





यह संसार भौतिक जीवन से भरपूर है और भौतिकता के इस जीवन में सभी प्रकार के रंग है। दुःख है तो सुख है, मृत्युपीड़ा, जराव्याधि है तो निरोगता, शांति भी है। गृहस्थ जीवन के आनन्द हैं तो उसकी समस्यायें भी हैं और यह भी निश्चित है कि ईश्वर के दिये हुये इस जीवन को जीना ही है और जीना भी श्रेष्ठ रूप में है। हो सकता है कि पूर्व जन्म में कुछ दोष हुये हों अथवा इस जन्म में दोष इत्यादि हुये हों लेकिन जब गुरू की शरण में आ जाते हैं। तो उसका उपाय भी प्राप्त होता है।
भगवान शिव को देवाधिदेव महादेव कहा गया है। जो सब संकटों को हरने वाले हैं। इनका स्वरूप त्रिगुणात्मक है, ब्रह्म स्वरूप सृजनकर्त्ता, विष्णु पालनकर्त्ता एवं रूद्र स्वरूप संहारकर्त्ता। ये तीनों ही रूपों का समन्वित रूप महादेव है।
भगवान शंकर स्वयं निर्विकार रह कर विकार युक्त विश्व हिमालय के मध्य शंकर धाम कैलाश में न तो कोई चिन्ता है और न ही कोई सन्ताप। स्वयं निर्मुक्त होते हुये भव बन्धन को तोड़ने में सक्षम, शिव के अतिरिक्त और कोई देवता ऐसा नहीं है जो जन्म मरण के कलुष को धोकर अभय दे सके, स्वयं स्थिर और निश्छल होते हुये भी चराचर जगत के कण-कण में व्याप्त हैं, इसलिये तो शंकर चराचरात्मर हैं, शंकर हैं, अभयंकर है।
कल्याणकारी शिव प्रलय एवं संहार के भी देवता माने जाते हैं। उनके प्रलयंकारी स्वरूप का वर्णन भी शास्त्रों में मिलता है। उनका तांडव नृत्य इसी महाविनाश लीला का अंग है। सृष्टि और प्रलय ये दो अवश्यम्भावी तत्व है। समस्त चराचर ब्रह्माण्ड को अपने में लीन कर वह नयी सृष्टि का उपक्रम करते हैं। समुद्र मंथन में निकलने वाले कालकूट विष का भगवान शंकर ने पान किया और अमृत देवताओं को दिया। श्रेष्ठ व्यक्तित्व और समाज एवं कुटुम्ब के स्वामी का यही कर्त्तव्य है। उत्तम वस्तु समाज के अन्यान्य लोगों को देनी चाहिये और अपने लिये परिश्रम, त्याग तथा तरह-तरह की कठिनाइयों को ही रखना चाहिये।
शिवजी ने न विष को हृदय में उतारा और न उसका वमन ही किया, किन्तु कण्ठ में ही रोके रखा। इसलिये विष और कालिमा भी उनके भूषण हो गये। जो संसार के हित के लिये विषपान से भी नहीं हिचकते, वे ही जगत् के ईश्वर हो सकते हैं। अमृतपान के लिये सभी उत्सुक होते हैं, किन्तु विष पान के लिये शिव ही हैं। शिव जी का कुटुम्ब भी विचित्र ही है। अन्नपूर्णा का भण्डार सदा भरा, पर भोले बाबा सदा भिखारी। कार्त्तिकेय सदा युद्ध के लिये उद्यत, पर गणपति का स्वभाव ही शान्तिप्रिय। फिर कार्त्तिकेय का वाहन मयूर, गणपति का मूषक, पार्वती का सिंह और स्वयं अपना नन्दी और उस पर आभूषण सर्पों का। सभी एक-दूसरे के शत्रु, पर गृहपति की छत्रछाया में सभी प्रेम भाव व सुख शान्ति से रहते हैं।
यदि व्यक्ति भगवान शिव को अपना आदर्श ही मान लें और यह निश्चय कर ले कि मैं शिव समान ही अपने जीवन को रसयुक्त रखूंगा और जीवन यात्रा में चाहे कितने भी दुःख रूपी सर्प आये उन दुःखो को धारण करते हुये भी आनन्द के साथ जीवन यात्रा करूंगा, तो भी मनुष्य का जीवन शांत और सर्वसुखों से युक्त महान बन जाता है फिर उसे छोटी मोटी पीड़ा-व्याधि नहीं सताती है। और यदि वह भगवान शिव की पूजन, अभिषेक सम्पन्न कर लें तो जीवन में दुःख कैसे रह सकता है?
