





तंत्र महार्णव ग्रंथ के इस श्लोक में तंत्र की पूर्ण व्याख्या की गई है। मैं तो एक श्लोक लेता हूं और उस एक श्लोक की व्याख्या करता हूं। पूरे ग्रंथ में तो सैकड़ों, हजारों श्लोक होते हैं और एक-एक श्लोक की व्याख्या अपने आप में एक सम्पूर्ण अर्थ होती है, एक-एक, दो-दो घंटे का प्रवचन लिये होती है। तंत्र महार्णव अपने आप में एक अद्वितीय ग्रंथ है। तंत्र का अर्थ है किसी भी कार्य को अत्यंत व्यवस्थित तरीके से करने की क्रिया, तंत्र का मतलब इतना ही है। हम प्रजातंत्र में जीवित हैं, सन् 1947 से हम तंत्र मय हैं। तो क्या हम कहीं खराब हो गये? पहले राजतंत्र चलता था, अब हम स्वतंत्र हैं।
तंत्र कहां खत्म हुआ? या तो आप गुलाम रहिये या स्वतंत्र बनिये और जहां तंत्र है और स्वतंत्र हैं तो इसका अर्थ है अपने आपको पूर्णता के साथ समझने की क्रिया-पूर्णता के साथ, इसलिये स्वतंत्र शब्द बना। एक काम व्यवस्थित तरीके से भी हो सकता है और यह भी हो सकता है कि आप शिविर में आये तो कोई लेटा हुआ है, कोई खड़ा है, मैं प्रवचन कर रहा हूं और आप बोल रहे हैं, बात कर रहे हैं, कोई मूंगफली चबा रहा है। परन्तु यदि आप पूर्ण एकाग्रचित होकर बैठें तो यह तंत्र का तरीका है। इसलिये तुम्हारे मानस में अगर यह है कि तंत्र में तो अघोरी होते हैं, लाल आंखें होती है, शराब होती है, शराब पीते हैं और पंचमकार होते हैं तो आपका यह चिंतन बेसलैस, निराधार है। पूरे तांत्रिक ग्रंथों में कहीं पर भी इन सब चीजों का उल्लेख नहीं है और शायद जितना मैंने तंत्र का अध्ययन किया है, उतना पृथ्वी पर किसी ने तंत्र का अध्ययन किया ही नहीं।
यह तो गोरखनाथ के बाद में कुछ मक्कार, ढोंगी और पाखंडी लोगों ने जिनको ज्ञान तो था नहीं, उन्होंने ये तंत्र के विषय में भ्रांतियां समाज में फैला दीं। वे केवल लोगों को डरा धमका कर पैसा लूटना चाहते थे। जब सीधे सादे तरीके से हाथ जोड़कर कुछ नहीं मिला और जब उनमें ज्ञान नहीं रहा तो उन ढोंगी साधुओं ने डराना शुरू कर दिया। सुलफा पीना शुरू कर दिया, आदत पड़ गई। अब सुलफा पीने से अगर कोई महान् बनता है तो सुलफा पीने वाले और बीड़ी पीने वाले तो हजारों हैं। इसका मतलब तो सभी उच्च कोटि के तांत्रिक हैं जो चैन स्मोकर है। फिर तो एक शराबी अपने आप में सबसे बड़ा तांत्रिक हो जायेगा। उन ढोंगियों ने एक फर्जी श्लोक बना दिया –
तांत्रिक वही हो सकता है जो इनका प्रयोग करे। उन्होंने एक झूठा श्लोक बना दिया, एक परिपाटी बनायी। उन्होंने कहा तांत्रिक होने के लिये जरूरी है कि शराब पीयें, मांस खाये, मत्स्य-मछली खायें, मुद्रा-पैसा एकत्रित करें और मौज करें, मैथुन-पर स्त्री गमन करें। जो पांच मकारों की साधना कर लेता है वह तांत्रिक है। उन्होंने यह झूठी परिपाटी बनाई और वे सुलफा पीते थे। सुलफा पीने से आंखें लाल तो होंगी ही। लाल आंखें होंगी, शराब पीये होगा तो गालियां निकलेंगी ही मुंह से। उन्होंने गालियां निकालीं और आपने हाथ जोड़ना शुरू कर दिये कि ये बहुत पहुंचे हुये साधु हैं। जिनके मुंह से गालियां निकलती हैं, वह बहुत उच्चकोटि का साधु हो जाता है। वे चिल्लाते, गालियां देते और आप हाथ जोड़ कर सामने खड़े हो जाते। वह कहता-जा यह ला मेरे लिये, एक धोती ला और आप सोचते कि यह तांत्रिक कोई श्राप दे देगा, मेरे बेटे को मार देगा, चलो एक धोती दे दो। और फिर वह कहता-चल अब पांच सौ रूपये लाकर दे। वरना नाश कर देंगे तुम्हारा। जो धोती मांग कर पहनता है वह क्या तांत्रिक बनेगा, दूसरों का क्या कल्याण करेगा? जिसमें एक धोती कमाने की क्षमता नहीं है। वह क्या तुम्हारा कल्याण करेगा? जिसमें पांच सौ रूपये कमाने की क्षमता नहीं है, जो भीख मांग रहा है तुमसे, वह तुम्हारा गुरु क्या बन सकेगा? कहां से तांत्रिक बन सकेगा? कौन सा ज्ञान दे सकेगा? उससे कहां घबराने की जरूरत है? कोई तांत्रिक आपके सामने आंख निकाल कर खड़ा हो तो तुम खुद आंख निकाल कर सामने खड़े हो जाओ। एक सेकेण्ड में उसकी आंख नीची हो जायेगी। तुम्हारी आंख से आंख मिलाने की हिम्मत ऐसे तांत्रिक में हो ही नहीं सकती क्योंकि तुम मेरे शिष्य हो, मेरा शिष्य अपने आप में अद्वितीय है। इन पाखण्डियों से घबराने की जरूरत नहीं है। वे तुम्हारा कुछ अहित नहीं कर सकते, अहित करने की क्षमता है ही नहीं, वरदान देने की क्षमता भी उनमें नहीं हैं।
