





केवल विश्वामित्र ही ऐसे ऋषि थे जिन्होंने वेद माता गायत्री को पूर्ण सिद्ध किया।
राजा दशरथ ने राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुध्न चारों भाईयों को वेद ज्ञान के लिये कुल गुरु वशिष्ठ के पास अवश्य भेजा लेकिन अन्ततः कुल गुरु वशिष्ठ ने ही कहा कि जीवन की पूर्णता, युद्ध-संघर्ष, विजय का ज्ञान ब्रह्माण्ड में केवल विश्वामित्र ही दे सकते हैं और विश्वामित्र ने चारों राज पुत्रों को एक शिष्य की भांति सेवा-समर्पण सिखा कर पूर्ण पुरूषोतम मय बनाया।
आज तक ऐसा संभव नहीं हुआ कि एक गुरु अपनी इच्छा से वह भी अपनी इच्छा से राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुध्न जैसे भावी सम्राटों का विवाह अपनी इच्छा से करवा दें और उसके पिता दशरथ को पूछने की आवश्यकता ही नहीं समझे। विश्वामित्र ने यही किया, राजा जनक के दरबार में जाकर राम और सीता का स्वंयवर में मिलन करवाया तथा विवाह तय कर केवल और केवल जानकारी अयोध्या भेजी। ऐसा प्रबल साहस विश्वामित्र जैसे ऋषि में ही संभव था।
जब इन्द्र को अपने इन्द्रलोक के वैभव पर गर्व होने लगा और उसने कहा कि यहां देह त्यागने के पश्चात् ही कोई आ सकता है, तो विश्वामित्र ने कहा कि- मैं सदेह मनुष्य को इन्द्र लोक भेजूंगा और नहीं तो नये इन्द्रलोक का निर्माण कर दूंगा। अपने शिष्य राजा त्रिशंकु को सदेह इन्द्रलोक भेजने का प्रयास किया और जब यह संभव नहीं हो पाया तो ब्रह्माण्ड में नये इन्द्रलोक की स्थापना कर त्रिशंकु को विराजमान किया।
यह केवल और केवल विश्वामित्र के लिये ही संभव था कि उन्होंने मेनका को अपनी जीवन संगीनी बनाया और तपस्या में पूर्णता प्राप्त कर महान ग्रंथ विश्वामित्र कल्प, विश्वामित्र संहिता, विश्वामित्र स्मृति की रचना की और उन्हीं के वंश में आगे शकुन्तला उत्पन्न हुई। शकुन्तला के गर्भ से भरत उत्पन्न हुआ, जिसके नाम से हमारा देश भारत कहलाता है और उन्हीं के वंश में आगे युधिष्ठर, अर्जुन, भीष्म का जन्म हुआ।
जब लंका युद्ध के समय राम को कोई मार्ग नहीं सूझा कि किस प्रकार समुद्र पार कर लंका विजय प्राप्त की जाए, उस समय राम ने अपने सेनापतियों से पूछा, देवताओं का आह्वान किया लेकिन कोई उपाय नहीं बता सका। अंत में उन्होंने अपने गुरु विश्वामित्र को याद किया, गुरु विश्वामित्र वहां पहुंचे और राम को आज्ञा दी कि तुम मिट्टी का शिवलिंग बनाकर यहां स्थापित करो। राम ने महादेव की स्थापना रामेश्वरम् के रूप में की। महादेव और विश्वामित्र की कृपा से राम धनुष कोटि से श्रीलंका तक सेतु बनाने में सफल हो सके, जो कि रामसेतु कहलाता है।
ऐसा विद्रोही, महान व्यक्तित्व कालजयी होता है, जिसके सामने देवता भी नमन करते हैं। ऐसे ऋषि द्वारा ही नवीन तंत्रों की रचना की जाती है, नवीन मंत्रों की रचना की जाती है और वे तंत्र-मंत्र विद्याएं जन-जन के लिये उपयोगी बन जाती हैं। ऋषि वही महान है जो अपनी साधना का ज्ञान जन-जन को उच्च बनाने हेतु और उनके जीवन की समस्याओं के निराकरण हेतु प्रदान करे। ऐसे महान ऋषि विश्वामित्र को शत्-शत् नमन।
