





भगवान शिव देव होने के बाद भी अन्य सभी देवों से अलग हैं। वे मानव मात्र के एकदम निकट दिखाई देते हैं और ऐसा लगता है कि केवल उन्होंने ही मानव के कल्याण की शपथ ली हो। अनेक सन्दर्भों में वे मानव व्यवहार के एकदम सौम्य व्यवहार करते दिखाई देते हैं।
पिता के द्वारा अश्वमेध यज्ञ में सती के द्वारा देह त्याग के पश्चात् उनके शव को अपने कन्धों पर लिये वे प्रेम में विह्नल हो यहां-वहां भटकते हैं, उनकी मृत्यु से जितना वे दुःखी होते हैं, उससे वे देव न होकर मानव ही प्रतीत होते हैं। समुद्र मंथन के समय सागर के गर्भ से निकले हलाहल को उन्होंने न पिया होता तो तीनों लोकों की क्या स्थिति बनती, इसके बारे में सामान्य मानव विचार करना नहीं चाहेगा। सागर पुत्रों को जीवनदान देने के लिये जब भागीरथ ने तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिये राजी किया, तो गंगा के वेग को भी उन्होने ही अपनी जटाओं में धारण किया भागीरथ को गंगा जी ने आश्वस्त कर दिया कि वे पृथ्वी पर आने और सागर पुत्रों को जीवित करने के लिये तैयार हैं किन्तु आकाश लोक से पृथ्वी पर आते समय उनका वेग इतना प्रचण्ड हो जायेगा कि अगर उसे रोका न गया तो वे पृथ्वी का सीना चीरते हुये पाताल लोक में चली जायेंगी। इसके बाद पृथ्वी पर आना असम्भव ही होगा। उस समय किसी देव में ऐसी सामर्थ्य नहा था कि वे गंगा के वेग को थाम सकें, सबको भय था कि गंगा के वेग को न रोक पाने की स्थिति में वे भी उसके साथ पाताल में समा जायेगें तब शिव एक मात्र ऐसे देव थे जो इस असम्भव कार्य को सम्भव कर सके।
गंगा के प्रचण्ड वेग को अपनी जटाओं में धारण कर लिया। गंगा पूरी तरह से जटाओं में सिमट गई थी, तब शिवजी ने जटाओं से थोड़ा सा मार्ग गंगा को दिया जिससे वे बाहर आकर भागीरथ के साथ जा सके। हमारी पवित्र नदी गंगा भगवान शिव की कृपा से ही समस्त मानवों का कल्याण कर रही है।
अन्य देवताओं की अपेक्षा भगवान शिव भौतिक सुखों एवं सुखों की आसक्ति से हमेशा दूर ही रहें। वे हर समय देवताओं एवं मानवों को दानवों से रक्षा-सुरक्षा के लिये उद्यत रहे। सामान्य अवस्था में एकदम सौम्य एवं शांत तथा क्रोध की मुद्रा में ताण्डव करते दिखाई देते हैं। तीसरा नेत्र विनाश के द्वार खोलता है, तो उनके छोटे से मंत्र जप से साधक अनेक समस्याओं से मुक्त हो जाता है।
हर दृष्टिकोण से भगवान महादेव कभी पूरी तरह से हम सभी के तारणहार बने दिखाई देते हैं, सभी कष्टों से मुक्त कर देते हैं, तो दूसरे रूप में दानवों-राक्षसों का विनाश कर देते हैं, भगवान शिव जो अपने समस्त सुख-भोग को छोड़कर, पूर्ण वैराग्य भाव से तप में लीन हैं, वे निश्चय ही सब लोकों के कल्याण के बारे में ही विचार करते होंगे। जो करूणा से भरा होगा, वही दूसरों के कल्याण के लिये सोच सकता है और भगवान शिव तो वास्तव में करूणा के सागर ही है। इसी कारण उन्हें भोलेनाथ कहा जाता है। भगवान सदाशिव महादेव स्वरूप हैं, जिनकी कृपा तले यह चराचर विश्व गतिशील है। भगवान शिव को औघड़दानी भी कहा गया है, जो कृपा कर अपने भक्तों को सदैव अभय वर एवं सामर्थ्य प्रदान करते हैं। भगवान शिव ही एक मात्र गृहस्थ देव हैं जिनकी पूजा पूरे परिवार सहित की जाती है।
