





किसी भी विजेता के विजयी होने का रहस्य उसके आत्मविश्वास के बल पर निर्भर करता है। क्योंकि विश्वास विजय की कुंजी है। यदि विश्वास नहीं तो विजय नहीं। विजय का अद्भुत चमत्कार विश्वास ही है। किसी भी विजेता को देखो, उसके विजय होने का रहस्य उसके विजयी होने के अटूट विश्वास में ही था। स्वयं पर विश्वास रखकर हम अजेय हो सकते हैं फिर संसार में हमारे लिये कुछ भी असंभव नहीं रह जाता। और यदि हमारी असफलता, निराशा का कोई कारण है तो वह है सिर्फ हमारे अन्दर आत्मविश्वास की कमी, इसलिये यदि विश्वास होगा तो विजय स्वयं आकर चरण चूमेगी।
असंभव को संभव कर दिखाने वाली शक्ति सिर्फ आत्मविश्वास ही है। लेकिन कितने दुर्भाग्य की बात है कि हम अपने आपका मूल्यांकन विजय से नहीं पराजय से आंकते हैं। हम विजय को कोरा स्वप्न ही मान लेते हैं। हम अपनी शक्ति की तुलना अपनी कमजोरी से करते हैं, जबकि ईश्वर ने इन्सान को भय या निराशा का अभिशाप नहीं दिया बल्कि शक्ति, साहस, स्वास्थ और प्रेम का वरदान दिया है। यदि मनुष्य इस वरदान को ठीक से समझ जाये तो सम्पूर्ण विश्व में प्रतिभाशाली, सफल लोगों का साम्राज्य हो जाये। क्योंकि आत्मविश्वास के द्वार खुलने पर ईश्वर विश्वासी इन्सान को ईश्वर तुल्य बना देता है।
युद्ध में बन्दूक नहीं उसको पकड़ने वाला सैनिक लड़ता है। उस सैनिक का शरीर ही नहीं उसका हृदय भी लड़ता है। आत्मविश्वास के बल पर ही एक यौद्धा युद्ध के मैदान में हार को जीत में बदल देता है।
किन्तु संदेह और अविश्वास से भरे हृदय के कारण जीवन में सफलता के लक्ष्य को प्राप्त करने में असमर्थ होते हैं। यह जीवन का अमूल्य सिद्धान्त है कि यदि आप अपनी सफलता पर संदेह करेंगे तो कभी भी पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर सकेंगे। आत्मविश्वास के अभाव में आपके ईश्वर, ईष्ट, सद्गुरू भी आपकी मदद नहीं कर पायेंगे। क्योंकि उनकी तरफ से प्रवाहित ऊर्जा का भी आप अपने अविश्वास से नष्ट कर देंगे। सफलता प्राप्त करने के लिये उन पर विश्वास करना ही होगा।
आपकी मनोवृत्ति ही एकमात्र कारण है जिसने आपको दीन हीन बना रखा है। केवल एक ही व्यक्ति है जिसने आपको गिरा रखा है और वह स्वयं आप हैं। आप ही में वह अविश्वास, दोष, कमी, त्रुटि है जो आपको सफल नहीं होने देती। यह आर्थिक स्थिति का रोना-रोने बैठ जाना आपकी पराजय को प्रकट करता है। हाथ पर हाथ रखकर अपने-आप में ही दोष निकालनें से क्या होगा। जबकि आपको आत्मविश्वास, उत्साह के साथ श्रम करना चाहिये, फिर तो जीवन में विजय, सफलता आपके कदमों में हाथ जोड़े रहेगी। सफलता को अपनी आदत बनाईये, सफलता की कामना रखने वाले लोग, अपने जीवन में कुछ भी नहीं कर पाते, उनका जीवन सिर्फ ख्याली पुलाव बनाने में ही व्यतीत हो जाता है।