भारत ऋषि परम्परा में अद्भुत ऋषि हुए हैं ब्रह्मर्षि विश्वामित्र, जिनका सम्पूर्ण जीवन ही अनूठी घटनाओं से भरा रहा है, जो अपने तेज, अपने ओज अपने विद्रोह और जीवन की नित नूतनता के कारण सदैव ही हमारे मानस में धड़कते रहे। ब्रह्मा के मानस पुत्रों में सर्वाधिक तेजस्वी ऋषि वही हुए जिन्होंने झुकना या गिड़गिडाना जाना ही नहीं। जीवन में जो कुछ भी व्यर्थ सा लगा, उसे उन्होंने एक क्षण में ठोकर मारकर अलग कर दिया। उन्होंने जीवन के प्रत्येक पक्ष को अपनी दृष्टि से समझा और जिया। बंधी बंधाई लीकों पर तो वे चले ही नहीं। मेनका ने उनकी तपस्या भंग की तो उन्होंने उसे पत्नी बना कर छोड़ा। राजा त्रिशंकु को इन्द्र ने स्वर्ग में प्रवेश से रोका तो उन्होंने नया स्वर्ग ही रच डाला।
विद्रोह तो उनके जीवन की धड़कन थी। विद्रोह करना अपने आप में कोई घटियापन भी नहीं। जिनके जीवन में साहस का, ओज का समुद्र सा लहरा रहा होता है, जिनके पास जीवन की स्पष्ट धारणा होती है, जिनके पास जीवन के सभी पक्षों के प्रति स्पष्ट मत होता है और साथ ही होता है दृढ़ निश्चय, वे ही विद्रोही होते हैं। जिनके पास तड़फ होती है, जीवन की विसंगतियों के प्रति और स्वयं को मिटा कर भी रचनात्मक घटित करने की, वे ही विद्रोह का मार्ग पकड़ते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि घिसे-पिटे मार्ग से उनका इच्छित पूर्ण होगा नहीं।
विश्वामित्र ने जीवन में यही किया। उन्होंने कभी भी हाथ नहीं जोड़े, गिड़गिड़ाये नहीं। उन्होंने आंखों में आंखें डालकर प्रत्येक साधना को झपट लेना सीखा। जहां परम्परगत मार्गों में सफलता नहीं मिली, वहां पर उन्होंने नवीन मार्ग ही ढूंढ लिया और नवीन तंत्र रच डाला। वे ही पहले ऋषि हुए जिन्होंने लक्ष्मी के आगे हाथ नहीं जोड़े। सर्वथा नूतन पद्धति से लक्ष्मी को बाध्य कर दिया कि वह उनके आश्रम में आकर स्थापित हो।
विश्वामित्र त्रेता युग के अद्वितीय आचार्य, क्रोधी, हठी और अपनी धुन के पक्के थे। उस समय साधनात्मक दृष्टि से देखा जाये तो विश्वामित्र की समानता करने वाला कोई ऋषि नहीं था। वशिष्ठ के गुरु रहते हुए भी दशरथ ने उसकी सलाह से राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र के हाथों में सौंपा कि इन्हें धनुर्विद्या और अस्त्र-शस्त्र साधना का ऐसा ज्ञान और सिद्धियां दीजिए जिससे वे सर्व विजयी प्राप्त कर सकें और विश्वामित्र के कुशल हाथों में राम और लम्क्षण योद्धा बने।
