





होली शब्द सुनते ही द्वापर युग की याद हो आती है, जब कृष्ण, राधा और गोपियों के साथ यमुना तट पर होली खेला करते थे। अत्यन्त तन्मयता और मस्ती भरी होली, जब राधा, कृष्ण के ही रंग में रंग गई थीं, जब उन्होंने अपने तन-मन पर कृष्ण की ही मनमोहक छवि अंकित कर ली थी, जब उन्होंने कृष्ण के ही रंग में सराबोर चादर को अपने तन-मन-प्राण पर ओढ़ लिया था, तभी तो होली का नाम लेते ही ब्रज की होली का स्मरण सर्वप्रथम हो आता है, एक ऐसा मनमोहक रंग, जो कभी नहीं उतरा और न ही कोई दूसरा रंग ही उस पर चढ़ सका।
इतना गहरा, इतना सुन्दर, इतना आनन्दित कर देने वाला कि उसके आगे तो सभी रंग फीके नजर आते हैं, जिसने तन को ही नहीं, अपितु पूरे जीवन को ही रंग दिया, उस प्रेम रस और आनन्द की फुहार से, जो तन-मन पर वर्षा बनकर बिखरा था, उन गोप-ग्वालों और गोपिकाओं को प्रेम रस में भिगो देने के लिये, और उनसे ही पता चलता है, कि वह दृश्य, वह आनन्द, वह रंग क्या था और कैसा था, जिसमें वे रंगे थे, जिसमें वे लीन हुये थे, जो उनके जीवन का आनन्द था? कैसा था वह रंग बसंती? जिसने ब्रजवासियों को बेसुध कर, असीम आनन्द की उपलब्धि प्रदान की थी। जैसे होली के विभिन्न रंग होते हैं, वैसे ही जीवन के भी विभिन्न रंग होते हैं, जिसमें हर मनुष्य को रंगना ही पड़ता है, इन्हीं रंगों से जीवन में उमंग, उत्साह का संचार होता है।
और ये सभी रंग हैं- सुख, सम्पत्ति, ऐश्वर्य, सुयोग्य पत्नी, पुत्र-पुत्री, धन-वैभव, समृद्धि इन सबकी पूर्णता से जीवन के प्रत्येक रंग को प्राप्त कर लेना। उस एक रंग को प्राप्त कर लेना, जिसे निखिल वन्दे नारायण रंग कहते हैं। उन्हीं सद्गुरू में लीन हो जाना, एकाकार हो जाना, उनके ही रंग में रंग जाना ही तो पूर्णता है। होली पर्व के आगमन के साथ ही प्रकृति स्वयं भी वासन्ती सुगन्ध से सुवासित हो नानाविध रूप से श्रृंगार कर सजने-संवरने लग जाती है? शीत काल के कारण मलिन पड़ गये सौन्दर्य को एक बार फिर से नव-यौवन का रूप देने लगती है, अल्हड़ता से चलती हुई चारों ओर हर्ष और आनन्द का वातावरण उत्पन्न करने लगती है।
फागुन मास का आरम्भ ही कुछ ऐसा है, जिसमें आनन्द व उमंग की अधिकता तो दिखाई पड़ती ही है, क्योंकि ये क्षण तो ऐसे होते हैं, जब हम कुछ देर रूक कर किसी छांव तले सकून का अनुभव करते हैं, कि रंग जायें उसी अमिट रंग में और फिर भूल जायें यह समाज, यह तनाव, समस्यायें, दुःख, परेशानियां। और जब ऐसा क्षण प्राप्त होता है, तो हम वास्तव में भूल जाते हैं, स्वयं को, सिर्फ सामने वाला रह जाता है, ऐसा ही तो होता है ‘प्रेम’ भरे इस उत्सव में। ‘प्रेम’ की तो कोई भाषा होती ही नहीं है और जहां प्रेम रंग छा जाता है, फिर वहां पर कोई और रंग चढ़ता ही नहीं है। होली भी तो प्रेमोत्सव ही है, जब प्रत्येक शिष्य अपने ही गुरू के रंग में रंगा होता है।
इस रंग में रंग जाने के लिये ही हमें प्रेरित करता है, यह होली का पावन त्यौहार, जो समस्त विकारों को दूर कर, स्वयं प्रेम रस में आप्लावित हो जाने का पर्व है। इसीलिये तो मीरा कृष्ण की प्रतीक्षा करती हुई कहती हैं- फागुन मास आ गया है—-और अपने मन को समझाती हैं—-। मेरे मन, अपने स्वयं के रंग को भूल कर होली के अवसर पर कृष्ण के रंग में रंग जा। फिर तो बिना किसी ढोल, नगाड़े के ही अनहद नाद सुनाई देगा। तुम्हे वह ध्वनि सुनाई देगी, जिसे योगी ने अनहद कहा है, पूर्णता कहा है, जो जीवन की श्रेष्ठतम स्थिति है।
