





महाकाल उज्जैन का प्रधान मन्दिर है। महाकाल वन में बहुसंख्य शिवलिंग माने जाते हैं। उनमें से øþ मुख्यलिंग हैं और वे अवन्तिका के विभिन्न स्थानों में स्थित हैं। उज्जैन में क्षिप्रा नदी बहती है, जो अत्यन्त पवित्र मानी जाती है। इस नदी को पापनाशिनी के नाम से भी पुकारा गया है। क्षिप्रा-स्नान से पाप नष्ट हो जाते है। इसमें स्नान करने का पुण्य सब नदियों से बढ़कर है। भू-मण्डल पर मनुष्य के पाप को दूर करना ही कुम्भ की उत्पत्ति का हेतु है। जो पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ क्षिप्रा नदी में स्नान करता है वह शिव स्वरूप हो जाता है।
‘जिस समय सूर्य मेष राशि पर हो और बृहस्पति सिंह राशि पर हो तो उस समय उज्जैन में कुम्भ-योग होता है। जो सब प्रकार के सुखों की वृद्धि करता है।’ कुम्भ का पर्व हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक-इन चार तीर्थ स्थानों में मनाया जाता है। ये चारों ही परम पवित्र तीर्थ हैं। बृहस्पति के सिंह राशि में होने पर क्षिप्रा स्नान का बहुत महत्त्व माना गया है।
‘जो मनुष्य कुम्भ-योग में स्नान करता है, वह अमृतत्व (मुक्ति) प्राप्त करता है। जिस प्रकार दरिद्र मनुष्य धनवान व्यक्ति का नम्रता से अभिवादन करता है, उसी प्रकार कुम्भपर्व में स्नान करने वाले मनुष्य को देवगण नमस्कार करते हैं।’
एक बार देवता और दानवों ने रत्न की प्राप्ति के लिये समुद्र का मन्थन किया था। सुमेरू पर्वत की मथानी तथा शेषनाग की रस्सी बनाई गई थी। क्षीरसागर के मन्थन से चौदह रत्न निकले। उनमें अमृत से भरा कुम्भ भी निकला था। उस कुम्भ के लिये देवता और दानवों में छीना-झपटी हुई।
अमृत-कुंम्भ क्रम से सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति तथा अन्य ग्रहों के हाथ में जाता रहा। अन्त में इन्द्र का पुत्र जयन्त उसे देवलोक में ले गया। छीना-झपटी में अमृत की बूंद नासिक, उज्जैन, प्रयाग और हरिद्वार इन चारों स्थानों पर गिरी। इस प्रकार कुम्भ को अपने पास रखने वाले ग्रहों की स्थिति विशेष पर उक्त चार स्थानों पर यह कुम्भ पर्व मनाया जाता है।
ईश्वर ने पार्वती देवी को कहा – इस पृथ्वी लोक में कई पुण्य क्षेत्र हैं। उनमें महाकाल क्षेत्र सर्वश्रेष्ठ है। यहाँ पाप का क्षय होने से इसे क्षेत्र करते हैं। यहाँ मातृ का स्थान होने से इसे पीठ कहते हैं। यहाँ मरने पर पुनर्जन्म नहीं होता हैं इसलिये यह ऊषर क्षेत्र कहलाता है। भगवान् रूद्र को दश श्मशान प्रिय हैं- एकाम्रक, भद्रकाल, करवीर, कोलागिरि, काशी, प्रयाग, अमरेश्वर, भरथ, केदार और रूद्र महालय। तीनों लोकों में कुरूक्षेत्र उत्तम है। कुरूक्षेत्र से दस गुनी काशी और उससे दस गुणा महाकाल वन का माहात्म्य है। श्मशान, ऊषर, क्षेत्र, शक्तिपीठ और वन ये पाँचों चीजें केवल अवन्तिका में ही एक स्थान पर उपलब्ध हैं।
जहां महाकाल है, क्षिप्रा नदी है और सुनिर्मल गति मिलती है, उस उज्जयिनी में रहना किसको अच्छा नहीं लगेगा। महानदी क्षिप्रा में स्नान करना जो कठिनाईयों से मिलता है तथा महाकाल को नमस्कार कर लेने पर फिर मृत्यु की कोई चिन्ता नहीं रहती। कीट या पतंग भी मरने पर रूद्र का अनुचर होता है।
उज्जयिनी में प्राणी मर कर शव होने पर भी न तो दुर्गन्ध को प्राप्त होता है और न सड़ता ही है। वहां पर भी यमदूत प्रवेश नहीं करते और वहां पर करोड़ों शिव पग-पग पर वर्तमान हैं। एक ही ज्योर्तिलिंग हाटकेश, महाकाल और तारकेश्वर- इन तीनों रूपों में त्रैलोक्य में व्याप्त होकर स्थित है। जो द्विजातिगण इस उज्जयिनी सिद्धवट में ज्योतिः स्वरूप ज्योर्तिलिंग अथवा श्रीमहाकालेश्वर के दर्शन करते हैं, वे पुण्य राशि परं ज्योति को देख लेते हैं। संसार के जिन दिन-दुःखियों ने कभी भी महाकालेश्वर के लिंग का दर्शन किया उन्हें न तो महापाप छूते हैं और न यमदूतगण ही सताते हैं। महाकाल, महाकाल, महाकाल इस प्रकार सर्वदा स्मरण करने वाले को कामदेव के पिता (विष्णु) और शत्रु (शिव) ये दोनों स्मरण करते रहते हैं।
अवन्ती के प्रत्येक कल्प में भिन्न-भिन्न नाम होते हैं। यथा-कनकश्रृंगा, कुशस्थली, अवन्तिका, पद्मावती, कुमुद्वती, उज्जयिनी, विशाला और अमरावती। जो मनुष्य क्षिप्रा नदी में स्नान करके भगवान महेश्वर की पूजन करता है, वह महादेव और महादेवी की कृपा से सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण कर लेता है। क्षिप्रा नदी सर्वत्र पुण्यदायिनी, अतिशय पवित्र तथा पापहारिणी है।
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