





शुभाशीर्वाद
आज की युवा पीढ़ी नास्तिक होकर नकारात्मकता के एक ऐसे जाल में फंसती चली जा रही है। जहां से उसका निकलना कठिन हो गया है। सांसारिक आडंम्बरों, संकल्पों, मूढ़ी और अधकचरे व्यक्तियों के पीछे एक पागल हाथी की तरह भागी जा रही है। इसमें स्वयं उसी के जीवन में दुःख, विषाद, क्षोभ बढ़ता जा रहा है यह मेरे मन को भी कचोटता है कि ये मूर्ख स्वयं का नुकसान कराने को कितना आतुर है, वह स्वयं की शक्ति का निरर्थक व्यय कर रहा है, हर एक साधक के चित में सद्गुरुदेव विराजमान है। सद्गुरुदेव द्वारा किया गया श्रम, मेहनत, त्याग को हम भूलते जा रहे है। वह साधना और दीक्षा के महत्त्व को नहीं मानता।
सद्गुरुदेव ने अपने जीवन में कुछ ही ऐसे क्षण निकाले होगें जब वे अपने परिवार पत्नी, बच्चे, बहू, नाती, पोतो के साथ बिताये होगे, वे केवल अपने शिष्यों का उद्धार व उनके कल्याण में लगे रहे। उनके इसी भाव को उन्होंने मेरे अन्दर स्थापित किया है और उसी के फलस्वरूप शिष्यों के कल्याण व उद्धार के लिए साधनात्मक रूप से प्रयासरत हूं। यह कार्य आज भी मेरे द्वारा जारी है।
सद्गुरुदेव डॉ- नारायण दत्त श्रीमाली एक विराट पौरूषवान व्यक्तित्व रहे है। उनके हजारों हाथ, हजारों नेत्र है, ज्ञानी साधकों में सभी जगह उपस्थित है। वे अपने हजारों भक्तों के माध्यम से हर धड़कन में उपस्थित है। हर तरह के दीक्षार्थी व्यक्तित्व में पूर्णरूपेण विराजमान हैं। परन्तु उनके शिष्यों में घमंड और लोभ आ गया है। वे गुरु की महिमा को जानते हुए भी इसे मानने को तैयार नहीं है क्योंकि उन्हें तो संसार के लोभ व भौतिक चकाचौंध से समय ही नहीं है और वे इस अंधकार में डूबते चले जा रहे है। इन्हें इसका ज्ञान काफी देर से होगा। तब शायद आपको समझाने के लिए मैं ना हूंगा। सद्गुरुदेव ने मुझे शिवरात्रि 1991 में कहा था, यह एक ऐसा समय चल रहा है जब व्यक्ति अधर्म, लोभी, भोगी रूपी आग में जल रहा है तुम्हें इस अग्नि को शांत करना है। चाहे तुम्हें अपने आप को हर दृष्टि से मिटाना ही पड़े और ऐसे ही भाव चिंतन से पिछले चालीस वर्षों से अधिक समय से प्रयासरत हूं।
सद्गुरुदेव का दिया वचन मुझे आज भी याद है- मुझे उनके प्रत्येक शिष्य को उच्चता के मार्ग पर शीघ्रताशीघ्र पहुँचाना है। सद्गुरुदेव द्वारा दिया गया ज्ञान अपार है इसकी कोई सीमा नहीं है। आपको इसे ग्रहण करने का भाव और धैर्य होना चाहिए। आप अपनी चित और आत्मा को सद्गुरुदेव से जोड़कर तो देखे आपको प्रसन्नता और आनन्द का ऐसा भण्डार मिलेगा जिसकी कोई सीमा नहीं होगी। अभी देर नहीं हुई है इस ज्ञान शक्ति की सीमा अपार है, आप इसे जानकर अपने जीवन का उद्धार कर सकते है। स्वयं साधना कर अपने अन्दर की शक्ति को जाग्रत कर सकते है। इस ज्ञान का अपव्यय न करे, जिस दलदल में हम फंसते जा रहे है उससे बाहर जरूर निकल सकते है। इसके लिए आपको अपने भीतर अपने गुरु की शक्ति का बोध होना चाहिए। इसके फलस्वरूप आप किसी पर निर्भर नहीं रहेगें। आप स्वयं में इतने कर्मवान व शक्ति से परिपूर्ण होगे कि आपकी उपमा सद्गुरुदेव के श्रेष्ठमय शिष्यों में होगी।
