





सृष्टि का नियम है कि संसार में जो भी वस्तु उत्पन्न होती है उसका क्षय अर्थात् अंत अवश्य होता है, कुछ भी स्थायी नहीं हैं, इसी कारण प्रकृति में निरन्तर उत्पत्ति, निर्माण और विखण्डन की क्रियायें गतिशील रहती है। यही जगत के प्रमुख देव ब्रह्मा, विष्णु, महेश का कार्य हैं।
हर कोई जानता है कि नवरात्रि शक्ति साधना पर्व है। दीपावली लक्ष्मी साधना का पर्व है। होली आनन्द का पर्व है। शिवरात्रि शिव-पूजन का पर्व है। लेकिन अक्षय तृतीया के सम्बन्ध में बहुत कम जानकारी है। लोक जीवन में इस पर्व को मंगल पर्व के रूप में मनाया जाता है। आखिर ऐसा क्या है? अक्षय तृतीया के महान पर्व में जिसकी मान्यता पूरे भारत वर्ष में अलग-अलग रूपों में है। कश्मीर से कन्या कुमारी तक और गुजरात से बंगाल तक लोक जीवन में इसका विशेष महत्व हैं।
होली का उमंग भरा पर्व और नवरात्रि का चैतन्यता से भरा काल बीत जाने के बाद आ जाती है ग्रीष्म की कड़ी ऋतु, ज्यों शैशव और यौवन का आनन्द बीत जाने के बाद गृहस्थ की कर्मठ भूमि साधक के जीवन में आ जाती है। इस तपन में झुलसन नहीं है, जीवन की एक अलग शैली है जो आवश्यक भी है। दूध से भरे अन्न कण कुछ कड़ी धूप पाकर ही रसमय होते है, और फिर सुनहरे स्वर्ण कणों में बदल कर ही साक्षात् लक्ष्मी का ही आगमन प्रकट करते हैं।
यह माह होता है वैसाख का जब धूप में भी तपन थोड़ी बढ़ जाती है और दिन हल्के से बोझिल हो जाते हैं तभी फिर से जीवन में नूतनता का संचार करता हुआ आता है अक्षय तृतीया का पर्व। अक्षय यानी कि जिसका क्षय न हो, जो चिर स्थायी हो, नित नूतन हो, नित यौवन से भरा हो, तपन से भरे हुये दिनों में यह मां भगवती अन्नपूर्णा के स्वागत का ही एक अवसर है, यही फसल कटने का समय भी है और घर में धन-सम्पदा आने का भी। जो लक्ष्मी सैकड़ों-सैकड़ों दानों में खनकती हुई घर में ऐश्वर्य और लावण्य बिखेरती हुई आती है, यह उन्हीं के स्वागत का पर्व है, यह उन्हीं को चिरस्थायित्व भी देने का पर्व है, यह उन्हीं को अक्षय कर लेने का पर्व है।
इसे नवान्न पर्व भी कहा जाता है। यही भगवान विष्णु के हयग्रीव अवतरण का भी दिवस है और प्रखर परशुराम के जयन्ती का दिवस भी। मां भगवती पार्वती का भी पूजन इस दिवस पर किया जाता है और यदि तृतीया में चतुर्थी विद्ध हो जाये तो गणपति साधना का अनुपम अवसर उपलब्ध होता है।
समय के अनुसार सब कुछ चलता है तो अच्छा लगता है, लेकिन समय से पहले किसी वस्तु का क्षय होना दुःख दायी कहा जाता है। यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में बाल्यावस्था या युवावस्था में ही मृत्यु का शिकार हो जाता है तो सभी को दुःख होता है। और यदि वही व्यक्ति अपने जीवन के सत्तर-अस्सी वर्ष की आयु प्राप्त कर कालगति को प्राप्त होता है तो दुःख नहीं होता हैं। दोनों ही स्थितियों में व्यक्ति मृत्यु का शिकार हुआ हैं लेकिन एक में दुःख है और दूसरे में शान्ति हैं। इसी प्रकार व्यापार में धीरे-धीरे प्रगति होती है तो व्यक्ति प्रसन्न होता है, तीव्रता से प्रगति होती है और भी अधिक प्रसन्न होता है लेकिन यदि व्यापार में एकाएक घाटा लग जाय, तो जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।
