





यह पर्व सही अर्थों में गुरु का पर्व है ही नहीं, यह तो शिष्य पर्व है, इसे शिष्य पूर्णिमा कहा जाता है, क्योंकि यह शिष्य के जीवन का एक अन्तरंग और महत्वपूर्ण क्षण है। यह उसके स्वयं का उत्सव का आयोजन है, यह मन की प्रसन्नता को व्यक्त करने का त्यौहार है, यह ऐसा पर्व है, जो जीवन की प्रफुल्लता, मधुरता और समर्पण के पथ पर गुरु के चरण चिन्ह अंकित कर अपने आप को सौभाग्यशाली मानता है।
यदि तुम मेरे आत्मीय हो, मेरे प्राणों के घनीभूत हो, मेरे जीवन का रस और चेतना हो तो यह निश्चय ही तुम्हारे लिए उत्सव, आनन्द और सौभाग्य का पर्व है, जब वह गुरु ऋण से उऋण हो जाये। मां ने तो केवल तुम्हारी देह को जन्म दिया, पर मैंने उस देह को संस्कारित किया है, उसमें प्राणश्चेतना जाग्रत की है, उस तेज तपती हुई धूप में वसन्ती बहार का झोंका प्रवाहित किया है, मैंने तपते हुए भूखण्ड पर आनन्द के अमिट अक्षर लिखने की प्रक्रिया की है और मैंने तुम्हें पुत्र शब्द से नहीं आत्मीय प्राण शब्द से सम्बोधित किया है।
और यह गुरु के द्वारा ही संभव हो सका है, यह इस जीवन का ही नहीं, कई-कई जन्मों का लेखा-जोखा है। मैं तुम्हारे इस जन्म का साक्षीभूत गुरु ही नहीं हूं, अपितु पिछले पच्चीस जन्मों का लेखा-जोखा, हिसाब-किताब मेरे पास है और हर बार मैंने तुम्हें आवाज दी है और तुमने अनसुनी कर दी है। हर बार तुम्हारे प्राणों की चौखट पर दस्तक दी है और हर बार तुम किवाड़ बंद करके बैठ गये हो। हर बार तुम्हें झकझोरने का, जाग्रत करने का, चैतन्यता प्रदान करने का प्रयास किया है और हर बार तुमने अपना मुंह समाज की झुरभुरी रेत में छिपाकर अनदेखा, अनसुना कर दिया है।
यह और कब तक चलेगा, कितने जन्मों तक तुम्हारी यह चुप्पी, तुम्हारी यह बुजदिली मुझे पीड़ा पहुंचाती रहेगी, कब तक मैं गला फाड़-फाड़ कर आवाजें देता रहूंगा और तुम अनसुनी करते रहोंगे। कब तक मैं तुम्हारा हाथ पकड़ कर सिद्ध योगा झील के किनारे ले जाने का प्रयास करूंगा और तुम हाथ छुड़ाकर समाज की उस विषैली वायु में सांस लेने के लिए भाग खड़े होंगे, ऐसा कब तक होगा? इस तरह से कब तक गुरु को पीड़ा पहुंचाते रहोगे, कब तक उसके चित्त पर अपने तेज और नुकीले नाखूनों से घाव करते रहोगे, उसके प्राणों को वेदना देते रहोगे?
