





अर्थात् जैसे दीपक की लौ नित्य ऊपर की ओर जाती है, उसी प्रकार आरती करने वाले भक्त को भी ऊर्ध्वगति प्राप्त होती है। कर्मकाण्ड के क्षेत्र में कई पद्धतियों के पीछे एक धारणा छिपी होती है अथवा प्रतीक रूप में वह नित्य ऐसे दार्शनिक तथ्य का आभास कराती रहती हैं। ऐसे प्रतीकों के नित्य दर्शन से उस भाव की पुनरावृत्ति होती है।
दीपक की निरन्तर ऊंची उठती हुई लौ यह भावना दृढ़ करती है कि जैसे यह ज्योति शिखा चारों ओर रिक्त स्थान होते हुये भी इधर-उधर न जाकर केवल ऊपर को ही जाती है, क्योंकि इस अग्नि का उत्पादक मूल स्त्रोत सूर्य भगवान ऊपर द्यौःलोक में ही विराजमान हैं। अतः यह अग्नि सूर्य की ओर ही सदैव अभिमुख होती है। इसी प्रकार आरती करने वाले साधक भी ईश्वर की शरण में जाते हैं। क्या हवा में थाली घुमाना ही आरती है?
देवताओं की स्तुति के लिये आरती एक विधिवत् क्रिया है। जिस देवता की आरती करनी हो, उस देवता से सम्बन्धित बीज मंत्र का जल पात्र, घण्टी, थाली, कमण्डल आदि पात्रों पर चन्दन, कुंकुंम से अंकन करना चाहिये। आरती करते समय भी अपने ईष्ट देव, गुरू को प्रसन्न करने के लिये सम्बन्धित बीज मंत्रों अथवा ऊँ का अंकन करना, आरती के थाल को ऊँ आकृति के अनुरूप घुमाना चाहिये। अलग अलग देवताओं के बीज आकृति के अनुरूप आरती घुमाने का विधान है। जैसे दुर्गा आरती में नौ बार आवर्तन होना चाहिये। गणेश चतुर्थी तिथि के अधिष्ठाता होने से गणेश का 4 बार आवर्तन होना चाहिये। रूद्र एकादश अथवा शिव चतुर्दशी तिथि के अधिष्ठाता हैं इसलिये 11 या 14 आवर्तन होने चाहिये। इसी प्रकार सभी देवताओं का अलग अलग आवर्तन करने का विधान है।
यदि संख्या का ज्ञान न हो, तो ऊँ प्रणवाक्षर के अनुरूप हर प्रकार की आरती में 7 बार आवर्तन करना पर्याप्त माना गया है, जिसमें चार बार चरणों में, एक बार नाभि में और दो बार मुखमण्डल का आवर्तन किया जाता है। गुरू साक्षात् शिव रूप होते हैं, इसलिये सद्गुरूदेव की आरती में 11 अथवा 14 बार आवर्तन करना चाहिये।
साधाना प्रारम्भ पूर्व संकल्प क्यों लें?