तंत्र के विषय में आपको ज्ञान देने से पूर्व मैं आपको यह एक बात समझा रहा था। यह अलग बात है कि उसकी पद्धति अलग है। पद्धति तो प्रत्येक संप्रदाय की अलग-अलग है। शैव पद्धति अलग है, वैष्णव पद्धति अलग है, शाक्त पद्धति अलग है, भैरव साधना पद्धति अलग है। पद्धति का केवल रूप भिन्न है, मूल में तो तंत्र का वह ज्ञान एक ही है। एक ही बेसन से पच्चीस तरह की मिठाईयां बनती हैं, इतनी अलग-अलग मिठाइयां हैं। मगर मूल में तो वही बेसन है। चीजें अवश्य पच्चीस अलग दिखाई देती हैं। मूल रूप से सब एक ही चीज है। आप किसी भी पद्धति का आसरा लें, चाहे शाक्त पद्धति का अथवा वैष्णव पद्धति का आसरा लें। गृहस्थ भी तंत्र पद्धति का आसरा लेता है तो कहीं दोष है ही नहीं, कोई नुकसान नहीं हो सकता। तुम्हारे मन में कई बार प्रश्न आते हैं और फिर पत्र आते हैं कि गुरु जी मैं ऐसा कर रहा हूं और तांत्रिक पद्धति से कर रहा हूं कहीं कुछ विपरीत हो गया तो क्या होगा? विपरीत हो ही नहीं सकता।
यह हो सकता है कि तुम सही नहीं करो तो फल नहीं मिल पायेगा। मैं किसी देवता को आवाज दूं, तो यह हो सकता है कि वह आये नहीं मगर ऐसा तो नहीं हो सकता कि वह आये और मेरा गला काट दे। तंत्र अपने आप में आत्म बल जाग्रत करने और स्वतंत्र होने की पद्धति है। स्वतंत्र होने का अर्थ है कि यदि व्यक्ति को ब्रह्म कहा है तो मैं ब्रह्म हूं फिर यह मैं सिद्ध करके दिखाऊं। केवल कहने से कि मैं बहादुर हूं, आप बहादुर बन नहीं सकते। केवल बातें करने से तुम्हारी बहादुरी नहीं दिखाई दे सकती। क्षमता, संकल्प शक्ति, दृढ़ता, चेहरे पर एक ओज तुम्हारा पौरूष, तुम्हारा वक्षस्थल अपने आप इस बात को बता देगा कि तुम मर्द आदमी हो। तुम्हारी आवाज इस बात की चेतना दे देगी कि तुममें क्षमता है- बोलने की भी, करने की भी और संकल्प शक्ति की भी।
तंत्र अपने आप में पूर्ण निष्ठा के साथ, ताकत के साथ, बल पूर्वक कोई कार्य करने की एक क्रिया है। जब मैं बलपूर्वक शब्द प्रयोग कर रहा हूं तो मैंने कहा कि जीवन में भाग्य लिपि बदलने के लिये, अपनी भी तथा दूसरों की भी, एक क्षमता चाहिये। आप खुद जब मजबूत बनेंगे, हिम्मतवान बनेंगे तो ही ऐसा कर पायेंगे। मगर हिम्मतवान बनें साधनात्मक पद्धति से—! कोई दंड बैठक करने से नहीं बन सकते। कोई बहुत ज्यादा पहलवानी करने से महान नहीं बन सकते।
गामा पहलवान पूरे भारत में मशहूर था, उसने सैकड़ों लड़ाइयां लड़ीं, मगर बुढ़ापे में उसकी हालत यह थी कि वह खड़ा नहीं हो पा रहा था। उसको कोई रोग नहीं था, बीमारी नहीं थी। बस शरीर में ताकत नहीं थी और वह एक नाली में गिरकर समाप्त हो गया क्योंकि उसमें संकल्प शक्ति थी नहीं। जब तक उसकी दंड बैठक चलती रही तब तक शरीर साथ देता रहा। जब संकल्प शक्ति खत्म हो गई उसके बाद पाव भर दूध पचाने की हिम्मत नहीं रही। नाली में गिरा तो बाहर निकलने तक की हिम्मत नहीं थी और वहीं वह समाप्त हो गया।
इसलिये बिना दैवीय सहायता के मनुष्य अपनी भाग्य लिपि और दूसरों की भाग्य लिपि को नहीं बदल सकता। और यह दैवीय सहायता, देवताओं की सहायता चाहे जगदम्बा हो, चाहे भैरव हो, चाहे भवानी हो, चाहे षोड़शी हो, चाहे त्रिपुर सुंदरी हो। प्राप्त करने की पद्धति तंत्रात्मक भी है और मंत्रात्मक भी है। पर तंत्र के माध्यम से काम होता ही होता है, वह फिर रूक नहीं सकता, संभव नहीं है। परन्तु उसके लिये आपको क्षमतावान होना पड़ेगा, ताकतवान होना पड़ेगा। कमजोर और कायरों के साथ तंत्र नहीं चल सकता और कमजोर और कायर की परिभाषा मैंने तुम्हें गामा का उदाहरण देकर समझाया है कि बहुत मोटा ताजा होने से ही कोई बहुत ताकतवान नहीं होता। गांधी जी तो बहुत दुबले-पतले थे, बयालिस किलो के आदमी थे और उन्होंने हजारों, करोड़ों लोगों को पीछे खड़ा कर दिया। अंग्रेजो से लोहा लिया और अंग्रेजों को हरा दिया। कोई वजन ही नहीं था शरीर में। एक हड्डियों का ढांचा था, बिना लाठी के चल नहीं पा रहे थे, पर संकल्प शक्ति दृढ़ थी, आस्थावान थे, एक चेतनावान थे। हम चाहे तंत्र साधना करें या मंत्र साधना करें या तो हम गिड़गिड़ाते हुये करें, हाथ जोड़ते हुये करें, जैसा आज तक करते आये हैं या फिर दृढ़ता और संकल्प शक्ति के साथ करें।
