





नवरात्री पर्व वर्ष में चार बार आता है, उनमें चैत्र नवरात्रि से संवत् नववर्ष का प्रारंभ होता है, और आश्विन नवरात्रि जो कि आश्विन शुक्ल पक्ष में आती है, यह दोनों नवरात्रि ‘जाग्रत नवरात्रि’ कहलाती है, इसके अतिरिक्त दो नवरात्रि आषाढ़ शुक्ल पक्ष और माघ शुक्ल पक्ष ‘ सुप्त नवरात्रि’ कहलाती है, इस प्रकार हर तीन महिने के अन्तर में नवरात्रि पर्व आता है। नवरात्रि दिव्य शक्ति के पूर्ण विग्रह का एक उत्सव है, इन दिवसो में माँ भगवती दुर्गा इस बात का ज्ञान कराती है कि हम उसमें अलग नही हैं। नवरात्रि के समय भक्त और शक्ति के बीच भेद समाप्त हो जाता है और यह ज्ञान होता है कि हम आद्या शक्ति के ही अंश हैं। चण्डी माहत्म्य में एक काव्य के रूप में राक्षसी प्रवृतियों पर देवी शक्तियों के विजय की कथा आती है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में भी आंतरिक रूप से जो अर्न्तद्वन्द्व चलता रहता है।
व्यक्ति के अन्दर जो राक्षसी प्रवृतियां जाग्रत हो जाती है उन्हें नष्ट करने का महान पर्व ही नवरात्रि का एक रूप हैं। नवरात्रि पर्व को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है, और ये तीनों शक्ति के ही स्वरूप है। नवरात्रि अर्थात् नवीन रात्रि और नौ रात्रि तीन देवियों को समर्पित है। इसमें प्रथम शक्ति है- सरस्वती जिसे ज्ञान की शक्ति कहा गया है जो वाग्देवी, ज्ञान और चेतना स्वरूप में विद्यमान होती है। द्वितीय शक्ति- लक्ष्मी जिसे धनदात्री देवी कहा जाता है जो ज्वालामालिनी, कमला और भुवनेश्वरी स्वरूप में है। तीसरी शक्ति है- दुर्गा जो आत्मशक्ति आन्तरिक ऊर्जा कुण्डलिनी का स्वरूप है, ये तीनों शक्तियां संयुक्त रूप सें परमात्मा का स्त्री रूप में प्रगटीकरण है।
भगवती दुर्गा संहार की सभी शक्तियों की जनक है और उसका विवरण नहीं किया जा सकता है, यह ठीक उस प्रकार है जैसे अग्नि और उष्मा हैं। बाह्य दृष्टि से दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए होते भी एक दूसरे से अलग ही हैं। हमारे जीवन में निरन्तर युद्ध रूपी नूतन नाग-पाश और संदेह होते हैं, उसमें नवरात्रि हमें अपने आप को पुनः जाग्रत करने का अवसर प्रदान करती है, कि हम जाग्रत होकर आद्या शक्ति से एकाकार हो जाये। कलयुग में मनुष्य जीव में अहंकाररूपी अंधकार, विपरीत विचार, कुबुद्धि कभी भी उत्पन्न हो जाते है और उन दुर्गुणरूपी राक्षसों को तत्काल समाप्त करने की आवश्यकता है, इसलिए प्रत्येक नवरात्रि से पहले एक महालय आता है, जिसका तात्पर्य है कि महाविनाश। ऐसे समय में भीतर की विनाशकारी शक्तियों को नष्ट करने का शुभ अवसर नवरात्रि है और नवदुर्गा की साधना से शक्ति को पुनः जाग्रत किया जाता है।
यह पूरा रचना क्रम जो संहार और उत्पत्ति का क्रम, व्यक्ति के जीवन में निरन्तर चलता रहता हैं। दुर्गा के नव स्वरूप इस रचनात्मक प्रक्रिया के भाग है, जो कि हमारे भीतर एक-एक क्रम का निर्माण करते हुए हमारा पुनः निर्माण करते है। हमारे पास आयुद्ध क्या है? अर्थात् शस्त्र क्या है? हमारे पास शस्त्र हमारे विचार, हमारे संस्कार , हमारा ज्ञान ही है। ये विचार संस्कार और ज्ञान से निर्मित होते है और जब जीवन में विनाशकारी विचारों को नष्ट करने कि भावना आ जाती है, उद्देश्य आ जाता है तो आद्याशक्ति स्वयं हमारे भीतर प्रवेश करती है, जिससे हम पुनः आंतरिक और बाह्य रूप से दिव्य भाव ग्रहण कर सके। नवरात्रि आत्म विश्लेषण का भी काल है, हम अपनी पूरी ईमानदारी से अपनी शक्ति का विश्लेषण करते है और इस विश्लेषण द्वारा संदेह के बंधनो को काट कर अपने भीतर इन्द्र तुल्य राज्य की शुद्धता को स्थापित करते हैं।