विश्वामित्र का आश्रम सभी दृष्टियों से बढ़ चढ़ कर था और उस समय दो ही ऋषि बराबर की टक्कर के थे। एक तो विश्वामित्र और दूसरे वशिष्ठ। वशिष्ठ का आश्रम जहां सम्पन्न और धनी था वहीं विश्वामित्र का आश्रम आर्थिक अभाव से पीडि़त और निर्धन सा था। यद्यपि विश्वामित्र ने उच्च कोटि की साधनाएं सिद्ध की थीं, यद्यपि विश्वामित्र अद्वितीय थे, यद्यपि विश्वामित्र ने त्रिशंकु को नया स्वर्ग बना कर भेजने का निश्चय कर लिया था किन्तु वहीं वे अपने आश्रम में सम्पन्नता, भाग्य लक्ष्मी और ऐश्वर्य लक्ष्मी को प्राप्त नहीं कर सके थे और न ही आश्रम में स्थापित कर सके थे।
धीरे-धीरे धन के अभाव में आश्रम बिखरने सा लग गया। शिष्य इधर-उधर जाने लगे, इससे विश्वामित्र को अत्यधिक चिंता हुई। जब तक आश्रम ‘श्री-सम्पन्न’ न हो, तब तक किसी दृष्टि से पूर्णता प्राप्त नहीं हो सकती ‘भले ही मैं उच्च कोटि का विद्वान हूं, भले ही अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण हूं, भले ही मैं अद्वितीय आचार्य हूं परन्तु जीवन में लक्ष्मी का भी पूर्ण महत्व है। जिस घर में सभी कुछ हो और लक्ष्मी नहीं हो तो वह घर अपने आप में दीन-हीन, कांति रहित, मलिन और बिखरा-बिखरा सा होता है’’ उन्होंने एक दो बार लक्ष्मी की साधनाएं की भी, लक्ष्मी की मूर्ति का अनावरण भी किया, ध्यान भी किया, नवीन स्तोत्रों की रचना भी की परन्तु कठोर हृदय लक्ष्मी न तो पसीजी, न प्रकट हुई और न विश्वामित्र के आश्रम में स्थापित हुई। विश्वामित्र का आश्रम वैसा ही मलिन और धन-रहित कमजोर बना रहा।
जब बात बर्दाश्त से बाहर हो गई तो विश्वामित्र अत्यधिक क्रोधित हो गए और उन्होंने आश्रम के मध्य अपने बचे-खुचे शिष्यों के बीच लाल आंखों से क्रोधातिरेक में भरकर आकाश की ओर उंगली उठाकर जोरों से गर्जना की- ‘‘मैं यदि इस बार भी अपने इन विशिष्ट दिव्य मंत्रों से लक्ष्मी को अपने वश में नहीं कर सका, यदि मैं इन विशेष साधनाओं द्वारा लक्ष्मी को अपने आंगन में खड़ा नहीं कर सका, यदि मैं अद्वितीय साधना के बल पर सभी गुणों से युक्त महालक्ष्मी को बिठा नहीं सका तो मेरा जीवित रहना व्यर्थ है और यदि ऐसा नहीं होता तो मैं सारे साधना ग्रंथों को आग लगा दूंगा और मैं यह समझ लूंगा कि ये सब साधनाएं झूठी और असत्य हैं।’’
इसके उपरान्त फिर अपने सीने पर हाथ रख कर कहा, ‘‘ मैं दूसरे ऋषियों से सम्बन्धित साधनाओं की बात नहीं कहता, परन्तु मैं ब्रह्माण्ड से प्राप्त मंत्रों के आधार पर नवीन साधना पद्धति की रचना करूंगा, नवीन मंत्रों का उद्गम करूंगा और इस साधना पद्धति और इस मंत्र के माध्यम से मैं लक्ष्मी को हमेशा हमेशा के लिए अपने आश्रम मे स्थापित कर दूंगा, जिससे आश्रम में किसी प्रकार की निर्धनता, न्यूनता और दरिद्रता रहे ही नहीं।