आपने शायद यजुर्वेद के मंत्रों को पढ़ा नहीं। पढ़ा तो अर्थ समझा नहीं। यजुर्वेद में कोई बहुत महान घटनायें छिपी नहीं हैं। कोई ऐसा अजूबा नहीं है यजुर्वेद, अथर्ववेद और ऋग्वेद। उसमें कहा है- हे इंद्र! तू मेरे खेतों में वर्षा कर तो मेरे धान बहुत पैदा हो। उन्होंने देवताओं से एक याचना की। हे अग्निदेव! तू मेरा ऐसा कार्य कर, हे पवन! तू मेरी ऐसी सहायता कर। हे यम! तू मुझे मृत्यु से बचा। उन आर्यों ने भी उन देवताओं की सहायता ली। जिन शब्दों से उनका सहयोग लिया उनको मंत्र कहा गया। आपकी जेब में अगर पांच हजार रूपये हैं और जब पांच हजार रूपये हैं तो पांच रूपये की आपके लिये कोई वैल्यू नहीं है। पांच रूपये तो आपके लिये बहुत छोटी सी चीज है और भिखारी गिड़गिड़ाता हुआ आता है, हाथ जोड़ता है कि आप बहुत दयालु हैं, दानी हैं, कर्ण हैं मैं तीन दिन से भूखा हूं मेरा बच्चा बीमार है, आप मुझे पांच रूपये दे दीजिये।
अब कोई ठेका थोड़े ही है कि आप पांच रूपये दे ही देंगे। उसके लिये पांच रूपये बहुत जरूरी हैं क्योंकि जरूरत है उसको क्योंकि उसे रोटी खानी है। उसके जीवन का यह अभाव है। हो सकता है गिड़गिड़ाने पर आप उसे पांच रूपये न दें, मगर वह अगर आपका गला पकड़ ले, तो आप कहेंगे- यह ले पांच रूपये और जान छोड़ मेरी। यह दूसरा जो तरीका है, वह तंत्र है। तंत्र का अर्थ है देवताओं को बाध्य कर देना, विवश कर देना कि वे आपकी इच्छा पूर्ण करें, जो आप मांगे वह दें। मगर गलत चीज के लिये आप देवताओं को बाध्य नहीं कर सकते और गलत उद्देश्यो के लिये तंत्र का प्रयोग भी नहीं कर सकते। करेंगे तो कोई रिजल्ट आपको नहीं मिलेगा। मगर सही उद्देश्यो के लिये यदि तंत्र का प्रयोग करते हैं तो निश्चय ही प्रभाव पड़ता ही है इसमें दो राय नहीं।
और आज के जीवन में तंत्र जरूरी भी है। क्यों जरूरी है? क्योंकि आज के आपा-धापी के युग में साधक दस घंटे रोज बैठकर मंत्र जप और साधना नहीं कर सकता। जीवन में भाग दौड़ है जिनके कारण व्यक्ति सब कुछ छोड़ कर लम्बी साधनायें नहीं कर सकता मगर फिर क्या कोई ऐसे उपाय हैं तंत्र में, जिनके माध्यम से वह अपने पूरे जीवन को आनन्दायक बना सकता है। और इसके लिये में तंत्र महार्णव बताया है कि पांच ऐसे प्रयोग हैं जिनके माध्यम से जीवन में पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। पहला है सम्मोहन प्रयोग- सम्मोहन का अर्थ है, हम किसी को भी अपने अनुकूल बना सकें। ऑफिसर हो, लाल आंखें किये हुये हो और यदि आप में सम्मोहन का ज्ञान है तो वह आप से आंख से आंख मिलाकर आपके सामने नहीं खड़ा हो सकता फिर, यह संभव नहीं है। सम्मोहन का तात्पर्य है किसी को अपने अनुकूल बना लेना। किसी को अपने अनुकूल बना लेने की क्रिया को सम्मोहन कहते हैं।
और वशीकरण है किसी को भी अपने वश में कर लेने की क्रिया। जहां किसी को भी शब्द का प्रयोग किया है वहा अर्थ है कि हर किसी को वशीकरण किया जा सकता है, चाहे कोई देवता भी है या जगदंबा है। हमें उसे भी अपने वश में करने की क्रिया करनी है। हमें उसे भी अपने अनुकूल बनाना है। अगर हममें संकल्प शक्ति है तो उसे हमारे सामने खड़ा होना पड़ेगा। वह देवता है, कोई अजूबा नहीं है। अगर वे देवता है तो हम मनुष्य हैं। उनकी योनि अलग है, हमारी योनि अलग है। बात इतनी सी है। यह बात है कि उनके पास हजार रूपये हैं और हमारी जेब में पांच रूपये भी नहीं हैं। हजार रूपये में से पांच रूपये देने से उनको कोई फर्क पड़ेगा नहीं। हमें उन पांच रूपयों की जरूरत है। तो देवताओं का भी वशीकरण करके बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है तो शत्रुओं का भी किया जा सकता है, किसी जज का किया जा सकता है, वकील का किया जा कसता है, प्रेमी का किया जा सकता है, प्रेमिका का किया जा सकता है और गुरु का भी किया जा सकता है!
वशीकरण का तात्पर्य है कि हम प्रतिकूल परिस्थितियों को अपने वश में कर सकें। जीवन में तो प्रतिकूल परिस्थितियां आयेंगी ही, आती ही हैं। इसलिये तांत्रिकों ने एक साधना रखी वशीकरण कि हम परिस्थिति को ही अपने वश में कर लें। परन्तु किसी को व्यर्थ तंग करने या फिर किसी को हानि पहुंचाने के लिये आप इसका प्रयोग नहीं कर सकते। संभव ही नहीं है। अपने हित के लिये तो कर सकते हैं, मगर उस आपके हित से यदि किसी का नुकसान होता हो तो यह प्रयोग फलदायी नहीं होगा। अगला प्रयोग है उच्चाटन। उच्चाटन का अर्थ है कि एक व्यक्ति और दूसरे किसी व्यक्ति के बीच डिफरेंस पैदा कर देना, मतभेद करा देना। अब आप कहेंगे- हम ऐसा क्यों करें गुरुजी? आप ऐसा क्या हमें सिखा रहे हैं? मगर मैं कहता हूं कि कोई तुम्हारे सामने चाकू लेकर खड़ा हो जाये तो उसके सामने गिड़-गिड़ाने से कैसे काम चलेगा?