व्रत, उपवास, अनुष्ठान, साधना सभी धार्मिक अनुष्ठान संकल्प जन्य हैं। साधनाओं में निरंतरता की अति आवश्यकता होती है, इसलिये संकल्प लेना अनिवार्य होता है। जब साधक संकल्प द्वारा कोई प्रतिज्ञा करता है, तो उसके कहे गये शब्दों का उसके मन, विचार पर असर पड़ता है और वह दृढ़ता से स्वयं साधना की पूर्णता की ओर बढ़ने के लिये क्रियाशील रहता हैं। साथ ही उसे साधना में उत्पन्न विघ्न, बाधाओं से जूझने की चेतना प्राप्त होती है। इस प्रकार वह साधना पूर्ण होता है। संकल्प लेने के पश्चात् साधक अपने इष्ट अथवा सद्गुरू से वचनबद्ध हो जाता है। जिसे पूर्ण करना उसका प्रथम कर्तव्य है। किसी भी परिस्थिति में साधक को अपना संकल्प नहीं छोड़ना चाहिये। बार बार संकल्प लेकर छोड़ने वाले साधक की गरिमा समाप्त हो जाती है और उनके ईष्ट का भरोसा उन पर नहीं रह जाता है।
जिससे वे साधना का उचित फल नहीं प्राप्त कर पाते। यदि किसी विकट परिस्थितिवश साधना बीच में अवरूद्ध करनी पडे़ तो पुनः जल लेकर अपने संकल्प का विसर्जन अपने गुरूदेव के श्री चरणों में ईष्ट मंत्र अथवा गुरू मंत्र का 108 बार या 4 माला मंत्र जप कर करना चाहिये।
वेद शास्त्रों में हाथ में जल लेकर संकल्प करने का विधान इसलिये है, क्योंकि जल में वरूण का निवास है और उनके साक्ष्य में की गयी प्रतिज्ञा का निर्वाह न करने पर वरूणदेव प्रसन्न होकर साधक को अभीष्ट फल देते हैं। जल, वायु, अग्नि ये प्रत्यक्ष देवता हैं, जो अनुभूत हैं, जिन्हें देखा या स्पर्श किया जा सकता है। इसलिये इन प्रत्यक्ष देवों को साक्षी मानकर संकल्प लिया जाता है। जो सर्वत्र उपस्थित होकर साधक के संकल्प को पूर्ण करने में सहायक होते हैं,
सोते समय दक्षिण की ओर पांव नहीं करना चाहिये यह बात गांवो में स्त्रियां भी एक धार्मिक मत के रूप में पालन करती हैं, यह अवश्य हो सकता है, कि इसके पीछे कारण से वे अनभिज्ञ हों। आज से कई हजार वर्ष पूर्व ऋषियों ने यह बता दिया था, कि जिस प्रकार समस्त सौर-जगत (पृथ्वी, मंगलादि) सूर्य के आकर्षण पर सुस्थिर है, ठीक उसी प्रकार सूर्य भी ध्रुव नामक महापिण्ड के आकर्षण पर आधारित है सूर्य इसी आकर्षण के अन्तर्गत एक जगह स्थिर न रहकर समस्त सौर जगत को अपने साथ लिये बराबर गतिशील है। वह ध्रुव पृथ्वी के सापेक्ष उत्तर दिशा में स्थित है।
इसलिये यदि कोई व्यक्ति दक्षिण दिशा की ओर पांव व उत्तर की ओर मस्तक रख कर सोयेगा, तो ध्रुवाकर्षण से पेट में पड़े भोजन का अनुपयोगी अंश जो मल रूप में नीचे की ओर गतिशील होना चाहिये, वह ऊपर की ओर गतिशील होगा। इससे हृदय, फेफडे़ और मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है, स्वास्थ्य क्षीण होता है, मन दूषित होता है, बुरे स्वप्न आते हैं, दैत्य प्रवृत्ति उसमें बढ़ने लगती है। और व्यक्ति चेतना, ऊर्जा भी क्षीण हो जाती है।
वर्तमान में सिद्धाश्रम साधक परिवार के सभी सदस्य सूर्य ग्रहण के महत्व से परिचित हैं, लेकिन अधिकांश साधक ऐसे तेजमय चैतन्य अवसर पर सिर्फ साधना सम्पन्न करना ही पूर्णता समझ लेते हैं, जबकि यही वह अवसर है जब साधक विशिष्ट शक्तिपात दीक्षाओं की तेजस्वी चेतना को अपने रोम-रोम में अक्षुण्ण रूप से स्थापित कर सकता है, जिसकी चेतना जीवन भर जाग्रत रहती है, इसीलिये परम पूज्य सद्गुरूदेव ग्रहण काल में व्यक्तिगत रूप से और मानस चेतना टैलीपैथी द्वारा प्रातः 07:27 से 08:46 तक दीक्षा प्रदान करेंगे। साधक दीक्षा और साधना ग्रहण काल में ही सम्पन्न कर श्रेष्ठतम सफ़लता अर्जित करने में सफ़ल हो सकेंगे।
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