





वेद व्यास ने इस श्लोक में यह बात कही है कि मनुष्य का अर्थ है मृत या मरा हुअ। जिंदा केवल इसलिए है कि वह सांस ले रहा है और यह सांस समाप्त हो जाता है तो शरीर में, सारे अंग प्रत्यंग तो उसके होते हैं, मगर फिर भी वह मृत कहलाता है । हाथ, पांव, आंख, नाक, कान उनमें कहीं कोई त्रुटि नहीं आती मगर फिर भी वह मृत कहलाता है, और जीवन इसलिए कहलाता है कि सांस लेने की क्रिया उसमें है और सांस लेता भी है सांस निकालता भी है। अंदर लेता भी है, छोड़ता भी है और तीन कार्य करता है, सांस लेता है, धारण करता है और छोड़ता है।
और वेद व्यास ने मनुष्य को मृत क्यों कहा? क्या सांस लेने या नहीं लेने से ही व्यक्ति जीवित या मृत हो जाता है? वास्तव में मृत व्यक्ति वही है, जिनमें हौसला नहीं है, साहस नहीं है, क्षमता नहीं है, और संकटों से मुकाबला करने की क्षमता नहीं है। ऐसे लोग मृत हैं। मनुष्य तो हैं, जिंदा भी हैं, घूमते-फिरते भी हैं, मगर उसके बाद भी मरे हुए से हैं, इसलिए, कि उनमें एक नीरसता है उनमें कोई नवीनता नहीं है कोई नयापन नहीं है, कोई चेतना नहीं है, कोई प्रबुद्धता नहीं है। यदि जीवन में संकट नहीं है, बाधाएं नहीं है, अड़चनें नहीं हैं, कठिनाइयां नहीं है तो मनुष्य जीवन हो ही नहीं सकता। मनुष्य जीवन उसको कहते हैं कि हर पग पर समस्याएं आएं, कठिनाइयां आएं और हम उन पर विजय प्राप्त करें। वही जीवित मनुष्य रह सकता है, जो ऐसा कर पाता है।
और विज्ञान इस बात को स्वीकार करता है कि जिन्होंने संघर्ष किया, जो संघर्षशील व्यक्ति है या जानवर हैं या जीव हैं वे ही जीवित रहे। जिनमें संघर्ष की, समस्याओं से जूझने की क्षमता समाप्त हो गई, वे मर गए। अभी कुछ समय पहले बीच में आपने बहुत हो हल्ला सुना होगा कि डायनासॉर होता था जो संसार का सबसे लम्बा चौड़ा प्राणी था, मगरमच्छ, हाथी या व्हेल मछली तो उसके सामने एकदम तुच्छ प्राणी थे और अभी एक फिल्म भी बनी थी डायनासॉर पर। आज से हजारों साल पहले आखिर डायनासॉर की मृत्यु हो गई और एक का भी अस्तित्व नहीं रहा, एक भी डायनासॉर जीवित नहीं रहा। क्यों नहीं रहा? इतना बड़ा लम्बा-चौड़ा प्राणी तुम्हारे जैसे कम से कम पांच सौ आदमी उसके मुंह में आ सकें, वह जीवित नही रहा और आप जीवित है, इसका क्या कारण था? वह क्यों नहीं जीवित रहा?
और आपको मालूम होना चाहिए कि आज से तीन हजार साल पहले भी मेंढक था, और आज भी जीवित हैं। सबसे पुराने जो जीव हैं जो पिछले हजारों सालों से हमारे बीच हैं – एक तो कॉकरोच और एक मेंढक। बाकी सब जांतियां धीरे-धीरे नष्ट होती गईं, बदलती गईं या परिवर्तित होती गईं। पर, उन दोनों में कुछ परिवर्तन नहीं आया और दोनों आज भी वही हैं जो आज से तीस हजार साल पहले थे। तीस हजार साल बहुत बड़ी उम्र है, और तीस हजार वर्षों से वे जीवित हैं ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है कि वे प्रत्येक परिस्थिति में जीवित रहने की क्षमता रखते हैं। आपने देखा होगा कि बरसात में मेंढक पानी में तैरते हैं, आवाज करते हैं और जब समाप्त हो जाती है बरसात तो किसी खोखले पत्थर में वह मेढ़क घुस जाता है और उसके ऊपर एक परत आ जाती है, वायु की परत हो या रेत की परत हो। यदि आप भी चार घंटा बाहर बैठ जाएं तो आपके ऊपर रेत की परत आ जाएगी और आप सफेद कुर्ता पहन कर चांदनी चौक में निकल जाएं तो आपके ऊपर एक धुएं की, रेत की परत आ जाएगी और कुर्ता काला हो जाएगा और चार दिन तक चलेंगे तो आपके ऊपर मैल की परत चढ़ जाएगी और दस दिन आप स्नान नहीं करें तो आपके शरीर पर मैल चढ़ जाएगा कि आप को चार बार साबुन लगाना पड़ेगा।
आपने खुद चढ़ाया नहीं उस मैल को, मगर मैल चढ़ा, कपड़ों पर भी चढ़ा। मेंढ़क छः महीने उस पत्थर में रहतें हैं और बाहर से उनको ऑक्सीजन मिलती ही नहीं। उसके बाद भी वे जीवित रहते हैं। तो जो जीव छः महीने बिना ऑक्सीजन के रह सकता है वह मर नहीं सकता, क्योंकि उसमें संघर्ष करने की क्षमता है, एक पॉवर है, एक ताकत है। वह अहसास करता है कि जीवन में एक संघर्ष है, कठिनाई है, और कठिनाई होते हुए भी जीवित रहने की एक क्षमता और ताकत रखता है। इसलिए मेढ़क जीवित है इसलिए कॉकरोच जीवित हैं इसलिए ऊंट जीवित है कि वह तीस दिन बाद तक बिना पानी के जीवित रह सकता है, हम और तुम नहीं रह सकते। बिना पानी के वह तीस दिन चल सकता है, मरूस्थल में, रेगिस्तान में । यह केवल एक छोटा सा उदाहरण है, मगर वह छोटा उदाहरण इसलिए दे रहा हूं कि आप समझ सकें कि जिंदा वही व्यक्ति रहता है जिसमें संघर्ष करने की पूर्ण क्षमता हो, और संघर्ष वह कर सकता है जिसके सामने समस्याएं आएं। समस्याएं आएंगी ही नहीं तो संघर्ष करेगा भी क्या? किससे संघर्ष करेगा, दीवारों से? दरवाजों से? पत्थरों से? वह संघर्ष होता ही नहीं। और पति पत्नी के बीच संघर्ष नहीं होता, मतभेद होते हैं। आप मतभेद को लड़ाइ्र्र कहते हैं, मैं कहता हूं मतभेद हैं।
वह कहती कि मैं प्लाजा पर फिल्म देखने जाऊंगीं आप कहते हैं नहीं, रिवोली पर पिक्चर देखने जाएंगे। लड़ाई झगड़ा कोई नहीं है, बस वह एक अलग कहानी, कहती है आप एक अलग बात कहते हैं और यह एक टकराहट है आपके जीवन की इसलिए घर में एक टकराव की, एक तनाव की स्थिति है। वह आपका संघर्ष नहीं है। आपका संघर्ष पुत्र से भी नहीं है। आपका संघर्ष पत्नी से भी नहीं है और आपका संघर्ष खुद से भी नहीं है। इसलिए आप समाप्त हो जाते हैं धीरे-धीरे, क्योंकि कोई संघर्ष नहीं है। ——-और हमारे ऋषि दो सौ साल, तीन सौ साल जीवित रहे यह हमने सुना। और यदि आप उस साधनात्मक लेवल पर हैं तो आप देख सकते हैं कि पांच सौ साल, हजार साल के ऋषि योगी आज भी जीवित हैं और इतनी आयु लिए हुए हैं और हम केवल साठ साल या सत्तर साल जीवित रह पाते हैं।
ऐसा क्यों हो रहा है कि हम साठ साल की आयु में ही मर जाते हैं। सत्तर साल के होकर मर जाते हैं, बहुत मुश्किल से गिन कर के अस्सी साल के दो चार व्यक्ति आप मुझे दिल्ली में दिखा पाएंगे। सौ साल किसी के होते हैं तो भारत सरकार उसका अभिनंदन करती है तिलक करती है। आज व्यक्ति सौ साल भी उम्र प्राप्त नहीं कर पाता, व्यक्ति इसलिए टूट जाता है क्योंकि उसके सामने संघर्ष है ही नहीं, और संघर्ष नहीं है तो व्यक्ति का जीवन एकरस हो जाता है, और जहां एकरसता है वहीं मृत्यु है। आप सुबह उठे, स्नान किया, पेंट पहनी, कुर्त्ता पहना, नाश्ता किया, टिफिन हाथ में लिया और ऑफिस चले गए, फिर ऑफिस से वापस आए, पत्नी की भी सुनी दो बातें, पत्नी को सुनाई खाना खाया और सो गए। तीस दिन महीने के ऐसे ही होते हैं। एक संडे के अलावा ऐसा ही होता है, बस संडे को कहते है आज संडे है आठ बजे अखबार पढ़ते हैं और पड़े रहते हैं, बेड टी पी लेते हैं । अगला संडे भी वैसा ही होता हैं। जीवन में कोई प्रॉब्लम आई, कोई समस्या आई, कोई तनाव आया, कुछ ऐसी अनिश्चितता आई कि कल क्या होगा या एक घंटे बाद क्या होगा, किसी ने तलवार लेकर आपके सिर पर रखी? कोई बंदूक की गोली लेकर आपके सामने खड़ा हुआ?