शिव का अर्थ ही कल्याण है, शुभ है, मंगलयुक्त है, जीवन में पूर्णता देने में शिव अग्रणी हैं, क्योंकि शिव भोग और मोक्ष दोनों के ही प्रदाता हैं, शिव औढ़रदानी हैं, जो क्षण में ही कृपा कर भक्तों को अभय देते है, भगवान शंकर आशुतोष हैं, जिन भक्तों की जैसी इच्छा होती है, उसी के अनुसार उनकी इच्छा तुरन्त पूर्ण करने में अग्रणी है, इसलिये तो शंकर को ‘भोगश्च मोक्षश्च करस्यथ एव’ कह कर सम्बोधित किया है, इसलिये तो भीष्म पितामह जब बाणों की शैय्या पर लेटे थे और युधिष्ठिर द्वारा भगवान सदाशिव शंकर के सम्बन्ध में प्रश्न पूछे जाने पर भीष्म पितामह को केवल यही कह कर चुप होना पड़ा कि जो सब में रहते हुये भी किसी को दिखाई नहीं देते, ऐसे महादेव के गुणों का वर्णन करने में मैं सर्वथा असमर्थ हूं।
श्रावण मास भगवान भोलेनाथ, शिव का मास है, पूर्णिमा दिवस पर पूजा साधना करने से भगवान शंकर सारी इच्छाओं को पूर्ण कर देते हैं यदि जीवन में शिवत्व प्राप्त करना है, तो श्रावण पूर्णिमा पूर्णरूपेण सिद्ध मुहूर्त है इस पुण्य मुहूर्त की प्रतीक्षा केवल साधु, योगियों को ही नहीं हर साधक स्त्री-पुरूष सबको रहती है, इस दिवस का आनन्द कुछ ओर ही है? अलमस्त फुहारों से भरा यह मास मन और शरीर के भीतर एक विशेष उत्साह आवेग, चेतना जगाता है। यही तो वह अवसर है जब मां पार्वती और महादेव अपने भक्तों के गृहस्थ जीवन को स्वयं की भांति पूर्ण कर देने में ही संतुष्टि अनुभव करते हैं। आखिर हर अभिभावक तो यही चाहता है कि उनकी संतान सुखी और समृद्धिशाली हो।
सांसारिक जीवन के सभी मनोरथों को प्राप्त कर जीवन को नवीन चेतना और स्फ़ूर्ति से युक्त करने के इस अवसर में यदि आप किसी कारण वश साधना, अभिषेक या दीक्षा से वंचित रह गये तो घबराईये मत पूज्य गुरूदेव शिव समान ही करूणामयी और भोले हैं। साधक शीघ्र ही अपना फ़ोटों कार्यालय में भेजकर या मेल कर दीक्षा प्राप्त करें। जिससे गृहस्थ जीवन की अनेक-अनेक कार्यों की पूर्ति श्रेष्ठमय हो सके और आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो सकेंगे, भौतिक और सांसारिक गृहस्थ सुखों में वृद्धि होगी।
सावन पूर्णिमा रक्षा बंधन के दिन प्रातः 10:42 से मधयांह 02:35 के बीच शुद्ध पीत वस्त्र धारण कर गंगाजल मिश्रित जल से गणपति और शिव का अभिषेक शनिश््चरीय श्री फ़ल नारियल दिवस पर सम्पन्न करें। जिससे निश्चिन्त रूप में पूर्णता से श्री की प्राप्ति हो सके। इस अमृत काल में सद्गुरूदेव द्वारा शिवोह्म धनदा अमृत तत्व प्राप्ति दीक्षा प्राप्त होगी। साथ ही महामृत्युजंय लक्ष्मी मंत्रों से चैतन्य माला उपहार स्वरूप प्रदान की जायेगी। जिससे कि साधक कंकर स्वरूप निष्क्रियता से शंकर स्वरूप की स्थिति को प्राप्त कर सके।
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