मैंने तुम्हें अपना नाम दिया है और इससे भी बढ़ कर मैंने तुम्हें अपना पुत्र और आत्मीय कहा है, अपना गोत्र तुम्हें प्रदान किया है और अपने जीवन के रस से सींच-सींच कर तुम्हारी बेल को मुरझाने से बचाने का प्रयास किया है, तुम्हारी सूखी हुई टहनियों में रस प्रदान करने का सफलतापूर्वक प्रयास किया है और मेरा यह प्रयत्न है कि इन सूखी हुई टहनियों में फिर नई कोपलें आयें, फिर वातावरण सौरभमय बनें। मैंने अपने जीवन के प्रत्येक क्षण को इसके लिए लगाया है, अपनी जवानी को हिमालय के पत्थरों पर घिस-घिस कर तुम्हें अमृत पिलाने का प्रयास किया है, तुम्हारे प्रत्येक जन्म में मैंने चेतना देने की कोशिश की है और हर बार तुम्हारे मुरझाये हुए चेहरे पर एक खुशी, एक आह्लाद एक चमक प्रदान करने का प्रयास किया है।
हम अपनी भौतिक वासना में डूबी आंखों से भले ही इस आनन्द को समझना भूल गये हों किन्तु इस आनन्द की स्थिति से मुख नहीं मोड़ सकते और मुख मोड़ कर पाया भी क्या, उदासी और नैराष्य। तृप्ति तो मिली नहीं। यही तृप्ति आपके जीवन में आ सके, यही मेरी शुभकामना है। इसी के लिए निमंत्रण है। आपके मन में कोई चिंगारी फूट उठे और आप कबीर की तरह इस समाज की कुरीतियों पर प्रहार कर बैंठे। हो सकता है आपकी वाणी अवरूद्ध हो जाये, आप कुछ बोल ही न पायें, केवल आपकी आंखों से अश्रुपात ही होता रहे। ऐसा भी हो सकता है कि आप केवल गुमसुम रह कर खोई-खोई आंखों से इस विश्व को अपार करूणा से निहारते ही रह जायें। कई स्थितियां संभव है किन्तु प्रत्येक रूप से आपके अन्दर से अमृत का प्रवाह दूसरे हृदय तक होगा ही क्योंकि यह अमृत पूज्य गुरुदेव प्रदत्त है। संभव है कि आपके इस बांटने को कोई न समझे किन्तु आप जिस आलौकिक आनन्द के साक्षीभूत बनेंगे वह तो केवल युगों-युगों में कुछ एक को ही मिल पाता है। कई मीरा, कई कबीर, कई सूरदास, कई तुलसी नहीं मिलते। प्रत्येक युग में कोई-कोई बिरला ही होता है, क्या पता आप उस बिरलों में से एक हो। वास्तव में गुरु और भगवान में कोई भेद ही नहीं है।
जिस प्रकार एक जीव शेर के जबड़ो में फंस कर बच नहीं सकता उसी प्रकार मनुष्य संसार चक्र में फंसा रहता है। लेकिन जो गुरु की कृपा और शरण प्राप्त कर लेता है वह जीवन में भय रूपी मृत्यु से मुक्ति पा लेता है और उसे इसके लिये गुरु द्वारा बताये गये मार्ग का पालन करना ही पड़ता है। गुरु के सम्बन्ध में यह परिभाषा दी जाती है कि जो अध्यात्म का उपदेश देते हैं वे गुरु कहे जाते हैं। लेकिन वास्तव में गुरु वही होते हैं जिन्होंने आत्म साक्षात्कार प्राप्त कर लिया होता है तथा अपनी शक्तियों का उपयोग दूसरों को आत्म ज्ञान और आत्म साक्षात्कार का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए करते हैं।