यह एक नीति है, चाहे आप इसको राजनीति कहें, चाहे कूटनीति कहें। इस डिफरेंस पैदा करने देने की क्रिया या मतभेद पैदा करने की क्रिया को विद्वेषण भी कहते हैं। फिर है मोहन और मोहन का अर्थ है सबको मोहित कर देने की क्रिया पूरी भीड़ को। एक अकेले व्यक्ति को नहीं। एक पूरे समूह को अपने अनुकूल लेकर अपने विचारों के अनुकूल कर चलने की क्रिया का नाम मोहन है।
और पांचवां तंत्र का प्रयोग मारण बताया कि यदि कोई चारा रहे ही नहीं तो मारण प्रयोग भी किया जा सकता है। मगर मारण का मतलब कोई चाकू मारना नहीं है। मारण तो साधु लोग अपने क्रोध का कर देते हैं तंत्र के द्वारा लोभ का मारण कर देते हैं। यह भी मारण है। शत्रुओं को एकदम से पददलित करना भी मारण प्रयोग है। शत्रु मर्दन की क्रिया भी मारण है। मारण का यहां मतलब मृत्यु नहीं होता। मारण का अर्थ है वह पददलित हो, पराजयी हो। ये पाचों प्रयोग हमारे जीवन के, हमारे भौतिक जीवन के आवश्यक अंग हैं जिनके माध्यम से हम जीवन को ज्यादा सुखमय बना सकते हैं और जब तक जीवन सुखमय नहीं बनेगा जब तक तनाव रहेगा, तब तक हम साधना नहीं कर सकते, जीवन में अग्रसर नहीं हो सकते, आध्यात्मिक धरातल पर पांव नहीं रख सकते। इसलिये उच्च साधनाओं की पृष्ठभूमि के लिये इनका प्रयोग करना पड़ेगा। आपके जीवन में अगर कलह होगी, भय होगा, तनाव होगा तो आप साधनाओं में एकाग्र नहीं हो सकते।
आप पूछ सकते हैं कि विद्वेषण जैसे प्रयोग की क्या आवश्यकता। अब मान लें आपकी लड़की किसी से प्यार करने लग गयी और आप बहुत परेशान हैं, बड़ी बदनामी सी हो रही है, आपको समझ नहीं आ रहा क्या करें, समझाने से वह समझे नहीं, आप जितना समझाते हैं, वह उतना ही जिद्द करने लगती है, आप हाथ जोड़ेंगे, समझायेंगे, इज्जत का वास्ता देंगे, तो वह तीसरे दिन घर से भाग जायेगी। अब आप क्या करेंगे? ऐसे समय में अगर आपको लगता है कि वह लड़का ठीक नहीं है और आपकी लड़की का भविष्य बरबाद हो जायेगा तो आप विद्वेषण द्वारा उन दोनों के बीच मतभेद कर सकते हैं। मगर तब, जब आपको इस लड़की से ज्यादा ज्ञान है और आपको मालूम है कि उसका जीवन असुरक्षित हो जायेगा। अभी इस लड़की को इतना विवेक नहीं है, भले-बुरे का ज्ञान नहीं है। ऐसी स्थिति में विद्वेषण अपने आप में एक विवेक पूर्ण साधना बन जायेगा।
ऐसी घटनायें तो सभी के जीवन में घटित हो रही हैं। कोई शत्रुओं से पीडि़त है और बिना कारण के ईर्ष्या वश शत्रु आपका सत्यनाश करने पर तुले हैं और उनके सामने असहाय अनुभव कर रहे हैं, तो विद्वेषण द्वारा उसके बीच मतभेद पैदा करके उनको कमजोर किया जा सकता है या मारण द्वारा उनको पराजित किया जा सकता है। और व्यक्ति ही नहीं, बीमारी का भी विद्वेषण किया जा सकता है, हटाया जा सकता है। यह विद्वेषण एक क्रिया बन सकती है रोगी और रोग में विच्छेद करने की। ये हमारे जीवन में, दैनिक जीवन में उपयोगी प्रयोग हैं। यों तो तंत्र में उच्चकोटि के सैकड़ों प्रयोग हैं, अष्टादश सिद्धि प्रयोग भी है। उन अट्ठारह सिद्धियों के प्रयोगों को प्राप्त कने के लिये, आप आगे आयें और आप मुझे छः महीने का टाइम दें और मेरे पास रहें और अगर मैं सिद्धि नहीं दे पाया तो मेरा गुरु होना व्यर्थ है।
मगर आप समय तो दें, संकल्प तो करें, आप आगे तो आयें। जब मैंने आपको आवाज ही दे दी, फिर रूकने की जरूरत नहीं है। केवल पोथी पढ़ने से कुछ प्राप्त नहीं हो सकता। जीवन को संवारने की तो एक क्रिया है और जहां तंत्र के प्रयोग हैं तो उन्हें सिद्ध करने के लिये सामग्री भी आवश्यक है। अगर मैं बोलूंगा तो माइक की आवश्यकता पड़ेगी ही पडे़गी। मैं युद्ध करूंगा तो मुझे तलवार, पिस्तौल चाहिये। बिना सामग्री तो साधना के युद्ध को नहीं जीता जा सकता, सफलता नहीं प्राप्त हो सकती। संकल्प शक्ति तो जरूरी है ही, गुरु का मार्गदर्शन भी जरूरी है, पर साथ-साथ साधना सामग्री भी उतनी ही जरूरी है। यह जब है तो इस प्रयोगों में आप सफलता प्राप्त कर सकते हैं। मगर एक बात फिर दोहरा दूं कि इर्ष्या वश या किसी को अकारण हानि पहुंचाने या तंग करने की दृष्टि से प्रयोग न करें क्योंकि अकारण आप इनका प्रयोग नहीं कर सकते। आपका चिंतन स्वस्थ हो, कहीं मलिनता न हो। गलत उद्देश्य से इन प्रयोगों के द्वारा सफलता संभव नहीं है।
समाज में तंत्र के विषय में अनेकों भ्रांतियां हैं। भ्रांतियां इसलिये हैं कि किसी को ज्ञान ही नहीं है या अधूरा ज्ञान है या गलत धारणायें हैं। तंत्र के द्वारा किसी का अकारण अहित नहीं किया जा सकता। स्वार्थ से लोभ से आप तंत्र का प्रयोग नहीं कर सकते और कुछ ढोंगी, पाखंडी स्वार्थवश कुछ करते भी हैं तो वह तंत्र नहीं हो सकता। कुछ भी हो सकता है पर तंत्र तो होता ही नहीं क्योंकि तंत्र का आधार दैविक शक्ति है और इसका प्रयोग गलत कार्य के लिये किया ही नहीं जा सकता।
