





अद्भुत ही होगा यह होली पर्व और आप भी होंगे हमारे संग कोई भी पर्व उत्साह और उमंग की भावना, उल्लास और हर्ष का संदेश लेकर तो सम्पन्न होता है किन्तु जितना मुखर होली का महापर्व होता है उतना तो सम्भवतः अन्य कोई पर्व नहीं होता है। रंगों की बिखरती छटा मानों इस पर्व के इसी भाव को सहस्त्र गुणित कर देने के लिए सृजित की जाती है। अनेक कथाएं और अनेक धारणाएं जुड़ी हैं इस पर्व से लेकिन इन सब में भी जो भाव प्रमुख है वह भाव होता है मनुष्य को उसकी बन्धन-मुक्ता का अनुभव करा देने का भाव। जड़ता का विसर्जन और नवगति का प्रवेश-यही तो मुख्य भाव होता है इस पर्व का और यही मुख्य चिंतन होता है प्रत्येक सांसारिक मनुष्य का।
भारतीय संस्कृति की धारणा में कहीं से, कुछ भी खंडित नहीं है। खंड-खंड में जीवन को देखने की बात नहीं कहती हमारी संस्कृति। प्रत्येक स्वयं में पूर्ण भी है और साथ ही साथ किसी अविभाज्य सत्ता का अभिन्न अंग भी तथा इसी रूप में होली का पर्व, पूरे वर्ष भर में उपस्थित होने वाला आमोद-प्रमोद का केवल एक अवसर भर नहीं वरन् इसी पर्व के तुरन्त बाद उपस्थित होने वाले एक अन्य नववर्ष के स्वागत् रूप में चैत्र नवरात्रि का पूर्वाभ्यास अथवा भूमिका भी है। कोई कक्ष सुसज्जित करना हो तो उसे पहले धो-पोंछ कर स्वच्छ करना पड़ता है अन्यथा उसे सुसज्जित करने का कोई अर्थ नहीं रह जाता । होली का अवसर भी एक ऐसा ही अवसर है जब व्यक्ति स्वयं अपनी मन की कुंठाओं को विसर्जित कर स्वयं को स्वच्छ कर सकता है।
हास्य और विनोद इस महापर्व के दो प्रमुख लक्षण माने गए हैं और इसका भी जो मूल भाव है वह केवल यही है कि व्यक्ति स्वयं में कुंठाओं से रहित हो ले, कुंठा चाहे किसी के प्रति द्वेष से उपज रही हो चाहे बैर भाव से, चाहे अपने व्यक्तित्व को लेकर कोई कुंठा हो या कुंठा का कोई अन्य रूप ही क्यों न हो। भगवान श्रीकृष्ण को योगेश्वर अर्थात् योगियों के भी योगी कहा गया है, इसके साथ ही उन्हें जगद्गुरु भी माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने ही होली जैसा महान पर्व प्रारम्भ किया, क्योंकि उससे पहले होली पर्व भक्त प्रह्लाद, हिरण्यकश्यप और भगवान नृसिंह के अवतार से ही जुड़ा था।
आज भी हम सब यह क्रिया सम्पन्न अवश्य करते हैं और इस दिवस से प्रेरणा लेने का भी प्रयास करते हैं कि कितना ही आतंक, अत्याचार, पाप धरा पर बढ़ जाये, भगवान किसी न किसी रूप में अवतरित होकर अपने भक्तों की रक्षा करते ही हैं, साथ ही साथ पाप का सर्वनाश भी कर देते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने होली के महापर्व को वीरता के साथ-साथ रस, रंग और आनन्द का पर्व बनाकर जन मानस के शुष्क हृदय में आनन्द की हिलोरें उठाई थीं। कहा जाता है, कि भगवान श्रीकृष्ण द्वारा पहला महारास होली के दिन ही सम्पन्न किया गया था, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण लाखों गोप-गोपिकाओं के साथ नृत्य कर रहे हैं और प्रत्येक गोप गोपी यह अनुभव कर रही है, कि भगवान श्रीकृष्ण उसके साथ केवल अकेले हैं, केवल वह और भगवान नृत्य कर रहे हैं। केवल और केवल भगवान उसी पर प्रेम रंगों की वर्षा कर रहे हैं, शिष्य, भक्त से प्रेम की फुहार ग्रहण कर रहे हैं।