आत्मविश्वास से कहे हुये शब्द हजारों लोगों को प्रभावित करने में समर्थ होते हैं। लोगों के अन्दर अद्भुत साहस जगा देता है और लोग भयंकर से भयंकर विपत्ति का सामना करने के लिये तैयार हो जाते हैं। आत्मविश्वास को जगाकर व्यक्ति अपने उत्साह से कई गुना अधिक सफलता प्राप्त कर सकते हैं। किन्तु जिन लोगों में आत्मविश्वास की कमी होती है अर्थात् सफलता प्राप्ति के लिये मन में संदेह होता है, वे कभी सफलता प्राप्त नहीं कर पाते। कारण जब मन में सफलता प्राप्ति के प्रति संदेह है तो कैसे सफलता मिलेगी? हमें अपनी विजय पर अटूट विश्वास होना चाहिये और अपनी शक्तियों पर अटूट भरोसा, तभी हम अपने कार्य में, जीवन में सफल हो पायेंगे। दृढ़ आत्मविश्वासी व्यक्ति ही जीवन में महान कार्य करने में सफल होते हैं। किन्तु जो व्यक्ति अपनी शक्तियों पर ही संदेह करते हैं वे कभी सफल नहीं होते। और वे संसार में आज तक न कुछ कर सके और न ही कुछ कर सकेंगे। कारण आत्मविश्वासी और आत्मविश्वास से हीन व्यक्ति में आकाश-पाताल का अन्तर होता है। एक रास्ता विजय की ओर जाता है जबकि दूसरा पराजय की ओर।
हमारा आत्मविश्वास जैसे-जैसे बढ़ता जाता है हमारी कार्यशक्ति भी वैसे ही वैसे निखरती जाती है। यदि हमारे विश्वास का पात्र संकरा है तो उसमें ईश्वरीय शक्ति का प्रवाह भी उतना ही कम होगा और जब हम उस सर्वशक्तिमान ईश्वर पर भरोसा ही नहीं रखते तो फिर हम वह नही बन सकते जो हम बनना चाहते हैं। विश्वास की कमी के कारण ही हमारे द्वारा किये गये परिश्रम, सभी प्रयत्न व्यर्थ हो जाते हैं। फिर इसी अविश्वास के कारण ही जीवन निराशा में डूब जाता है। अविश्वास और संदेह जीवन के लिये घातक सिद्ध होते ही हैं। इसलिये अपने आत्मविश्वास को दृढ़ बनाना चाहिये। क्योंकि हमारी सफलता हमारे विश्वास पर ही निर्भर होती है। आत्मविश्वास के अभाव में हम कभी भी आगे नहीं बढ़ सकते। जब तक हमारे हृदय में विश्वास की ज्योति नहीं जागती तब तक हम अपनी विजय को निश्चित नहीं बना सकते।
क्योंकि शक्ति शरीर से नहीं मन से अधिक आती है। जैसे-जैसे हमारे मन में आत्मविश्वास बढ़ता जाता है, वैसी ही कार्य शक्ति भी बढ़ती जाती है। असंभव को संभव कर दिखाने की और पर्वतों को भी हिला देने की शक्ति सिर्फ आत्मविश्वास से ही आती है। और फिर संसार भी उनके लिये रास्ता छोड़ देता है जो अपने रास्ते पर दृढ़ विश्वास से बढ़ते है। इतिहास के पृष्ठों पर वे ही अपना नाम अमर कर पाये जिन्हें अपने आप पर अटूट विश्वास था, अपने लक्ष्य को प्राप्त करने को दृढ़ संकल्प से युक्त थे।
