





शिव की पूजा केवल देवताओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि शिव की साधना राक्षसों, मनुष्यों, देवताओं और यहां तक कि भगवान राम ने लंका विजय हेतु रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना कर शिव उपासना की, उसके पश्चात् ही महान कार्य पूर्ण किया। शिवलिंग ही परम कारक है, जिसमें सभी दृश्य विलीन हो जाते हैं, शिवलिंग सृष्टि के समस्त प्राणियों का मूल कारण है, शिव-शक्ति स्वरूपों का सम्मेलन ही शिवलिंग है, यह संसार की सृष्टि करने वाली सभी शक्तियों का स्त्रोत है, यह सभी देवगणों का निवास स्थान तथा सारे जीव के होने का कारण है, ब्रह्म से ले कर चरा-चर तक सारी सृष्टि शिवलिंग में ही प्रतिष्ठित है।
शिव पुराण में स्वयं शिव ने कहा है, कि जो साधक शिवलिंग का नियमित पूजन करता है, वह पूर्ण रूप से मेरी शक्तियों को धारण करने के योग्य है, अर्थात् वह पूर्ण रूप से शिवत्व को आत्मसात कर परमगति को प्राप्त करता है। शिव शक्ति के सभी स्वरूपों का सम्मेलन ही शिव लिंग कहा जाता है, शिवलिंग में संसार की सृष्टि करने वाले की पूजा समाहित है, यह शिवलिंग शिवतत्व का गायन और बोधन है जो कि शिव-शक्ति सब कुछ देने में समर्थ है। यह जगत चैतन्य स्वरूप है तो शिवलिंग महा चैतन्यमय। शिवलिंग सकाम बुद्धि द्वारा, अहंकार रहित साधना में साधक की वृत्तियों को, कार्यों को उच्चता तक ले जाने में समर्थ है।
भगवान महादेव अपने उपासक, साधक की हर मनोकामना को पूर्ण करने में किसी प्रकार का संकोच नहीं करते हैं, जिसने पूर्ण भक्ति भाव से शिव स्वरूप शिवलिंग की पूजा सम्पन्न की उसे भगवान शिव ने स्वर्ग तक का वरदान दे दिया। पूरे वर्ष शिव की पूजा साधना करने पर भी वह अभीष्ट फल प्राप्त नहीं होता है, जो कि महाशिवरात्रि कल्प में शिवाभिषेक और साधना करने से प्राप्त होता है।
शुभ्र कान्ति स्वरूप यह रूद्राष्टध्यायी, महामृत्युंजय, अघोर गौरी मंत्रे से चैतन्य शिवलिंग विशेष फलदायक एवं गृहस्थ जीवन के सभी पक्षों को समेटे हुये है। इसका स्वरूप, इसका आकार, इसका दिव्य प्रकाश साधक को अपने आप साधना की ओर प्रवृत्त करता है। स्फटिक कान्ति वाले शिवलिंग का इस शुभ अवसर में पूर्ण विधि-विधान सहित साधना सम्पन्न कर, अपने जीवन के मनोकामनाओं को साकार रूप दे सकते हैं।
स्फ़टिक ज्योतिर्लिंगम् शिवाभिषेक साधना विधान प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर साधक स्नान कर शुद्ध श्वेत वस्त्र धारण करें, अपने पूजा स्थान में पीले ऊनी आसन पर पूर्व की ओर मुंह कर बैठें, अपने सामने स्फटिक ज्योतिर्लिंग स्थापित करें, इसके पश्चात् गुरू ध्यान करें-
अत्यधिक आनन्द को देने वाले, सदैव प्रसन्न रहने वाले, ज्ञान व आत्मज्ञान स्वरूप योगेश्वर, सांसारिक दुखों को दूर करने वाले श्री सद्गुरूदेव का मैं ध्यान करता हूं। तथा श्री सद्गुरू से प्रार्थना करें-
हे सद्गुरूदेव! प्रातः से शाम तक और सांय से प्रातः तक जो भी कार्य करता हूं, वे आपको समर्पित हैं, इसके पश्चात् ज्योतिर्लिंग का निम्न प्रकार से ध्यान करें।
इसके पश्चात् पुष्प समर्पित करें, गंगाजल से स्थान शुद्धि करें, तत्पश्चात् शिवलिंग पूजन प्रारम्भ करें, सर्व प्रथम स्फटिक शिवलिंग को जल से स्नान करायें, इसके पश्चात् दुग्ध, दही, घृत, शहद, शक्कर मिश्रित पंचामृत स्नान तथा पुनः गंगा जल से स्नान करायें, तत्पश्चात् तांबे के दूसरे पात्र में शिवलिंग स्थापित कर वस्त्र तथा यज्ञोपवीत समर्पित करें, इसके पश्चात् कुंकुंम, गुलाल, भस्म तथा चावल, तिल समर्पित करें, सबसे अन्त में बिल्व पत्र समर्पित करें।
‘स्फटिक ज्योतिर्लिंगम् मंत्र’ का पांच माला जप करें, शुद्ध छोटे दानों वाली ‘रूद्राक्ष माला’ से करें प्रत्येक मंत्र जप के साथ एक आचमनी जल जो दूध, दही, घी, शहद, शक्कर मिश्रित हो उससे अभिषेक करते रहें।
इस विशिष्ट मंत्र से शिवाभिषेक द्वारा साधक को जीवन में पूर्ण सफलता एवं सिद्धि प्राप्त होती है। जब मंत्र जप एवं अभिषेक पूर्ण हो जाये, तब पूर्ण विधि-विधान सहित कपूर एवं शुद्ध घी के द्वारा भगवान शिव की आरती करें, और हाथ जोड़ कर प्रार्थना करें –
ऊँ सर्वत्र, ज्ञान विज्ञान-प्रदायक, महात्मने
नमस्ते सर्व देवेश, सर्व-भूत हिते रतः
अनन्त कान्ति सम्पन्न, अनन्तासन संस्थितं
अत्यन्त कान्ति सम्भोग, परमेश, नमोऽस्तुते
सर्वार्थ निर्मलाभोग सर्व व्याधि विनाशन
योगि योगि महा योगि योगीश्वर नमोऽस्तुते।।
शिव आरती के बाद शान्ति पाठ करें-
ऊँ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष (गूं) शान्तिरापः
शान्तिराषधराः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व
(गूं) शान्तिरेधि। ऊँ शान्तिः। शान्तिः।।शान्ति।।।
भगवान शिव के सामने चढ़ाये गये नैवेद्य को पूरे परिवार में वितरित करें।
पश्चात् शिवलिंग तथा रूद्राक्ष माला को किसी स्वच्छ कपड़े में बांध लें, किसी तीर्थ जल में अगले दिन विसर्जित कर दें अथवा गुरु चरणों में समर्पित कर दें।
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