महाशिवरात्रि पर साधना, दीक्षा गृहस्थ व्यक्तियों द्वारा परिवार में सुख-समृद्धि प्राप्ति के लिये, कन्याओं द्वारा श्रेष्ठ पति प्राप्ति के लिये, वृद्ध और रोगियों द्वारा पूर्ण रोग मुक्ति के लिये, भय से ग्रसित व्यक्तियों के लिये मृत्युंजय स्वरूप में, योगियों संन्यासियों के लिये पूर्ण सिद्धेश्वर रूप में, अर्थात् सभी द्वारा अपने-अपने अभीष्ट कार्यों के लिये शिव पूजा अवश्य सम्पन्न की जाती है। ऐसा कोई अभागा ही होगा, जिसने भगवान शिव की पूजा साधना की हो और उसे फल प्राप्त नहीं हुआ हो। शिव साधना से तो अभागे व्यक्ति के भाग्य भी खुल जाते हैं, भगवान शिव तो सदैव वर प्रदान करते ही हैं, इसीलिये उनकी स्तुति देवताओ के साथ-साथ गण, राक्षस, गंधर्व, भूत-प्रेत, पिशाच सभी सम्पन्न करते हैं।
महाशिवरात्रि, भगवान शिव की पूजा अभिषेक करने हेतु विशेष दिवस है। सृष्टि में शिवलिंग की उत्पत्ति महाशिवरात्रि की रात्रि को ही हुई थी और इसी रात्रि को भगवान शिव ने भगवती पार्वती का वरण किया था इसीलिये इसे शिव गौरी दिवस भी कहा जाता है। यह पर्व मस्ती, उल्लास और आनन्द प्राप्ति का पर्व है। इस दिन प्रत्येक व्यक्ति को यथा बाल, युवा, वृद्ध, गृहस्थ, योगी, संन्यासी, स्त्री, पुरूष सभी को शिव पूजन एवं अभिषेक अवश्य ही सम्पन्न करना चाहिये।
त्रिवेणी संगम की चैतन्य भूमि पर जहां सृष्टि के रचनाकर्ता भगवान ब्रह्मा ने पहला महायज्ञ सम्पन्न कराया था। उसके बाद यह भूमि अनंत यज्ञो का साक्षी रही है, ऐसी ही दिव्यतम भूमि जहां महासंगम की स्थिति निर्मित होती है। उसी भूमि पर महाशिवरात्रि साधना शिविर 5-6-7 मार्च को सम्पन्न होगा जिससे साधक शिव और गुरूदेव के सायुज्य संगम को अपने दिव्य चक्षुओं से अपने हृदय में आत्मसात कर सकेंगे और गृहस्थ जीवन को पूर्णरूप से रसमय, आनन्दमय, प्रेममय रसो से सराबोर करने हेतु महाशिवरात्रि महामृत्युजंय गौरी अष्ट लक्ष्मी स्वःरूद्राभिषेक, कालसर्प दोष, पाप-ताप-संताप के शमन हेतु यज्ञ, विशिष्ट शक्तिपात दीक्षा की क्रियायें सम्पन्न होंगी। ऐसे दिव्यतम अवसर पर शिव और गुरू के औघढ़दानी स्वरूप से महामृत्युजंय युक्त आरोग्य सौभाग्य युक्त जीवन के साथ-साथ सभी मनोकामनाओं, अष्ट लक्ष्मी, मान-सम्मान, पद, प्रतिष्ठा, श्रेष्ठ वर, गुणवान पत्नी, संतान सुख, पारिवारिक सामंजस्य और गृहस्थ के पूर्णत्व चेतना से आपूरित हो सकेगें।
शिविर स्थल- काली मार्ग सड़क शास्त्री पुल के समीप माघ मेला क्षेत्र प्रयाग राज इलाहाबाद U.P
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