प्रत्येक मनुष्य का जीवन बहुआयामी होता है। इस जीवन में ही विभिन्न प्रकार के रंग, तरंग, उमंग है तो कभी हताशा-निराशा, परेशानी भी है। जहां जीवन में सुख हैं तो दुःख भी है जीवन में पीड़ा है, तो आनन्द भी है। ये सारी स्थितियां मनुष्य को विचलित भी करती हैं और ज्यादातर व्यक्ति अपने जीवन में अपने कार्यों का समाधान नहीं कर पाते तथा उन्हें स्थितियों में अनुकूलता प्राप्त नहीं होती है तो वे निराशामय अंधकार में चले जाते हैं। लेकिन इन सब बाधाओं तथा समस्याओं को अनुकूल बनाने का उपाय क्या हैं प्रथम शक्ति स्वरूप का प्रकटीकरण इस चराचर जगत में नौ प्रकार की स्त्री शक्ति है, विश्व की उत्पत्ति से पहले काल अर्थात् शिव का प्रगटी करण हुआ और शिव के साथ ही उष्मा अर्थात् ऊर्जा शक्तिरूप में प्रगट हुई, इसलिए उष्मा इसके पश्चात् क्रियात्मक स्वरूप ब्रह्मा और तदन्तर विष्णु शक्तियों के साथ प्रगट हुई।
ब्रह्मा के साथ स्त्री शक्ति के रूप में ज्ञान अर्थात् सरस्वती थीं, विष्णु के साथ प्रकाश अर्थात् लक्ष्मी शक्ति स्वरूप में साथ थी और उन दोनों ने काल अर्थात् शिव से संबध कर जगत रचना की इच्छा प्रगट की। क्योंकि काल अर्थात् शिव सब वस्तुओं से परे हैं और उनको काल बंधन में बांधना सम्भव नहीं हैं, उसके उपरान्त भी ब्रह्माण्ड के रचियता और पालन कर्ता विष्णु ने कहा की जब शिव अपनी क्रिया नहीं करेंगें तब तक जगत् में एक चक्र स्थापित नहीं हो सकता और जगत में वास्तविक स्वरूप में लक्ष्मी और नारायण स्थापित नहीं हो सकते।
महाकाल ने उन सारी शक्तियों को एकाकार कर अपने भीतर समाहित कर लिया। उस प्रकार महाकाल ने थोड़ी भक्ति, थोड़ी ज्ञान-शक्ति, थोड़ी प्रेम शक्ति, थोड़ी मातृत्व शक्ति, थोड़ी क्रिया शक्ति, थोड़ी अधिकार शक्ति, थोड़ी धन शक्ति, थोड़ी भावना शक्ति, थोड़ी संहार शक्ति को मिलाकर एक शक्ति का रूप दे दिया और यह शक्ति अपने आप में पूर्ण शक्ति बन कर शिव के साथ समाहित हो गई। इसी स्थिति में महाकाल अर्थात् शिव ने ब्रह्माण्ड में नौ स्तर स्थापित किये और उन नौ स्तरों में एक समन्वय रहे इसलिए शिव ने शक्ति के नौ स्वरूप प्रगट किये, जिससे विश्व एक वर्तुल स्थिति में चलता रहे। शक्ति की नौ स्थितियों का आपस में समन्वय भी है और विग्रह भी है। इस कारण जो व्यक्ति उन नौ शक्तियों से समन्वय स्थापित कर लेता है वह परम शिव भाव से युक्त हो जाता है।
शक्ति को नाम दिया गया ‘नव दुर्गा’ जिस के लिए नवरात्रि में नौ दिन अलग-अलग प्रकार की साधना, आराधना, पूजा की जाती हैं। इस प्रकार नवरात्रि के नौ दिवस शक्ति के यह नौ स्वरूपों की साधना के दिवस है जो कि एक पूर्ण स्त्री शक्ति में आवश्यक है, जिससे वह पुरूष रूपी जीव को जो शिव स्वरूप है उसे पूर्ण संयोग दे सके। मनुष्य को शिव स्वरूप कहा गया है और वह हर समय किसी न किसी रूप में शक्ति पर आधारित है। उसके जीवन में निर्माण शक्ति, भावना शक्ति, क्रिया शक्ति, ज्ञान शक्ति, अधिकार शक्ति, प्रेम शक्ति, आनंद शक्ति, संहार शक्ति, अर्थात् शक्ति के सारे स्वरूप आवश्यक हैं।