ऐसा हो ही नहीं सकता कि मैं किसी मंत्र की रचना करूं और वह सिद्ध न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता कि मैं जिस साधना पद्धति का निर्माण करूं, वह अपने आप में न्यून हो जाये और यदि ऐसा हुआ तो मैं भविष्य में किसी प्रकार की कोई साधना नहीं करूंगा और मैं अपने शिष्यों को कह दूंगा कि मैं अब तुम्हें स्वतंत्र करता हूं, अब तुम किसी भी दूसरे आश्रम में जाकर रह सकते हो और फिर उन्होंने तर्जनी उंगली को तानकर क्षीर सागर की ओर उठाकर कहा-‘‘ अब मैं तुम्हारे सामने गिड़गिड़ाऊंगा नहीं, हाथ नहीं जोडू़गा, स्तोत्र का उच्चारण नहीं करूंगा, स्तुति नहीं करूंगा, प्रार्थना नहीं करूंगा, मैं अपनी दृढ़ता से, मंत्रों की ताकत से तुम्हें उस क्षीर सागर से निकाल कर अपने आश्रम में स्थापित करूंगा और तुम्हें प्रसन्नता के साथ या मजबूरी के साथ जिस स्थिति में भी हो, पूर्ण सहस्त्र रूपों में आकर मेरे इस आश्रम में स्थापित होना ही पड़ेगा और सभी दृष्टियों से मेरे इस आश्रम को सम्पन्नता और पूर्णता देनी ही पड़ेगी।
विश्वामित्र की घोषणा से दिग्-दिगन्त हिल गया, पूरे आकाश में उनकी वाणी गूंज उठी उनके क्रोध से सभी परिचित थे, क्षीर सागर की लहरें आन्दोलित होने लगीं और यह ध्वनि लक्ष्मी के कानों में भी पड़ी, सहस्त्रनाग का फन भी कम्पायमान हो गया। भगवान विष्णु भी चौंक से गये और बोले अब विश्वामित्र अपनी नवीन साधना पद्धति से तुम्हें आने के लिए बाध्य करेंगे ही और तुम्हारे पास कोई चारा नहीं रहा क्योंकि वह जिस साधना पद्धति का निर्माण कर रहा है वह अपने आप में अन्यतम होगी क्योंकि वह ऋषि के मुख से निकली हुई साधना पद्धति नहीं होगी, अपितु ब्रह्माण्ड से आपूरित साधना पद्धति और मंत्र होगा।
ऐसा महान विद्रोही व्यक्तित्व था विश्वामित्र का जिन्होंने क्षत्रिय पुत्र होते हुए भी ऋषित्व ग्रहण कर महान मंत्रों की रचना की। उनके व्यक्तित्व में विद्रोह, उनके क्रोध को नहीं अपितु स्वाभिमान को प्रकट करता है। उन्होंने अपने जीवन में यह संभव कर दिया कि साधक की सृष्टि में सब कुछ संभव है, ऋषि ही भविष्य दृष्टा हो सकता है। राजा दशरथ ने राम लक्ष्मण आदि अपने पुत्रों को अस्त्र-शस्त्र की पूर्ण विद्या का ज्ञान कराने के लिए उन्हें विश्वामित्र के पास भेजा और सबसे बड़ी बात यह है कि विश्वामित्र को ज्ञान, तपस्या और शिक्षा पर इतना विश्वास था कि जनक के दरबार में शिव धनुष पर प्रत्यंचा केवल मेरे ये दो शिष्य ही चढ़ा सकते हैं और जनक पुत्री सीता केवल राम के ही वरण योग्य है। इस कार्य के लिए उन्होंने राजा दशरथ से पूछने की आवश्यकता भी नहीं समझी क्योंकि वे काल द्रष्टा थे और जो शिष्य के लिये आवश्यक है, वह उन्हें करना ही है ऐसा विश्वास, आत्मबल ऐसे महान् व्यक्तित्व में ही हो सकता है, वे ही भारतीय संस्कृति को उच्चतम सोपान पर बढ़ा सकते हैं।
ऐसे महान ऋषि अपने ज्ञान का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए नहीं करते। अपने ज्ञान, अपनी साधना से स्वयं धन कुबेर बनने की कोई इच्छा नहीं होती, अपने ज्ञान को वे जन-जन को प्रदान करते हैं।
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