





‘Weaklings have no place in the world’ दुर्बलों के लिये संसार में कोई स्थान नही है। जिसे अपने पूरी शक्ति का ज्ञान नही है, उसे संसार भार स्वरूप लगता है और उसे संसार में कहीं भी ठिकाना नहीं मिलता। क्योंकि उसे स्वयं की शक्ति पर आत्मविश्वास नहीं होता। परमात्मा ने किसी को निर्बल या बलवान् नहीं बनाया है। आप अपनी अवस्था को जैसी चाहो वैसी बना सकते हो। आप कहोगे कि हमारे प्राचीन, ऋषि, मुनि, महात्माओं में शक्तियों और सिद्धियों का भण्डार था। इन बातों के राग अलापने से कोई उन्नति का मार्ग नहीं प्रशस्त होगा। उनमें जो सिद्धियां, शक्तियां थीं वह सभी मानव में समान रूप से हैं।
प्रयत्न से, प्रयास से, पुरूषार्थ, परिश्रम, तप, साधना और भीतर छिपी शक्ति को जाग्रत कर जीवन में उन्नति प्राप्त होती ही है, शक्ति सम्पन्न होने पर किसी के सामने गिड़गिड़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, आप स्वयं में इतने समर्थ हो सकते हो कि जीवन की सभी विषमताओं, परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर सको। यही शक्ति तत्व का भाव है और इसी भाव को समझना है, जानना है। जब तक शक्ति तत्व को समझा नहीं जायेगा, जीवन में परिवर्तन संभव नहीं।
कोई इसे पराशक्ति, ज्ञान शक्ति, इच्छा शक्ति, क्रिया शक्ति कहता, कोई चिति शक्ति कहकर पुकारता है, कोई जगन्माता, जगदम्बा, जगत् जननी भाव से स्मरण करता है। यही आनन्दमयी शक्ति ही ब्रह्माण्ड की चेतना शक्ति है, जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड चलायमान है। नायमात्मा बलहीनने लभ्यः शक्तिहीन को न आत्मा की और न परमात्मा की प्राप्ति हो सकती है। इसलिये जीवन में शक्ति की उपासना अनिवार्य है। भौतिक और आध्यात्मिक सभी पूर्णता शक्ति द्वारा ही संभव है।
शक्ति को आत्मसात करने का पहला सूत्र- बलि देना है, किन्तु हिंसात्मक नहीं, अपने अहंकार रूपी मस्तक को प्रेम रूपी तलवार से पृथक करके माँ जगत् जननी के चरणों में समर्पित करना ही श्रेष्ठतम बलि है और इसी बलि का शास्त्रों में उल्लेख है। जीव बलि का शास्त्रों में कहीं कोई उल्लेख नही है। शास्त्र जीव बलि का किसी भी रूप में समर्थन नहीं करते व ना ही यह किसी दृष्टि से उचित है।
आद्या शक्ति तुच्छ से तुच्छ कीट, पशु और महान् से महान प्राणी, ब्रह्म, विष्णु, महेश सब में विद्यमान है, उनका निवास सब प्राणियों में है, सब उनकी प्रिय संतान हैं, वे सबकी रक्षा और पालन अपने ऊपर अनेक कष्टों को सहन कर करती हैं। इसलिये नवरात्र पर्व उस महान मातृ शक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन पर्व है। मातृ शक्ति के वात्सल्य को नमन करने का श्रेष्ठतम दिवस है। संसार में हमें जो भी मातृ वात्सल्य प्रेम की प्राप्ति होती है, चाहे वह माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी अथवा गुरु या ईष्ट से प्राप्त होती है, यह उन्हीं आद्या शक्ति की कृपा होती है।
वात्सल्य का तात्पर्य है, वह आत्मीय प्रेम जो सिर्फ प्रदान करने में विश्वास रखता है। एक माँ अपने संतान से जो लगाव, स्नेह, प्रेम रखती है, उसमें कुछ भी पाने की अपेक्षा नहीं होती। वह सिर्फ अपने संतान की प्रसन्नता ही चाहती है। इसलिये संसार में मातृ प्रेम को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। जिसकी कोई तुलना है ही नहीं। यह प्रेम सभी स्त्री-पुरूष को समान रूप से प्राप्त होता है। एक स्त्री के भीतर जो मातृत्व का भाव होता है, वह उन्हीं माँ जगत् जननी से प्रादुर्भाव हुआ है। माँ के नेत्रें में किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं होता। वे सबका कल्याण करती हैं।
आप सिर्फ मिट्टी के पुतले नहीं हो, हाड़-मांस और रक्त के थैले नहीं हो, निर्जीव मुर्दे के समान नहीं हो, आप एक सजीव शक्ति सम्पन्न चैतन्य आत्मा हो। आपके जीवन का लक्ष्य विशेष उद्देश्यों को पूर्ण करना है। प्रत्येक मनुष्य में एक दैवीय शक्ति छिपी हुयी है और वह सब कुछ कर सकता है। समस्त मानसिक और शारीरिक निर्बलताओं पर विजय प्राप्त कर सकता है। यह शक्ति आपके भीतर गुप्त है। इसे जाग्रत कर ही आप अपने जीवन के उद्देश्य को पूर्ण कर सकते हो।