इस प्रकार मनुष्य जीवन में हर समय शक्ति के सभी स्वरूपों की आवश्यकता पड़ती है। जब इसमें से किसी एक शक्ति की भी कमी हो जाती है तो जीवन अधूरा हो जाता है, इसलिए नवदुर्गा को ही पूर्ण स्त्री कहा गया हैं। पुरूष हो अथवा स्त्री शास्त्रों में उसे केवल जीव कहा गया है और जो जीव है उसे जीवन में शक्ति की आवश्यकता पड़ती ही है। इसके लिए शक्ति आराधना तांत्रोक्त रूप में, मांत्रोक्त रूप में हर पुरूष या स्त्री को अवश्य ही करनी चाहिए। जीवन में पहला सूत्र तो यह आवश्यक है कि गुरु होने ही चाहिए। गुरु का तात्पर्य है वह ज्ञान, शक्ति का भण्डार जो आपको सतत् जीवन्त चेतना प्रदान करता रहे। दूसरा सूत्र है कि मनुष्य को जीवन में कर्मशील बनना ही है। विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी जो कर्म करते रहते हैं उनके जीवन में समस्यायें बहुत छोटी हो जाती हैं और वे कभी भी निराश नहीं होते। कर्म ही संजीवनी शक्ति है।
जहां कर्म है और गुरु है, वहां गुरु के द्वारा जो ज्ञान प्राप्त होता है वह साधना कहलाती है। कर्मशील व्यक्ति गुरु द्वारा प्रदत्त साधनाओं के माध्यम से गुरु की शक्ति तो प्राप्त करता ही है, उसके साथ ही उसे दैवीय शक्ति भी पूर्ण रूप से प्राप्त होती है। देवी-देवता भी उसी व्यक्ति पर आशीर्वाद की वर्षा करते हैं जो कर्मशील होता है, शिष्य होता है, साधक होता है। इसी महीने नवरात्रि पर्व दिनाँक 25 सितम्बर से प्रारम्भ हो रहा है यह केवल एक पर्व नहीं अपितु साधना का विशिष्ट मुहूर्त है जिसमें साधना कर व्यक्ति मां भगवती दुर्गा का साक्षात् आशीर्वाद प्राप्त करता है। उसके जीवन में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती स्थापित होती है। उसे जीवन में त्रि-शक्ति तत्व प्राप्त होता हैं।
यह सत्य है कि मनुष्य विभिन्न प्रकार की इच्छाओं, स्थितियों वस्तुओं से आनन्द प्राप्ति का प्रयास करता है। लेकिन इस के उपरान्त भी अपने आप को अपूर्ण पाता है और संतुष्ट हो नहीं पाता। वेदान्त सिद्धांत के अनुसार मनुष्य जीवन का लक्ष्य आत्म ज्ञान प्राप्त कर पूर्णत्व प्राप्त करना है और यह स्वयं को जानकर ही प्राप्त किया जा सकता है। यह आध्यात्मिक मुक्ति भाव मोक्ष कहलाता है।
दैवी माहत्म्य एक सुंदर महाकाव्य है जिसमें मनुष्य जीवन की गाथा है। जिसमें आत्मा बंधन मुक्ति की ओर अग्रसर होती है। इस मार्ग में मनुष्य के सामने कई प्रकार की बाधायें आती है, जैसे वासनाएं, तृष्णाएं, अतृप्त भावनाएं आदि। वर्तमान जीवन पर दूसरों का प्रभाव, पूर्व जन्म से प्राप्त कर्म के कुफल जो कि इस जीवन यात्रा में बाधाओं के रूप में सामने आते है। उनमें तीन मुख्य बाधायें है माया, इच्छाएं, और क्रोध। ये तीनों एक दूसरे से जुड़े हुए है। माया का बंधन वायुरूप से मधुर लगता है और वह इच्छाओं का महासागर उत्पन्न करता है और इच्छाएं पूरी नहीं होने पर क्रोध की उत्पत्ति होती है। दैवी माहत्म्य में इन तीनों स्थितियों को पार करने की विधि स्पष्ट करता है, कि किस प्रकार विक्षेप मनः शक्ति में परिवर्तन द्वारा इन तीन स्थितियों पर विजय प्राप्त कर पूर्णत्व प्राप्त किया जाता है।
ये साधनाएं जीवन के प्रत्येक पक्ष से सम्बन्धित है। आपके लिये जो आवश्यक है उन साधनाओं को गुरु के सानिध्य में अवश्य सम्पन्न करें।
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