





किसी के समझाने से कुछ समझ में नहीं आता, करने से ही कुछ समझ में आता है। करोगे तो ही समझ पाओगे। इस जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है, उसका स्वाद चाहिए, उसकी व्याख्या और अर्थ नहीं चाहिए। अहंकार को बनाना कठिन है, मिटाना कठिन नहीं है। क्योंकि अहंकार वस्तुतः है ही नहीं, मिट सकता है आसानी से। सारी जिन्दगी बड़ी मेहनत करके उसे संभालना पड़ता है। उसे गिराना तो जरा भी कठिन नहीं है।
अगर आपका अहंकार क्षणभर को भी गिर गया, तो आपको ब्रह्मास्मि की प्रतीति हो सकेगी कि ब्रह्मास्मि क्या है तब ही तो समझेंगे। समझेंगे सिर्फ इसीलिए क्योंकि कर सके। तो मैं जो कहूंगा, उसे आप अपनी जानकारी नहीं बना लेंगे, उसे आप अपनी प्रतीति बनाने की कोशिश करेंगे। मैं कहूंगा, उसे अनुभव में लाने की चेष्टा करेंगे, तो ही! अन्यथा शब्द और शब्द का ढेर लग जाता है आखिर में। बहुत शब्द आपके पास होते हैं, ज्ञान बिल्कुल नहीं होता और जिस दिन ज्ञान होता है, उस दिन अचानक आप अपने अन्दर अपने इष्ट गुरु को पाते हैं, यही प्रार्थना है।
स्वयं में दोष देखना साधक का पहला लक्षण है। इसका यह अर्थ नहीं है कि दूसरों में दोष नहीं होते। होते होंगे। उनसे तुम्हें क्या प्रयोजन है? उनके दोषों के लिए तुम्हारा कोई दायित्व नहीं है। और यह दूसरों में दोष देखने की आदत का सबसे खतरनाक परिणाम है तो यह है कि किसी दिन अगर तुम्हें निर्दोष व्यक्ति भी मिल जाए तो तुम उसमें भी दोष देख लोगे। तुमने बुद्धों में दोष देख लिये! तुम्हारी दोष देखने की आदत इतनी सघन हो गई कि जहां नहीं है वहां भी तुम आविष्कृत कर लोगे। तुम और तो कुछ आविष्कार करते ही नहीं। तुम्हारी सारी सृजनात्मक शक्ति दोषों के निर्माण में बनती है और लगती है। औरों में दोष देखे तो चलेगा, लेकिन जब तुम संतों में दोष देखने लगते हो, तब तुम अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हो।
गुरु ने कभी शरीर की निन्दा नहीं की है, ना ही कर सकते हैं वे। यह परमात्मा की सबसे बड़ी भेंट है तुम्हें। और यह देह-मनुष्य की देह परम भेंट है! इस देह में सब कुछ है। इस देह में वे सारे द्वार हैं जिनसे तुम परमात्मा तक पहुंच जाओ। इस देह में वह ऊर्जा है जो तुम्हें पंख लगा दे, आकाश में उड़ा दे। इस देह में बड़े तिलिस्म छिपे हैं। इस देह का बड़ा जादू है। ऐसी देह किसी और पशु-पक्षी के पास नहीं है। सद्गुरु की सेवा से बहुत लोगों ने जीवन में पूर्णता को पाया है और ध्यान रखना, सेवा का अर्थ आध्यात्मिक है। पूर्वीय सेवा ध्यान का एक ढंग है, प्रार्थना, उपासना की एक प्रक्रिया है। सेवा तो बहाना है। गुरु को पैर दबवाने की जरूरत है? ऐसा नहीं है! शिष्य को दबाने की जरूरत है। गुरु के पैर दबाए जाये, यह कोई जरूरत नहीं है गुरु की। लेकिन यह शिष्य की जरूरत है कि उन परम-पावन चरणों का स्पर्श हो। गुरु के चरणों को तो चरण-कमल कहते रहे हैं, उन कमल जैसे चरणों का स्पर्श हो, उन चरणों की गंध समा जाये। गुरु को जरूरत नहीं है इस बात की, लेकिन शिष्य को जरूरत है। इस अन्तर को समझना जरूरी है।
