





बहुत लोग सोचते हैं कि देह में, जीवन में, संसार में रह कर कैसे पाया जा सकता है-सत्य को, ब्रह्म को, मुक्ति को! लेकिन जो जीवन में नहीं पाया जा सकता वह कभी भी नहीं पाया जा सकता है। जीवन ही एक अवसर है पाने का, चाहे पत्थर जुटाने में समाप्त कर दें और चाहे परमात्मा को पाने में—। जीवन आपसे कहता नहीं, क्या इकठ्ठा किये। कंकड़-पत्थर बीनें, व्यर्थ की चीजें संग्रहीत करें, अहंकार को बढ़ानें में, अहंकार को फुलाने में समाप्त कर दें, तो जीवन रोकेगा नहीं कि मत करो ऐसा। और चाहें तो सत्य को, स्वयं को, जीवन की आध्यात्मिक गहराई को पाने में लगा दें, तो भी जीवन बाधा नहीं डालेगा कि मत करें ऐसा। जीवन सिर्फ अवसर है, जो भी उपयोग करना चाहें कर लें।
लेकिन बहुत लोगों ने अपने को धोखा देने का इंतजाम कर रखा है। वे सोचते हैं, जीवन तो है संसार के लिये। जीवन तो है भोग के लिये। तो फिर मृत्यु ही बच जाती है योग के लिये। लेकिन मृत्यु अवसर नहीं है। मृत्यु का अर्थ है कि अब कोई अवसर न बचा। जीवन है अवसर, मृत्यु है अवसर की समाप्ति। इसलिये मृत्यु से तो कुछ भी पाया नहीं जा सकता है, पाने के लिये अवसर चाहिये।
बहुत से लोग कहते हैं कि मरते हुये आदमी के कान में गायत्री पढ़ दो। जब कि उसे सुनाई भी नहीं पड़ेगा, क्योंकि जिंदों को सुनाई नहीं पड़ता, तो मुर्दों को कैसे सुनाई पड़ता होगा, प्रभु का नाम ले दो, कि राम-राम की रटन लगा दो। जो जिंदगी भर प्रभु का नाम नहीं ले पाया, नहीं सुन पाया, सुना तो भी नहीं सुन पाया, सुना तो भी समझ नहीं पाया, वह मरते वक्त, जब कि इंद्रियां जवाब दे रही होंगी। आंखे देखेंगी नहीं, कान सुनेंगे नहीं, हाथ छुयेंगे नहीं, जब प्राण लीन हो रहे होंगे बीच में, तब वह गायत्री सुन पायेगा। वह तो नहीं सुन पायेगा। लेकिन फिर लोग क्यों सुनाये चले जा रहे हैं, इसमें भी राज है, वह मरता हुआ आदमी कुछ नहीं सुन पाता, लेकिन जो जिंदा सुना रहे हैं, उनको यह आश्वासन बना रहता है कि मरते वक्त कोई हमें भी सुना देगा और काम हो जायेगा।
जिसने जीवन में ही जान लिया है अपने स्वरूप को, वही केवल, जब देह गिरेगी, तो ब्रह्मरूप रहेगा। क्योंकि जिसने जीवन भर जाना हो कि मैं देह हूं, मरते वक्त मूर्च्छित हो जायेगा, पूरी तरह मूर्च्छा में आ जायेगा। मृत्यु बहुत कम लोगों की जागते हुये होती है। मृत्यु होती है सोते हुये, मूर्च्छित, बेहोश। आप होश में नहीं रहते मरते वक्त, नहीं तो आपको पिछली मृत्यु का स्मरण रहता। बेहोशी में जो घटता है, उसका स्मरण नहीं रहता। इसलिये तो लोगो को पता नहीं कि वे बहुत बार जन्मे हैं और बहुत बार मर चुके हैं, क्योंकि मृत्यु और जन्म एक ही चीज की दो घटनायें हैं। इधर एक आदमी मरता है, यह एक छोर हुआ, फिर वही आदमी एक गर्भ में प्रवेश करता है, वह दूसरा छोर हुआ। मृत्यु और जन्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जो बेहोश मरता है, वह बेहोश जन्मा है। मृत्यु तो बहुत बड़ा आपरेशन है। मृत्यु से बड़ा कोई आपरेशन नहीं है। सर्जन तो एकाध अंग काटता है। मृत्यु तो आपके पूरे शरीर को आपसे काट कर अलग करती है। जो आपको होश में रखकर नहीं किया जा सकता। इसलिये मृत्यु सदा से प्राकृतिक अनेस्थेसिया का उपयोग करती है। जैसे ही मृत्यु आती है, आप बिलकुल बेहोश हो जाते हैं। उस बेहोशी में इस जगत का सबसे बड़ा आपरेशन, सबसे बड़ी सर्जरी, शल्य चिकित्सा घटित होती है कि आपका शरीर और आपकी आत्मा अलग-अलग कर लिये जाते हैं।
