





किसी भी साधना का मूल आधार मंत्र और मंत्र के साथ दी हुई विशेष क्रिया ही है। मंत्र का उच्चारण शरीर में प्राण एवं मस्तिष्क में एक विशेष भाव की रचना करता है और जब इस ध्वनि को बार-बार उच्चारित किया जाता है, तो उसकी प्रतिक्रिया ही उस शक्ति को जाग्रत करती है।
प्रत्येक मंत्र किसी देवता विशेष और शक्ति विशेष की प्रार्थना से युक्त होता है। इसकी रचना व्याकरण के अनुसार की जाती है। मंत्र एक अक्षर से लेकर सहस्त्र अक्षरों का संयोजन हो सकता है। इसका उच्चारण शुद्ध रूप से करना आवश्यक है अन्यथा मंत्र का शाब्दिक अर्थ ही पढ़ना चाहिए। लेकिन मंत्रों में सबसे अनोखे ‘साबर मंत्र’ हैं, जो व्याकरण मुक्त, निर्द्वन्द्व एवं उफनते हुए जल प्रपात की भांति हैं, जो अपनी गति स्वयं बनाते हैं।
साबर मंत्रों की उपयोगिता, उनके प्रभाव को कोई भी अनदेखा नहीं कर सकता। जो कार्य बड़ी-बड़ी साधना से सम्पन्न नहीं हो सकता, वह साबर मंत्र से सम्पन्न हो जाता है, क्योंकि साबर मंत्र तो है ही बुद्धि से परे अनगढ़ हीरे की भांति जिससे लाभान्वित होने के लिए आवश्यकता है केवल भावना की।
साबर मंत्रों की उत्पत्ति भगवान शंकर ने शक्ति पार्वती के निवेदन पर जन-हितार्थ के लिये की थी। भगवान शंकर ने सीधे-सादे शब्दों में वह आशुशक्ति भर दी, जिससे सामान्य साधक भी अपनी इच्छाओं व मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु साधना मार्ग पर बढ़कर कार्य सिद्धि कर सकें।
सिद्ध पुरूषों ने इस महाविधान का और अधिक विकास किया, इसमें नई-नई रचनाएं जोड़ी, इन सिद्ध पुरूषों ने स्वयं उन साधनाओं को सम्पन्न कर सिद्धि भी प्राप्त की। सिद्ध पुरूषों ने गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वाह करते हुए अपने शिष्यों को ज्ञान दिया और इस प्रकार की विद्या का विशेष विकास हुआ। इन सिद्ध पुरूषों के नाम पर ही सम्प्रदाय बने हैं। सभी सम्प्रदायों का मूल आधार तो शिव और शक्ति की साधना करना ही है, लेकिन साधना पद्धति अवश्य अलग-अलग है। इन सम्प्रदायों में एक प्रमुख सम्प्रदाय है-‘नाथ सम्प्रदाय’ जिसमें दीक्षा लेने वाला व्यक्ति अपने घर-परिवार से अलग रह कर मठ या आश्रम में ही गुरु सेवा करते हुए गुरु-श्रीमुख से ज्ञान प्राप्त करते हैं। इस सम्प्रदाय के आश्रम हमेशा शहरों से भीड़-भाड़ से दूर एकान्त स्थल में होते हैं। गोरखपुर स्थित शक्ति पीठ नाथ सम्प्रदाय का प्रमुख शक्ति पीठ है।
इस सम्प्रदाय में दो महापुरूष सर्वाधिक विख्यात हुए-प्रथम ‘गुरु मत्स्येन्द्रनाथ’ और दूसरे ‘गुरु गोरखनाथ साबर मंत्रों को जन-जन तक विख्यात करने में इनका सबसे बड़ा योगदान रहा है। इन दोनों महापुरूषों द्वारा साबर मंत्रों के संबंध में विशेष रचनाएं लिखी गई जो जीवन के हर पक्ष से सम्बन्धित हैं। आगे चलकर सूफी संतों द्वारा भी इस महाविधान को अपनाया गया और प्रसिद्ध ‘सूफी संत साबर शाह’ ने भी कई रचनाएं इस विद्या से संबंधित लिखीं।
साबर साधनायें बहिर्मुखी साधनायें हैं, जिनके द्वारा साधक लक्ष्मी प्राप्ति, बुद्धि वृद्धि, प्रतिभा, विकास, रोगनाश, संकट निवारण कर सकते हैं। इनके अलावा मारण, सम्मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, कीलन, स्तम्भन, विद्वेषण इत्यादि क्रियाएं भी सम्पन्न कर सकते हैं। अतः साधक को ऐसा विचार नहीं करना चाहिए, कि साबर साधनायें केवल तांत्रिक कार्यों के लिए ही है अथवा केवल अनपढ़ व्यक्तियों के लिए ही है।