कई और भी भ्रांतियां हैं जैसे कि देवी को बकरे की बलि चढ़ाना जरूरी है। ऐसा कहीं किसी शास्त्र में कोई उल्लेख नहीं आता। अभी कुछ समय पहले एक शिष्य ले गया अपने साथ एक मंदिर में और बोला- आप बस देखते रहना गुरुजी। बकरे के शरीर में देवी प्रकट होती हैं गुरुजी! मैंने सोचा- मेरे शरीर में देवी कभी प्रकट हुई नहीं और यहां बकरे के शरीर में देवी प्रकट हो रहीं हैं? वह गांव था छोटा सा, एक मंदिर था देवी का। सामने साल भर के बकरे के बच्चे को लाकर खड़ा कर दिया क्योंकि नवरात्रि में देवी को भेंट चढ़ाते हैं। यहां भी जोधपुर में राजा भैंसा चढ़ाते थे चालीस साल से, अब कुछ साल पहले बंद हुआ। यहां चामुण्डा के मंदिर, जोधपुर में यहां के महाराज कैसे भैंसा चढ़ाते थे, शायद आपको ज्ञान नहीं है। वे टीले के ऊपर भैंसे को खड़ा कर देते थे और धक्का दे देते थे। वह लुढ़क करके खत्म हो जाता था तो काट-काट कर खा जाते थे और चामुण्डा की जय हो, चामुण्डा की जय हो—! उस बकरे को खड़ा किया तो एक तरफ हम भी खड़े हो गये कि भई, देवी आये तो मैं भी दर्शन कर लूं। उन्होंने उस बकरे के ऊपर पानी डाला स्नान कराने के लिये, स्वाभाविक है कि पानी डालेंगे तो वह शरीर हिलायेगा ही, वह जैसे ही हिला, थोड़ा कंप कंपाया तो सब बोले- देखो गुरुजी! देवी आ गई, देवी आ गई।
और झट से उसकी गर्दन अलग कर दी। जहां पाखंड, वहां तो केवल उन पंडितों की खाने की क्रिया है। कहां तंत्र में लिखा है कि देवी के लिये बकरा काटा जायेगा या भैंसे को काटा जाये? अब कुछ साल से यहां भैंसा नहीं चढ़ रहा तो क्या चामुण्डा निर्जीव हो गई? अभी तक क्या जीवित थीं? जब मैंने यहा के महाराजा से पूछा कि अब क्या हो गया? जब भैंसा नहीं चढ़ता, तो वे बोले- आप तो गुरुजी विपरीत बातें करने लग गये। मैंने कहा- विपरीत बातें कहां हैं? मैं तो पूछ रहा हूं कि फर्क क्या पड़ा? ऐसा तंत्र में कहीं मलिनता नहीं है, घटियापन नहीं है। ओछापन नहीं है। श्रेष्ठता है, सात्विकता है, उच्चता है, सफलता है। पाखंडी, और ढ़ोंगी और सुलफा पीने वाले और दम लगाने वाले, भांग पीने वाले तो कई मिल जायेंगे, पर उनसे प्राप्त क्या होगा? ऐसे आदमी को एक थप्पड़ मारो तो उसका सारा तंत्र नीचे उतर जायेगा। तुम्हारा कहीं कोई अहित नहीं हो सकता, यह तो मैं तुम्हें गारंटी के साथ लिखकर दे सकता हूं।
ये सामान्य से प्रयोग है। और ये प्रयोग मैंने आपको क्यों बताये? इसलिये कि आप अपनी समस्याओं के समाधान के लिये उन पंडितों के पास नहीं भागते फिरें, किसी अन्य के पास नहीं भागते फिरें। उन्हें पच्चीस पचास रूपये देने से काम तुम्हारा नहीं बनेगा। उस जगदम्बा के सामने और उन देवियों के सामने हाथ जोड़ने से काम नहीं चलेगा। आप खुद ऐसे प्रयोग गुरु से प्राप्त करके अपनी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। मैं तो आपकी खुद की रोशनी आपके हृदय में दिखाना चाहता हूं इस ज्ञान के द्वारा। और इनके द्वारा आप अपनी भौतिक जीवन की समस्यायें भी दूर करें और आध्यात्मिक जीवन की समस्यायें भी दूर करें। आध्यात्म में भी आप ऊंचे उठेंगे तब, जब भौतिक जीवन की समस्यायें दूर हो पायेंगी। ये सब भौतिक की समस्याओं को दूर करने के अचूक प्रयोग हैं। ये पांचों प्रयोग ओर इनके मंत्र आप गुरु से प्राप्त कर सकते हैं और उनके द्वारा भौतिक जीवन की सभी समस्याओं को दूर कर सकते हैं।
मगर ये तंत्र प्रयोग हैं। तंत्र की एक विशेष प्रक्रिया होती है। मंत्र साधना में सब कुछ चल सकता है मगर तंत्र में नहीं चल सकता। एक छोटा बच्चा एकदम आकर मेरी गोद में बैठ जाये और पेशाब कर दे तो मैं उसे कोई थप्पड़ नहीं मार दूंगा। उसको ज्ञान ही नहीं है, छोटा सा बच्चा है। मगर एक बीस साल का व्यक्ति ऐसा करता है तो मैं थप्पड़ मार दूंगा। जब आपको पूरा तंत्र में जाना ही है तो आपको विशेष प्रक्रिया अपनानी ही पड़ेगी। आपको क्षमतावान होना पड़ेगा। अगर तंत्र में लिखा है कि रात्रि का समय उपयुक्त है तो रात्रि के समय ही करें। उसमें जो सामग्री की जरूरत है उसका प्रयोग करें। सम्मोहन में अलग माला का प्रयोग करना पड़ता है, वशीकरण में अलग माला का प्रयोग करना पड़ता है। जो माला बतायी है वह तो प्रयोग करनी ही पड़ेगी। मगर संसार की सर्वश्रेष्ठ और अद्वितीय माला पारद माला बतायी गयी है। पारे से निर्मित माला। सामान्य रूप से यह नहीं बन सकती। इसी प्रकार भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिये रूद्राक्ष माला सर्वश्रेष्ठ है।