सद्गुरुदेव द्वारा रचित साधनाएं- सद्गुरुदेव ने सदैव कहा है कि आपको साधनात्मक जीवन व्यतीत करने के लिए व्यक्तिगत, पारिवारिक, सांसारिक, भौतिक, जीवन का त्याग नहीं करना है। परन्तु एक सामान्य व्यक्ति बनकर भी अपने जीवन की सभी जिम्मेदारियों को पूर्ण करते हुए साधनात्मक क्षेत्र में भी सम्पूर्णता प्राप्त कर सकते है। यह कार्य कठिन अवश्य हैं परन्तु नामुमकिन नहीं क्योंकि मैं आपके साथ हूं और सद्गुरुदेव का आशीर्वाद हम सब के साथ है। मैं अपने शिष्यों को किसी भी धर्म, जाति, भाषा, संस्कृति, देश के अधीन होकर शिष्य नहीं बनाता हूं, अपितु उसकी भावना, निष्ठा व खुद को उन्नत् बनाने की इच्छा शक्ति देखकर अपनाता हूं।
‘‘त्वम चित्ते-मम चित्ते, त्वम प्राण-मम प्राण।
त्वम देह मम देह। त्वम आज्ञा सः जीवन परिपालनय्।।’’
अर्थात् मैं अपने शिष्य के चित में समाकर उसकी सारी समस्याओं को अपना बना लूं, मेरे शिष्य पर कोई आघात हो तो वह मेरे पर हो। मेरे शिष्य पर कोई संकट हो तो वह मेरे से होकर गुजरे। मेरे बच्चो को कोई कष्ट न हो। मैं अपने प्रत्येक शिष्य के चित में विराजमान हूं।
मनुस्मृति में भी कहा गया है-
जन्मना जायेत शूद्र, संस्कारात द्विज उच्यते।
वेद पाठी भवेद विप्रः, ब्रहम जानाति ब्राहमणा।।
परन्तु मैं यह भी नहीं चाहता कि शिष्य थोथे वादो, अधकचरे व्यक्तियों द्वारा संकल्प-विकल्प करा कर बाँधकर रखने, कमजोर, डर भय से त्रस्त युक्त रहने से और सांसारिक चुनौतियों से हारने वाले व्यक्ति के रूप में बनने पर मेरी ही हार होगी। मुझे सदैव ज्ञात रहता है कि कौन किस कठिनाई में है और क्या कार्य कर रहा है। इसके लिए समय समय पर मैं अपने शिष्यों की परीक्षा लेता हूं कि वे किसी के बंधन में नहीं रहे और निरन्तर श्रेष्ठ गुरु के माध्यम से क्रियाशील रहते हुए कर्मठ व्यक्ति की तरह अपनी ख्याति समाज में स्थापित कर सके।
जीवन में श्रेष्ठता प्राप्ति के मौके बार-बार नहीं मिलते, इसी हेतु वर्ष का सर्वश्रेष्ठ शिवरात्रि महापर्व 26, 27 फरवरी 2014 महाकालेश्वर शक्तिपीठ उज्जैन की तपो भूमि पर ‘महा त्रिपुर सुन्दरी मंदिर प्रागंण, क्षिप्रा तट उज्जैन’ में महाकाल इन्द्राक्षी धन वैभव महामृत्युजंय साधना महोत्सव सम्पन्न होगा। आपके जीवन में ऐसी दिव्यतम साधनात्मक क्रिया सद्गुरुदेव के आशीर्वाद से सम्पन्न हो रही हैं। इसी हेतु कामदेव अप्सरा सौन्दर्य प्राप्ति दीक्षा, शिव गौरी सौभाग्य वृद्धि अघोर दीक्षा और रावणकृत स्वर्ण