सद्गुरु शिष्य के लिये आराध्य होते हैं और आराध्य के लिये केवल भक्ति नहीं की जा सकती। आराध्य के साथ भक्ति के साथ प्रेम भी हो जाता है तभी भक्त और भगवान, शिष्य और गुरु एकाकार हो जाते हैं। होली का पर्व मन में छिपे अंधकार और दुर्भावनाओं को हटाने के लिये आवश्यक है। इसके साथ ही जीवन के नव रंगों में प्रमुख- हास्य, नृत्य और सौन्दर्य को प्रकट करने का यही पर्व है। संस्कृति अपनी यात्रा में थोड़ी छिन्न-भिन्न हो सकती है, प्रदूषित हो सकती है और होली ऐसा पर्व है कि हम अपने मन का प्रदूषण दूर कर अशुद्ध-मलिन स्वरूप मन रूपी गंगा को पुनः मन्दाकिनी बना दें।
ऐसी गंगा की शीतलता प्राप्त करने के इच्छुक व्यक्ति को गंगा के समीप जाने की क्रिया करनी पड़ती है। ठीक उसी तरह शिष्य को भी गुरु के समीप जाने की क्रिया करनी पड़ती है, केवल तन से ही नहीं मन से भी, आत्मा से भी और प्राणों से भी, अर्थात् शाश्वत् रूप में गुरु से मिलकर हास्य, नृत्य, सौन्दर्य प्रेम को जीवन में उतारने की क्रिया करनी होती है उसके हल्के से संकेत को भी सुनना, समझना, सीखना पड़ता है और उसकी एक पुकार पर ही दौड़ते हुए उसके पास तक पहुंच जाना होता है।
इस आह्नान के रूप में वास्तव में गुरुदेव की ओर से यह एक पुकार है, उनका प्रेम स्वरूप आग्रह है आप सभी शिष्यों-शिष्याओं, गुरु भाइयों, गुरु बहनों को कि वे इस महारस पर्व 15-16 मार्च को कैलाश सिद्धाश्रम, जोधपुर में होली का महापर्व सम्मिलित रूप से मनाने के लिए अवश्य ही उपस्थित हों। आपको निमंत्रण है उस दिव्य साधना स्थली पर जो एक सम्मिलन स्थल भर ही नहीं आपका घर भी है। जहां भावनाओं का प्रवाह हो, जहां साक्षात् जगत-जननी पूज्यनीय माता जी की उपस्थिति हो, जहां के कण-कण में पूज्यपाद गुरुदेव का संस्पर्श अनुभव होता हो, गुरुदेव का वरदायक प्रभाव हो एवं सम्पूर्ण भारत से उमड़े गुरु भाई-बहनों के साथ-साथ अनेकानेक दिव्य महापुरूषों, संन्यासियों, सिद्धाश्रम के साधकों का निरन्तर आगमन होता रहता हो ऐसे ही स्थान को तो सही अर्थों में गुरु गृह कहा जा सकता है क्योंकि ईंट-पत्थरों से जो बनता है वह केवल मकान होता है और जो भावनाओं से बनता है वही गृह होता है।
गृह का एक अन्य गूढ़ अर्थ होता है कि जहां व्यक्ति को उन्मुक्तता का पूर्ण रूपेण अनुभव हो सके और जहां वह अपनी भावनाओं के साथ रह सके। ऐसा तभी हो सकता है जब व्यक्ति पूर्ण रूप से गुरु पर आश्रित हो सके। वह गुरु के और गुरु उसके मन में वास कर सके।
जो जीवन से जुड़े हैं, साक्षात जीवन की परिभाषा हैं क्या उन्हें इस बात का पता नहीं होगा? यदि ऐसा न होता तो क्यों पूज्यपाद गुरुदेव इस अवसर पर अन्य साधनाओं के साथ-साथ अमृत रस सिद्धि दीक्षा, नवयोजना पूर्णता प्राप्ति दीक्षा, ललिताम्बा धन प्रदायिनी दीक्षा देने का निश्चय करते जिसे गुरु सांदीपन के पश्चात् पुनः कोई अन्य गुरु नहीं प्रदान कर सके। इतना ज्ञान तो एक माली को भी होता है कि उसी जमीन में अंकुर फूट सकता है जो जमीन भीगी हो।
गुरु वस्तुतः शिव स्वरूप होते हैं और जिस प्रकार से भगवान शिव अपने रूद्र रूप में अशुभ का विध्वंस करने के साथ-साथ अपने महामृत्युजंय रूप में जीवन के नवनिर्माण का कार्य भी करते रहते हैं उसी प्रकार से गुरु भी दोनों क्रियाएं एक साथ सम्पन्न करने में समर्थ होते हैं। समस्त साधनाओं का मूल गुरु होते हैं, इस विषय में समस्त शास्त्र एकमत हैं। जो साधना गुरु मुख अथवा गुरु माध्यम से प्राप्त हो केवल वही प्रमाणिक होती है और यदि होली जैसे विशिष्ट मुहुर्त में गुरु सानिध्य में बैठ कर साधना सम्पन्न हो तब तो शिष्य के सौभाग्य की तुलना ही नहीं की जा सकती।