शिष्य सेवा कर रहा है अपने आनन्द, अपने ध्यान, अपने प्रेम के आविर्भाव के लिए। गुरु तो उसके लिए मंदिर हैं। सेवा प्रार्थना हैं और गुरु उसके लिए परमात्मा का प्रत्यक्ष रूप हैं, साकार रूप हैं-अवतरण हैं परमात्मा का। परमात्मा से सीधी पहचान मुश्किल है, क्योंकि वह अदृश्य है। गुरु परमात्मा का दृश्य रूप हैं। जैसे परमात्मा तुम्हारे जगत में, तुम समझ सको इस रूप में प्रकट हुआ है। गुरु तुम्हारी भाषा में परमात्मा का अनुवाद हैं, रूपांतरण हैं, भाषांतर हैं और एक बार गुरु समझ में आ जाये तो परमात्मा को समझने में कठिनाई न रह जायेगी। और गुरु के प्रवचन मात्र से तुम न समझ सकोगे। समर्पण चाहिए। गुरु बोले, तुम सुनो, इसका उपयोग है, मगर गुरु के सान्निध्य में होने के लिए एक निमित्त-मात्र है। इस बहाने उसके पास बैठते हो। इस बहाने उसकी श्वास तुम्हारी श्वास में सम्मिलित होती है। इस बहाने उसकी गंध से तुम आंदोलित होते हो। इस बहाने उसकी वीणा के कुछ स्वर तुम्हारी हृदय-तंत्री को छेड़ते हैं। यह सिर्फ एक बहाना है।
यही शिष्य का भजन है, सेवा भजन है। लेकिन लोगों ने भजन के आसान रास्ते निकाल लिये हैं। जल्दी साधना की माला घुमाई क्योंकि दुकान जाना है, दफ्रतर जाना है। जल्दी-जल्दी जपते हैं। सोचते हैं इस तरह जल्दबाजी से जप कर और माला घुमा कर परमात्मा को धोखा दे लेंगे। लोग औरों को धोखा देते-देते इतने माहिर हो गये हैं कि परमात्मा तक को धोखा देने की सोचते हैं। गुरु तो शून्य है, जब शिष्य भी शून्य हो जाता है, इन दो शून्यों के बीच पूर्णता का अनुभव होता है। गुरु तो शून्य होकर पूर्ण हुआ। गुरु के पास बैठ-बैठ कर तुम भी शून्य होने का पाठ सीख लोगे। सेवा शून्य होने का पाठ है। सेवा का अर्थ झुकना होगा, स्वयं इच्छा से दास बन जाना, स्वयं इच्छा से समर्पण कर देना। कह देना कि मैं नहीं हूं, तू ही है! और समग्र भाव से अगर कह पाओ तो उसी क्षण तुम इस लोक से दूसरे लोक में प्रवेश कर जाते हो। उसी क्षण तुम्हें परमात्मा का पहला प्रमाण मिलता है। तर्क प्रमाण नहीं दे सकते हैं, मगर सेवा प्रमाण दे सकती है।
गुरु कुछ भी करें तो भी उनके प्रति प्रेम न छूटे, तो जल्द ही, शीघ्र ही पूर्णता प्राप्त हो जायेगी। तुम उतनी ही देर लगवा दोगे, जितना तुम अपने को बचाओगे, उतनी ही देर लग जायेगी। देर तुम्हारे कारण होती है, देर गुरु के कारण नहीं होती। गुरु तो चाहता है अभी हो जाए, तत्क्षण। मगर तुम बचते फिरते हो, तुम अपने को बचाते फिरते हो, तुम अपनी बीमारियां अपने गुरु के सामने भी नहीं दिखाते, उससे भी बचा कर चलते