क्योंकि भगवान शिव का रूद्राक्ष से सीधा संबंध है-रूद्राक्ष या रूद्र की आंख, रूद्र का नेत्र, तीसरा नेत्र। पारद का मतलब ही है सम्मोहन और वशीकरण। उच्चकोटि का चेतना युक्त बनने की क्रिया। वह भगवान शिव का पूर्ण सत्व है, वीर्य है, पूरे शरीर का निचोड़ है भगवान शिव का इसलिये पारे को ठोस करके उस पारद की अगर माला बनायी जाये तो वह सर्वश्रेष्ठ सिद्धिदायक सिद्ध होती है। यों तो और मालाओं से भी काम चल सकता है, यह नहीं है कि पारद माला के बिना कुछ सिद्धि प्राप्त हो ही नहीं सकती। मगर वह पारद माला अपने आप में अद्वितीय चीज है, एक दुर्लभ वस्तु है जो सामान्य रूप से उपलब्ध नहीं हो पाती। और न जाने कब जरूरत पड़ जाये। आज जरूरत पड़ जाये या छः महीने बाद एकदम से कोई साधु मिल जाये जो ऐसा प्रयोग बता दें और कहे, इसमें पारद माला की ही जरूरत पड़ेगी और संसार की कोई साधना नहीं, चाहे तिब्बती साधना हो, चाहे मंत्र साधना हो, चाहे तंत्र साधना हो, चाहे शैव साधना हो, चाहे औघड़ साधना हो जिसमें पारद माला से काम नहीं चल सके। कई अलग विधान हैं, तरीके हैं, पारद माला को पहनने से ही सम्मोहन की क्रिया प्रारंभ हो जाती है, अपने आप में सम्मोहन होने की क्रिया, अपने आप में पौरूषता युक्त होने की क्रिया, सौन्दर्य युक्त बनने की क्रिया। यदि आपने रसायन विद्या जानी है तो आपको ज्ञात होगा कि पारा अपने आप में स्वर्ण का प्रतिरूप है। स्वर्ण तो बहुत छोटा सा रूप है उसका, पारद तो पारस का रूप है। उच्चकोटि के योगी, उच्चकोटि के साधक, उच्च कोटि के व्यक्ति उस पारद माला का उपयोग करते हैं, पहनते हैं। किसी से मिलने जाते हैं तो अंदर पहने रहते हैं, फिर हो ही नहीं सकता कि दूसरा आपकी बात को मना कर दे, संभव ही नहीं है। आप चाहें तो प्रयोग करके देख लें। पूरे शरीर का ओज और बल उसको पहनने से इतना विकसित हो जाता है आप अनुभव कर सकते हैं।
यह तो आप जितना तंत्र के क्षेत्र में जायेंगे उतना ही नया ज्ञान प्राप्त होगा और मैंने आपको पांच प्रयोग तंत्र के बताये हैं वे तो अद्वितीय हैं ही मगर भूलकर भी उनका दुरूपयोग न करें। न हमारे जीवन का उद्देश्य है कि हम किसी को अहित पहुंचायें और न ही हमारे जीवन का उद्देश्य है कि हम किसी को दुःखी करें। मगर हमारा उद्देश्य है कि हम न दुःखी हों और न हमारा उद्देश्य है कि कोई हमें अपमानित करें। हम ऐसे साधु व्यक्तित्व नहीं बन सकते, बुद्ध बनने की जरूरत नहीं है कि कोई तुम्हें कुछ भी कहे, तुम गालियां खाते रहो। हम ऐसे कायर नहीं हैं। कायरता और अपमान से तो मौत ज्यादा अच्छी होती है। ऐसे जिंदा रहकर करेंगे भी क्या? एक लकड़ी धू-धू करती हुई दो महीने जलती रहे न रोशनी पैदा हो, न चिंगारी पैदा हो, ऐसी जिंदगी क्या काम की?
इसकी अपेक्षा तो एक झड़ाक से जली लकड़ी और रोशनी पैदा की, वह अच्छा है, चाहे एक सैकेण्ड के लिये की। जीवन ऐसा चाहिये। प्रकाशवान, क्षमतावान! और यह सब इन साधनाओं के माध्यम ही से संभव है। इसलिये संभव है क्योंकि मैं तुम्हें पोथियों की पढ़ी बात नहीं कर रहा हूं। यह मैं अपने जीवन के अनुभवों की बात कर रहा हूं। इसलिये मेरे कहने में सच्चाई है और प्रामाणिकता है। और ये जो पांच प्रयोग हैं ये मूलतः दुर्गा से सम्बन्धित प्रयोग हैं। दुर्गा अपने आप में तांत्रिक शक्ति ही है। संसार का कोई व्यक्ति आकर सिद्ध कर दे कि दुर्गा सप्तशती अपने आप में मांत्रिक ग्रंथ है। वह तो पूर्ण रूप से तांत्रिक ग्रंथ है। पहले श्लोक से लगाकर आखिरी श्लोक तक पूरा ही तंत्र पर आधारित ग्रंथ है।
दुर्गा खुद खड़ी होकर कहती है कि जो तंत्र की क्रिया है जो तंत्र की पद्धति है उसके द्वारा ही मुझे जाना जा सकता है। जो तांत्रिक है वह मुझे जान सकता है। जो स्वयं बलिष्ठ है कायर लोग उसके सामने नहीं खड़े हो सकते। जो तांत्रिक हैं, जो निष्ठावान हैं, जो ज्ञानवान हैं, जो गुरुवान हैं, जिनके अंदर चेतना है, जिनके अंदर प्रकाश है, जिनके अंदर रोशनी है वे भगवती जगदम्बा का वशीकरण कर सकते हैं, सामने साक्षात् उपस्थित भी कर सकते हैं और अपने अनुकूल करने की क्रिया कर सकते हैं। का केवल पाठ दुर्गा सप्तशती करने से कुछ नहीं होगा, सैकड़ों पडितों ने पाठ किया और पिछले 500 वर्षों से पाठ होता ही जा रहा है, उनको पूरा कंठस्थ है, उससे क्या होगा? उसको समझने की क्रिया होनी चाहिये, दुर्गासप्तशती के एक एक श्लोक में क्या व्याख्या है, अर्थ क्या है कौन सा चिंतन है, यह जानना आवश्यक है।
जो मैंने आपको ये पांच प्रयोग बताये हैं ये ऐसे सामान्य प्रयोग नहीं हैं, इनको मामूली समझने की जरूरत नहीं है। ये बहुत बहुमूल्य और उपयोगी हैं। जहां कील की जरूरत है, वहां कील ही काम आयेगी, तलवार नहीं काम आयेगी। आप चाहे कितने ही लखपति या करोड़पति हैं, आप तलवार पर कुर्ता नहीं टांग सकते, उसके लिये तो कील ही लगानी पड़ेगी आपको और जहां युद्ध करना है वहां कील से काम नहीं चलेगा, वहां तलवार की ही जरूरत पड़ेगी।