आप लोग अक्सर आकर कहते हो गुरू जी ये साधाना 3 साल से कर रहा हूं, 5 साल हो गये अप्सरा आई नहीं, महाकाली के दर्शन हुये ही नहीं, अब इसमें गुरू जी क्या करें, गुरू जी ने तो मंत्र बता दिया, दीक्षा दे दी, अपनी तपस्यांश शक्ति को जिसे शरीर के तिल-तिल को जलाकर एकत्रित किया वह शक्ति भी आपके देह में प्रवाहित कर दी। और आपने अपने त्रुटियों से, अविश्वास के कारण उस शक्ति को भी नष्ट कर दिया। और सब कुछ गुरू जी पर थोप दिया, कि गुरू जी की इच्छा नहीं थी, प्रभु की मर्जी होगी तो सफ़लता मिल ही जायेगी। भाई गुरू जी आये ही इसीलिये हैं कि आप सफ़ल हो, श्रेष्ठता पर पहुंच सको, आपकी कुण्डलिनी जाग्रत हो, सद्गुरू, ईश्वर से साक्षात्कार कर सको, एक बहादुर योद्धा की तरह जीवन की सभी बाधाओं पर टूट पड़ो, अपने जीवन मार्ग को बिल्कुल साफ़-सुथरा बना लो, अपनी सफ़लता से अपने जीवन को ज्योर्तिंमय स्वरूप दे सको। यही सब प्रदान करने आया हूं, आप सब के बीच। भगवान राम का जीवन प्रत्येक दृष्टि से पूर्ण था, वे पुत्र, भाई, सखा, पति, राजा सभी रूपों में पूर्ण थे, भगवान राम ने सीता के लिये रावण जैसे बलशाली को परास्त किया। जबकि उस काल में राजा-महाराजा अनेक राजकुमारियों से विवाह कर जीवन का भोग करते थे। भगवान राम ने तो अपने सम्पूर्ण जीवन को सीता के लिये ही समर्पित कर दिया, जबकि वे चाहते तो अनेक विवाह कर सकते थे।
जीवन को प्रत्येक दृष्टि से पूर्ण बनाने हेतु 05-06 दिसम्बर को ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, राज मैदान, दरंभगा बिहार में राम जानकी पुरूषोत्तम शक्ति प्राप्ति साधना महोत्सव सम्पन्न होगा। जिसमें गृहस्थ जीवन को पुरूषोत्तमय शक्ति से युक्त और भौतिक जीवन के सभी कर्तव्यों का निर्वाह करते हुये धन, यश, वैभव, कीर्ति से आप्लावित होने हेतु पुरूषोत्तम जानकी गौरी लक्ष्मी दीक्षा, हवन, रूद्राभिषेक, अंकन, विशिष्ट साधना, प्रवचन की श्रेष्ठतम क्रियायें सम्पन्न होंगी।
अर्थात् जहां पर मनुष्य पाप, दोष, संताप, दुःख, कठिनाई, रोग, पीड़ा, धनहीनता, अभाव से मुक्त हो जाये उसे तीर्थ कहते हैं। भारतवर्ष में सैकड़ों तीर्थ हैं पर जिसे क्षयति पापम् के नाम से शास्त्रों ने विभूषित किया है, वह पावन पवित्र स्थल रामेश्वरम् ही है। जहां के वातावरण में अद्भुत शांति, प्रेम, साधनात्मक ऊर्जा का भंडार, ध्यान की अवस्था, एकाग्रता का भाव जाग्रत हो जाता है। ऐसे तेजमय देवत्व शक्ति से ओत-प्रोत भूमि कोतंडरामर स्वामी मंदिर में जहां पर राक्षसी वृत्ति में जन्म लेने वाले विभीषण ने आत्मज्ञान होने पर भगवान श्रीराम के श्री चरणों में समर्पण किया था। वही क्रिया एक बार पुनः सद्गुरू के सानिध्य में सभी शिष्यों-साधकों के जीवन में व्याप्त आसुरी वृत्ति जिन्हें आज के भौतिक युग में धनहीनता, रोग, जड़ता, तामसिक विचार, घृणा, अभाव, असम्मान, शत्रु, पाप-ताप, दोष कहते हैं, इन सभी वृत्तियों से निजात पाने हेतु राज-राजेश्वरी युक्त दिव्यतम दीक्षायें, रूद्राष्टाध्यायी नवग्रह, शिव शक्ति महामृत्युजंय और त्रिपुरा श्री विद्या मंत्रें से आपूरित स्वः रूद्राभिषेक व हवन 26-27 दिसम्बर को नववर्ष पूर्ण लक्ष्मी वृद्धि साधना महोत्सव रामेश्वरम् में सम्पन्न होगा।
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