हुआ ही नहीं, आप बस बचते रहें। बचना आप का धर्म है। इसका मतलब यह नहीं, कि आप ए-के- 47 के सामने खड़े हो जाएं कि गुरूजी ने कहा है संघर्ष करना। मगर यदि कोई सामने खड़ा हो जाए तो आपमें यह क्षमता होनी चाहिए कि आप उसे धक्का देकर उसके सीने पर खड़े हो सकें। इतनी ताकत आपमें होनी चाहिए और वह ताकत तब आ सकती है जब आप में आत्मबल हो, यदि आप में आत्मबल हो। यदि आत्म बल नहीं है तो आप जीवन में सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। और ज्योंही कोई गोली चली, आप मर जाएंगे और यदि आत्मबल है तो आप खड़े होकर उसे एक लात मारेंगे उसकी ए-के- 47 राइफल एक तरफ गिरेगी और वह एक तरफ गिरेगा। आप उसकी छाती पर बैठकर सफलता प्राप्त कर लेंगे। दोनों स्थितियां आपके सामने हैं। प्रत्येक व्यक्ति भयभीत है, जब संसार में पैदा होता है, उस क्षण से लगाकर मृत्यु तक उसके जीवन में और कुछ नहीं होता, बस भय होता है, और वह भय पीछा करता है आपका और कोई दूसरा नहीं करता । मां, बाप भय पैदा करते हैं उसके मन में कि बाहर मत जाना सड़क पर, एक्सीडेंट हो जाएगा। और स्कूल से सीधे दो बजे घर आ जाना नहीं तो कुछ हो जाएगा, और यह तू मत खाना इससे तकलीफ हो जाएगी, ऐसा करने से यह हो जाएगा, ऐसा करने से वह हो जाएगा। और हम उसे भय के अलावा कुछ देते ही नहीं क्योंकि हम खुद भी भय से पैदा हुए हैं और हमने उनको भय दिया इसलिए व्यक्ति कायर बना, बुजदिल बना। हम अपने लड़कों को ताकतवान नहीं बना सके, साहसवान नहीं बना सके।
कोई अस्सी किलो का आदमी ही ताकतवान नहीं बनता। गांधी जी तो बयालिस किलो के ही थे सिर्फ, और आप और हम से बहुत ज्यादा ताकतवान थे, अंग्रेजों से लोहा लिया, एक संघर्ष किया लाखों लोगों से और उनकी वाणी में इतनी ताकत थी कि हजारों लोग सूली पर चढ़ गए, फांसी पर चढ़ गए, गोलियां खा गए। आपके कहने से एक व्यक्ति भी कॉलेज छोड़ कर सड़क पर नहीं उतरेगा आपके कहने से एक व्यक्ति भी अपनी पत्नी को छोड़ कर जेल मे नहीं जाएगा। आपमें और उस आदमी में ऐसा डिफरेंस क्या था? यह तो अभी की घटना है पचास साल, साठ साल पहले की। डिफरेंस यह है कि आपमें आत्मबल नहीं है। उस व्यक्ति में आत्मबल था कि मैं ऐसा कर के छोडूंगा और आपमें आत्मबल नही है तो आप सोचते हैं कि होगा या नहीं होगा। आप बस कहते है चलो, कोशिश कर लेते हैं, देख लेते हैं, उम्मीद तो नहीं है फिर भी कोशिश कर लेते हैं यहीं से आपका भय स्टार्ट हो जाता है, और जब भय आरंभ हो जाता है तो उस भय के साथ मृत्यु जुड़ी होती है क्योंकि मृत्यु और भय एक ही शब्द हैं।
आपने सैनिकों को देखा। आर्मी वाले क्या करते है कि आर्मी ऑफिसर एक दिन में उनको एक हजार बार एक लाइन बुलवाते हैं। ‘जो डरा सो मरा’ बस, उनकी प्रार्थना होती है, उनकी स्तुति भी यही होती है, कोई ‘ऊँ जय जगदीश हरे’ नही करते वो। सुबह उठते ही सबसे पहले यही बोलते हैं कि जो डरा, सो मरा। फिर सोते हैं तो भी यही कहते हैं – जो डरा सो मरा। पूरे दिन भर में एक सैनिक को एक हजार बार बुलवाते हैं वो । एक दूसरे से मिलते हैं, बात करते हैं तो नमस्ते नहीं करते, वो कहते हैं -जो डरा, सो मरा। दूसरा भी कहता है – जो डरा, सो मरा। यदि आप आर्मी फील्ड में जाएं तो वहां दीवारों पर कुछ और लिखा नहीं होता, श्री कृष्णं शरणं मम लिखा नहीं होता, भगवान श्री कृष्ण या राम जी की जय, ऐसा लिखा नहीं होता। वहां केवल यही लाइन लिखी होती हैं।
यह क्या चीज है? ऐसा क्यों करते हैं? भय निकालने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसी कोशिश करते हैं इसलिए वह उन हथगोलों और बमों के बीच निर्भीकता से चला जाता है मर सकता है, जिंदा भी रह सकता है। मगर जिंदा रहने के चान्स ज्यादा होते हैं क्योंकि उनमें एक हिम्मत, एक साहस, एक क्षमता पैदा होती है कि देखा जाएगा। जीवन के एक छोर पर जन्म है, एक छोर पर मृत्यु है, हम दोनों के बीच में हैं – मर जाएंगे तो मर जाएंगे और जिंदा रह जाएंगे तो जिंदा रह जाएंगे। कृष्ण ने भी अर्जुन को यही कहा था गीता में, कि अर्जुन! तुम बहुत कायर, तुम बहुत बुजदिल हो क्योंकि तुम्हें ऐसा ही अपने भीतर पैदा किया गया। तुम भयभीत हो, तुममें ताकत और निर्भीकता नहीं है, तुममें क्षमता नहीं है, तुममें हौसला नहीं है और मैं कहता हूं कि तू मरण को प्राप्त कर, तू मर जा पहले। यदि तू मर भी जाएगा तो स्वर्ग मिलेगा आगे जहां अप्सराएं नृत्य करती हैं। जो कृष्ण ने कहा मैं वह बात दोहरा रहा हूं स्वर्ग है नर्क है, अप्सराएं है, या नहीं है मैं इस विषय को नहीं उठा रहा हूं। जो कृष्ण ने कहा मैं उस बात को कर रहा हूं। उस अर्जुन को समझाने के लिए श्री कृष्ण ने कहा – कि यदि तू जिंदा रह गया तो विजय प्राप्त करेगा, लोग जय जयकार करेंगे और आने वाली पांच हजार पीढि़यां तुम्हें याद करेंगी। दोनों स्थितियों में तुम्हें लाभ ही लाभ है, हानि है ही नहीं। जीत जाओगे तो भी लाभ है मर जाओगे तो भी लाभ है।
