिव को अपनी समाधि तोड़ कर आनंद ताण्डव करना ही पड़ता है, जिससे भक्तों का रोम-रोम झंकृत हो जाता है और उन्हें अपूर्व शान्ति तथा शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस स्तोत्र का लयबद्ध पाठ करने से तत्क्षण मन प्रफुल्लित होता ही है।
जटा रूपी वन निकलती हुई गंगा की धाराएं, जिनके कण्ठ प्रदेश को प्रक्षलित करती हैं, गले में सर्पों की विशाल माला को धारण करके, डमरू के डम-डम ध्वनि के साथ ताण्डव नृत्य करते हुए शिव जी हम उपासकों का कल्याण करें।।1।।
जिन शिव जी के शीश पर गंगा वेगपूर्वक घूमती हुई लहरा रही है तथा जिनके ललाट में धक्-धक् ज्वालायें जल रहीं हैं, जिनके सिर पर उदीयमान बाल चन्द्रमा विराजमान हैं, उन्हीं भगवान शंकर में मेरा अनुराग निरन्तर बढे़।।2।।
नृत्य के समय पहने हुए भगवती पार्वती के सिर के आभूषण से प्रकाशित समस्त दिशाएं ही जिनका वस्त्र हैं, ऐसे दिगम्बर भगवान शिव में मेरा मन आनन्दित हो।।3।।
जिनके जटा समूह में लिपटे हुए सर्पों के फनों की मणियों का फैलता हुआ भूरा-भूरा प्रकाश पुंज, दिशारूपी अंगनाओं के मुख पर कुंकुंम राग का अनुलेप कर रहा है, मतवाले हाथी के हिलते हुए चमड़े का उत्तरीय वस्त्र धारण करने वाले भगवान भूतनाथ में मेरा मन आनन्दित हो।।4।।
जिन भगवान शंकर की चरण पादुकाएं इन्द्रादि देवताओं के मस्तक पर लगे हुए फूलों के पराग (धूलि) से रंजित हो रही हैं, सर्पों से जिनकी जटाएं सुबद्ध हैं, वे भगवान शंकर मेरे लिये चिर काल तक समीप रहने वाली सम्पत्ति प्रदान करें।।5।।
जिन भगवान शंकर की मस्तक रूपी देवी पर प्रदीप्त अग्नि स्फुलिंगों के तेज से कामदेव भस्मीभूत हो गया था, देवराज इन्द्र भी जिनकी आराधना करते हैं, चन्द्रमा की कलाओं से सुशोभित वह उन्नत ललाट हमें सम्पत्ति प्रदान करे।।6।।
जिन भगवान शंकर ने अपने विशाल एवं विकराल भाल पटल पर धक्-धक् करके जलती हुई अग्नि में कामदेव को आहूत कर दिया, पर्वत सुता पार्वती के स्तनों के अग्रभाग पर चित्रकारी करने में चतुर भगवान त्रिनेत्र में मेरी प्रीति अटल हो।।7।।
जिनके कण्ठ में नवीन मेघ समूह से घिरी हुई अमावस्या की आधी रात के समय फैले हुए घनघोर अन्धकार के समान कालिमा फैली हुई है, जो गजचर्म लपेटे हुए हैं, इस संसार भार को धारण करने वाले, चन्द्रमा के समान सुन्दर कान्ति वाले भगवान शंकर मेरे ऐश्वर्य में वृद्धि करें।।8।।
खिले हुए नीले कमल की सी कान्ति से शोभायमान कण्ठ प्रदेश वाले, जिनके कन्धे सुन्दर हैं, कामदेव, त्रिपुरासुर, भवबाधा, दक्ष, यज्ञ, हाथी, अंधकासुर व यमराज का उच्छेदन करने वाले भगवान शंकर का मैं भजन करता हूं।। 9।।
अतीव मंगलमयी पार्वती की कला रूपी कदम्ब वृक्ष की मंजरी के मकरन्द के प्रवाह की बढ़ती हुई माधुरी को पान करने वाले भ्रमर के समान जो भगवान शिव हैं तथा जो कामदेव, त्रिपुरासुर, दक्ष, यज्ञ, हाथी, अंधकासुर एवं यमराज का भी अंत करने वाले हैं, उनकी मैं उपासना करता हूं।।10।।
जिन भगवान शंकर के ललाट पट्ट पर वेगपूर्वक घूमते हुए सर्पों के फुंफकार से मस्तक की भंयकर अग्नि धधकती हुई फैल रही है, जो धीमे-धीमे बजते हुए मृदंग के मंगल एवं गम्भीर ध्वनि के अनुसार प्रचण्ड ताण्डव नृत्य कर रहे हैं, उन मंगलमूर्ति भगवान शंकर की जय हो।।11।।
