





आज का मनुष्य अनेक विकट समस्याओं से घिरा है, आज के मानव को प्रतिस्पर्धा के इस संसार में जीवन सुचारू से व्यतीत करने के लिये क्षमता से अधिक संघर्षं करना पड़ रहा है। जिसके कारण वह शारीरिक और मानसिक रूप से जर्जर होता जा रहा है। जीवन की आवश्यकताओ ने उसे इस प्रकार जकड़ा हुआ है कि प्रयास कर भी वह इस जकड़न से मुक्त नहीं हो पा रहा है। इन कारणो से धीरे-धीरे उसका साधनाओं और ईश्वर से विश्वास उठता जा रहा है। जबकि ऐसा चिंतन उसे और अधिक पतन की ओर ले जाती है। ऐसा विचार करने से अधोगति ही प्राप्त होती है।
क्योंकि साधना की सफलता व असफलता साधक के भाव, श्रद्धा और विश्वास पर निर्भर होती है। यदि किसी के प्रति हमारी आस्था ही ना हो तो उससे अनुकूलता की कैसी अपेक्षा? इसलिये हमारा प्रयास अटूट श्रद्धा से युक्त होना चाहिये, मन में संशय कदापि हमें उच्चता नहीं प्रदान कर सकती है। छोटी-छोटी बरसात की बूंदे भी कुछ समय में ही विशाल नदी का स्वरूप ले लेती हैं। इसी तरह हमारे निरंतर प्रयास करने पर हम एक दिन अवश्य अपनी समस्याओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं, प्रश्न तो सिर्फ इतना ही है कि हमारा प्रयास सही दिशा में, सही समय पर हो।
जीवन का प्रत्येक क्षण अपनी एक विशिष्टता लिये हुये होता है। जीवन में सफलता तब तक संभव नहीं है, जब तक श्रेष्ठ समय का ज्ञान ना हो, क्योंकि प्रत्येक क्षण अपने-आप में एक अलग महत्व लिये होता है।
धन त्रयोदशी (कुबेर धनदा दिवस) अपने आप में एक श्रेष्ठतम दिवस है। एक ऐसा ही श्रेष्ठतम अवसर है जो गृहस्थ जीवन के लिये अत्यधिक महत्वपूर्ण है। सामान्य रूप से धनतेरस पर्व को जनमानस नवीन वस्तु खरीद कर परंपरागत रूप से मनातें है। लोगों में यह धारण बनी हुयी है कि धनतेरस के दिवस पर नवीन वस्तु खरीदकर ले आओ तो वर्ष भर वस्तुओं का आगमन बना रहता है। लेकिन अध्यात्म तो यह कहता है कि लक्ष्मी को अपने यहां ले आओ जिससे वर्ष भर लक्ष्मी का स्थायित्व बना रहे। इसके लिये आवश्यक है कि हम साधनाओं को अपने जीवन में जाग्रत करें, सम्पन्न करें।
विश्व की श्रेष्ठतम साधनाओं में ऐश्वर्य महालक्ष्मी तात्रोक्त कुबेर साधना महत्वपूर्ण साधना है। यह साधना गृहस्थ जीवन की नींव है, जिस पर यह भौतिक जीवन टिका हुआ है। महालक्ष्मी यदि धन की प्रदाता हैं, तो भगवान कुबेर धन के कोषाध्यक्ष हैं। महालक्ष्मी की कृपा से हमें धन की प्राप्ति होती है, तो वहीं कुबेर यह निर्धारित करते हैं, धन की रक्षा और निरंतर वृद्धि कैसे हो। इसका लेखा-जोखा इन्हीं के पास है। इसीलिये अतुल्य धन प्राप्ति के लिये कुबेर की साधना अनिवार्य है। जिनकी आराधना करने से समस्त देव लोक में श्री तथा सम्पन्नता स्थापित है। कुबेर अपने विनम्र स्वभाव के कारण ही शिव की कृपा से यह पद प्राप्त कर पाये और अपने इसी स्वभाव के कारण वे शीघ्र ही प्रसन्न होने वाले देव हैं। प्रत्येक साधारण मानव हो या देवता लक्ष्मीवान, ऐश्वर्यवान बनना उसके हृदय की आकांक्षा रहती है, वे शीघ्र ही श्री सम्पन्न बनने का साधनात्मक प्रयास करते हैं।