———और अर्जुन युद्ध के लिए तैयार हुआ, धनुष बाण हाथ में लिया, गांडीव हाथ में लिया और उस पर शर संधान कर के तीर संधान कर के अपने सामने जितने भी खड़े थे उन्हें समाप्त कर के विजय प्राप्त की। यहां तक कि उसके पुत्र की मृत्यु हो गई, अभिमन्यु की युद्ध में मृत्यु हो गई, यहां तक कि द्रोणाचार्य की मृत्यु हो गई उनके गुरू जी, यहां तक की भीष्म की भी मृत्यु हो गई, मगर फिर भी सारे पांडव अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव, युधिष्ठिर और श्री कृष्ण जीवित रहे, मर नहीं सके। क्या विशेषता थी कि वे मर नहीं सके और दुर्योधन, दुशासन जो थे मर गए। ऐसा हुआ क्या था? युद्ध तो दोनों में बराबर हो रहा था, बराबरी थी दोनों में, दोनों के गुरू एक ही थे। द्रोणाचार्य पांडवों के भी गुरू थे और द्रोणचार्य कौरवों के भी गुरू थे । कौरवों को भी द्रोणाचार्य ने पढ़ाया और पांड़वों को भी द्रोणाचार्य ने पढ़ाया। लेकिन कौरवों में भय था कि हम हारेंगे, इसमें दो राय नहीं है, हम हार जाएंगें क्योंकि उधर कृष्ण बैठे हैं। और पांडवों को भी द्रोणाचार्य ने पढ़ाया। लेकिन कौरवों में भय था कि हम हारेंगे, इसमें दो राय नहीं है, हम हार जाएंगें क्योंकि उधर कृष्ण बैठे हैं । और पांडवों को पूर्ण विश्वास था कि हम हार ही नहीं सकते, क्योंकि हमारे साथ कृष्ण खड़े है।
हम कहां से हारेंगे हारने का सवाल ही नहीं है। यह भय अभय के बीच की स्थिति थी, और वह व्यक्ति जिंदा रह सकता है जो संघर्ष कर सकता है, जो संघर्ष करने की क्षमता रखता है, जो संघर्ष को अपने जीवन में निमंत्रण देता है, जो संघर्ष को बुलाता है, जो अपने सामने संघर्ष को उत्पन्न करता है और फिर संघर्ष से जूझता है, वही सफलता प्राप्त करता है तो आनंद, असीम आनंद की अनुभूति होती है। कोर्ट में आप केस लड़ते हैं तो हर बार आप भयभीत रहते हैं कि हारेंगे या जीतेंगे, कहीं हमारा वकील दूसरे के साथ मिल गया है क्या, पता नहीं और आपके मन में तनाव और तनाव के अलावा कुछ नहीं होता । मगर जब आप जीत जाते हैं तो आपके चेहरे की प्रसन्नता और मुस्कुराहट इतनी तेज होती है कि शीशा भी एकदम तड़क जाता है। उस दिन क्या हो गया था और आज क्या हो गया है? पहले आप भयग्रस्त थे, जीते तो भय से मुक्त हुए। इसलिए यदि जीवन में सफलता प्राप्त करनी है तो जूझना ही पड़ेगा – तनाव के साथ नहीं विश्वास के साथ, दृढ़ता के साथ।
और जब संन्यासी दीक्षा लेता है, एक संन्यासी, गृहस्थ नहीं, तो निर्भीकता से दीक्षा लेता है। हममें से प्रत्येक संन्यासी है। आप में से कोई गृहस्थ है ही नहीं क्योंकि पत्नी आपकी है नहीं, पुत्र आपका है नहीं, पति आपका है नहीं, बंधु-बांधव आपके हैं नहीं, मकान जायदाद आपके हैं नहीं । अगर ये आपके होते तो आपके साथ चिता पर चले जाते ये सब। कोई जाता नहीं है, मैंने तो देखा नहीं, अपने सत्तर साल के इतिहास में मैंने तो देखा नहीं कि पति गया तो पत्नी भी साथ में मरी, मकान को भी जला दिया, नोट के टुकड़े भी अंदर आग में डाल दिए, बक्से भी अंदर डाल दिए, हीरे-मोती भी अंदर डाल दिए । ऐसा मैने देखा नहीं, शायद आपने भी नहीं देखा । सुना बस, राम नाम सत्य है आगे गया गत है। आगे गया गत है, अब आगे तो किसने देखा । और हम स्नान करके वापस घर आते हैं, फिर तराजू में दस छटांक कम तोलते हैं और हम दुकानदारी वैसी ही चलाते हैं । फिर अपने बच्चे को कहते हैं देख, सड़क पर मत जाना एक्सीडेंट हो जाएगा, देख उसका ऐक्सीडेंट हो गया मदनलाल का, देख किशनलाल का ऐक्सीडेंट हो गया, देख हरिराम का एक्सीडेंट हो गया। तू बाहर मत जाना।
——–और हम उनको कायर, हम उनको बुजदिल बनाते हैं। मैं कह रहा हूं कि गृहस्थी कोई होती नहीं चीज, और संन्यास भी नहीं होता चीज। इसलिए संन्यास चीज नहीं होती कि जिसकी आंख में विकार है, जिसकी आंख में गंदगी है, जो लड़की को देखने के बाद कामातुर हो जाता है, आप उसे कैसे संन्यासी कहेंगे? वह कैसे संन्यासी हुआ । केश रखने से ही संन्यासी हो गया? इसलिए गृहस्थ व्यक्ति भी संन्यासी है और संन्यासी व्यक्ति भी गृहस्थ है और गृहस्थ व्यक्ति भी गृहस्थ नहीं है और संन्यासी व्यक्ति भी संन्यासी नहीं हैं। दोनों एक ही जगह जलते हैं, एक ही प्रकार की लकडि़यों से जलते हैं और एक ही जगह जाते होंगे। या कब्र में उसे गाड़ देते हैं, या नदी में प्रवाहित कर देते है या लकडि़यों में जला देते हैं। तीनों में से कोई एक स्थिति बनती है क्योंकि कोई मरने के बाद उसको रखता ही नहीं। पत्नी कहती है कि तुरंत ले जाओ और जला दो। मुश्किल से चार घंटे भी आंगन में रख दे तो बहुत बड़ी बात है हां, अंतिम दर्शन करने के लिए बर्फ की सिल्लयां चारों तरफ रख देते हैं क्योंकि नेताजी हैं उनको चौबीस घंटे रखने ही पड़ेगा। तो वे रख देते है और 24 घंटे के बाद जला देते हैं । बस इतना ही डिफरेंस होता है।