हे भगवान शिव! पत्थर की शय्या में, सर्प और मुत्तफ़ा माला में, बहुमूल्य रत्न व मिट्टी के ढेले में, मित्र और शत्रु में, तृण और नारी समूह में, प्रजा और राजा में समभाव रखता हुआ मैं अब आपकी सतत आराधना करूंगा।।12।।
सुन्दर मस्तक वाले, भगवान चन्द्रशेखर में एकाग्र चित्त होकर, समस्त नीच विकारों को छोड़कर, गंगा किनारे पर स्थित उपवन में निवास करता हुआ, मस्तक पर हाथ जोड़कर, डबडबाई विह्वल आंखों से शिव मंत्र का उच्चारण करता हुआ मैं कब सुखी होऊंगा।।13।।
देवांगनाओं के सिर पर गुथे हुए पुष्प हारों के मध्य से गिरते हुए पराग कणों से सुन्दरतम, परम शोभायमान शिवजी के अंगों की सुन्दरता, आनन्दमग्न हमारे मन की प्रसन्नता को निरन्तर प्रवृद्ध करे।।14।।
प्रचण्ड बडवानल की भांति समस्त पापों को भस्म करने वाली स्त्री रूपी अणिमादि अष्ट सिद्धियों तथा चंचल नेत्रों वाली देवकन्याओं द्वारा शिव विवाह के शुभावसर पर गाई गई मंगलध्वनि सब मंत्रों से श्रेष्ठ हैं। वह शिव मंत्र पूरित मंगलध्वनि हमारे समस्त दुःखों को नष्ट करके हमें विजय प्रदान करे।।15।।
जो मनुष्य इस उत्तम शिव ताण्डव स्तोत्र का नित्य पाठ, स्मरण एवं वर्णन करता है, वह परम शुद्ध हो जाता है, वह सुरेश्वर भगवान शंकर एवं गुरु में श्रेष्ठ भक्ति प्राप्त करता है। उनकी भक्ति से ही प्रणियों के मोह का विनाश होता है।।16।।
सायंकाल में पूजा की समाप्ति पर रावण द्वारा गाये हुए इस शम्भु से सम्बन्धित स्तोत्र का जो पाठ करता है, भगवान शंकर उस भक्त को रथ, हाथी, घोड़ों से युक्त सदा स्थिर लक्ष्मी प्रदान करते हैं।।17।।
शिव ताण्डव स्तोत्र के नित्य पाठ से साधक के मन में अपूर्व शांति व्याप्त हो जाती है। इसके नियमित पाठ से काम, क्रोध, अहंकार, लोभ, मोह आदि कुवृत्तियां समाप्त होने लगती हैं, तथा चित्त पवित्रता की ओर गतिशील होने लगता है। यही स्थिति बढ़ते-बढ़ते साधक को शिवत्व प्राप्त कराती है। इस स्तोत्र के पाठ से भगवान शिव की कृपा साधक पर बरसती है। ऐसे साधक के जीवन में, या उसके घर में, अकाल मृत्यु नहीं होती। उसके घर में हर प्रकार के ऐश्वर्य, धन, सम्पदा की वृद्धि होती है तथा कभी भी आर्थिक तंगी अनुभव नहीं होती। कैसी भी विपत्ति क्यों न आ पड़ी हो, इस स्तोत्र का पाठ करने वाले साधक पर शत्रु हावी नहीं हो सकते और कोई विषम परिस्थिति आ भी गई हो, तो भी साधक बिना विचलित हुए उनका मुकाबल करने की क्षमता प्राप्त करता ही है। हर स्थिति में वह भगवान शिव की ही भांति आनन्दित एवं प्रसन्न बना रहता है।
इस स्तोत्र को सिद्ध करने के लिए किसी प्रदोष के दिन ‘पारद शिवलिंग’ के समक्ष 21 दिन तक नित्य सायंकाल में 5 पाठ करें। प्रत्येक श्लोक के पाठ के साथ ही उसका हिन्दी अर्थ भी उच्चरित करें। पाठ प्रारम्भ करने से पूर्व अपने संकल्प अथवा मनोकामना को बोल दें। अंत में भगवान शिव को बेल पत्र एवं पुष्प अर्पित करें। साधक इस स्तोत्र की शक्ति को अपनी किसी समस्या के समाधान के लिए भी प्रयोग कर सकता है। यों भी प्रत्येक सोमवार अथवा प्रत्येक प्रदोष को भी इस स्तोत्र का पाठ कर लिया जाये तो अत्यंत अनुकूलता अनुभव होती है।
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