





जो अपने दम पर जिये दुनियां उसी की कहलाती है, जो अपने जीवन में जोखिम उठा कर कार्य हाथ में लेता है, भाग्य उसी का साथ देता है, और वही अपने जीवन में सफल होता है, आप जी रहे हैं और मोहल्ले के बाहर आपको कोई पहिचानता ही नहीं है, फिर ऐसा जीवन किस काम का, नये-नये कार्य करने से, नये जोखिम उठाने का उत्साह हर समय होना चाहिए तभी सड़े-गले जीवन से मुक्त होकर नये जीवन का निर्माण किया जा सकता है।
जीवन को श्रेष्ठ रूप से जीने के लिए जो आपके हाथ में शक्ति का, उत्साह का वह वज्र थमा सकते हैं, जिसके बलबूते पर आप अपना जीवन अपनी इच्छानुसार जी सकते हैं, अपने व्यक्तित्व को पराक्रमी बना सकते है, अपनी श्रेष्ठता स्थापित कर सकते है।
काल अपने आपमें एक साधारण शब्द नहीं है, यह तो अपने भीतर एक पूरा संसार सामये हुए है, काल एक गतिमान तत्व है, और काल गति का, जीवन का अन्त भी है, यह विरोधाभास अद्भुत है, जो इस काल की गति को नहीं पहिचान सकता और इसको अपने अनुकूल नहीं कर पाता, वह काल के आधीन हो कर अन्त प्राप्त करता है।
जहां कालाध्यक्ष सूर्य हैं, वहां कालकंठ, कालभक्ष शिव हैं, जो काल को अपने आधीन कर महाकाल बन गये, काल-चक्र जीवन का समय चक्र है, और कालरात्रि वह रात्रि, बेला है, जिसमें साधक काल-चक्र को अपने आधीन कर सकता है, कालहर-शिव को प्रसन्न कर सकता है, काल भैरव का अभय वर प्राप्त कर सकता है, कालहरणम् अर्थात् उसके समय का नाश नहीं होता, अपितु वह काल को अपने आधीन कर देता है।
भगवान शिव तो तंत्र, मंत्र और यंत्र के आदि रचयिता है, जिनकी हर लीला न्यारी है, जो त्याग और आनन्द की प्रतिमूर्ति हैं। देव ओर दानवों ने सागर मंथन किया, लक्ष्मी मिली विष्णु को, उच्चैश्रवा ऐरावत, इन्द्र और भी सारे विविध रत्न अन्य देवताओं को, लेकिन विश्व को ग्रस लेने को उद्यत हलाहल विष किसने ग्रहण किया, उसे विश्व रक्षार्थ शिव ने अपने कंठ में उतार लिया शिव एक महान् प्रेमी, शिव सभी ललित कलाओं के देवता शिव एक वत्सल पिता, शिव एक अपरिग्रही वैरागी, प्रेम में आकंठ डूबे हुए भी वीतराग शिव का निवास हिमालय, ऐसे महाप्रभु की हर लीला निराली है। शिव जो दानी है जो प्रसन्न होकर हर भक्त को मुंह मांगा वर दे देते हैं। शिव ही देव है जो विधाता के लिये लेख के विरूद्ध जो कुछ अदेय है सहज ही उसे प्रदान कर देते हैं।
जो काल से परे है, और जो व्यक्ति काल से ग्रसित है जिसकी आयु क्षीण हो गई है जो शारीरिक कष्टों से पीडि़त है उसे भी काल से छीन कर केवल शिव ही आयु प्रदान करते हैं जो देवताओं के भी देव है और राक्षसों के भी देव है, जो गृहस्थ के भी देव है और सन्यासियों के भी देव हैं ऐसे शिव की महिमा को बारम्बार प्रणाम।
शिव के अंश, स्वरूप, शक्ति सम्पन्न, शक्ति स्वरूप महाकाल के सेवक के रूप में भैरव की मान्यता विख्यात है, भैरव जन-जन के देव है, जो साधक विशेष मंत्रों को नहीं जानता, पूजा का विशेष विधान नहीं जानता, वह भी भैरव पूजा कर उन्हें पूर्णरूपेण प्रसन्न कर सकता है। भैरव की मान्यता मूल रूप से रक्षाकारक देव के रूप में ही है, बड़े से बडे़ यज्ञ में पहले भैरव स्थापना की जाती है, जिससे कि भैरव अपने शक्ति से दसों दिशाओं को आबद्ध कर देते हैं। फिर शुभ-मंगल कार्य में कोई विघ्न उपस्थित नहीं हो सकता है, भूत, पिशाच, प्रेत, तांत्रिक प्रयोग कैसा भी प्रबल प्रहार किया जाय तो जहां भैरव की उपस्थिति है, वहां से यह प्रहार उलटे लौट आते हैं और इस प्रकार से गलत तांत्रिक प्रयोग को करने वालों का ही नाश कर देते है। क्षिप्रा तट पर प्राचीन काल भैरव का मन्दिर है।