शरीर 24 घंटे नहीं रह सकता। चार घंटे बाद उसमें बदबू आने लग जाती है। आठ-दस घंटे बाद कीड़े पड़ने लग जाते हैं, चौबीस घंटे बाद उनको उठाने की किसी की हिम्मत नहीं होती । अब आप का शरीर कितना ताकतवान कितना क्षमतावान कितना संघर्षवान है, इसका आप निर्णय कर सकते हैं । इस शरीर में ताकत नहीं है, और भय के अलावा इस जीवन में कुछ है ही नहीं, प्रारंभ से ही आपके मन में भय है, और जहां भय है वहां मृत्यु है ही, क्योंकि भय और मृत्यु एक ही चीज हैं। और कृष्ण भी हमें क्यों याद आ रहें हैं, मुझे क्यों याद आ रहे हैं? और मदनलाल जैसे क्यों नहीं याद आ रहे जो कृष्ण के साथ पैदा हुए थे। इतने कौरव पैदा हुए थे आप में भी कौरव होंगे, पांडव होंगे क्योंकि आपका भी जन्म तो बराबर होता ही रहा है या तो कौरवों की सेना में होंगे या पांडवों की सेना में होंगे । मगर आपका नाम मुझे याद नहीं कि द्वापर में आपका नाम क्या था, मगर कृष्ण का नाम याद हैं । इसलिए कि उन्होंने जिन्दगी के प्रारम्भ से लगाकर अंत तक संघर्ष के अलावा, कुछ किया ही नहीं। सुख नही मिला उन्हें पूरी जिन्दगी में। सुख जैसी चीज उन्होंने देखी ही नहीं। पैदा होते ही कंस ने मारने की कोशिश की, दो महीने का था तो पूतना ने आकर मारने की कोशिश की, थोड़े से बड़े हुए तो बकासुर आया, फिर कंस ने एक और राक्षस को भेजा, फिर और किसी प्रकार से मारने का उपक्रम किया, कालिया नाग आया और उनको डसने की कोशिश की। आप मुझे बताइए कि जिंदगी के प्रारंभ से लेकर अंत तक कृष्ण को कौन सा सुख मिला, एक दिन भी एक मिनट भी सुख नहीं मिला।
मगर कहां हारे जीवन में, कहां पराजित हुए? एक बार भी हारे नहीं, विजयी हुए और उन सारे संघर्षों का सामना करते हुए। इसलिए कृष्ण याद आ रहे हैं, इसलिए मदनलाल याद नहीं आ रहा हैं। इसलिए हेमराज याद नहीं आ रहा हैं। —-और राम ने कहां सुख देखा मुझे बता दीजिए। एक दिन भी सुख देखा हो तो मुझे बता दीजिए, एक दिन भी। पत्नी के साथ जंगल-जंगल भटके एक राजा के बेटे होकर भटके, पिता का दाह संस्कार नहीं कर सके, कैकेयी के षड्यंत्र का सामना करना पड़ा, कैकेयी ने षड़यंत्र किया कि भरत किसी तरह राज गद्दी पर बैठ जाए, और वे षड्यंत्र उस समय भी चलते थे आज भी चलते हैं और संघर्ष के अलावा राम ने कुछ देखा ही नहीं, इसलिए आज राम याद आ रहे हैं । मेरा कहने का अर्थ यह है कि अगर हमारे जीवन में संघर्ष नहीं है तो हम मृत्यु युक्त हैं, हममें और एक मरे हुए व्यक्ति में डिफरेंस कोई नहीं है, इसलिए हम मरे हुए व्यक्ति हैं और आश्चर्य यह है, कि मरे हुए व्यक्ति हैं, और सांस ले रहे हैं । और ऐसे लोगों को देख कर बड़ा आश्चर्य होता है कि ये कैसे मृत व्यक्ति हैं, जो सांस भी ले रहे हैं और चल भी रहें हैं । एक छोटा मोटा शिकारी था जिसको कोई खास बंदूक चलाना आता नहीं था । बेटे ने एक दिन कहा कि आप बहुत बड़े शिकारी हैं—— उसने कहा – अरे शिकारी! मैनें एक गोली मारी और एक गोली से बीस बाघ समाप्त। शेर का शिकार करना कोई सीखें तो मुझसे सीखें। तो बेटे ने समझा कि बहुत बड़े बहादुर का पुत्र हूं। उसने कहा, पिता जी ! तालाब के किनारे पहुंचे घूमते घामते। वहीं ऊपर एक चील उड़ रही थी, एक कौआ उड़ रहा था।
बेटे ने कहा – आपने बाघ को मार दिया तो उस कौए को भी मार सकते हैं बंदूक की गोली से? बाप ने कहा – यह दो मिनट का काम है। उसने बंदूक से गोली चलाई कौआ उड़ गया। बेटे ने कहा – कौआ तो मरा नहीं। बाप ने कहा – यही तो विशेषता है कि गोली लगने के बाद भी मरा नहीं। आप देखिए लगी उसको, फिर भी उड़ता रहा । यह मंत्र-तंत्र है तुम नहीं समझ पाओगे। यह साधना है । यह अपने बेटे को भुलावे में डालने के लिए झूठी प्रक्रिया थी। उसको भयभीत करने की प्रक्रिया थी। उसको और गुमराह करने की प्रक्रिया थी। वह खुद तो गुमराह था ही, बेटे को भी गुमराह कर दिया और हम जीवन में यही करते हैं – खुद गुमराह होते हैं और दूसरों को भी गुमराह करते हैं। इसके अलावा आप कुछ करते नहीं, कर नहीं सकते। आप में अधिकांश जब मेरे पास आते हैं तो एक ही बात कहते हैं कि बहुत तनाव है, बहुत दुःख है, परेशानी है, बेटी कहना मानती नहीं, मेरे बेटे कहना मानते नहीं, मैं बीमार हूं, मुझे यह तकलीफ है, और इसके अलावा आप कुछ बात करते ही नहीं है और मैं सोचता हूं कितना आश्चर्यजनक व्यक्ति है? मरा हुआ है, सांस भी ले रहा है और बात भी कर रहा है। ऐसे व्यक्ति इस पृथ्वी पर ही मिलते हैं, हर जगह नहीं मिलते।
निर्भयता जो है वह जीवन की श्रेष्ठता, सत्यता है, प्रामाणिकता है और वे व्यक्ति जिंदा रहे, वे पशु जिंदा रहे, वे पक्षी जिंदा रहे, वे कीट पंतग जिंदा रहे, वे नभचर और जलचर जिंदा रहे, जिन्होंने संघर्ष करने की क्षमता रखी। जो संघर्ष करते रहे, स्ट्रगल करते रहे, वे ही बच पाएं। और आप टालते रहते हैं कि जीवन में यह भी प्रॉब्लम नहीं आए, वह भी प्रॉब्लम नहीं आए। अमृतसर जाना नहीं है, गुरुद्वारे में माथा टेकना नहीं है क्योंकि कभी ए-के-47 चल जाएगी। और मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि ए-के- 47 की कोई गोली अभी तक आपके लिए बनी ही नहीं है। जब ऐसे कारखाने बने ही नहीं तो आपको लगेगी कहाँ से, और आप पहले से ही डर रहे हैं गोली बनेगी ए-के-47 में जाएगी फिर आपको लगेगी तब देख लेंगे । अभी आप क्यों परेशान हो रहे हो, अभी आप क्यों तनावग्रस्त हो रहे हो? मगर नहीं, आप कहते हैं, अमृतसर से गुजरना ही नहीं हमें, वहां रात को टिकना ही नहीं हमें, हमे तो सीधा जम्मू (तवी) जाना है तो वहीं जाएंगे, बीच में रुकना ही नहीं और अमृतसर आते ही आप बिल्कुल दुबक कर बैठ जाएंगे। दूर से ही मत्था टेक देंगे। मै ऐसा नहीं कह रहा कि हमें जाना ही चाहिए मैं ऐसा भी नही कह रहा कि आपको नहीं जाना चाहिए। मैं ऐसा कह रहा हूं कि आपके मन में जो भय है, यह मिटना चाहिए और आपमें से अधिकांश व्यक्ति उस भय को लेकर मेरे पास आ रहे हैं, जो घटना घटी ही नहीं आपके जीवन में, उससे आप भय खा रहे हैं!