लेकिन वह आदमी होश में मर सकता है, प्रकृति उसको छूट देती है होश में मरने की, जो आदमी यह जान लेता है कि मैं देह नहीं हूं। क्योंकि जब देह कटती है, तो भी वह नहीं जानता की मैं कट रहा हूं। वह दूर खड़ा देखता रहता है। क्योंकि वह मानता है कोई और कट रहा है। मैं नहीं कट रहा हूं, मैं देख रहा हूं, मैं सिर्फ साक्षी हूं ऐसी प्रतीति जिसकी गहन हो जाती है प्रकृति उसको अवसर देती है कि वह होश पूर्वक मरता है। बचपन को देखा आपने, बचपन बदल गया, लेकिन देखने वाला जो आपके भीतर है, वह नहीं बदलता। फिर जवानी आई, जवानी देखी आपने, फिर जवानी चली गई, लेकिन जिसने देखी वह नहीं बदला, उसी ने बचपन देखा, उसी ने जवानी देखी, उसी ने बुढ़ापा देखा, उसी ने जन्म देखा, उसी ने मृत्यु देखी, उसी ने सुख, उसी ने दुख, उसी ने सफलता, उसी ने असफलता, सब बदलता जाता है, सिर्फ एक जो देखता रहता है, सबका अनुभव करता रहता है, वह भर नहीं बदलता, उसी को ही हम आत्मा कहते हैं, वही सत्य है।
सिर्फ दुखी ही सुख चाहता है। सुखी सुख को क्यों चाहेगा हम वही मांगते हैं जो हमारे पास नहीं है। जो हमारे पास है उसे हम कभी नहीं मांगते। इसीलिये तो दुख को कोई भी नहीं मांगता, क्योंकि दुख सबके पास है। सुख को लोग मांगते हैं। क्योंकि उनके पास नहीं है। तो जिस दिन आप कहते हैं सुख चाहिये, उस दिन एक बात तो आपने यह बता दी कि आप दुखी हैं। दूसरी बात, जो भी सुख आप मांग रहे हैं, अगर वह मिला, तो भी दुख में उतर जायेंगे, क्योंकि मिल कर पता चलेगा कि सोचे थे कितने-कितने सपने इस सुख के मिलने से पूरे होंगे, वे कोई पूरे नहीं होते। तो हम जितना सुख मांगते है, एक तो मिलेगा नहीं, क्योंकि मांगने से कुछ मिल नहीं जाता। नहीं मिलेगा तो विषाद घेर लेगा। मिल जायेगा, तो विफलता हाथ लगेगी और रिक्तता घेर लेगी कि व्यर्थ गई मेहनत, कुछ पाया नहीं, दौड़े, धूपे, श्रम उठाया और जो मिला, वह यह है! जो इतना चमकदार मालूम पड़ता था दूर से, जो ढ़ोल बहुत सुहावने मालूम पड़ते थे, वे पास आकर साधारण ढोल साबित होते हैं।
मछली को पकड़ने वाले लोग, कांटे में आटा लगा कर पानी में डाल रखते हैं। इनसे सिर्फ वही मछली बचेगी, जो मुंह खोलेगी ही नही। जिस मछली ने भी मुंह खोला, वह फंसी। सभी मछलियां आटे के लिये मुंह खोलती हैं। कोई मछली इतनी नासमझ नहीं कि कांटे के लिये मुंह खोलती हो। सभी मछलियां आटे के लिये मुंह खोलती हैं। मछुआरा भी इसलिये कांटे में आटा लगा कर पानी में पैर कर बैठा हुआ है। मछली फंसती है आटे के कारण। सभी लोग सुख चाहते है और दुख का कोटा सुख में से निकल कर आता है सभी लोग