प्रत्येक मनुष्य अन्नमय और प्राणमय कोष पर आधारित है। उसके भीतर दो तत्व हैं- जड़ और चेतन। जड़ रूप में स्थूल शरीर है, सूक्ष्म शरीर उसकी चेतना है। भीतर जो शक्ति है, उसके भी दो प्रकार हैं- स्थूल शक्ति और सूक्ष्म शक्ति। इन दोनों शक्तियों की भिन्न-भिन्न श्रेणियां हैं और वे श्रेणियां भी भिन्न-भिन्न परिणाम और शक्ति वाली हैं। जिस शक्ति के द्वारा व्यक्ति चलता, फिरता, क्रिया करता है, उसका मूल स्रोत है उसका भोजन। भोजन एक प्रच्छन्न शक्ति होती है, जो सूर्य के रश्मियों से शक्ति संचित करती है। इसे सरलता से समझो- दाल, चावल, गेहूं अन्य जो भी पदार्थ हम ग्रहण करते हैं, जिससे हमें ऊर्जा मिलती है, वे सभी पौधे सूर्य की रश्मियों से शक्ति संचित करते हैं और श्वास के द्वारा हम जो ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं, वह ऑक्सीजन भोजन में सुप्त, निष्क्रिय शक्ति को सक्रिय करता है। फिर इसी शक्ति के द्वारा मनुष्य अपने सभी कार्य करता है।
जब मनुष्य अपनी आसुरी एवं तामसिक वृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है और अपनी सात्विक, बौद्धिक अथवा उच्च वृत्तियों से परिचित हो जाता है और अपनी उदात्त शक्ति का विकास करने लगता है, तभी वह ईश्वर के साथ तादात्मय स्थापित करने योग्य होता है।
ईश्वर जब क्रिया शून्य होता है जब वह ‘एकमेवा द्वितीयम्’ रहता है। जब उसे सृजन की इच्छा शक्ति होती है तब वह क्रियाशील हो जाता और उसकी शक्ति स्त्री के आकार में व्यक्त होती है। इसी को इच्छा शक्ति कहते हैं। तब उसकी चित्-शक्ति अथवा ज्ञान शक्ति का विकास होता है, जिससे ब्रह्मण्ड का मानसिक चित्र खिंच जाता है। इसके बाद उसकी क्रिया शक्ति के द्वारा सृष्टि की क्रिया होती है। ईश्वर की इन्हीं तीन शक्तियों के अनुरूप मनुष्य की तीन मानसिक क्रियायें भी होती है। जिनके नाम है। संवेदन (अनुभव करना), ज्ञान और इच्छा। इच्छा का ही परिणाम क्रिया है। मनुष्य को अपनी इन शक्तियों को विकसित करने के लिये प्रयत्न की आवश्यकता होती है।
जब मनुष्य को किसी घोर कष्ट का अनुभव होता है। कोई संताप जब उसे घेरता है, जब वह हृदय को पीड़ा देने वाले समाचार सुनता है, चिंतन करता है, तब वह सोचने लगता है कि सांसारिक सुखों से भी उच्च वस्तु है या नहीं? तब उसे तलाश होती है किसी ऐसे वस्तु कि जो उसे शाश्वत शांति और आनन्द दे सके। तभी उसकी दृष्टि अपने भीतर की ओर जाती है। वह अपनी प्रकृति का विश्लेषण करने लगता है और इस बात का अनुभव करता है कि उसके अन्दर एक महान, उच्च, दिव्य, उदात्त, शाश्वत शक्ति है और यह निश्चय करता है कि उसे शक्ति को जागृत चाहिये, उसके विकास के लिये प्रयत्न करना चाहिये। तब उसे यह बोध हो जाता है कि वह शरीर मात्र या पंचकोषो का पुतला मात्र नहीं है, शरीर तो उसे अपने वास्तविक स्वरूप से परिचित कराने का मात्र साधन है। वह जान जाता है कि उसके अन्दर जो शक्ति बैठी है, उसी का प्रभुत्व उस पर होना चाहिये, शेष सभी उसकी अधीनता में रहें। वही शक्ति ही सर्वोपरि है। लेकिन यह सब क्रिया हम घोर कष्ट, संताप को सहने के यदि पूर्व कर लें तो जीवन का एक बहुमूल्य भाग जो व्यर्थ के क्रिया-कलापों में चला जाता है। जिसका उपयोग हम अपनी शक्ति को जाग्रत और उदत्त करने में कर सकते हैं। तो इसी जीवन में अमृत्व का उपभोग कर सकते हैं। सत्-चित्त आनन्द को प्राप्त कर सकते हैं।
यदि माँ को रिझाना है, तो शुद्ध आचरण करो, सद्- चिंतन में लीन रहो। शुद्ध विचार अखण्ड हृदय में जाग्रत रखो। आप सभी अपनी शक्ति को जाग्रत करो, शक्ति का संचय करो, शक्ति की ही उपासना करो, आपकी शक्ति ही आपका जीवन है। शक्ति ही धर्म है, शक्ति ही सत्य है, शक्ति की सर्वत्र आवश्यकता है। बलवान, निर्भय, साहसी, आत्मविश्वासी, स्वतंत्र व शक्तिशाली बन सको और अपने जीवन को उर्ध्वगति की ओर अग्रसर कर सको यही आशीर्वाद् आप सभी को!
आपकी माँ
शोभा श्रीमाली
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