दक्षिण में भव्य प्रवेश द्वार है। मूर्ति प्रभावोत्पादक है। मुख में मदिरा का पात्र लगाने से भैरव उसे पी जाते हैं काल भैरव तीर्थ स्थान पर बैठ कर साधना करने मात्र से सब दुःख दूर हो जाते हैं। योगिनियों में उत्तम काली ने भैरव को पुत्रवत् पाला था। भैरव ने भयंकर और दुष्ट नौ मातृकाओं -महामारी, पूतना, कृत्या, शकुनी, रेवती, खला, कोटरी और तामसा को वश में कर लिया था। भैरव का स्थान ऊषर श्मशान के सामने क्षिप्रा के उत्तर तट पर कुछ पूर्व में हट कर है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के पूर्णता के दिवसों में भैरव की पूजा व स्तुति करना चाहिए। जिससे सर्व पितृ दोष से निवृत्त होकर साधक को सुखमय वैवाहिक जीवन, पुत्रोत्पत्ति, आयु वृद्धि, निरन्तर मंगल कार्यों में वृद्धि होती ही है।
गुरु के पश्चात् सबसे बड़ा सहयोगी परिवार है और परिवार में भी जो पूर्वज हैं, उनका स्थान उच्च है, जीवित रहते हुए आपस में कई बार मतभेद, मनमुटाव एवं विरोधाभास हो सकता है, लेकिन मृत्यु के पश्चात् यह सब सांसारिक स्थितियां समाप्त हो जाती है, जिस प्रकार एक पिता सदैव यही चाहता है, कि उसका पुत्र उससे अधिक योग्य बने, उसी प्रकार हमारे पूर्वज यही चाहते है, कि उनकी संतान अपने जीवन में सम्पूर्ण रूप से सुखी हों।,
जहां तक सहयोग एवं दिशा प्रदायक का सम्बन्ध है, सभी शास्त्रें में सबसे बड़ा सहयोगी मार्गदर्शक गुरु को ही कहा गया है, गुरु द्वारा शिष्य को सदैव उसकी उन्नति का ही मार्ग प्राप्त होता है, गुरु के शरण में आ कर तथा शुद्ध मार्ग से की गई कोई भी गुरु भक्ति निष्फल नहीं हो सकती। यदि पितरों को श्रद्धा पूर्वक पूजा, ध्यान एवं आवाहन किया जाय, तो वे उसके प्रत्येक कार्य में ऐसे सहयोगी बनते हैं, कि चिन्ताएं एवं समस्याएं उनके जीवन से दूर ही हो जाती है, इसीलिए जो विधि पूर्वक पूजा, यज्ञ करते हैं, वे पूजन कार्य से पहले अपने पितरेश्वरों का ध्यान करते हैं, उनका आह्नान करते हैं।
यजुर्वेद में कहा गया है कि श्रद्धा से जो देवता और पितरों के लिए तर्पण किया जाता है, वह ‘श्राद्ध’ कहलाता है। सात जन्मों के पितरों के लिए श्राद्ध किया जाता है और उससे तीनों प्रकार के ऋण (देव, ऋषि, पितृ) से मुक्ति होती है। पितरों का आह्नान करते समय उन्हें पूर्ण निमंत्रण दें, अपने जीवन के सभी कार्यों में भागी बनायें, तथा अपने आयु, यश, उन्नति में वृद्धि हेतु कामना करें।
इससे उसके पाप दूर होकर वह शिवस्वरूप हो जाता है। इसलिए क्षिप्रा पापनशिनी कहलाती है। महाकाल क्षेत्र में यात्रान्तर्गत तीर्थों का पुण्यफल वर्णन इस प्रकार हैं।
1- क्षिप्रा के जल से महादेव का अभिषेक करने से मनुष्य की व्याधिया समाप्त होती हैं।
2- जो मनुष्य वटयक्षिणी की पीले फूल से पूजा करता है उसे सिद्धि प्राप्त होती ही है।
3- जो मनुष्य क्षिप्रा-स्नान कर गुरु के निर्देश से मंत्र जाप करता है वह यमलोक से मुक्त होकर रुद्रलोक को प्राप्त होता हैं।
4- पिशाचमुक्तेश्वर में स्नान करने से मनुष्य के कुल की पिशाच-योनि से मुक्ति हो जाती है।
5- क्षिप्रा स्नान कर जो हवन पूजन करता है उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता हैं।
6- क्षिप्रा जल से तर्पण करने से पूर्वजों की आत्मा मुक्त होकर सिद्धाश्रम में प्रवेश करती हैं।
7- महामाया के दर्शन पूजन से भक्त या साधक सभी तरह के भौतिक सांसारिक सुखों की प्राप्ति में सर्वेसर्वा महामाया युक्त हो जाता हैं। जीवन द्वैष व वैमनष्यता शत्रुता विहिन हो जाता है।