इस बार भी तो यही क्रिया होने जा रही परम पूज्य सद्गुरूदेव के सानिध्य में इसलिये आपका आवाहन कर रहे हैं, जहां रंगों की अलमस्ती में डूबना होगा। आनन्द के सरोवर में गोते लेते हुये दिन कब समाप्त हो जायेगा, कुछ एहसास ही न होगा, दिन छोटा लगने लगेगा इसी के साथ ही गुरूदेव साधना के विविध रंग देंगे जिन्हें समाहित कर आप अपने जीवन को पूर्ण रूप से बदल पायेंगे।
गुरूदेव के साथ यह पर्व मनाना ही है, तो फिर अब किसी विचार में पड़ने की आवश्यकता नहीं है, बाधाओं के समक्ष घुटने टेकने की भी आवश्यकता नहीं है। सिर्फ कैलाश सिद्धाश्रम जोधपुर पहुंच जाना है और डुबो देना है खुद को नारायण की मस्ती में।
पूज्य सद्गुरूदेव तो अपने प्रत्येक शिष्य के गृहस्थ जीवन में आनन्द, प्रेम, सुख-समृद्धि के सुन्दर और आकर्षक रंगो की दिव्य शक्तिपात दीक्षा, विशिष्ट साधनाओं द्वारा नारायण रंग में रंगने के लिये हर क्षण तत्पर हैं, और होली का त्यौहार ही मात्र ऐसा पावनतम पर्व है, जो जीवन के विभिन्न रंगों को अपने में समेटे हुये सभी को एक रंग में रंग देने का उत्सव है। जिसे साधनात्मक चैतन्य तपोभूमि कैलाश सिद्धाश्रम में परम पूज्य सद्गुरूदेव, वन्दनीय माता जी और आप सभी योगी तुल्य साधकों के सान्निध्य में जोधपुर में विशिष्ट तांत्रोक्त विधि से सम्पन्न किया जायेगा।
जिस भूमि पर हजारों शक्तिपात दीक्षायें, साधनायें, विशिष्ट अवसरों पर सम्पन्न हुये हैं, जिसकी चैतन्यता से नवीन ऊर्जा का संचार साधक की देह पर स्वयं प्रारम्भ हो जाता है। तांत्रोक्त महाकल्प के तेजमय चेतना से युक्त है ऐसे दिव्य अवसर पर जीवन सभी मलिनता, दूषित विचार, धनहीनता, दुर्बलता से मुक्त होकर नवनिधि की चेतना से आपूरित होता ही है। क्योंकि यह भूमि ही अपने आप में इतनी अधिक ऊर्जावान, चेतनावान है कि जिसके स्पर्श होने पर ही जीवन की तमाम न्यूनताओं की समापन की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है। यही कारण है कि आदि काल से ही ऐसे दिव्य अवसर श्रेष्ठ साधक, शिष्य अपने गुरू के सान्निध्य में साधनात्मक महाकल्प होली पर विशिष्ट साधनाओं, दीक्षाओं को सम्पन्न कर मनोकामनाओं को पूर्ण कर पाते थे।
एक बार फि़र जीवन को उन्हीं दिव्य चेतनाओं से आपूरित करने का यह श्रेष्ठ अवसर सभी शिष्यों, साधकों के जीवन में उत्साह, चंचलता के साथ विविध सप्त रंगों से रंगने का संदेश लेकर यह होली महोत्सव आया है, इस बार आपको यह निश्चय करना ही है कि जीवन की रूग्णता, जड़ता, पशुता, आलस्य, प्रमाद, दरिद्रता, दुःख, कठिनाई, बाधाओं को जड़ से समाप्त करने के लिये सभी अवरोधों को समाप्त कर अपने प्राण-प्रिय गुरूदेव के पास पहुंचना ही है, जीवन का नव निर्माण करने। क्योंकि यही वह अवसर होता है जब पूज्य सद्गुरूदेव शिष्य के जीवन से सभी होलिका और हिरण्याकश्यप रूपी आसुरी शक्तियों का शमन होलाष्टक के चैतन्यता में सम्पन्न करते हैं, और प्रज्ज्वलित होलिकाग्नि के ताप, तेज से जीवन नव निर्माण की ऊर्जा का संचार करते हैं। इस दिव्यतम अवसर पर आपका सपरिवार हृदय से स्वागत है———।
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