खप्पर प्राप्ति दीक्षा के साथ प्रत्येक साधक व्यक्तिगत रूप से स्व रूद्राभिषेक सम्पन्न करेंगे। भगवान सदाशिव और माता गौरी के परिणय दिवस पर आप सपरिवार उज्जैन में पधारकर शिव स्वरूप कैलाश गुरुदेव और गौरी स्वरूपा वन्दनीय माताजी के सानिध्य में दीक्षायें प्राप्त करेंगे तो अपने आप को शिव-गौरी सौभाग्य शक्ति युक्त बनाने में सक्षम हो सकेंगें। साथ ही गृहस्थ जीवन में धर्म, अर्थ, काम की पूर्णता की प्राप्ति निश्चित रूप से सम्भव होगी।
पग-पग पर संसार में फैली व्यापक निष्क्रियता, सांसारिक विषमतायें, पाप, कुकर्म देख व्यक्ति विचलित हो जाता है उसे घुटन का एहसास होता है। ऐसी विषम स्थितियों से निजात केवल सद्गुरु चिंतन, सेवा और भक्ति से ही प्राप्त हो सकती है, क्योंकि जब जब आप सद्गुरु चिंतन-भक्ति में लीन होगे आपके पास नकारात्मक क्रियाओं के बारे में सोचने का समय नहीं होगा और अपने जीवन में आने वाली कठिनाईयों का निदान स्वयं गुरु शक्ति के ज्ञान से ही सम्भव हो पायेगा। हमारी भाषा, धर्म, संस्कृति अलग हो सकती है पर मन में सदैव गुरु का ही वास रखें। अपने चित में गुरु हो तो आप स्वयं सिद्ध पुरुष बन सकते है। अर्थात् सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन की पूर्णता को प्राप्त कर सकते है।
मानव जीवन के विकास के लिए व इसे सम्पूर्ण बनाने के लिए चार पुरूषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पुरूषार्थों की सिद्धि के लिये -चार प्रकार के योग (राजयोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग) तथा विभिन्न योग साधनों की सिद्धि के लिये, चार आश्रमों ( ब्रहमचर्य-आश्रम, गृहस्थ-आश्रम, वानप्रस्थ-आश्रम, संन्यास-आश्रम) की संरचना निश्चिंत ही भारतीय संस्कृति को एक विशेष स्थान प्रदान कराती है। अपने जीवन के कर्म व मोक्ष का बोध होने पर ही हमारा जीवन सफल होता है। इन चारों का सही ज्ञान होने पर ही साधक अपने जीवन में ज्ञानयोग व भक्तियोग के माध्यम से ही राजयोग, कर्मयोग को पूर्णता से भोग पाता है। यद्यपि कर्म का पालन कर ही राजसी वैभव प्राप्त कर सकता है। धर्म का बोध होने पर ही व्यक्ति को आत्मज्ञान होगा और भक्ति में लीन हो सकेगा। इसी के फलस्वरूप सांसारिक आध्यात्मिक उन्नति संभव हो सकेंगी इन सब के समावेश के लिए ही प्राचीन काल में विभिन्न साधना पद्धति की रचना हुई जिसे वर्षो तक ऋषि मुनियों ने उपयोग कर अपार शक्ति के अधिपति बने।