जब लड़का बिगड़ेगा तब बिगड़ेगा, अब आज से ही क्यों तनाव में है कि लड़का बिगड़ेगा, लड़का बिगड़ेगा। छः बजे आना चाहिए साढ़े छः बजे आना चाहिए और पैंट पहननी चाहिए, जीन्स पहनना हैं। कहना नहीं मानता गुरुजी, आप सोच लीजिए कितनी परेशानी है और मेरी बेटी जो है वह सात बजे आती है और उसकी आंखे कह रही हैं कि वह ठीक नहीं है, कहीं गड़बड़ जरूर है, अब गुरुजी आप ठीक कर दीजिए। यह अपनी स्थिति आपके लिए मुझे बताना स्वाभाविक है। आपका विश्वास है कि ये गुरुजी हैं और मेरी समस्या तो दूर करेंगे। और समस्याओं को दूर दैविक साधना और सहायता के माध्यम से किया जा सकता है। जहां दैविक बल हो, उससे ऐसा किया जा सकता है। मनुष्य के बल से नहीं। जब देवताओं का बल हमारे साथ हो तो हम सफलता प्राप्त कर सकते हैं, तब हम निर्भीक बन सकते हैं, युद्ध में विजय प्राप्त कर सकते हैं, पूर्णता प्राप्त कर सकते हैं, धनवान बन सकते हैं और जीवन में वह सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं जो हम चाहते हैं। आप जीवन में धन चाहते हैं और मैं कहता हूं कि आपको धनवान होना चाहिए । मैं कहता हूं कि इतना अधिक होना चाहिए कि आप गिनत-गिनते थक जाएं । मै बुद्ध नहीं हूं कि आपको कहूं कि धन त्याग दो, बुद्धं शरणं गच्छामि संघं शरणं गच्छामि । न मैं महावीर स्वामी हूं कि सब कपड़े खोल देना चाहिए।
मैं ऐसी सलाह आपको नहीं दे रहा हूं। मै कह रहा हूं आपके पास बहुत वैभव होना चाहिए बहुत मकान होने चाहिए। ऊंची गाड़ी होनी चाहिए, आपको धनवान होना चाहिए क्योंकि आप मेरे शिष्य हैं, धन होना चाहिए, यश होना चाहिए, मान, पद प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य होना चाहिए और वह सब कुछ दैविक बल से प्राप्त हो सकता है, आपके प्रयत्नों से प्राप्त नहीं हो सकता। आपके प्रयत्नों से प्राप्त होता तो अब तक आप करोड़पति होते, क्योंकि प्रयत्न करने में आप कसर रखते ही नहीं। दिन भर परिश्रम करते रहते हैं। प्रत्येक प्रकार से प्रयत्न करते हैं छल, बल, ताकत, युक्ति, चतुराई, चालाकी, मक्कारी, धूर्तता, समझदारी – कोई चीज छोड़ते नहीं आप। मगर उसके बावजूद भी आप उतनी ही तकलीफ में बंधे रहते हैं। चाहे तकलीफ फाइनैंशीयल हो, चाहे पुत्र की हो, चाहे पुत्री की, चाहे पत्नी की । जिसे आप शादी कर के लाए वही आपके कंट्रोल में नहीं है। डेटिंग वेटिंग करके लाए होंगे, बगीचे में गए होंगे, दो चार महीने डेटिंग की होगी उसने आपको परखा होगा, आपने उसे परखा होगा लेकिन फिर भी घर लाते ही झगड़ा शुरु और जिन्दगी भर फिर लड़ाई झगड़ा चल रहा है आपका। यह हुआ क्या? कैसे हो गया?
इसलिए हुआ कि वह भयभीत है कि अगर यह मर गया तो मैं कैसे रहूंगी? अभी तक मकान भी नहीं बनाया अभी तक किराए के मकान में रह रहा है, और मरेगा जरूर यह, तो फिर मैं कहां जाऊंगी, यह गड़बड़ हो जाएगा, मैं करूंगी क्या? वह भयभीत इसलिए है वह कहती है – अच्छा चलो एक मकान तो बनाओ, अरे रहने के लिए कोई स्थान भी नहीं है, तुम कैसे आदमी हो? लोगों ने देखो, कितने मकान बना लिए, मदनलाल ने बना दिया तुम ने बनाया ही नहीं । वह भयभीत आपसे नहीं है, वह भयभीत आने वाली स्थिति से हैं । पति भी भयभीत है कि अगर बीमार पड़ गई तो अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ेगा, डॉक्टर की फीस 1200 रूपये है, फिर दवा, कया करें? वह पत्नी को बहकाता रहता है कि तुम्हें कोई तकलीफ नहीं है, छोटा-मोटा बुखार है आता ही रहता है और मर भी जाएगी तो कोई फर्क नहीं होगा मैं तुम्हे विश्वास दिलाता हूं कि दूसरी शादी नहीं करूंगा। बस भरोसा रख मेरे ऊपर। एक पत्नी मरने लगी तो पति का हाथ पकड़ कर कहा – देखना, मैं मर जाऊंगी, घंटा-डेढ़ घंटे से ज्यादा जिंदा नहीं रह पाऊंगी। पति ने कहा – मुझे लग रहा है तेरी अंतिम सांसे चल रही हैं, तू मर जाएगी ऐसा लग रहा है और अभी तो उम्र ही तेरी 40-42 साल की है।
पत्नी ने कहा – आप मेरा कहना मानेंगे? पति ने कहा – तेरी अंतिम इच्छा है जरूर पूरी करूंगा। पत्नी ने कहा – आप दूसरी शादी कर लेना, बच्चे छोटे-छोटे हैं। पति ने कहा – चलो तुम्हारी बात मान लूंगा पर छः महीने पहले विश्राम करूंगा, पहले आराम करूंगा, बहुत दुःखी हो गया हूं मैं तुम्हारे साथ रहते-रहते। जब छः महीने विश्राम कर लूंगा तो फिर शादी कर लूंगा । अभी छः महीने तक तो मुझे माफ करना, उसके बाद देख लूंगा। आप खुद सोचिए कि पति कितना, दुखी और तकलीफ में है और आपने, कितना उसे कोंच-कोंच कर दुःखी कर दिया है। और उसने भी आपको भयभीत कर दिया है। और आप दोनों ने मिलकर बेटे को क्या दिया है? मैं शादी को भयपूर्ण घटना नही कह रहा हूं। मैं कह रहा हूं। जो निर्भय होता है वह जीवित हो सकता हैं और निर्भय तब आप हो सकते हैं, जब आपके सामने संघर्ष आएंगे। और संघर्ष तब आएंगे जब आप बुलाएंगे संघर्ष को। टेन्शन आए, बाधाएं आएं, परेशानिया आएं, कठिनाइयां आए और नहीं हो पाएं तो गुरु के पास जाएं और पूछें, कौन सी साधना है, कौन सी तरकीब है, कौन सा मंत्र है, दैविक बल मै कहां से प्राप्त करूं, जिसके माध्यम से हम सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं। आप किसी के यहां नौकर हैं और तीन, चार, आठ हजार रूपये तनख्वाह ले रहे हैं, आप ले रहे हैं तोताराम जी से तोताराम जी क्या महान हो गए?