गुरु सबके लिये आवश्यक हैं, जो व्यक्ति आध्यात्मिक, दैविक और भौतिक उन्नति की ओर अग्रसर हैं। लेकिन यह ज्ञान उन्हें ही प्राप्त हो सकता है जो कि इसके लिये पूरे उत्साह के साथ इच्छुक हैं और वास्तव में ज्ञान की भूख है। जब शिष्य की ओर से प्रयत्न होता है तभी गुरु की शक्ति और कृपा से स्वभाविक रूप से शक्ति प्राप्त होने लग जाती है, शक्ति का प्रवाह बन जाता है। यदि शिष्य की ओर से कोई प्रयत्न नहीं है तो वह गुरु से शक्ति एवं कृपा नहीं प्राप्त कर सकता।
भगवत् कृपा गुरु रूप में सर्व व्यापी है और गुरु शिष्य का आत्मिक मानसिक विकास करते हैं। कई बार शिष्य यह सोचता है कि मैं भी मनुष्य हूं और गुरु भी मनुष्य हैं और आशा करता है कि दोनों भौतिक देह में एक सम्बन्ध होना चाहिए, परन्तु गुरु आत्म स्वरूप में शिष्य के भीतर सहयोग करते हैं और उसकी गलतियों को सुधारते रहते हैं जब तक वह अपने जीवन को सही रूप में नहीं जाना जाता। मनुष्य को हजारों व्यक्ति मिलते हैं लेकिन गुरु उसे एक ही मिलता है और गुरु के मिलने की पहचान यही है कि जिससे देख कर मिलकर उनकी बात सुन कर मन को शांति प्राप्त हो।
कई बार कहा जाता है कि कोई भी शिष्य कितनी भी शक्तियां प्राप्त कर ले लेकिन गुरु कृपा के बिना उसे पूर्णता प्राप्त नहीं हो पाती है। यह पूर्णतः सत्य है क्योंकि मनुष्य स्वयं जीव रूप में हजारों बन्धनों से घिरा हुआ रहता है। इस कारण उसे अपने स्व की पहचान नहीं हो पाती, शिष्य का ज्ञान कई बार गर्व रूप में उस पर हावी हो जाता है। तब वह अपने मार्ग से भटक सकता है। अतः विशेष को सदैव शिष्य भाव में ही रहना चाहिए। कभी भी अपने आप को गुरु से उच्च कोटि का ज्ञानी अथवा व्यक्तित्व नहीं समझना चाहिये क्योंकि गुरु कृपा से ही और उच्च कोटि का व्यक्तित्व प्राप्त हुआ है। सद्गुरु की पहचान यही है कि वह सब को सम दृष्टि से देखते हैं। दृढ़ आत्मविश्वास और इन सब के ऊपर एक विशेष मानसिक शांति होती है।
गुरु अपनी शक्ति का प्रवाह दृष्टि, स्पर्श के रूप में करते हैं और यह प्रेरणा देने का कार्य ही दीक्षा कहलाता है। गुरु की शक्ति के प्रवाह का तात्पर्य शिष्य के भीतर के अहम् भाव को समाप्त कर उसके स्वभाव को जाग्रत करना है। ऐसा नहीं हो सकता है कि एक क्षण आप कुछ और हो तथा दूसरे क्षण कुछ और बन जाएं।
लोग कहते हैं कि जीवन्त गुरु सार्थक है और कई लोग का यह मत बनता है कि जीवन्त गुरु की अपेक्षा गुरु का व्यापक स्वरूप आवश्यक है। वास्तव में गुरु देह रूप में भी जीवन्त होते हैं और देह त्याग के पश्चात् भी जीवन्त ही रहते हैं, क्योंकि भगवान, ईश्वर, देवता और गुरु को अमर कहा गया है, क्योंकि गुरु ज्ञान का स्वरूप हैं। भौतिक देह समाप्त हो सकती है लेकिन आत्मिक ज्ञान स्वरूप कभी समाप्त नहीं होता, इसीलिये श्रेष्ठ शिष्यों का गुरु से संवाद, देह त्याग के बाद भी चलता रहता है और मानसिक जुड़ाव स्थायी रूप से बना रहता है।
गुरु के साथ निरन्तर मिलने, देखने, बात करने की प्रक्रिया तभी तक आवश्यक है जब तक सारे संदेह समाप्त होकर आत्म साक्षात्कार की क्रिया प्रारंभ ना हो जाए। जब आत्म साक्षात्कार हो जाता है तो बाह्य गुरु अन्तर मन में विद्यमान हो जाते हैं।