इसलिये किसी भी ज्ञान का प्रयोग हम अपने विवेक से करें। स्वार्थ से किसी के पैसों के लालच से या प्रतिस्पर्धा या ईर्ष्या से हम किसी का अहित न करें और हम किसी के द्वारा अपना अहित भी न होने दें। मैं दोनों बातें साथ-साथ जोड़ता रहता हूं। कोई हमारे सामने आंख तरेर कर बात न करे, इतनी हिम्मत दूसरे में भी नहीं होनी चाहिये। बोलेंगे तो हम बोलेंगे, क्षमतावान बनेंगे तो हम क्षमतावान बनेंगे क्योंकि अगर हम मंत्र सिद्ध हैं, हमारे पास सिद्धि है, हमारे पास क्षमता है तो हम बोलने की क्षमता भी रख सकेंगे, उनके सामने चाहे ऑफिसर हो, चाहे उच्च अधिकारी हो, चाहे समाज का कोई भी व्यक्ति हो। हम से ऊंचा फिर कोई नहीं है जिस दिन आप अपनी खुद की रोशनी में खुद को देखने की क्रिया कर लोगे, जब आपकी रोशनी पैदा होगी तो आप मुझे भी पहचान लोगे, अपने आपको भी पहचान लोगे, गुरु को भी पहचान लोगे, अपने ज्ञान को पहचान लोगे, अपनी चेतना को पहचान लोगे।
और ये जो पांच प्रयोग मैंने बताये हैं उनके मंत्र दुर्गा सप्तशती में ही छिपे हैं। आप पूरे शास्त्रों में ढूंढ़ लीजिये, आपको ये मंत्र कहीं नहीं मिलेंगे और आप दुर्गा सप्तशती में भी ढूंढ लीजिये आपको मिलेंगे नहीं और मैं कह रहा हूं कि उसी में है। आप बस पाठ करते रहें, समझ में आया नहीं पहला अध्याय, दूसरा अध्याय पढ़ते रहें। उस पाठ को करते रहने से क्या होगा? दुर्गा बेचारी क्या करेगी? पंडि़त जी आपके घर आकर पाठ करते हैं दुर्गा जहां खड़ी हैं। शाम को पंडित जी अपने पैसे लेकर घर चले गये, हुआ कुछ नहीं। आप आरती करते रहते है- जय दुर्गा मैया, जय दुर्गा मैया— और रोज पाव भर घी जला देते हैं। इससे कुछ नहीं होगा। आप साधना करेंगे तो दुर्गा को साक्षात् आना ही पड़ेगा। ये ऐसे मंत्र हैं। ये दुर्गा सप्तशती के मंत्र हैं। और दुर्गा सप्तशती में स्पष्ट रूप से लिखा है कि जब तक इन पांचों प्रयोगों को व्यक्ति सिद्ध नहीं कर लेता, तब तक वह सिद्धि पुरूष बन भी नहीं सकता। सिद्धि पुरूष बनने के लिये, जीवन को अनुकूल बनाने के लिये, जीवन को सुखमय बनाने के लिये जरूरी है कि हम इन पांचों प्रयोगों को सिद्ध करके सफलता प्राप्त कर सकें।
और जहां भौतिक जीवन में बाधाओं पर विजय प्राप्त करने के लिये जरूरी है कि हम इन पांचों प्रयोगों को सिद्ध करें, वहीं जीवन में निर्धनता, दैन्यता को मिटाने के लिये लक्ष्मी साधना भी उतनी ही आवश्यक है और लक्ष्मी साधना भी तंत्र का अभिन्न अंग है। लक्ष्मी का अर्थ है कि हम दरिद्र नहीं रहें। गृहस्थ को जहां लक्ष्मी की जरूरत है वहीं साधु को भी जरूरत है। संन्यासी को भी जरूरत है। वह भी शाम को आस लगाकर देखता है कि कोई खाना लेकर आये।
ये हमारे जीवन के सबसे ज्यादा दुर्भाग्यशाली क्षण थे जब हमें यह ज्ञान दिया गया कि निर्धनता में महानता है। यह हमारा दुर्भाग्य था। यह हमारे ग्रंथों का दुर्भाग्य था, यह हमारे लोंगों का दुर्भाग्य था। बुद्ध ने कुछ अहित नहीं किया, मगर बुद्ध ने कायर बना दिया। हमारे साधु संतों ने हमें बुजदिल बना दिया कि भूखे रहने से, एकादशी का व्रत रखने से भगवान सामने आकर खड़े होते हैं। यह हमारी कमजोरी है कि हम कहते हैं, गरीबी में ही जीवन की पूर्णता है। यह कोई श्रेष्ठता नहीं है। श्रेष्ठता इसमें है कि हम अपने आप में श्री सम्पन्न बनें। यदि आपके ऊपर कर्ज है तो आपको तनाव होगा ही और फिर चाहे मैं कितना भी चीखता रहूं, आप साधना कर ही नहीं सकते कैसे साधना करेंगे? आप माला लेकर बैठे रहेंगे और घर में क्लेश मचा रहेगा तो, कैसे आप साधना कर पाओगे? ऊपर कर्जा होगा तो रोज सुबह आपको पैदा होना पड़ेगा, रोज शाम को मरना पड़ेगा। सुबह पैदा हुये कि आज दिन ठीक बीतेगा, दस बजे फिर दरवाजा किसी ने खटखआया कि भई, किराये का क्या हुआ, फिर तीन बजे कोई और कर्जा मांगने वाला आ जायेगा।
तो जहां वे पांच प्रयोग आवश्यक हैं, लक्ष्मी प्रयोग भी उतना ही आवश्यक है। जहां ये तंत्र के माध्यम से उच्चतम प्रयोग हैं वहीं तांत्रिक विधि से उच्चकोटि की लक्ष्मी साधना भी है। हर साल आप दीवाली मनाते हैं। पिछले चालीस साल से मना रहे हैं और तेल के, घी के दीपक लगाते हैं और लक्ष्मी का चित्र लगाते हैं, नैवेद्य चढ़ाते हैं, आरती करते हैं, जय लक्ष्मी मैया, जय लक्ष्मी मैया, मेरा कर्जा दूर कर, मेरा कर्जा दूर कर। न लक्ष्मी आयी, न कर्जा दूर हुआ। और ऐसा आप पिछले चालीस साल से करते आ रहे हैं। ऐसा किसी गुरु ने समझाया ही नहीं कि कैसे कर्जा दूर होगा? ऐसी कब तक निर्धनता रहेगी? हमारे पास धन हो, खूब धनवान हों। हां धन है, तो हम अय्याश नहीं बन जायें। धन के माध्यम से हम किसी को नुकसान नहीं पहुंचा दें। मंदिर बनायें, दान दें, किसी श्रेष्ठ संस्था के लिये कार्य करें, अपने लिये कार्य करें, सम्पन्नता के साथ रहें, और उसके बाद भी अनासक्त भाव से रहें। संपन्नता में भी रहें परंतु अनासक्त भाव से रहें। सब कुछ होते हुये भी मोह न करें। पहनेंगे तो चार कपड़े ही। मगर निर्धनता अपने आप में जीवन का एक अभिशाप है जो आप भोगते रहें हैं और आपने यदि इसे दूर नहीं किया तो आपकी आगे की पीढ़ी भी भोगेगी। तुम्हारी पिछली पीढि़यों ने भी निर्धनता भोगी है। मुठ्ठी भर लोग ही धनवान हो पायें और जो धनवान बन गये वे बीमार भी बन गये। उनके पास सौ-सौ टेन्शन हैं। इसलिये धनवान बनें पर धन के प्रति अनासक्त रहें। अनासक्त रहेंगे तो तनाव होगा ही नहीं और इससे भी जरूरी बात, धन का सही प्रयोग करें। मैं आपको साधना की वह कुंजी दे देना चाहता हूं कि जिसके माध्यम से आप पूर्ण श्री सम्पन्न बन सकें। पिछले दस साल के आपने अपने जीवन को देखा है मेहनत की है, परिश्रम किया है, भाग दौड़ की है, व्यापार किया है, नौकरी की है और नौकरी करने के बाद आपने एक लाख बचाया या डेढ़ लाख बचाया, दो लाख बचा दिये। इतनी ही तो किया। चार छः कोट और सूट सिलवा लिये। मगर एक सम्पन्नता और ऐश्वर्य, पूर्ण ऐश्वर्य आप प्राप्त नहीं कर पाये।