आपके लिए इसलिए महान् हो गए कि उनके पास एक लाख रुपये हैं, आपके पास नहीं है। इतना ही तो डिफरेंस है, इसलिए कि आप तोताराम जी से ले रहे हैं। आप हरिराम से ले ही नहीं रहे हैं। जिसके पास खाने को ही नहीं है वह आपको कहां से देगा? उस देवता से हम प्राप्त कर पांएगे, जिसके पास वह शत्तिफ़ है। अगर लक्ष्मी है तो हमें धनवान बनाने में वह क्षमतावान हो सकती है क्योंकि उस चीज में वह सिद्धहस्त है। अब उस देवी का बल प्राप्त कैसे करें? वह आपको ज्ञान नहीं है और वह आपको ज्ञान नहीं है इसलिए आप भयभीत हैं और जिस दिन आपको दैविक बल प्राप्त हो जाएगा जब आप आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न हो जाएंगे। पर बिना दैविक बल के सम्पन्न नहीं हो पाएंगे। जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीश——- इस प्रकार हनुमान जी आपके शरीर में आ ही नहीं सकते और हनुमान जी कुछ कर ही नहीं सकते क्योंकि आपके लिए कौन सा मंत्र, कौन सी विधि, साधना उपयुक्त है जिसके माध्यम से आप सफलता प्राप्त कर सकते हैं, यह आपको ज्ञात नहीं है। इसलिए नही है कि आपके पास कोई गुरु नहीं हैं ।
———और दस लाख में से एक गुरु होता हैं यह मैं आपको बता देता हूं। दस लाख व्यक्तियों की गणना करें तो एक गुरु निकलता है, बाकी तो पंडे निकलते हैं, बाकी पुजारी निकलते हैं,बाकी पूजा करने वाले निकलते है बाकी, घंटा घ्डि़याल बजाने वाले निकलते हैं। वे गुरु नहीं हो सकते, और वो थोक के भाव मिलते हैं तो गाड़ी से उतरिए हरिद्वार आप और पांच सौ पंडि़त एकदम से घेर लेंगे आपको। क्या वो गुरू हैं? क्या तो गऊ दान पांच रुपये में करा देते हैं, और मैं तो गाय की पूंछ का एक बाल भी नहीं खरीद सकता पांच रुपयें में। अब पांच रुपये मैं गऊदान कहां से करूंगा। मगर वे करा देते हैं वो दो रुपये में भी करा देते हैं, मैने भी कराया हैं। जब मेरी मां की मृत्यु हुई तो मै गया तो मुझे पता था यहां गऊदान कराना ही पड़ेगा, यहां वैतरणी पार मां को करवाना ही पड़ेगा क्योंकि वो कहते हैं कि वैतरणी पार नही कराया तो मां यहीं टिक जाएगी। मुझे पता था यह सब फ्रॉड है, छल है, झूठ है, उनको कुछ ज्ञान है ही नहीं। हरिद्वार में जाते है तो पहली बात यही पूछते हैं कोई मर गया हैं क्या? मैने कहा, मेरी मां मर गई। उसने कहा – हां ठीक है, तुम्हारा पंडा मैं हूं। अब कोई प्रमाण है तुम्हारे पास मैं कैसे मानू तुम पंड़े हो, यहां तो इतनी भीड़ है पंडो की। कोई धोती खींच रहा है, कोई कुर्ता खींच रहा है, तुम हो तो कोई प्रमाण तो दो। उसने कहा – चलो।
तुम उसके पीछे चलते हो और वह बही निकालता है और पढ़ता है कि तुम्हारे दादा जी आए थे और दादाजी का नाम यह था। आप संतुष्ट होते हैं कि दादाजी ने सोने की थाली दी। अब तुम सोचते हो दादाजी के पास पीतल के बर्तन तो थे नहीं, वो तो तकलीफ पा रहे थे तो सोने की थालियां कहां से दे दी? मगर पंडे को इसलिए कहना पड़ रहा है, कि यह भी कुछ दे तो सही। दादाजी ने तो सोने की थाली दी नहीं पर यह तो पांच सौ रुपये दे। वह इसलिए कहता है, दादाजी आए थे, सोने की थालियां दीं। हमारे हिस्से में तो आई नहीं मेरे भाई के हिस्से में भी नहीं आईं दादाजी ने तो सोने की थाली दी नहीं पर यह तो पांच सौ रुपये दे। वह इसलिए कहता है, दादाजी आए थे, सोने की थालियां दी। हमारे हिस्से में तो आई नहीं मेरे भाई के हिस्से में भी नहीं आईं दादाजी सब कुछ यही देकर समाप्त हो गए। आश्चर्य है घोर आश्चर्य है। पंडा कहता है – तुम नास्तिक न बनो, तुम नास्तिक हो बच्चे। मैं आस्तिक हूं, नास्तिक हूं और मुझे अपने दादाजी के बारे में नॉलेज है, सोने की थाली क्या पीतल के बर्तन भी नहीं थे उनके पास। यह मुझे अच्छी तरह से ज्ञात है। पंडा कहता है, अच्छा चलो, छोड़ो तुम, मरा कौन हैं? मरी तो मेरी मां हैं। चलो नीचे नदी पर फिर।
वहां गए तो कहता है – तुम्हें गऊ दान कराना पड़ेगा, तुम्हारे पास पैसे कितने हैं? पैसे तो मेरे पास थे। मैं असत्य भी नहीं बोल सकता था तो सत्य भी नहीं बोल सकता था। पंडे थे पांच सौ और मैं था अकेला, मुझे पकड़ते, बांधते और सीधा माताजी के पास भेज देते गंगाजी में फेंक कर के। मैंने कहा – मेरे पास पैंतालीस रुपये हैं। पंडा बोला – कंजूस, पैतालीस रुपये लेकर मां का श्राद्ध कराने आया है। पैंतालीस रुपये में होगा क्या? मैंने कहा – मैं तो नौकरी से कमाता हूं, बस इतने ही हैं और इनमें वापस जाने का किराया भी बाकी हैं। टिकट लिया नहीं मैंने, कोई रिजर्वेशन नहीं है मेरा । कितना किराया लगता हैं? मैंने कहा, पंद्रह रुपये। उसने कहा – अच्छा पैतालीस में से पंद्रह गए, बचे तीस। तीस रुपये ला, मैं गऊ दान करा देता हूं। मैंने कहा – तीस कैसे दे दूं? सराय के रुपये देने बाकी हैं, पांच रुपये सराय वाले को देने हैं, फिर शाम को रोटी खानी है, सुबह भी रोटी खानी है, रिक्शा करके स्टेशन जाना है। उसने कहा – यह कैसा कंजूस है। दिन भर में पहला तो यजमान मिला, पहला ही कंजूस। अब इसके पास बस पांच रुपये बचते हैं। अच्छा ला, पांच रुपये ला। मैंने कहा पांच रुपये देने में मुझे तो कोई आपत्ति है नहीं, मगर सुबह मेरा एक कुर्ता गुम गया, अब कुर्ता नहीं है, आप सोचिए, क्या पहन कर जाऊंगा? बाजार में तीन रुपये में कुर्ता आता है। उसने कहा अच्छा ला, दो रुपये ला, तुम्हारी मां को वैतरणी पार करा दूंगा।