जीवन में कुछ प्रामाणिक रूप से सम्भव हो इसके लिए आवश्यक है कि पहले शिष्य के जीवन के पाप-ताप-दोष समाप्त हो सकें। इस जीवन में या विगत किसी जीवन में हुआ कोई अपराध प्रायः कई-कई जन्मों व साधनाओं के बाद भी समाप्त नहीं हो पाता है। यह गुरु की करुणा ही तो होती है कि वे ऐसे अपराधों को भी क्षण भर में ही समाप्त कर देते हैं। होली के रंगमय पर्व पर गुरु-चरणों में बैठ कर ऐसे सभी दोषों के निराकरण करने की क्रिया होती है और इसी कारण होली महारस कहलाती है। होलिका का प्रज्ज्वलित करना तो बस एक भूला-बिसरा प्रतीक है उस तथ्य का जब शिष्यगण गुरु-चरणों में बैठ कर साधनात्मक रूप से अपने जीवन का नवनिर्माण करते है।
वास्तव में गुरु के साहचर्य में जो उत्सव सृजित होता है वही वास्तविक उत्सव होता है क्योंकि गुरु का आग्रह अपने शिष्य के जीवन में स्थायित्व के साथ कुछ सृजित करने का भाव होता है। होली तो आप अपने घर पर भी एक दूसरे पर रंग उछाल कर मना सकते हैं लेकिन जीवन में रंगों के आलोक आकर स्थायी भी हो सके, जो इस पर्व की मूल भावना है पर ऐसा होना तो केवल गुरु-साहचर्य में ही सम्भव है। आप सभी गुरु चरणों में बैठ कर अपने जीवन का नवनिर्माण विविध रंगों के आलोक के साथ कर सकें, गुरु के निर्मल प्रेम के रस में आकण्ठ आप्लावित हो सकें, वन्दनीय माताजी, पूज्य गुरुदेव के आशीर्वाद के पात्र बन सकें इन्हीं भावों के साथ आप दिनांक 15, 16 मार्च को कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर में आगमन प्रतीक्षित हैं। आपको पुनः पुनः निमंत्रण है, आपका पुनः पुनः स्वागत है।
जीवन में ऐसे दिव्यतम साधनात्मक कार्यक्रम सद्गुरुदेव के आशीर्वाद से सम्पन्न हो रहे है, इसीलिए वे ही साधक-साधिकाएं शिविर में आये जो कि अपने जीवन की मलिनता को समाप्त कर, न्यून से उच्चतम बनाना चाहते है।
प्रत्येक साधक-साधिका का पंजीकरण आवश्यक है
14 मार्च 2014 शुक्रवार को सायं काल तक कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर पहुँचना अनिवार्य है।
बहिन, बेटियां माताऐं किसी भी स्थिति में अकेली नहीं आयें।
सात्विक प्रसाद और भोजन और विश्राम की व्यवस्था गुरुदेव द्वारा आश्रम में ही प्रदान की जायेगी।
15 मार्च 2014 को भोर काल में गुरुदेव के सानिध्य में योगा, प्राणायाम, मंत्र जाप, साधना की क्रिया प्रारम्भ होगी। जिससे इस साधनात्मक शिविर का पूरा लाभ आप को जीवन भर अक्षुण्ण बना रहे। इधर-उधर ना भटक कर पूरा ध्यान चिंतन अपनी स्व उन्नति और गुरु आज्ञा पालन में लगायें।
वे ही पंजीकरण करवायें जो अपनी स्वयं की बुद्धि-ज्ञान और विवेक से जीवन में कर्मशील रहते है अपने आपको तांत्रोक्त शक्ति से युक्त करना चाहते है। पूर्व में ही पंजीकरण अनिवार्य हैं। पंजीकरण राशि में आप ही से सम्बन्धित तांत्रोक्त साधना सामग्री और ललिताम्बा धन प्रदायिनी दीक्षा की क्रिया आपके नाम से प्रारम्भ की जा सके और रस राज होली महोत्सव पूर्णिमा दिवस पर साधना और दीक्षा प्रदान कर आपके जीवन को पूर्णमय बनाने की क्रिया सम्पन्न हो सके।
इस पंजीकरण राशि में ठहरने की व्यवस्था, सात्विक भोजन-प्रसाद, साधना सामग्री का शुल्क सम्मिलित हैं।
(पंजीकरण शुल्क: 2400/-)
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,