आज चाहे व्यापार कार्य हो, जीविकोपार्जन का कार्य हो, धार्मिक कार्य हो या सामाजिक कार्य प्रत्येक की धुरी धन पर ही आधारित है। ऐसा नहीं है, कि पूर्व काल में धन का महत्व नहीं था, हमारे ऋषियों, योगियों ने भी धन प्राप्ति के लिये साधनायें सम्पन्न की और अपने आश्रम को वैभव युक्त बनाया। स्वयं महाराज दशरथ को जब युद्ध हेतु धन की आवश्यकता पड़ी, तो उनकी इस आवश्यकता की पूर्ति उनके कुल गुरु वशिष्ठ ने की, क्योंकि वे श्री सम्पन्न थे, उनके आश्रम में पन्द्रह बीस या सौ शिष्य नहीं थे अपितु कई हजार शिष्य थे, जिनका भरण-पोषण महर्षि वशिष्ठ स्वयं करते थे। दशरथ को जब भी धन की आवश्यकता पड़ती, महर्षि वशिष्ठ उसे अवश्य ही पूर्ण करते थे।
इससे तो यह सिद्ध होता है, कि हमारे ऋषि भिक्षुक प्रवृत्ति के नहीं थे, अपितु वे श्री सम्पन्न तथा वैभव युक्त थे। वर्तमान समय की स्थिति पूर्व काल की स्थिति से पूर्णतः विपरीत है, उस काल में अथाह धन-सम्पदा थी, व्यक्ति को अपनी इच्छा पूरी करने के लिये गिड़गिड़ाना नहीं पड़ता था, प्रत्येक व्यक्ति स्वयं-समर्थ था। इसका कारण था, उच्चकोटि का तंत्र, जिसके आधार पर ऋषियों ने दीनता नहीं दिखाई। पूर्व काल में अध्यात्म जीवन का केन्द्र बिन्दु था, धन गौण था, किन्तु वर्तमान समय में व्यक्ति के जीवन का केन्द्र बिन्दु धन हो गया है, अध्यात्म गौण। उसे सामान्य आवश्यकताओं के लिये भी धन पर आश्रित रहना पड़ रहा है। आज व्यक्ति बिना धन का उपयोग किये किसी प्रकार का कोई ज्ञान नहीं प्राप्त कर पाता है, पौष्टिक भोजन प्राप्त करना बिना धन के उसके लिये स्वप्न बन जाता है। प्रत्येक साधारण-सी वस्तु को प्राप्त करने के लिये भी धन की आवश्यकता पड़ती ही है। वर्तमान युग में व्यक्ति की श्रेष्ठता, उच्चता, योग्यता का आकलन धन से किया जाने लगा है, क्योंकि व्यक्ति के जीवन में आवश्यकतायें इस प्रकार बढ़ गयी हैं, जिन्हें वर्तमान सामाजिक परिवेश में नहीं चाहते हुये भी उन आवश्कताओं का बोझ ढोना पड़ता है।
भौतिकता प्रधान युग में यदि व्यक्ति श्री हीन है, तो उसके जीवन का कोई अर्थ नहीं रह जाता है, वह समाज की अनेक महत्वपूर्ण आवश्यकताओं से वंचित होता है। धन के बिना व्यक्ति अपने जीवन के मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकता। वर्तमान युग में प्रथम आवश्यकता धन की है और इस आवश्यकता को पूरा करने के लिये धन से सम्बन्धित तीव्र साधना की है। व्यक्ति अपने पुरूषार्थ से तो कार्य करता ही है, किन्तु वह यदि दैवीय शक्ति और कृपा प्राप्त कर ले तो उसके अभीष्ट सरलता से पूर्ण होने लगते हैं और मार्ग की बाधायें समाप्त हो जाती हैं। जीवन में धन को पूर्ण करने की सर्वश्रेष्ठ ऐश्वर्य महालक्ष्मी तांत्रोक्त कुबेर साधना है। जिसे सम्पन्न कर व्यक्ति अपने जीवन को सरल सुख-समृद्धि और श्री युक्त बना सकता है।