8- तीन दिन तक साधना, पूजन, मंत्र जाप, करने से जीवन के भूत, वर्तमान, भविष्य श्रेष्ठमय बनता है और साधनाओं में सिद्धियां प्राप्त होती ही है।
उस महादेव की जो वहां साक्षात् स्वरूप में विराजमान हैं। उज्जैन में महाशिवरात्रि पर्व के बाद पुनः शिवस्वरूप सद्गुरुदेव जी की आज्ञा से महाकालेश्वर धाम उज्जैन में महालय श्राद्ध के श्रेष्ठतम दिवसों में दिव्यतम साधनात्मक आयोजन सम्पन्न होगा। जब जीवन के पुण्य उदय होते हैं अपने पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है तब ही साधक को ऐसे आयोजनों में भाग लेने का सौभाग्य प्राप्त हो सकेगा और ऐसे पूर्ण आत्मिय चैतन्ययुक्त साधनात्मक शिविर में साधक साधना सम्पन्न कर सकेंगे।
प्राचीन काल भैरव मंदिर प्रांगण में भैरव शक्ति पूजन, हवन, महामाल्य पितृ श्राद्ध के दिवसों पर पितृ पक्ष में अपने सभी संताप, दोष, रोग-कष्ट की समाप्ति हेतु साधनात्मक क्रियायें व महामृत्युजयं रूद्राभिषेक महाकाल मंदिर प्रांगण में सम्पन्न होगी। उज्जैन में सद्गुरुदेव के सानिध्य में तीन दिवसीय साधना शिविर में साधक के, परिवार के प्रत्येक सदस्य को अवश्य ही भाग लेना चाहिए जिससे उसके जीवन की दुर्भिक्षता, न्यूनता, गरीबी, रोग-शोक, से युक्त जीवन के दोष, पाप, कष्ट, पीड़ा निवारण हो इस हेतु आध्यात्मिक साधनात्मक वातावरण में दिव्य पवित्र तपोभूमि पर साधना, आराधना, पूजा-अर्चना, स्तुति, वन्दना, आदि कर सकेगें।
समय किसी के लिये नहीं रूकता, श्रेष्ठ अवसर का सही समय पर सदुपयोग करने से पूरे परिवार सहित इसमें भाग लेकर भौतिक सुखों की प्राप्ति एवं आध्यात्मिक साधनाओं में पूर्णता की ओर अग्रसर हो सकेगें।
19 सितम्बर 2014 शुक्रवार को प्रातः काल तक उज्जैन पहुँचना अनिवार्य है।
19 सितम्बर को सांध्य बेला में प्राचीन काल भैरव मंदिर प्रागंण में भैरव शक्ति साधाना पूजन हवन सम्पन्न होगा।
20 सितम्बर क्षिप्रा नदी में स्नान, सर्व पितृ दोष निवारण हेतु गुरुदेव द्वारा तर्पण व पिण्ड दान की क्रिया होगी।
21 सितम्बर कालसर्प दोष मुक्ति साधना कर अपने जीवन को दीर्घायु आरोग्य युक्त, धन वैभव, यश-लक्ष्मी से आपूरित हेतु प्रत्येक साधक द्वारा रूद्राष्टाध्यायी नवग्रह और शिव शक्ति महामृत्युजंय मंत्रों से आपूरित महाकालेश्वर स्व रूद्राभिषेक सम्पन्न होगा। नित्य प्रतिदिन योगा, प्राणायाम, मंत्र-जप, साधना पूजा, प्रवचन, शक्तिपात दीक्षायें, भजन आरती सम्पन्न होगी। साथ ही दोनों समय सात्विक प्रसाद और भोजन की व्यवस्था गुरुदेव द्वारा प्रदान की जायेगी।
पूर्व में ही ऐसी व्यवस्था कर आये कि 21 सितम्बर सांध्य आरती के बाद सीधे घर को प्रस्थान कर सकें जिससे की गुरुदेव के सानिध्य में प्राचीन पवित्र दिव्य अलौकिक पूर्ण चेतन्य स्थानों पर जो उक्त क्रियायें सम्पन्न की है उसका पूरा लाभ आप को जीवन भर अक्षुण्ण बना रहे।
पंजीकरण अनिवार्य हैं। जिससे की आप ही से सम्बन्धित साधना सामग्री मंत्र सिद्ध चैतन्य की जा सकें।
प्रत्येक साधक का पंजीकरण शुल्क: 5100/- (Rs. Five Thousand One Hundred Only)
महाकाल मंदिर प्रांगण उज्जैन में ही DORMITORY अर्थात् हॉल में सामूहिक रूप से ठहरने और विश्राम की व्यवस्था की है जिससे पारिवारिक और आत्मिक वातावरण बन सकें।
सम्पर्कः- जोधपुर कार्यालय- 0291-2517025, 0291-2517028, 07568939648, 08769442398
सभी पत्रिका पाठकों, साधकों, शिष्यों से आग्रह है कि वे अपना पंजीकरण शीघ्र करायें। जिससे उनसे सम्बंधित साधनात्मक चैतन्य सामग्री और ठहरने, भोजन, प्रसाद, विश्राम की सुव्यवस्था की जा सकें।
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