हो। समस्या कुछ होती है, प्रश्न कुछ उठाते हो। उलझन कुछ होती है, बातें तत्वज्ञान की करते हो। वासना सताती है, प्रश्न ब्रह्मचर्य के संबंध में पूछते हो। काम पीडि़त करता है, भगवान है या नहीं, इसके प्रमाण मांगते हो। ऐसी ही निरर्थक बातें कर अपने आपको बहुत ही बुद्धिमान और ज्ञानी समझते हो। इसी के फलस्वरूप जीवन में प्यास बनी रहती है। क्योंकि तुम किसी से आत्मिक प्रेम नहीं करते और न ही अपने ही लोगों से अन्तसः स्वरूप में प्रेम, आत्मीयता, स्नेह, सहयोग नहीं मिल पाता है।
सही स्वरूप में तुम चैतन्यता का एक सागर हो, तुम्हारी चेतना की एक छोटी सी लहर इस सारे संसार को अपने में डुबो सकती है। ऊपर से देखो तो बूंद हो, भीतर से पहचानो तो सागर हो। ऊपर से देखो तो बहुत छोटे, भीतर से देखो तो तुम्हारा न कोई आदि है न अंत। ऊपर से देखो तो क्षणभंगुर और भीतर से देखो तो सनातन, शाश्वत्। देखो तो नाम है, धाम है, पता-ठिकाना है, विशेषण है, जाति है, धर्म है, देश है, भीतर से देखो तो अनिर्वचनीय हो तुम, ब्रह्म-स्वरूप हो तुम! तुम्हारी चैतन्यता में उठी छोटी सी लहर सारे अस्तित्व को भिगो सकती है।
जिसने अपनी चेतना के इस सागर को पहचाना, वही संत है। जिसने सत्य को जाना, वही संत है। जिसने इस सत्य के साथ अपने को एकरूप पहचाना, वह संत है। जानने में तो थोड़ा भेद रह जाता है – जानने वाले का और जाना जाने वाले का, ज्ञान का और ज्ञेय का। लेकिन उतना भेद भी नहीं है सत्य में और संत में। सत्य में जो डूब गया है, सत्य में जिसने अपना सत पा लिया है, या सत्य में जिसने अपने को डुबा दिया है और सत्य में जिसने अपने को पूर्ण कर दिया है -वही संत बन जाता है। तुम्हारे कारण परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता और तुम्ही पूछते हो कि परमात्मा कहां है। जैसे किसी ने आंख पर पट्टियाँ बांध रखी हो और पूछता हो कि सूरज कहां है? कान बंद रखे हो और पूछते हो कि स्वर-संगीत कहां है? हृदय को बिल्कुल मार डाला है और पूछते हो- प्रेम क्या है? प्रार्थना क्या है? सारी संवेदनशीलता जड़ हो गई है। अहंकार तुम्हारी छाती पर पत्थर की तरह बैठ गया है। तुम अब अनुभव नहीं करते, केवल सोचते हो। प्रेम के सम्बन्ध में भी अब केवल सोचते हैं, विचारते हैं-प्रेम क्या है? यह भी एक विषय है सोचने-विचारने का, जीवन्त अनुभव नहीं। तो परमात्मा तो बहुत दूर हो गया, बहुत-बहुत दूर हो गया और वह है तुम्हारे कारण! तुम जिम्मेदार हो इसके।