शनैः शनैः प्रगति अथवा शनैः शनैः क्षय के लिये हर व्यक्ति अपने आप को तैयार कर लेता है। लेकिन आकस्मिक चढाव अथवा उतार के लिये व्यक्ति मानसिक रूप से तैयार हो नहीं पाता। जीवन में प्राप्त लक्ष्मी का क्षय नहीं हो और उसमें निरन्तर वृद्धि होती रहे। क्षय को रोककर अक्षय की और प्रवृत्त होना ही तो पुरूषार्थ है। काल की गति के अनुसार सभी अपनी जीवन यात्रा में विचरण कर रहे है, लेकिन काल की गति के विरूद्ध विचरण किया जा सकता हैं।
प्रत्येक व्यक्ति की यही इच्छा होती रहती है, कि उसके पास लक्ष्मी का स्थायी आवास हो, और उसे किसी प्रकार से आर्थिक दृष्टि से पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो, लक्ष्मी का तात्पर्य केवल धन ही नहीं है, यह तो लक्ष्मी का एक अत्यन्त छोटा सा रूप है, लक्ष्मी के लिए एक गुण तो बहुत ही लघु पड़ जायेगा, महाकाव्यों में, आदि ग्रन्थों में लक्ष्मी के विभिन्न स्वरूपों का, विभिन्न नामों जो वर्णन आया है, उसे पूर्ण रूप से प्राप्त करना ही सही रूप में लक्ष्मी को प्राप्त करना है।
लक्ष्मी का तात्पर्य है- सौभाग्य, समृद्धि, धन-दौलत, अच्छी किस्मत, सफलता, सम्पन्नता, प्रियता, लावण्य, आभा, कान्ति तथा राजकीय शक्ति-ये सब लक्ष्मी के स्वरूप हैं, और इन्हीं गुणों के कारण भगवान विष्णु ने भी लक्ष्मी को अपनी पत्नी बनाया, जब इन सब गुणों का समावेश होता है, और जो इनको प्राप्त कर लेता है, वही वास्तविक रूप से लक्ष्मीपति है।
अक्षय तृतीया में सबसे बड़ा गुण यह है कि पूरे वर्ष में कोई भी तिथि क्षय हो सकती है लेकिन यह तिथि अर्थात् वैशाख शुक्ल पक्ष की यह तृतीया कभी भी क्षय नहीं होती। यह पूर्णता के साथ आती है, कई बार नवरात्रि में तिथि क्षय हो जाती है, दीपावली, अमावस्या के स्थान पर चर्तुदशी को सम्पन्न करनी पड़ती है, लेकिन अक्षय तृतीया की तिथि कभी भी क्षय नहीं होती। यह सौभाग्य सिद्धि दिवस है। अक्षय तृतीया लक्ष्मी सिद्धि दिवस है, इस कारण लक्ष्मी सम्बन्धित साधनायें विशेष रूप से की जाती है।
मनुष्य प्रत्येक शुभ कार्य मुहूर्त इत्यादि देखकर करता है, लेकिन अक्षय तृतीया ऐसा पर्व है जिस दिनगृह निर्माण शुभारंभ, विवाह, विदेश यात्रा, नया व्यापार प्रारम्भ करने के लिए सर्वाधिक श्रेष्ठ सिद्ध पर्व है इस दिन किसी भी प्रकार की साधना प्रारम्भ की जाती है, नया कार्य प्रारम्भ किया जा सकता है, यहां तक यक्षिणी, अप्सरा और कमला साधना के लिए भी यह शुभ मुहूर्त दिवस है। उपयुक्त वर अथवा वधु की प्राप्ति के लिए और विवाह बाधा दोष निवारण के लिए भी यह श्रेष्ठ पर्व है।
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