अब दो रुपये में मेंढक भी नहीं आता, और वह दो रुपये में गाय खरीद कर वैतरणी पार करा देगा। वे आपके गुरु हैं। वे तिलक लगाए हुए बस बैठे हैं और वे गुरु नहीं है तो आपको ज्ञान कहां से दे पाएंगे? इसलिए मैंने कहा कि दस लाख में से कोई एक गुरु होता है। यदि आपको जीवन में ऐसे गुरु मिल जाएं तो यह आपका सौभाग्य ही होगा। ————–और संसार में किसी देश-भाषा में गुरु शब्द कहीं है नहीं, टीचर शब्द है, मास्टर शब्द है, जो पैसे लेकर काम करते हैं, वे हैं। मगर गुरु शब्द नहीं है। यह गुरु परंपरा केवल भारत में ही है। और आज से नहीं पिछले पचास हजार वर्षों से हैं। यह शब्द नहीं मर पाया, बाकी सब शब्द समाप्त हो गये। मगर गुरु शब्द नहीं मर पाया । वशिष्ठ के समय भी यही शब्द था आज के समय में भी यही शब्द है क्योंकि गुरु कोई व्यक्ति नहीं हैं गुरु एक ज्ञान है, गुरु एक चेतना है, गुरु एक प्रबुद्धता है । जिसमें ज्ञान की प्रबुद्धता है वह गुरु है । मै तुम्हारा गुरु हूं मैं यह नहीं कह रहा हूं पर जो मेरा ज्ञान है वह आपका गुरु हैं। वह आपको सही ढंग से ज्ञान दे पाएगा, चेतना दे पाएगा कि यह मंत्र है जो तुम्हारे लिए सही है, यह साधना सही है। गुरु ही तुम्हें बताएगा और कहेगा तू मुझे दक्षिणा चढ़ा, न चढ़ा, चरण स्पर्श कर या नहीं कर, मुझे इसकी जरूरत नहीं है, पैर पर जोर से सिर पटकेगा तो नाडि़यां आगे सरकेंगी, अपनी खोपड़ी मेरे पैरों में रखना जरूरी है मगर मैं जो साधना दूंगा वह दैविक बल के लिए जरूरी होगा।
ब्राह्मण, आपको ज्ञान नहीं दे सकते सारे ब्राह्माण, दस पंद्रह को छोड़कर कहते हैं कि ग्रहण बहुत खराब है ग्रहण काल में बाहर नहीं जाना चाहिए, ग्रहण काल में खाना नहीं खाना चाहिए, मटकों का जल फेंक कर मटके उलटे रखने चाहए, ग्रहण समाप्त होते ही स्नान करना चाहिए, उसके बाद सब काम करना चाहिए । वास्तव में ग्रहण कोई खराब शब्द है ही नहीं, मगर बाकी सारे गुरु उल्टा कहते हैं और आपके परिवार वाले भी ग्रहण को बुरा मानते हैं क्योंकि उन्होंने अपने बड़ों से यही सीखा, और आप भी यही कहते हैं अपने बेटे को कि ग्रहण काल में कुछ नहीं करना चाहिए, ग्रहण काल खराब हैं क्योंकि राहु आता है और सूर्य को मुंह में डाल देता हैं, डालता है तो ग्रहण हो जाता है। इतना बड़ा सूर्य उसको राहु कैसे मुंह में डालेगा मेरी समझ में नहीं आता। आपकी समझ में शायद आ रहा होगा पर मेरी समझ में नहीं आता। साइंस इस बात को स्वीकार नहीं करता। मगर गीता में कृष्ण कह रहे हैं कि ग्रहण से श्रेष्ठतम कोई समय है ही नहीं, अद्वितीय समय है, एक समय है कि उस समय जो कुछ भी किया जाए उसमें सफलता मिलती ही हैं। और इसीलिए महाभारत युद्ध ठीक समय शुरु हुआ जब ग्रहण काल था और पांडव विजयी हुए। पांडवों ने कृष्ण से कहा, शंख बजा दें, युद्ध आरंभ कर दें। कृष्ण ने कहा – अभी नहीं, ठहर जाओ।
पांडवो ने कहा – ठहर जाओ? कौरव सामने खड़े हैं, तलवार लिए खड़े हैं, उनके शंख बज रहें हैं भीष्म तैयार खड़े हैं और आप कहते हैं ठहर जाओ? कृष्ण ने कहा – अभी ठहर जाओ। अभी नहीं क्योंकि ‘कालोयं निर्विदा विपुला च लक्ष्मी ।’ काल क्षण अपने आप में बहुत मूल्यवान हैं। मैंने भी थोड़ी देर पहले कहा कि मैं दस मिनट बाद प्रयोग कराऊंगा। आपने सोचा, गुरुजी को कोई काम होगा अंदर क्योंकि आप तो तर्कवान हैं न, कुछ न कुछ सोचा ही होगा। अब मेरे साथ तो कमरे में कोई था ही नहीं, बस बैठा था और दस मिनट बाद इसलिए आया कि प्रयोग के लिए वह समय उपयुक्त हो, जहां आपको लाभ मिल सके।
जब राम-रावण युद्ध हुआ तब भी राम ने ज्योंही तीर संधान किया तो हनुमान ने कहा, महाराज! ठहर जाइए। युद्ध का अभी समय नहीं आया है। युद्ध में यदि विजय प्राप्त करनी है तो आपको रुकना पड़ेगा और मैं तो सेवक हूं, मैं आज्ञा तो नहीं दे सकता, मैं तो विनम्र निवेदन कर सकता हूं मगर आप विश्वामित्र से पूछिए कि यह समय उपयुक्त हैं? आप ध्यान में अपने गुरु को लाइए, और उनको आज्ञा चक्र में स्थापित करिए। यह सब बात इसलिए समझा रहा हूं कि जब राम कर सकते है तो आप भी आज्ञा चक्र में गुरु को स्थापित कर सकते हैं, आप भी हृदय में गुरु को स्थापित कर आज्ञा ले सकते हैं तो आप भी ले सकते हैं । राम में और आप में कोई अंतर है ही नहीं! जहां तक मैंने सुना है उनके दो हाथ ही थे, दो पांव थे, दो आंखें थीं, दो कान थे । बीस या पचास हाथ उनके नहीं तो आपके भी नहीं हैं। जन्म से कोई महापुरुष होता ही नहीं, आज तक नहीं हुआ। वे सब आपके जैसे ही थे, अपने कार्यो सें, संघर्ष से राम, कृष्ण, बुद्ध और चैतन्य बने। यदि आपमें संघर्ष है तो आप राम बन सकते हैं, बुद्ध बन सकते हैं चैतन्य बन सकते हैं और जीवित रह सकते हैं दो हजार पांच हजार साल तक भी, यदि आप में संघर्ष करने की क्षमता है, यदि आप निर्भीक हैं और चुनौतियों को सामने बुलाते हैं, हर समय चुनौतियों का सामना करते है, प्रॉब्लम आती हैं तो उसे फेस करते हैं। यदि आपमें यह भावना, यह क्षमता है तो आप जीवित रह सकते हैं, संघर्षशील हो सकते हैं, और सफलता प्राप्त कर सकते हैं और उसके लिए दैविक बल जरूरी