वास्तव में साबर साधनायें तो साबर मंत्रों के जनक भगवान शिव का ही स्वरूप हैं। जिस प्रकार से भगवान शिव आडम्बर रहित हो, गले में सर्प डाले हुए, राख लपेटे हुए, त्रिलोक के स्वामी होते हुए भी एकदम वीतरागी हैं, न कोई वैभव और न कोई आभूषण। इसी प्रकार साबर मंत्र भी टेढ़े-मेढ़े छन्द एवं व्याकरण से परे भावना से युक्त हैं, अतः इनका जप भाव युक्त होकर करना चाहिए।
एक बार साबर साधना प्रारम्भ करके तो देखें, फल तत्काल सामने आ जाता है, क्योंकि इनकी सरलता ही इनकी पूर्णता है। इनमें केवल मंत्र जप करना पड़ता है, जटिल विधि-विधान, लम्बा-चौड़ा क्रिया-कलाप आवश्यक नहीं है, जितना अन्य दैवीय साधनाओं में होता है। ये साधनायें सरल भाषा में हैं, इसलिए संस्कृत न जानने वाले व्यक्ति भी भली-भांति साबर मंत्र उच्चारण कर सकते हैं। साबर साधना तो किसी भी वर्ण तथा जाति का व्यक्ति कर सकता है, चाहे वह स्त्री हो या पुरूष, बाल हो या वृद्ध, गृहस्थ हो या संन्यासी, क्योंकि शिव का यह वरदान तो गंगा की भांति ही है, जिसमें कोई भी डुबकी लगाकर अपने समस्त पाप-दोषों से मुक्ति पा सकता है तथा अपनी इच्छित कामना की पूर्ति कर सकता है।
स्वास्थ्य संबंधी बाधाओं के कारण आज के युग में प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रूप से ग्रस्त अवश्य रहता है, स्वयं को स्वास्थ्य संबंधी बाधा न हो तो परिवार में किसी सदस्य अथवा पत्नी आदि की स्वास्थ्य संबंधी बाधा होती है। स्वस्थ शरीर ही स्वस्थ्य मन का आधार है, परिवार में कोई भी सदस्य किसी न किसी रूप से रोगग्रस्त हो तो उसका प्रभाव अन्य सदस्यों पर पढ़ता ही है।
इस साधना में विशेष बात यह है, कि साधना के प्रति, उसके फल के प्रति मन में पूर्ण श्रद्धा एवं सम्मान होना चाहिए। यदि रोगी स्वयं साधना न कर सके तो उसके नाम से संकल्प कर दूसरा उस साधना को सम्पन्न कर सकता है। तथा जब तक रोग पूर्ण रूप से दूर न हो जाये तब तक नियमित रूप से मंत्र जप अवश्य करना चाहिए। साबर साधनाएं शनिवार अथवा मंगलवार की रात्रि को प्रारम्भ करनी चाहिए।
मंगलवार अथवा शनिवार को अर्धरात्रि को स्नान कर, शुद्ध धुले हुए वस्त्र पहने। तेल का दीपक जलाएं, अपने सामने काले तिलों की ढेरी पर कापालिक तंत्र से सिद्ध कापालिक ताबीज रखें। इसके पश्चात् सभी देवी देवताओं, पीर-पैगम्बरों तथा गुरु गोरखनाथ का ध्यान करते हुए जिस प्रकार की भी स्वास्थ्य बाधा हो, उससे संबंधित साबर मंत्र का जप काली हकीक माला से करें। 21 दिन तक नियमित मंत्र जप करने से आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त होते हैं।
पेट व्यथा पेट व्यथा तुम हो बलबीर, तेरे दर्द से
पशु मनुष्य नहीं स्थिर, पेट पीर लेवों पल में
निकार, दो फेंक सात समुद्र पार आज्ञा कामरू
कामक्षा माई आज्ञा हाडि़ दासी चंडी की दोहाई।।
प्रत्येक बार मंत्र जप करते समय ताबीज को जिस स्थान पर पेट में विशेष दर्द रहता हो, उस स्थान पर बांये हाथ से स्पर्श करें।
ऊँ कामर देश कमाक्षा देवी, तहां बसै इस्माइल
जोगी, इस्माइल जोगी के तीन पुत्री, एक रौले, एक
पक्षौले, एक ताप तिजारी इकतरा मथवा आधा
शीशी टोरै, उतरे तो उतारै चढ़े तो मारौ, ना उतरे
तो गगुरूंड मोर हंकारौ। सबद सांचा, पिंड कांचा।
फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा।
मंत्र जप के समय सामने तांबे के लोटे में जल रखें।
एक माला मंत्र जप हो जाने के पश्चात् थोड़ा जल ग्रहण करें, प्रतिदिन मंत्र जप के पश्चात् ताबीज को सिर पर सात बार फेरने के पश्चात् बांह पर बांध दें।
स्त्रियों को कमर दर्द की समस्या विशेष रूप से रहती है। यदि स्त्री स्वयं मंत्र जप करें तो उत्तम है, अन्यथा उसके नाम का संकल्प कर अन्य कोई भी व्यक्ति यह साधना सम्पन्न कर सकता है।
मंत्र
।। चलता आवे उछलता जाय, भस्म करता डह डह
जाय, सिद्ध गुरु की आन, मंत्र सांख पिंड कांचा,
फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा।।
प्रति दिन 1 माला मंत्र जप कर शुद्ध सूत से ताबीज को कमर में बांधे और जब तक रोग पूर्ण रूप से दूर न हो जाये तब तक नियमित रूप से प्रति दिन रात्रि को मंत्र जप आवश्यक करें। 21 दिन की साधना के पश्चात् सात कुंवारी कन्याओं को भोजन कराएं।
।। ऊँ नमो खों खंगारन खंगारन कहां गइले
नंदन वन चंदन वन काट के किसके सत्ताइस
दुअरिया गढ़े, किसके सत्ताइस दुअरिय गढ़ के
हूक काटौं फोड़ा काटौं फुटकी काटौं आश
काटौं करो कान फूट के। पिता ईश्वर महादेव
की शक्ति गुरु की भक्ति से झारौं बलाई जात
नहीं तो श्री महोदव की दोहाई फिरै।।
उपरोक्त मंत्र का जप करते हुए जोड़ों पर ताबीज का स्पर्श करें, तथा जांघ पर लाल डोरा बाधें और सरसों का तेल लगाएं।
आंखों से पानी गिरना, आंखें लाल हो जाना, दृष्टि कमजोर हो जाना, आदि नेत्र सम्बन्धी बाधाएं होने पर इस मंत्र का जप कर ताबीज धारण करना अत्यन्त लाभ कारक देखा गया है।
ऊँ झलभल जहर भरी तलाई अस्ताचल पर्वत से
आई जहां बैठा हनुमन्ता जाई, न फूटै पाकै, करै
न पीड़ा जती, हनुमंत हरै पीड़ा मेरी भक्ति गुरु
की शक्ति फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा सत्यनाम
आदेश गुरु को।
इस मंत्र का 21 बार उच्चारण करते हुए नीम की डाली प्रत्येक मंत्र जप के साथ नेत्रें को स्पर्श करना चाहिए, इससे नेत्र सम्बन्धी रोग दूर हो जाते है।
ऊँ नमो कोतकी ज्वालामुखी काली दो वर रोग
पीड़ा दूर कर सात समुद्र पार कर आदेश कामरूप
देश कामाख्या माई हाडि़ दासी चंडी की दुहाई।
जब तक पीड़ा पूर्ण रूप से दूर न हो जाये तब तक बांह पर कापालिक ताबीज को बांधे रखें, जब उतारना हो तो गुरु गोरखनाथ का ध्यान कर ताबीज को उतार कर पूजा स्थान में रखें।
यदि सामाजिक बंधनों के कारण या दो परिवारों के बीच द्वेष के कारण अथवा परस्पर मतभेद हो जाने की वजह से प्रेमिका का मन बदल गया हो और वह नहीं मिलती हो तो यह प्रयोग रामबाण की तरह असर करता है और प्रयोग पूरा होते ही वह स्वंय आकर प्रेमी से मिलती है, तथा उसका कहा मानती है। मंगलवार के दिन लोबान धूप लगा दे अपने सामने ही वशीकरण गुटिका रखकर उस पर निम्न मंत्र की ग्यारह माला फेरे-
मंत्र
।। ऊँ अमुक रूपमालिनी नमः।
इसमें ‘अमुक’ के स्थान पर प्रेमिका का नाम लें, जब ग्यारह मालाए पूरी हो जाये तब मन में यह भावना दें कि प्रेमिका तुरन्त आकर मिलें तथा फिर लाल कपड़े में प्रेमिका का चित्र तथा ‘वशीकरण गुटिका’ लपेटकर किसी स्थान पर रख दें तो चौबीस घण्टे के भीतर-भीतर प्रेमिका का संदेश प्राप्त हो जाता है या स्वयं आकार मिलती है। यह आजमाया हुआ प्रयोग है और निश्चय ही सिद्धिदायक है।
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