वैश्रवण साधारण ऋषि पुत्र थे, जिन्होंने अखण्ड तपस्या कर भगवान शिव से देवताओं के कोषाध्यक्ष का पद प्राप्त किया। उनको कोषाध्यक्ष का पद देकर भगवान ने उनको कुबेर नाम से सम्बोधित किया। जिनके संरक्षण में धन का अजस्र प्रवाह होता है। इसीलिये कुबेर साधना सम्पन्न करनी आवश्यक है, एक बार यदि कुबेर की कृपा प्राप्त हो जाये तो धन का मार्ग अवरूद्ध नहीं हो सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इनकी साधना करने से व्यक्ति को अतुल्य धन की प्राप्ति होती है। चारों ओर से धन आगमन का मार्ग प्रशस्त होता है।
धन त्रयोदशी से अमावस्या तक का यह तीनों दिवस साधनात्मक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण और फलदायी है। इन चैतन्य दिवसों पर इस विशिष्ट तात्रोक्त कुबेर साधना सम्पन्न करने से सफलता प्राप्त होगी ही, यह निश्चित है। जब सम्पूर्ण पृथ्वी श्री हीन हो गई थी, ब्राह्मण, वाणिक आदि व्यग्र हो गये, देवताओं की सम्पन्नता भी ह्रास होने लगी, तब समस्त देवी-देवताओं तथा ऋषिगण गुरु वृहस्पति के पास गये, तो उन्होंने कहा धन त्रयोदशी पर लक्ष्मी को प्रसन्न करने हेतु तात्रोक्त कुबेर साधना सम्पन्न करो, अवश्य ही पूर्ण सम्पन्नता युक्त होंगे।
हमारे किसी भी ऋषि ने अपूर्णता के साथ जीवन नहीं जिया। अपितु पूर्ण दम-खम के साथ जिया, तो हम फिर क्यों गिड़-गिड़ायें, क्यों अन्य लोगों के समक्ष रोना रोयें, कि क्या करूं? व्यक्ति यदि दृढ़ निश्चय कर लें, तो वह सम्पन्नता प्राप्त कर ही लेगा। जब व्यक्ति अपने पुरूषार्थ के साथ-साथ देवताओ की कृपा भी प्राप्त कर लेता है, तो फिर वह अपने क्षेत्र में अद्वितीय बन जाता है। उच्चता के श्रेष्ठ शिखर पर पहुंच जाता है, जीवन में सम्पन्नता, वैभव प्राप्त कर लेता है।
श्री व सम्पन्नता प्राप्त करने का अर्थ मात्र रूपया पैसा नहीं होता अपितु गृहस्थ के लिये यश, सम्मान, व्यापार में उन्नति आदि भी होता है। इस साधना को सम्पन्न करने पर व्यक्ति के निम्न उद्देश्यों की पूर्ति होती है।
ध्यान करते हुये पुष्प अर्पित करें –
मनुजबाह्य विमान वरस्थितं, गरुड रत्ननिभं निधिनायकम् ।
शिवसखः मुकुटाविभूषितं, वरगदे दधतं भग तुदिलम ।।
कमल गट्टे की माला से निम्न मंत्र की 5 माला मंत्र जप 3 दिन तक करें, अर्थात् (दीपावली) की रात्रि तक मंत्र जप करें।
जप समाप्त होने पर पुनः पुष्प अर्पित करते हुये साधना में हुई त्रुटियों के लिये क्षमा मांग लें।
साधना समाप्ति के पश्चात् यंत्र को लाल वस्त्र में बांधकर तिजोरी में रख दें। तात्रोक्त नारियल तथा माला को लाल वस्त्र में बांध कर नदी में प्रवाहित करें। सवा महीने पश्चात यंत्र को भी नदी में प्रवाहित कर दें।
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