पूर्ण ऐश्वर्य, जिसे सहस्त्र लक्ष्मी ऐश्वर्य कहा जाता है, अष्ट लक्ष्मी कहा जाता है धन, धान्य, कीर्ति, आयु, यश, जीवन हो, सम्मान हो, राज्य सम्मान हो, पुत्र हो, पौत्र हो, घर में शांति हो, सुख सौभाग्य हो, ऐश्वर्य हो, इन सबसे मिलकर जो चीज बनती है उसे लक्ष्मी कहते है। कागज के नोटों को लक्ष्मी नहीं कहते। एक मन में गर्व हो, उच्चता हो, श्रेष्ठता है, कीर्ति हो और पूर्ण वैभव हो और उसी दुर्गा सप्तशती में एक अद्वितीय लक्ष्मी साधना दी गई है जिसके माध्यम से आप सब प्राप्त कर सकते हैं और प्रामाणिकता के साथ प्राप्त कर सकते हैं।
ये सब प्रयोग पहले पांच और यह लक्ष्मी प्रयोग भौतिक जीवन के लिये आवश्यक है। दोनों का बैलेंस हो हमारे जीवन में भौतिकता भी हो, आध्यात्मिकता भी हो और भौतिकता के लिये सम्पन्नता जरूरी है। सम्पन्नता का अर्थ समझाया मैंने आपको। आपके पास पांच लाख रूपये हैं उसको लक्ष्मी नहीं कहते हैं। वह लक्ष्मी है ही नहीं। तुम्हारे घर में सुख-शांति, ऐश्वर्य, सौभाग्य हो, कर्जा नहीं हो, तुम्हारी व्यापार वृद्धि हो, तुम्हारी नौकरी में प्रमोशन हो, तुम्हारे पुत्र-पौत्र आज्ञाकारी हों, तुम्हारी पत्नी सहयोगी हो, सब स्वस्थ हों, घर में एक आनंदपूर्ण वातावरण हो। ऐसा लगे कि मैं घर का मुखिया हूं और घर में रह रहा हूं। और फिर समाज में सम्मान हो। प्रत्येक व्यक्ति सम्मान चाहता है। सम्मान भी लक्ष्मी है जिसे सम्मान लक्ष्मी कहा गया है, कीर्ति लक्ष्मी कहा गया है, यश लक्ष्मी कहा गया है।
यश के लिये लाखों मंदिर बनाये जाते हैं, दीवारें बनाई जाती हैं, भवन बनाये जाते हैं, पोथियां लिखी जाती हैं। आपके जीवन में नाम हो। पूरा भारतवर्ष आपको पहचान सके, परिचित हो सके। वह यश लक्ष्मी और कीर्ति लक्ष्मी के माध्यम से प्राप्त हो सकता है। और जिस प्रकार पारद शिवलिंग संसार का अद्वितीय विग्रह होता है। उसका घर में स्थापन आने वाली पीढि़यों के लिये सौभाग्य का चिह्न बनता है। एहसान मानेंगी आने वाली पीढि़यां कि मेरे पूर्वजों को एक गुरु मिला जो उनका मार्ग दर्शन कर सका, एक चेतना दे सका, एक मंत्र दे सका, एक विधि दे सका।
और आप प्रयोग करके देखें। मुझसे ये प्रयोग प्राप्त करें और करके देखें कि उन चित्रें के माध्यम से, जिनकी आप पूजा करते आये हैं और उस पारद लक्ष्मी के माध्यम से कितना एक डिफरेंस अगले छः महीने में आता है। अद्वितीय डिफरेंस सम्पन्नता में, श्रेष्ठता में और उच्चता में। ऐसा आपके जीवन में हो यही मेरी कामना है और आशीर्वाद है और आप स्वयं अनुभव करके देख सकते हैं कि पारद लक्ष्मी कितना अद्वितीय विग्रह है जो कोई बना नहीं सकता, संभव नहीं है। एक विग्रह हो, पूर्ण मंत्रश्चेतना युक्त हो और फिर वह लक्ष्मी मंत्र हो जो दुर्गासप्तशती का मूल आधार है।
मार्कण्डेय ने कहा है कि दुर्गा सप्तशती के सारभूत एक एक अक्षर को लेकर यदि उसकी माला पिरोयी जाये तो उसके मूल में पारद लक्ष्मी के विग्रह की पूरी साधना है।
हम श्री सूक्त पढ़ते हैं, लक्ष्मी सूत्र पढ़ते हैं, यह क्या है? उसमें भी पारद लक्ष्मी के विग्रह का स्पष्ट चिंतन है कि हम कैसे पारद लक्ष्मी बनाये, कैसे उसका स्थापन करें और कैसे उसका पूजन करें आने वाली पीढि़यों को धरोहर देने के लिये। आपके पूर्वज आपको क्या देकर चले गये? एक दो लाख या दो चार बच्चे। आप भी क्या देकर चले जायेंगे? आप दे सकते हैं ऐसी चीज जो उनकी आने वाली पीढि़यों के लिये भी सौभाग्यदायी होगी।
और आप गुरु से ये तंत्र पर आधारित सभी प्रयोग प्राप्त कर सकें, ऐसा आपका सौभाग्य हो और आप पूर्ण भौतिक उच्चता और श्रेष्ठता प्राप्त करते हुये आध्यात्मिक धरातल की ओर अग्रसर हो सकें। ऐसा ही मैं आशीर्वाद देता हूं कल्याण कामना करता हूं।
सद्गुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी
It is mandatory to obtain Guru Diksha from Revered Gurudev before performing any Sadhana or taking any other Diksha. Please contact Kailash Siddhashram, Jodhpur through Email , Whatsapp, Phone or Submit Request to obtain consecrated-energized and mantra-sanctified Sadhana material and further guidance,