





यज्ञ या हवन क्रिया भी भगवान विष्णु के ही अवतार है। श्री विष्णु ने यज्ञ, कर्म और प्रकृति का संतुलन बनाये रखने, देवताओं को शक्ति प्रदान करने और नकारात्मक शक्तियों से धर्म की रक्षा करने के उद्देश्य से प्रजापति रूचि और उनकी पत्नी आकूति के यहां यज्ञावतार लिया था।
यज्ञ क्रियाएं घर में कार्यस्थल में या जिस भी स्थान पर यह यज्ञ क्रियाएं की जाती है उस स्थान को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है। वहां व्याप्त आसूरी शक्ति, नकारात्मकता, बुरी नजर, ग्रह-दोष, पितृ दोष का अंत निश्चित रूप से होता है। यज्ञ के समय मंत्रोच्चारण, आहुति, हवन सामग्री आदि से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा वहा मौजूद सभी लोगों के दोषों का निवारण करतें है। जिस प्रकार भगवान विष्णु ने देवताओं को आशीर्वाद देकर आश्वस्त किया था कि यज्ञ के माध्यम से वे अपनी शक्तियां व यज्ञ दक्षिणा देकर उसका फल प्राप्त कर सकते है, ठीक उसी प्रकार वर्तमान में भी यज्ञ व हवन सभी क्रियाओं द्वारा साधक अपने जीवन की मलिनताओं, सभी बाधाओं का निवारण कर पुनः जीवन को संतुलित एवं ऊर्जावान बना सकते हैं।
नजर दोष एवं पितृ दोष बाधा निवारण के लिये हवन क्रिया :-
आवश्यक सामग्रीः
सुखी लकड़ी (आम अथवा पीपल की), गोबर के उपले, अक्षत, कपूर, गाय का घी यदि संभव हो तो थोड़ी मात्रा में दशांग लें।
प्रातःकाल सूर्योदय के समय अथवा सायंकाल सूर्यास्त के समय स्नानादि से निवृत्त हो जाएं। सर्वप्रथम किसी पवित्र स्थान पर तांबे अथवा मिट्टि का हवनकुण्ड तैयार करें। तत्पश्चात अपने आराध्य सद्गुरुदेव का पंचोपचार पूजन करते हुए अपनी मनोकामना की पूर्ति हेतु संकल्प लें। तत्पश्चात नीचे दिये गये मंत्र का 108 बार उच्चारण करते हुये हवन करें। जिससे आपके जीवन में व्याप्त नजर दोष व पितृ दोष का शमन हो सके।
मंत्र
।। ऊँ क्रीं गुरवे मम् मातृ-पितृ स्वात्म सिद्धिं देहि देहि नमः।।
आहुति देनें के बाद पुनः एक माला गुरू मंत्र का जाप अवश्य करें।
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