वर्तमान में प्रत्येक मनुष्य मन में भौतिकता में छिपी रिक्तता को अनुभव कर रहा हैं परन्तु उसके लिए उसे स्पष्ट मार्ग दिखाई नहीं देता है। जो उसके अंधकारमय जीवन को प्रकाशवान कर सके उसके चेहरे पर मुस्कुराहट ला सके इस अवस्था में मनुष्य को किसी योग्य निर्देशक की आवश्यकता पड़ती है जो उसके जीवन को पूर्ण आनन्दमय बना सकें। इस हेतु साधना सिद्धि का भाव तप, त्याग व श्रम की आवश्यकता होती है जो एक आम व्यक्ति सांसारिक जीवन में रहकर संभवत् सम्पूर्ण नहीं कर सकता। सद्गुरुदेव ने इन्हीं साधनाओं को सरल कर अपने शिष्यों को एक भेंट स्वरूप दी ये साधनाएं सरल प्रयास व दीक्षा के माध्यम से सिद्ध की जा सकती है। यह सब ज्ञान का भण्डार और श्रेष्ठ ज्ञान की कृतियां आपको प्राचीन मंत्र-यंत्र विज्ञान के माध्यम से प्राप्त होती रही है। आप स्वयं इसका प्रयोग कर इन साधना की सफलता को पूर्णता से अनुभव कर सकते है। ये वास्तविकता में कारगर है और अपने आप में जीवन को पूर्ण योगमय बनाने में सहायक है।
वर्ष भर में अपने इष्ट अपने गुरु के लिए क्या सद्कार्य किये कितने ही अपने समान साधको को जोड़ने का प्रयास किया है। इस क्रिया में कहाँ न्यूनता और कहाँ कमी रही है। इसका विवेचन करें। इन न्यूनताओं को समाप्त करने के लिए क्या विचार और क्या क्रियात्मक संकल्प नववर्ष पर ग्रहण किया है। जिससे पिछले वर्ष की न्यूनतायें समाप्त हो सके। इस नववर्ष पर आप संकल्प करे की अपने जीवन की सभी न्यूनताओं और मलिनता को पूर्णता के साथ समाप्त करेंगे, क्योंकि आपके पास कर्म की शक्ति है, ज्ञान की शक्ति है और इसके फलस्वरूप जीवन के महत्त्व को समझकर अपने भीतर के दोष, मैली मानसिकता का त्याग कर अपने जीवन का नूतन निर्माण करने की क्रिया में गुरु शक्ति और आज्ञानुसार क्रिया कर सांगोपांग सफलता को पूर्णरूपेण प्राप्त कर सकेंगे।
इस नववर्ष में घर में कोई भी शुभ कार्य हो तो सर्व प्रथम सद्गुरु का स्मरण कर आशीर्वाद प्राप्त करे और शुभ कार्य को अक्षुण्ण बनाने के लिए अपने सम्बन्धियों, रिश्तेदारों, बहन-बेटीयों, भाई-बन्धु को ‘प्राचीन मंत्र-यंत्र विज्ञान’ पत्रिका से जुड़ाव स्थापित करायें। ऐसे सद् कार्य से आपका यह शुभ कार्य निश्चित रूप से पूर्ण आनन्दयुक्त और फलदायी हो सकेगा। इस क्रिया से यह ज्ञात हो सकेगा कि आपके रोम-रोम में सद्गुरुदेव किस रूप में विराजमान है और आपको कितना उनका स्मरण रहता है। क्योंकि जैसे भाव विचार होते है वैसी ही क्रिया रूप में कार्य होते है और जैसा कार्य हम करते है उसका वैसा ही फल मिलता है इसीलिए अपने आप को श्रेष्ठमय ज्ञानवान हर दृष्टि से जीवन को उन्नतिशील बनाने के लिए सांसारिक क्रियाओं के साथ मन विचार और भावों के रूप में विद्यमान सद्गुरुदेव के ज्ञान के प्रसार के लिए क्रियाशील रहेगे तो सद्गुरुदेव भी निरन्तर-निरन्तर आपके श्रेष्ठ कार्यों में पूर्ण सहयोगी बन सकेगें। नववर्ष पर आप सभी से मिलकर मुझे खुशी होगी। Happy New Year 2014
मेरे सभी मानस पुत्र-पुत्रियों को नववर्ष 2014 की हार्दिक मंगलमय शुभकामनाएं।
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