प्रार्थना के क्षण में प्रार्थना करने वाला जहां होता है वहां नहीं रह जाता। एक द्वार खुलता है जो सदियों से बंद था। एक नया आयाम, नई यात्रा, एक नये आकाश के दर्शन होने शुरू हो जाते हैं। अगर बूंद ठीक से प्रार्थना कर पाये सागर की, तो उसके प्राणों का सागर से सम्पर्क होना शुरू हो जाता है और बूंद जब सागर को पुकारती है तो किसी अज्ञात मार्ग से सागर होने की क्षमता और पात्रता पैदा होती है। और बूंद कहती है सागर से कि मेरी सहायता करना कि मैं तुझ तक पहुंच सकूं, तो आधी मंजिल पूरी हो जाती है। क्योंकि बूंद ने जिस श्रद्धा, आस्था और निष्ठा से कहा कि परमात्मा मुझे सहायता करना, यह श्रद्धा, निष्ठा, आस्था बूंद की जो संकीर्णता है उसे तोड़ देती है और जो विराटता है उससे जोड़ देती है। दीपक की ज्योति बुझ जाती है, पर मिटती नहीं। दीपक की ज्योति लुप्त हो जाती है, समाप्त नहीं हो जाती। साधक की तरफ से जो खोना है, वह किसी दूसरी तरफ मिलन होता है। ज्योति आई थी किसी विराट से और फिर विराट में लीन हो जाती है। सागर से ही आती है बूंदे, जो आपके घर, खेत, बाग और बगीचे में बरसती हैं और फिर सागर में ही लीन हो जाती हैं।
भौतिक जीवन के हर क्षण में नवीनता अनिवार्य है।, जो आत्मनिर्भर है, आत्मविश्वासी तथा आत्म निर्णायक है, जीवन उनका ही सफल एवं संतुष्ट होता है, जिनके पास अपनी बुद्धि और अपना विवेक होता है। कालचक्र फिर से एक नूतन वर्ष को ले आया है वह सब कुछ पूर्णता से प्राप्त करने के लिए जो आपके मन और मस्तिष्क में निरन्तर निरन्तर इच्छा उत्पन्न होती है। सृष्टि में अनन्त गुण हैं, अनन्त विद्याएं हैं, अनन्त कलाएं हैं, इसी के फलस्वरूप जीवन में पूर्णता को प्राप्त करने का यह श्रेष्ठमय अवसर नववर्ष के रूप में महामाया शक्ति की तेजमय तपोभूमि रायगढ़ छत्तीसगढ़ में नववर्ष 2,3,4 जनवरी को षोडश कला पूर्ण राज-राजेश्वरी साधना महोत्सव का आयोजन सम्पन्न होगा। जिसमें अपने समस्त पाप ताप दोषों का शमन कर अपना जीवन-पथ गुरु के सान्निध्य में नूतन चेतना से जीवन को जोश, आनन्द और शक्ति से युक्त करें। जिस प्रकार समस्त नदियां अपने-अपने मार्ग पर प्रवाह करती हुई। समुद्र में विलीन हो जाती हैं। उसी प्रकार सारे मनुष्य अपने क्रम पूर्ण कर भगवान सदाशिव में लीन हो जाते हैं। भगवान सदाशिव और शक्ति सृष्टि की रचना करते हैं। उसकी निरन्तरता कायम रखते हैं। भगवान शिव रस के आराध्य देव हैं। जिसने शिव को समझ लिया और शिव भाव को ग्रहण कर लिया, वह अपने संकल्पों को तीव्र करता हुआ ऊर्ध्वगामी यात्रा करता है और उसे प्राप्त होती है गौरी शक्ति, विघ्नहर्त्ता गणपति, पराक्रमी, कार्त्तिकेय, ऋद्धि-सिद्धि, शुभ-लाभ—-यही तो रहस्य है शिव परिवार का।
अपने जीवन के समस्त पाप दोषों का शमन कर स्वयं को शिव-गौरीमय बनाने हेतु पूज्य गुरुदेव की आज्ञानुसार महाशिवरात्रि महारात्रि महापर्व पर द्वादश ज्योर्तिलिंग और नर्मदा के उद्गम स्थल पर महादेव की तेजमय भूमि अमरकंटक में शिवगौरी शक्ति महाशिवरात्रि महोत्सव 16,17,18 फ़रवरी को सम्पन्न किया जायेगा। जिससे आपको इस नूतनवर्ष में श्रेष्ठता प्राप्त हो सके।
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