है। राम को भी विश्वामित्र की जरूरत थी। ——और जब राम ने उनसे पूछा तो थोड़ी देर बीत जाए उसके बाद तुम तीर संधान करना। अब कहां विश्वामित्र ठेठ अयोध्या के पास एक आश्रम में और कहां राम, ठेठ दक्षिण में रामेश्वरम् के पास में और उसके भी आगे। मगर वहा से भी उनका आपस में संचार होता रहा। आप भी कहीं भी हों, चाहे यहां हों, चाहे दो हजार मील दूर हों आपके आज्ञा चक्र में भी गुरु स्थापित हो सकते हैं और गुरु बता सकते हैं और आप गुरु की आज्ञा प्राप्त कर सकते हैं, गुरु आपको गाइड कर सकते हैं और आप गुरु से गाइड हो सकते हैं यदि आपका गुरु से अटैचमैंट है, यदि आपको विश्वास है और यदि आपको गुरु में विश्वास है, उनकी दी हुई साधनाओं में विश्वास है, तो फिर देवता भी आपके जीवन में सफलता दे सकते हैं और आप विजय प्राप्त कर सकते हैं।
और विजय का मतलब है कि जो आपके जीवन में समस्याएं है उन पर सफलता प्राप्त होनी चाहिए। अभी वह क्षमता प्राप्त हुई नहीं है आपको, क्योंकि उस दैविक बल को प्राप्त नहीं कर पाए आप, दैविक बल को छोड़ो गुरु को भी प्राप्त नहीं कर पाए आप। जब गुरु को भी प्राप्त नहीं कर पाए तो देवता कहां से आपके जीवन में आ पाएंगे? इसलिए आपको विजय की जरूरत है, आपको संघर्ष करने की जरूरत हैं, आपको निर्भय होने की जरूरत है आपको निडर होने की जरूरत है और आपकी जो भी इच्छा है उसको पूरा करने की जरूरत है और प्रत्येक व्यक्ति के मन मे इच्छा रहनी चाहिए क्योंकि ‘इच्छा विहीनः पशुः’ । जिसकी इच्छा है ही नहीं, वह तो मरा हुआ है, आपमें इच्छा ही नहीं है, संघर्ष करने की भावना ही नहीं है और जब इच्छा नहीं होती तो आदमी मर जाता है, जिंदा होते हुए भी मर जाता है । संन्यासी को जब दीक्षा दी जाती है तो कहा जाता है – जा मर जा यह नहीं कहा जाता तू सुखी रह सम्पन्न रह सफल हो। ऐसा आशीर्वाद नहीं देते हैं। जब दीक्षा देते हैं तो कहते हैं – तू मर जा। आज तक जितना तुम्हारे अन्दर डर था, भय था, समस्याएं थीं, बाधाएं थीं, उन्हें मार देता हूं, मैं तुम्हें नया जन्म देता हूं। आज तुम्हें नवीन चेतना दे रहा हूं, आज से तुम्हें नवीन तरीके से काम करना हैं। संन्यासी को भी जब गुरु दीक्षा देता है तो अंत में यही कहता है, जा, मृत्यु को प्राप्त हो जा।
और आप सुनेंगे तो कहेंगे-यह अच्छा है गुरु जी! आपको अच्छा आशीर्वाद देना चाहिए कि लखपति हो, करोड़पति हो। मर जाने का मतलब है कि आज तक का तुम्हारा जीवन जितना डरपोक था गया बीता था, घटिया था, वह समाप्त हो जाए। आप नए मनुष्य के रूप में जन्म दे सकें, आज से नए बन सकें, नवीनता का प्रारंभ हो सके, नवीनता का संचार हो सके। जैसे सूर्य पर ग्रहण लगता है वैसे आपके ऊपर भी ग्रहण लग गया है भय का, डर का, चिंताओं का, बाधाओं का, अड़चनों का, कठिनाइयों का । यह सब दूर हो सके और सूर्य की भांति आप चमक सकें, रोशनी कर सकें, पूरे संसार में आपका नाम हो सके। ऐसा तब हो सकेगा, जब आपके पास दैविक बल होगा और दैविक बल तब हो पाएगा जब आप गुरु के सान्निध्य में हो सकें, और गुरु का सान्निध्य तब हो पाएगा जब गुरु का आप पर बिश्वास हो पाएगा और गुरु का विश्वास तब हो पाएगा जब आप उन पर पूर्ण विश्वास कर पाएंगे।
इसलिए जीवन में आप संघर्षशील बनें, विजयी बनें और मैं कह रहा हूं आपके पास इच्छाएं होनी चाहिए, रोज नयी इच्छाएं होनी चाहिए और प्रत्येक इच्छा पर विजय प्राप्त करें आप। एक साल में होगी, दो में होगी या दस में होगी। मगर इच्छाओं पर विजय प्राप्त होनी ही चाहिए। जहां भी कृष्ण हैं वहां विजय है – ऐसा गीता में कहा गया है। जब गुरु हैं, वहां विजय होगी ही होगी। क्योंकि जब गुरू होगा तो एक भय का संचार मिटेगा। और गुरु प्राप्त होगा तो दैविक बल प्राप्त होगा क्योंकि गुरु समझा पाएगा कि आपका जीवन क्यों बना है? वह बता पाएगा आपके लिए कौन सी साधना जरूरी है और इसके लिए गुरु शिष्य के बीच एक एग्रीमैंट होना चाहिए विश्वास का, क्योंकि यह चीज तर्क की नहीं है, यह श्रद्धा की है। तर्क में तो न मैं आपसे जीत सकता न आप मुझसे जीत सकते । यह चीज तर्क की नहीं है, श्रद्धा की है।
जब आप ने मान लिया कि यह व्यक्ति सत्य बोल रहा है और मेरा हितचिंतक है तो आपको विश्वास में लेना पड़ेगा। आप शादी कर के आते हैं, उस अनजान लड़की से जिसे आपने देखा नहीं, और सत्रह साल की लड़की पहली बार आपके घर आती हैं, उससे कोई परिचित भी नहीं है, अभी कोई उसे जानता भी नहीं, और एकदम से संदूक की चाबी उसे दे देते हैं यह क्या? आप पड़ोसी को इतने साल से जानते हैं, उसे देते नहीं मगर उसे क्यों दे देते हैं? क्योंकि आपको विश्वास है कि यह पैसे बरबाद नहीं करेगी। विश्वास एक क्षण में पैदा हो गया, और जहां विश्वास नहीं होगा, वहां रात को भी चाबी तकिए के नीचे रखेंगे आप।
विश्वास गुरु के प्रति होना चाहिए, अपने प्रति होना चाहिए, संघर्षशील होना चाहिए और आप जीवन में सफलता प्राप्त कर पाएं और निश्चय ही आप जीवन में विजयी हो पाएं, दैविक बल प्राप्त कर पाएं, पूर्ण रूप से सफल हो पाएं ऐसा ही मैं आपको आशीर्वाद दे रहा हूं ।
सद्गुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानन्द जी
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