सम्मान चाहते हैं और सम्मान में से ही अपमान का कोटा निकल आता है। और सभी लोग शांति चाहते है और शांति ही अशांति बन जाती है। उस मछली का ख्याल करें जो इस आटे और इस कांटे में से चुनाव ही नहीं करती, जो उदासीन इस आटे के पास से तैरती हुई चली जाती है। इसको पकड़ना असंभव है। ऐसी मछली की तरह हो जायें इस जगत में कि जिसका कोई चुनाव नही है। जो चुनती ही नहीं, जो मांग नहीं करती। फिर आपके ऊपर कोई बंधन हो ही नहीं सकता, आप पकड़े नहीं जा सकते।
जीवन तो उसी का सफल है जो प्रत्येक अवसर का पूर्णरूपेण लाभ उठाने के लिये प्रयत्नशील रहा हो। जिसने जीवन के प्रत्येक परिस्थिति को स्वयं पर हावी ना होने दिया। ऐसे ही व्यक्ति जीवन में पूर्णरूपेण विजय को प्राप्त कर पाते हैं। शरद पूर्णिमा का तात्पर्य है शीतलता। अर्थात् जीवन में ताजगी, शीतलता, सौम्यता, सौन्दर्यता युक्त पूर्णता की पूर्णिमा बनी रहे। पूर्णिमा तो होता ही है पूर्णत्व की प्राप्ति हेतु। ऐसे ही पूर्णत्व के भाव से आपूरित होने हेतु कार्तिकेय विजयश्री प्राप्ति शरद पूर्णिमा साधाना महोत्सव 26-27 अक्टूबर 2015 को बसना, महासमुन्द छ-ग में सम्पन्न होगा। जिससे जीवन में प्रेम, आनन्द, आह्लाद, प्रसन्नता, आर्थिक सृजन को पूर्णता से प्राप्त कर सकेंगे। साथ ही सभी भौतिक सुखों से जीवन में सुवृद्धि, आयु वृद्धि, धन वृद्धि, मान-सम्मान, प्रतिष्ठा से युक्त हो सकेंगे। शिव पुत्र कार्तिकेय के समान सभी स्थितियों से जूझने और जीवन की दुख रूपी बाधाओं, कठिनाईयो, व्यथाओं पर विजय प्राप्त करने की चेतना शिव स्वरूप गुरू से प्राप्त कर सकेंगे।
शारीरिक व्याधि से अधिक पीड़ा का कारण मानसिक व्याधि होती हैं, जिसके कारण से मनुष्य हर समय चिन्तित रहता है और उसके जीवन में उन्नति नहीं हो पाती है, मानसिक व्याधियों का मूल कारण पारिवारिक अशांति, राजकीय बाधा, सभी कार्यों में निरन्तर रूकावट, विभिन्न प्रकार की शारीरिक पीड़ायें होती हैं। जिनमें उलझा व्यक्ति श्रेष्ठता की ओर बढ़ नहीं पाता। अर्थात् बाधायें उसके प्रगति के मार्ग को अवरूद्ध कर देती हैं।
साधक जीवन की आठ प्रकार की बाधाओं मुत्यृ, रोग, ऋण, कुटुम्ब क्षय, बुद्धि हीनता, शत्रु आक्रमण, गृहस्थ न्यूनता, अज्ञानता पर विजय गुरू की शिव स्वरूप शक्ति से ही प्राप्त कर सकता है। सांसारिक भौतिक बाधाओं, कठिनाईयों, दुखों, धन अभावों से निजात पाने व अष्ट लक्ष्मी गौरी कार्तिकेय शक्ति से युक्त होने हेतु पाटणेश्वरी-समलेश्वरी की चैतन्य भूमि पर कार्तिकेय देव जागृत धनदा साधना महोत्सव 19-20 नवम्बर 2015 को बालांगीर उड़ीसा में सम्पन्न होगा। साथ ही पार्वती स्वरूप भगवती लक्ष्मी धनदा वर्षा से सरोबार और अनन्त विनायक रिद्धि-सिद्धि, शुभ-लाभ कार्तिकेय की पूर्णता से युक्त हो सकेंगे। विशिष्ट दीक्षा, अंकन, हवन की श्रेष्ठतम क्रियायें इस साधना महोत्सव में सम्पन्न होंगी। जिससे आप सभी आध्यात्मिक और भौतिक लक्ष्यों को पूर्णता से प्राप्त कर सकेंगे।
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