वास्तव में गुरु और शिष्य का सम्बन्ध स्वतंत्रता का संबंध है जिसमें आपसी निर्भरता होते हुए भी एक आत्मिक स्वतंत्रता है क्योंकि बाह्य गुरु का कार्य आपकी आन्तरिक स्वतंत्रता को जाग्रत करना है। जब आन्तरिक रूप से स्वतंत्र हो जाते हैं तो अपने आप क्रिया शक्ति, ज्ञान शक्ति, इच्छा शक्ति का उदय हो जाता है और कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया भी प्रारंभ हो जाती है।
सद्गुरु वही है जो कि शिष्य में निरन्तर जाग्रत और सुप्त अवस्था में शक्ति का प्रवाह करता रहे। जब व्यक्ति गुरु का कोई एक विशिष्ट स्वरूप अपने भीतर स्थापित करता है तो कई बार वह विशेष स्वरूप टूट सकता है लेकिन जब शिष्य गुरु के ज्ञान स्वरूप को स्थापित कर देता है तो वह स्वरूप कभी भी टूटता नहीं है। गुरु सम्बन्धों में समर्पण, विश्वास, श्रद्धा तत्व अत्यन्त आवश्यक हैं। इनके बिना छात्र और अध्यापक के सम्बन्ध तो बन सकते हैं लेकिन गुरु, शिष्य का सम्बन्ध नहीं हो सकता है।
मैं इन सब के लिए ही गुरु पूर्णिमा पर आवाज दें रहा हूं, क्योंकि यह तुम्हारा स्वयं का पर्व है। यदि शिष्य सही अर्थों में शिष्य है, यदि सही अर्थों में वह मेरी आत्मा का अंश है, यदि सही अर्थों में मेरी प्राणश्चेतना है तो उसके पांव किसी हालत में रूक नहीं सकते, समाज उसका रास्ता रोक नहीं सकता परिवार उसके पैरों में बेडि़यां डाल नहीं सकता, वह तो हर हालत में आगे बढ़ कर गुरु चरणों में, मुझ में एकाकार होगा ही क्योंकि यह एकाकार होना ही जीवन की पूर्णता है और यदि ऐसा नहीं हो सका तो यह शिष्यता ही नहीं है, वह तो कायरता है, बुजदिली है, कमजोरी है, नपुंसकता है और मुझे विश्वास है कि मेरे शिष्यों के साथ इस प्रकार के घिनौने शब्द नहीं जुड़ सकते।
गुरुदेव ने तो आप सभी शिष्यों से मिलने की तीव्रतम इच्छा से आवाहन किया है क्योंकि आप सद्गुरुदेव के मानस पुत्र-पुत्रियां है। गुरु तो बाहें फैलाएं खड़े हैं आपके इन्तजार में क्योंकि उन्हें विश्वास है कि जितनी मिलने की की पीड़ा गुरु के हृदय में है, इतनी ही पीड़ा उस नदी रूपी शिष्य को भी है अपने आपको शीघ्रताशीघ्र उस समुद्र में विसर्जन करने की, उनमें एकाकार होने की। गुरु पूर्णिमा का यह महापर्व तो वास्तव में शिष्य पूर्णिमा ही है और पूर्णता प्राप्ति के लिए इसका इंतजार सभी साधकों-शिष्यों को होता ही है। इस चैतन्य गुरु पूर्णिमा का पर्व पर सद्गुरुदेव ने सबकों पूर्णता देने का, ज्ञानश् चेतना देने का, गुरुत्व देने का, विश्वास और पूर्णता देने का वायदा किया है वह पूर्ण होगा ही।
ऐसे दिव्य साधनात्मक समारोह में इन्द्राक्षी धन वैभव लक्ष्मी दीक्षा, प्रत्यांगिरा ऊर्वशी आकर्षण दीक्षा, ब्रह्म वर्चस्व शिष्याभिषेक दीक्षा प्रदान की जाएगी और वन्दनीय माताजी के सानिध्य में प्रत्येक साधक द्वारा स्व रूद्राभिषेक सम्पन्न होगा। आप सभी को यह प्रेम भरा निमंत्रण है गुरुदेव की ओर से और आप सभी का गुरु पूर्णिमा शिविर में 10,11,12 जुलाई को रायपुर (छ-ग) में आत्मिय भाव से इंतजार रहेगा।
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